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Thursday, 16 December 2010

मेरे बाग के फूल..................

मेरे बाग के फूल
डाली से टूट भी जाए तो
मुरझाते नहीं है।
पँखुड़ी-पंखुड़ी अलग हो जाए
तो भी
खुशबू ही विखेरते हैं।

Wednesday, 17 November 2010

फासले दिल के बहुत हो गए................

फासले दिल के बहुत हो गए है
अब तन्हा-तन्हा रास्ता तय करना है
यादों के जंगल से निकलकर
नया सपनों का शहर देखना है

क्या होगा जो तुम नहीं हमसफ़र तो
थे हम कहा तुम्हारे ही साथ
है थोड़ा मुश्किल काम मगर
अकेले करके होगा सख़्त अपना ही हाथ

जीना भी सीख लेंगे अकेले
पर कभी नहीं पुकारेंगे तुम्हें
जो हमपर नहीं भरोसा था
तुमसे तो दूर रहने की उम्मीद करेंगे।

Tuesday, 19 October 2010

रंग जिन्दगी के...........

कैसे-कैसे रंग ज़िन्दगी के
आँखों में उतरते जाते है
कुछ रंग आखों को चमकाते है
कुछ तिरछे कर देते है
कुछ जुगनुओं की तरह
इधर-उधर पलकों को नचाते
कुछ विस्मय में डाल देते है
कुछ काजल धो देते है
तो कुछ सिर्फ थोड़ा गिला करते है
ज़िन्दगी के ये रंग आँखों में सदा रहते है
जब नहीं रहते तो अँधेरा कर देते है
मन में समाकर वो फिर सपना बनकर आँखों को जगाते रहते है
कैसे-कैसे करके ये रंग ज़िन्दगी के
आँखों में उतरते जाते है।

Friday, 1 October 2010

प्रतिभा राय की स्त्री चेतना।

प्रतिभा राय की स्त्री चेतना द्रौपदी के सन्दर्भ में ।



‘द्रौपदी’ प्रतिभा राय जी की औपन्यासिक कृति है। इस उपन्यास में लेखिका प्रतिभा राय जी ने महाभारत की नायिका द्रौपदी को आधुनिक संदर्भ में देखा है। इसकी मूल कथा वस्तु महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत तथा उड़िया महाभारत है।
जब भी कोई रचनाकार किसी पौराणिक कथा को या पुराण को अपनी रचना के लिए चुनता है तो उसके सामने दोहरी समस्या आ जाती है। ये दोहरी समस्या है स्थापित सत्य की सुरक्षा तथा नयी चेतना की अभिव्यक्ति। इन दोनों बातों का ध्यान रखना रचनाकार के लिए आवश्यक होता है। परन्तु कभी-कभी अतिशय क्रान्तिकारी चेतना के चलते स्थापित सत्य को विध्वंस कर दिया जाता है। ‘द्रौपदी’ उपन्यास इसी प्रकार की रचना है जिसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी सम्बन्धी समस्त पारम्पारिक स्थापित सत्य को विध्वंस करते हुए नए आधुनिक दृष्टिकोण को स्थापित किया है। इसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के सम्बन्ध में जो पाँच पति वरण करने के कारण जो लोगों के मन में उसके प्रति घृणा भावना तथा उसके लिए जो उपहास्पाद भाव है उसे मिटाते हुए उसके सतीत्व एवं महानता को नए आयाम देते हुए स्थापित किया है।
द्रौपदी महाभारत ही नहीं, भारतीय जीवन तथा संस्कृति का एक अत्यन्त विलक्षण और महत्त्वपूर्ण चरित्र है – परन्तु साहित्य ने अब तक उसे प्रायः छुआ नहीं था।........कृष्ण समर्पित तथा पांच पांडवों को ब्याही द्रौपदी का जीवन अनेक दिशाओं में विभक्त है, फिर भी उसका व्यक्तित्व बंटता नहीं, टूटता नहीं, वह एक ऐसी इकाई के रूप में निरन्तर जीती है जो तत्कालीन घटनाचक्र को अनेक विशिष्ट आयाम देने में समर्थ है।1 (भूमिका) प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में द्रौपदी के जरिए नारी मन की वास्तविक पीड़ा, सुख-दुख और व्यक्तिगत अन्तर्सम्बन्धों की जटिलता आदि को गहराई से प्रस्तुत की है। इस उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने स्वयं द्रौपदी के दृष्टि से महाभारत के पहले से चले आ रहे कौरव-पाण्डव के युद्ध तथा द्रौपदी के प्रति सभी के द्वारा किए गए अन्याय को, महाभारत के बाद पंच पाण्डवों तथा द्रौपदी के महाप्रस्थान तक की सम्पूर्ण कथा को दर्शाया है। प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए अपनी स्त्री- चेतना को प्रस्तुत किया है।
प्रतिभा राय की स्त्री-चेतना द्रौपदी के संदर्भ में जो है उसको समझने के लिए हमें यह जान लेना आवश्यक है कि यह उपन्यास उन्होंने क्यों लिखा? वास्तव में प्रतिभा राय जी ने यह उपन्यास इसलिए लिखा था क्योंकि उनके किसी परिचित महिला की बहन जिसका नाम कृष्णा था जो अपने दुष्चरित शराबी पति के अत्याचार से पीड़ित हो अलग रह रही थी। उसने अपने आत्मीय जनों के कहने पर पुनर्विवाह किया। दूसरे विवाह के बाद वह सुखी थी। पर विडम्बना यह हुई कि उससे सहानुभूति रखने वालों ने ही कृष्णा के दुबारा विवाह करने के बाद कहते थे कि- वाह नाम ही जब कृष्णा है, दूसरा पति कर ही तो सुखी हो सकी। अरे, कभी कृष्णा ने पाँच पति वरण किये, फिर भी सन्तुष्ट न हो कर्ण एवं कृष्ण के प्रति अनुरक्त हुई।2 (पृ.सं. 262) इस बात पर प्रतिभा राय जी को दुख हुआ कि किस तरह लोग बिना मूल बात को जाने अपनी संस्कृति को अज्ञानवश निंदित करते रहते है। उनका इस बात पर कहना था कि – द्वापर की असामान्य विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण नारी कृष्णा के प्रति ऐसी विचार-शून्य बात मेरे दुख की जड़ में थी। यह किसी का व्यक्तिगत मत हो सकता है। पर हम कृष्णा को कितना जानते है? कितना ज्ञान है हमें महाभारत के महत्त्व और उस महान संस्कृति का? मूल संस्कृत या उसका भाषांतर, या सरला दास रचित उड़िया महाभारत को कितनों ने भली-भांति पढ़ा है? अंधे हाथी देखने बैठे हैं, उस तरह महाभारत की महान आख्यायिका खुद पढ़े बिना सुनी-सुनाई बात पर हम अपनी संस्कृति पर छींटाकशी कर बैठते हैं।3 (पृ.सं. 263)
सच ही है कि अँधों की तरह हम अपनी संस्कृति के सत्य को ही बिना जाने कुछ न कुछ कहते रहते है। इस उपन्यास को लिखते समय प्रतिभा राय जी ने यह बात ध्यान में रखा कि हमें हमारी संस्कृति, परम्परा तथा इस महाभारत के मूल बातों तथा रहस्यों को उजागर किया जाए जिससे की यह सिद्ध हो सके कि द्रौपदी सचमूच में ही महा सती स्त्री थी कुछ और नहीं। जो कुछ उसके जीवन में हुआ विशेषकर उसके विवाह के समय उससे वह कम आहत नहीं हुई थी। बल्कि अपने जीवन में घटे इस अस्वभाविक घटना ने उसे स्तभ्ध कर दिया था। वह भी उस काल में जब किसी स्त्री के लिए एक ही पति का विधान था। जहाँ स्त्री को अपने पति, चाहे जैसा भी हो, उसके अलावा किसी अन्य का ध्यान भी मन में लाना पाप है। वह काल जिसमें स्वयं नारी ने ही इस विधान को रचा और इसकी गरीमा बनाए रखने के लिए अपने प्राण की भी परवा न की हो। ऐसे काल में एक नारी को किसी स्वयंवर में जीत कर ले जाने के बाद उसे अपनी माँ के सामने एक उत्तम दुर्लभ वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना तथा माँ के द्वारा उसे सभी भाईयों में बराबर-बराबर हिस्से बांट लेना उस नारी के प्रति अमानवीय एवं लज्जास्पद व्यवहार था।यह व्यवहार भी किसने किया स्वयं युधिष्ठिर ने जो उस समय द्रौपदी के पति के सबसे बड़े भाई थे। स्वयं युधिष्ठिर जिसे पूरा संसार धर्मराज के नाम से अभिहित करता है क्या उनका द्रौपदी को इस प्रकार से अपनी माँ के सामने सम्बोधित करना उचित था। यह तो सबसे बड़े दुख की बात है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही स्वयं द्रौपदी के रूप लावण्य के देख कर उसे उचित सम्मान न देते हुए केवल वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर रहा है जो कि एक अन्याय है। जिस नारी के साथ यह अन्याय हुआ वह और कोई नहीं द्रौपदी थी जो यज्ञ से उत्पन्न हुई थी एक अत्यन्त तेजस्विनी नारी थी। जिसकी सुन्दरता की कोई परिभाषा नहीं थी। जो इतनी विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण, शीलवती नारी थी। जिसके साथ सबसे प्रथम अन्याय पाण्डवों ने किया था। यह अन्याय पाण्डवों द्वारा अनजाने में हुआ या विधी का यह विधान था इस पर कोई भी विचार नहीं किया जा सकता। परन्तु इसमें आहत द्रौपदी ही हुई ।फिर भी इतिहास के इस विशेष सत्य को जाने बगेर या जानकर भी अनजाने बनकर आज भी समाज द्रौपदी के प्रति विचार-शून्य बातें करता है। उसे तरह-तरह से अपमानित किया जाता है। उसके पाँच-पाण्डवों के साथ हुए विवाह को हास्यास्पद तरीके से देखा-दिखाया जाता है और उन सबके जीवन पर व्यंग्य किया जाता है। प्रतिभा राय जी ने इन्हीं बातों का ध्यान रखकर द्रौपदी उपन्यास की रचना की है।
प्रतिभा राय जी की स्त्री चेतना कितनी प्रबल और स्वस्थ है यह इस बात से पता चलता है कि उन्होंने स्वयं को द्रौपदी की भांति भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया और स्वयं को पूरी तरह से द्रौपदी के स्थान पर ला खड़ा किया। उन्होंने द्रौपदी को अपने में आत्मसात कर द्रौपदी के सम्पूर्ण जीवन के घटना चक्र तथा उसकी मानसिक पीड़ा, दुख-सुख आदि का वर्णन किया।
उपन्यास के प्रारम्भ में ही प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के मन की व्यथा को प्रस्तुत किया। पाण्डवों के महाप्रस्थान के समय जब सभी हिमालय के रास्ते स्वर्ग जा रहे थे तब अचानक द्रौपदी का पाव फिसल जाता है और वह गिर जाती है। तब भीम उसकी सहायता के लिए आगे आता है पर युधिष्ठिर उसे द्रौपदी की सहायता करने से मना कर देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि --- कितना झूठ है यह पति-पत्नी का सम्बन्ध!स्नेह, प्रेम,त्याग और उत्सर्ग! अपने कर्म अगर आदमी स्वयं भोगता है, तो पिर युधिष्ठिर के धर्म की रक्षा के लिए पाँच पतियों के चरणों में अर्पित होकर सारी दुनिया का उपहास, व्यंग-विद्रुप और निंदा-अपवाद ढोती क्यों फिरी?4 (पृ.सं.8) यह प्रश्न द्रौपदी का नहीं बल्कि आज तक पति के कारण दुख भोगती आयी उस प्रत्येक नारी का है जिसमें पति ने कुछ कर्म किया पर लांछन पत्नी पर लगा। द्रौपदी पाँच पाण्डवों की पत्नी थी। पाँचों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे, अपने जुआ खेलने की आदत में तो वह अपना राज्य गंवा बैठे, परन्तु क्या अधिकार था युधिष्ठिर को द्रौपदी को जुए में दाव पर लगाने का। पत्नी कोई राज्य या सम्पत्ति तो नहीं जिसे जैसे चाहे कोई इस्तेमाल करे। परन्तु यही बात यह पुरूष समाज नहीं समझ सका, न ही युधिष्ठिर और कर बैठता है अपनी पत्नी का अपमान। द्रौपदी को कौरव सभा में अपमानित किया दोनों ने ही। वास्तव में देखा जाए तो युधिष्ठिर ने कभी भी द्रौपदी को स्त्री के रूप में नहीं देखा, देखा तो सिर्फ वस्तु के रूप में। विवाह के प्रथम रात्री में वह द्रौपदी से कहते हैं पुरूष की प्रकृति से तुम परिचित नहीं। अपने प्रिय पदार्थ पर किसी अन्य का अधिकार वह सह नहीं सकता। तुम तो वैसे ही पाँचों की प्रियतमा हो। हम में से कोई तुम्हें पल भर भी अपने निकट से अंतर करना नहीं चाहेगा। किसी को ज़रा-सी भी उपेक्षा सहन नहीं होगी। तब अवस्था क्या होगी? ( पृ.सं. 52)5 । यह बात युधिष्ठिर ने द्रौपदी से तब कही जब द्रौपदी ने सबके कहने पर पँच-पति वरण कर युधिष्ठिर से विवाह किया और उससे कहा कि वह उनकी बात मानेगी और सब कुछ ठीक होगा क्योंकि बाकि सभी भाई जो उसके पति होंगे वह सब युधिष्ठिर के आज्ञा का पालन करेंगे। यब युधिष्ठिर अपने भाईयों का स्वभाव जानते थे और द्रौपदी की दुविधा को भी समझते थे तो उन्होंने ऐसा किया ही क्यों, क्यों उन्होंने द्रौपदी को इस प्रकार के अस्वभाविक रिश्ते में जकड़ा। फिर भी युधिष्ठिर की तुच्छ सोच को देखो वह तब भी द्रौपदी को पदार्थ या वस्तु ही बता रहे है। जबकि द्रौपदी एक मनुष्य है जीवित हाड़-मांस की जिसमें चेतना है, भावना है। वह कोई वस्तु कैसे हो सकती है। प्रतिभा राय जी ने न केवल द्रौपदी के इस दुख को ही उजागर किया है बल्कि द्रौपदी को संसार की पंच सती नारी में स्थान देने पर द्रौपदी के मन से निकले दुख और व्यंग्य को भी उजागर किया है। यह इसलिए क्योंकि भले ही वह पंच सतियों में से एक है पर फिर भी संसार उसका उपहास करता न की आदर। इसी कारण वह यह कहते हुए दुखी हो जाती है कि—कहते है मेरा नाम पंच सती में गिना जाएगा। उसे देख कलियुग के नर-नारी विद्रुप कर हँसेंगे। कहेंगे पंचपति वरण कर द्रौपदी अगर सती हो सकी, तो फिर एक पतिव्रतपालन की क्या आवश्यकता? बहुपति वरण कर वे कलियुग में सती क्यों नहीं होंगी? यौन विकारग्रस्त कलियुग के उच्छृंखल नर-नारियों के बीच द्रौपदी होगी व्यंग्य-परिहास का उपादान। पांच पतियों की पत्नी द्रौपदी को सतीत्व के लिए तिल-तिल जलना पड़ा होगा, इसे ये लोग भला कैसे समझेंगे? तब तो हस्तिनापुर की नायिका द्रौपदी एक निंदित आत्मा, कलंक भरी कहानी की नायिका बन जायेगी।6 (पृ.सं. 8) यह बात सच भी हुई। कलयुग में आज द्रौपदी उपहास की पात्र बन गयी है।
पर प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में एक प्रसंग में यह भी दिखाया कि जब द्रौपदी विवाह के पश्चात् प्रथम बार अपने गार्हस्थ जीवन का प्रारम्भ करती है तब उस कृष्ण-युधिष्ठिर की बात से ज्ञात होता है कि बहुपति वरण करना स्त्री के लिए लज्जा जनक बात है तो उसके अंदर से यज्ञ-अनल में संभूत याज्ञसेनी विद्रोह कर उठती है और सोचने लगती है कि देवलोक के विधान अनुसार एक पुरूष अनेक स्त्रियाँ ग्रहण कर सकता है पर स्त्री एक से अधिक पति वरण करने पर पापिनी कहलाएगी। साथी ही सबसे आश्यर्च की बात है कि यही बात जब उसके द्वारा तथा उसे परिवार द्वारा कही जा रही थी तब सभी ने इस बात को नहीं माना। जो युधिष्ठिर आज द्रौपदी के पाँच पति वरण करने को लेकर उसे पापिनी समझ रहा है तब स्वयं द्रौपदी के इस विवाह से इन्कार करने पर देवलोक एवं गन्धर्व लोक के उदाहरण देकर यह विवाह कर रहा था। तब उसने यह क्यों नहीं सोचा कि वह तो स्वयं ही एक स्त्री को एक पाप करने के लिए विवश कर रहा है। स्वयं एक धर्मात्मा होते हुए भी एक स्त्री से अधर्म करवा रहा है। द्रौपदी यह बात समझ गयी थी कि इस पुरूष प्रधान समाज के द्वारा बनाया गया नियम है तभी वह स्त्री-पुरूष में पाप-पूण्य का भेद इस प्रकार से करते है। जब चाहे अपनी सुविधा के अनुसार एवं अपने सुख के लिए पाप और पुण्य का निश्चित विधान बना डाला और स्त्रियों को तुच्छ वस्तु के समान मान कर उसका जैसे चाहे प्रयोग करते रहे। इस पुरूष प्रधान समाज ने स्त्री को कभी मनुष्य का दर्जा नहीं दिया। इस प्रसंग पर प्रतिभा राय जी के विचार द्रौपदी के जरिए इस प्रकार आते है—वास्तव में पंचपति वरण समग्र नारी जाति के लिए एक आहवान था। एक साथ अनेक पुरूष वरण कर भी किसी नारी के चरित्र की शुद्धता अमलिन रह सकती है, मानो यह प्रमाण करने का स्वर्ण अवसर है।7 (पृ.सं. 66) सत्य ही है कि द्रौपदी का चरित्र शुद्ध था। फिर यह कोई साधारण बात नहीं थी किसी स्त्री के लिए कि वह एक साथ बहुपति वरण कर वैवाहिक जीवन को निभा सके। द्रौपदी के चरित्र की शुद्धता इस बात से भी सिद्ध होती है कि कभी भी पंच-पाण्डवों में से किसी ने भी स्वयं द्रौपदी पर किसी भी प्रकार से संदेह नहीं किया न ही उसके किसी बात की अवहेलना की हो। सभी ने द्रौपदी को प्रेम ही किया है। वास्तव में एक स्त्री जब एक पुरूष के साथ रहती है तो स्वाभाविक रूप से उसके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध जोड़ती है। फिर वह चाहे पिता हो, भाई हो या पति। सबके साथ उसकी भावनाएं जुड़ी होती है तथा वह अपने हर रूप में पुरूष को संस्कारित ही करती है। पंच-पाण्डवों के बीच रहकर द्रौपदी ने पंच-पाण्डवों के लिए केन्द्रीय शक्ती के रूप में रही तभी पाण्डव महाभारत का युद्ध जीत पाए थे। केवल ईश्वर के साथ होने से ही नहीं बल्कि ये द्रौपदी का सतीत्व ही था कि पाँचों भाई सौ कौरवों पर विजय प्राप्त कर सके।
प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए ही अपनी स्त्री चेतना को व्यक्त नहीं किया है बल्कि उन्होंने स्त्रियों के बारे में भी लिखा जिन्हें परिस्थिति के आगे इतना विवश होना पड़ा कि अंत में एक स्त्री को अपने प्राण तक त्यागने पड़े और फिर अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह शिखंडी के रूप में दुबारा जन्मी। धीवर कन्या मत्स्यगंधा तथा काशिराज की तीन कन्याओं अम्बा, अम्बिका तथा अम्बालिका की कथा को उजागर करते हुए यह स्पष्ट दर्शाया कि किस प्रकार महापुरूष के भी स्वार्थ तथा काम पिपासा के कारण उन स्त्रियों को लोकनिंदा तथा परिहास सहना पड़ा। राजकुमारी अम्बा को भीष्म के कारण प्राण त्यागने पड़े थे क्योंकि उन्होंने उसे अपने भाई विचित्रविर्य के लिए अपहृत किया था परन्तु बाद में उसके निवेदन पर छोड़ दिया था। तत्पश्चात् जब राजा शाल्व ने उसे अस्वीकार किया तो वह भीष्म के पास शरण मांगने गयी थी तो भीष्म ने भी अपनी प्रतिज्ञा के चलते उसे ठुकरा दिया था। जिस कारण उसे अपने प्राण त्यागने पड़े। इसी प्रकार मत्स्यगंधा के साथ मुनि पराशर ने बलात् उसे नौका में ग्रहण किया पर बाद में उसे सत्यवती में रूपांतरित कर दिया जो आगे जाकर कुरूवंश के राजा शांतनु की पत्नी बनी। परन्तु यह बात तब तक लोक में फैल चुकी थी जिस कारण वह जीवन भर लोक निन्दा सहती रही। इस बात को पाठक वर्ग के सामने लाने के पीछे प्रतिभा राय जी का उद्देश्य यह है कि आखिर पूरा संसार पुरूष के द्वारा स्त्री पर किए गए अत्याचारों या कुकर्मों के लिए स्त्री को क्यों कोसता है या उसे सहानुभूति की आढ़ में ताने क्यों देता है। क्या नारी कोमल है शक्तीहिन है इसलिए?
प्रतिभा राय जी नारी की शक्तीशालिनी एव धर्यशालिनी रूप के बारे में अपने विचार अपने उपन्यास के एक दुसरे प्रमुख पात्र ऋषि व्यास के द्वारा उपन्यास में प्रस्तुत करते हुए कहती है – नारी तो सर्वसहा धरित्री है। उनकी जैसी सहनशीलता पुरूष में कहाँ? अतः नारी के प्रति दोष-रोष सहज है। पुरूष के प्रति ऐसा दोष-रोष करने से पृथ्वी भर पर हिंसा री हिंसा चलती रहेगी। शायद तभी पुरूष की निंदा करने का साहस कोई नहीं करता।8 (पृ.सं. 67) पाप-पुण्य का विचार द्रौपदी के मन में हमेशा से उठता रहा है। वह जब भी अपने वंश की अन्य स्त्रियों राज माता सत्यवती, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, कुंती तथा माद्री के बारे में सोचती है तो उनके जीवन में घटित घटनाओं से वह आहत होती है। सबके जीवन में अस्वभाविक घटनाएं पुरूषों के द्वारा घटित हुई है। मुनि पराशर ने मत्स्यगंधा के रूप पर मोहित होकर उसका नौका में बलात्कार किया फिर अपनी तपस्या के बल से उसे सत्यवती में परिवर्तित भी कर दिया। इसके बाद वह कुरूवंश में राजा शांतनु की पत्नी बनी। जो भी हो उनके साथ अन्याय हुआ जिसके दायी मुनि पराशर है पर उनको इस बात के लिए कोई दोषी नहीं ठहराता। शायद इसलिए कि वो अपने तपोबल से प्रतिवाद करने वाले को श्राप दे देते या कुछ कर देते। इसलिए निन्दा का पात्र चुना समाज ने सत्यवती को। अम्बा के साथ हुए अन्याय को सभी जानते है जिसमें प्रथम दोष भीष्म का है, दूसरा राजा शाल्व का जो कि उस पर बिना सोचे-समझे अविश्वास कर बैठते है। उसे अस्वीकार करते है। अम्बिका और अम्बालिका को भी अपने पति के बाद पर पुरूष से सम्बन्ध बनाना पड़ता है क्योंकि उनके वंश को उत्तरअधिकारी चाहिए नहीं तो सही गति न होगी। समाज नियोग को स्वीकृति देता है कहकर सत्यवती और अन्यों ने समझाया उन्हें। फिर भी देखों समाज की ही कारस्तानी, सबको ही अपने जीवन में उपहास निन्दा का पात्र बनना पड़ा। कुंती एवं माद्री तक न बची। फिर भी समाज इसी को आधार बनाकर पाप-पुण्य का विचार स्त्री के पक्ष में कुछ और पुरूष के पक्ष में कुछ देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि पाप-पुण्य का विचार नारी-पुरूष के लिए समान होता तो सामाजिक अत्याचार में नारी जाति उत्पीड़ित नहीं होती।9(पृ.सं.69) देखा जाए तो सच ही है यह। प्राचीन काल की अनेक गाथाओं में हम देखते है कि किसी ऋषि की तपस्या भंग करने पर अप्सरा को बानरी बनने तक का श्राप मिला है वही किसी मुनि ने एक पवित्र कुमारी का शील हरण किया तो उन्हें किसी प्रकार का श्राप विधाता ने नहीं दिया। पति की बात न मानने पर या उसे न पहचानने पर उसे पत्थर बनने का श्राप दिया परन्तु पति ने ही जब उसे समाज के झुटे आक्षेपों को सुनकर अपनी पत्नी पर विश्वास न करके उसे वनवास दिया तो उस पति को किसी ने दण्ड नहीं दिया। सब वास्तव में पुरूष के जानवरों वाली प्रवृत्ति के कारण ही है। जिसमें पुरूष कभी अपनी गलती नहीं मानता और न ही कभी यह समाज मानता है।
इस बात से स्पष्ट सिद्ध होता है कि वास्तव में पुरूषों में इतनी सहनशीलता नहीं है। जबकि नारी में है तभी तो वह समाज के इतने कठोर नियमों का पालन कर सकती है। इससे ज्ञात होता है कि नारी पुरूष के मुकाबले अधिक महान एवं शशक्त है। परन्तु यह भी कोई बात नहीं हुई कि नारी में सहनशीलता है तो समाज उसकी सहनशीलता की बार-बार परीक्षा लेता रहे और उसकी सहनशीलता का परिहास करे। नारी के सहनशीलता की एक सीमा है। यदि यह सीमा पार हो गयी तो नारी अपना कोमल रूप छोड़कर प्रचण्ड रूप धर सकती है। क्या समाज इस बात को समझ नहीं पाता। आज भी नारी ही पर अत्याचार हो रहे है। आधुनिकिकरण के चलते समाज में जो बदलाव आए है उसके चलते नारी की स्थिति में परिवर्तन अवश्य आए है परन्तु फिर भी कही-न-कही किसी-न-किसी रूप में नारी के साथ अन्याय होता ही रहता है जो हम देखते भी है तो अनदेखा कर लेते है।
प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी एवं अम्बा, मत्स्यगंधा आदि नारियों का प्रसंग उठाकर तथा उनके जीवन में हुए अस्वाभाविक घटना, उनके कष्ट, उनके साथ हुए अन्याय को तथा इन समस्थ प्रसंगों के साथ उठाए गए प्रश्नों को समाज के सामने इसलिए रखा है ताकि समाज एक बार तो आँखें खोलकर देखे कि उसने नारी के प्रति क्या-क्या अन्याय किया है और किस-किस रूप में किया है। परम्परा, संस्कृति के नाम पर बनाए गए नियमों में नारी का जीवन ही आहुति के रूप में चढ़ाया जा रहा है यह समाज एक बार देखे और समझे। आधुनिकिकरण ने भी नारी को ही विवश किया है अपने स्वरूप एवं स्वभाव को बदलने के लिए। फिर द्रौपदी के जीवन में जो कुछ भी हुआ उसके लिए द्रौपदी ही दोषी क्यों? पाँच-पति वरण करना कोई सम्मान का कार्य नहीं परन्तु अपनी माता समान सांस के आदेश का पालन करने के लिए अपना जीवन द्रौपदी ने स्वाहा कर दिया। फिर भी द्रौपदी को ही दोषी माना जाता है। परन्तु एक बार समाज यह भी तो सोचकर देखे कि जो कुछ द्रौपदी ने किया क्या वह उचित नहीं था? नहीं था तो समाज ने उसे विवश क्यों किया? विवश किया समाज ने फिर स्वयं अपनी भूल न मानते हुए उसे ही दोषी माना। प्रतिभा राय जी इन सब प्रश्नों का उत्तर समाज से चाहती है। फिर द्रौपदी पर जो यह आरोप लगाया जाता है कि पाँच पति होने के बाद भी द्रौपदी कृष्ण के प्रति अनुरक्त थी तो इस बात को प्रतिभा राय जी ने कृष्ण-द्रौपदी के बीच के सखा भाव तथा देहातीत प्रेम को दर्शाते हुए यह सिद्ध किया है कि द्रौपदी कृष्ण की परम् भक्त थी। दोनों के बीच ईश्वरीय प्रेम था जिसे समाज किसी अन्य दृ्ष्टि से देख रहा था। एक नारी का अपने जीवन में हुए इस प्रकार के घटनाक्रम के कारण जो उस पर बीती है क्या उसमें उचित नहीं कि वह ईश्वर की शरण ले तथा ईश्वर से प्रेम करने पर क्या पाप किया उसने।
इस प्रकार प्रतिभा राय जी के इस उपन्यास में हम पाते है कि नारी के प्रति जो समाज ने अन्याय किया है उससे वह कितनी आहत हुई है। अपनी संस्कृति, परम्परा तथा महाभारत की कथा के हर मूल बातों को और प्रसंगों को बिना जाने हम आज भी द्रौपदी का अपमान करने लगते है। जो कि न केवल उसका अपमान है बल्कि नारी जाति का अपमान करते है। क्योंकि आज तक द्रौपदी के जैसे ही कई घटनाएं हुई होंगी समाज में, कई अम्बाओं ने अपने प्राण त्यागे होंगे, कई मत्स्यगंधा को बलात् अपनाया गया होगा फिर भी उन्हीं को ही हम दोष देते रहते है। प्रतिभा राय जी का यह उपन्यास नारी चेतना को दर्शाने वाला एक सशक्त उपन्यास है। जिसमें समस्त नारी जाति को आहवान किया जा रहा है कि वह अपने प्रति हो रहे तरह-तरह प्रकार के अत्याचारों के प्रति अपनी आवाज उठाए और इस पुरूष प्रधान समाज को अपने उपर कोई भी आरोप लगाने का मौका न दे। यदि ऐसा हो भी तो आरोप के विरूद्ध, आरोप लगाने वाले के विरूद्ध संघर्ष करे।

Monday, 6 September 2010

हज़ारों ख़्वाहिशें दिल में....................

हज़ारों ख़्वाहिशें दिल में उठा करती है।
पर किसी खास पे,
नज़रे जाकर रूकती है।
उस ख़्वाहिश के साथ
हर लम्हा हम जीते है,
हर पल उसे अपनी पलकों पर सवारते है।
हज़ारों ख़्वाहिशें जो दिल में उठा करती है।
पर किसी खास पे नज़रे जाकर रूकती है।

कोई कहता है ख़्वाहिशें है बुलबुलें हैं पानी के,
बनती है एक पल में,पल में टूट जाती है।
तो क्या हुआ जो ये ख़्वाहिशें है बुलबुलें पानी के।
ज़िन्दगी भी तो ऐसी है कि आज आयी तो कल जानी है
फिर क्यों न ख़्वाहिशें दिल में उठा करें।
और उन ख़्वाहिशों में हम जिया करें।
उन ख़्वाहिशों से किसी की ज़िन्दगी भी सवार दिया करें।

हज़ारों ख़्वाहिशें इसीलिए दिल में उठा करती है
और किसी खास पे इसीलिए ही नज़रें जाकर रूकती है।

Sunday, 29 August 2010

ऐसा क्यों होता है?

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
ज़िन्दगी में, कि हम चाहते है जो-कुछ नहीं मिलता
मिलता है जो हम नहीं चाहते
देता है वह जिससे हम चाहते है।

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
कि जब आप प्यार करते है किसी को
तो उस पर चाहे जितना भी विश्वास हो
शक होता है दूसरों की बातों से।

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
कुछ पाने की चाहत में रास्ते सब सही है
पर फिर भी हार जाते है
गम में डूब जाते है।

क्या तुमको पता है जब कुछ अपना खो देते है तो
सांतवना देने वाले पर भी गुस्सा आता है
फिर भी उससे कुछ कह नहीं सकते
अपने दिल का दर्द कम नहीं कर सकते
और तब भी ऊपर वाला शांत बैठा सब कुछ देखता रहता है।


ऐसा क्यों होता है
क्या ये सब धोका है
सब क्या दिल को दुख देने का जरिया है।

ऐसा क्यों होता है
कि जिससे प्यार किया वही आपको
कहता है
तुमने प्यार में देरी कर दी
ऐसा क्यों होता है
कि आप उसे चाहे ज़िन्दगीभर और
वह भूल जाए आपको
अपनी नई ज़िन्दगी में आकर
कामयाबी की पहली झलक पाकर

ऐसा क्यों होता है
कि आगे बढ़ना चाहो भी तो
प्यार की यादें बढ़ने नहीं देती
प्यार रोक देता है हर कदम
प्यार थाम लेता है हाथ
प्यार दबा देता है आगे बढ़ने का फैसला
प्यार ही तोड़ देता है आगे बढ़ने का सपना

ऐसा क्यों होता है?

Friday, 6 August 2010

तेरे साथ

तेरे साथ चलती रही है मेरी यादें हर कही
अब साथी मेरे अलग रास्ते की गुँजाईश ही नहीं

प्यार करके छोड़ दे तुम्हें तन्हा
ऐसा हो सकता नहीं
मिलो तुम चाहे न मिलो
मेरी ऐसी कोई ख़्वाहिश भी नहीं

प्यार करने में अगर देरी की हमने
तो क्या हुआ?
लो अब कह देते है तुम्हें
सुन लो जरा

चलेगी ज़िन्दगी हमारी यू ही
तुम्हें याद करते-करते ही
प्यार मिले, मिले ना सही
तुमसे रिश्ता तोड़ेंगे नहीं।

Wednesday, 21 July 2010

मेरा चेहरा...........

मेरा चेहरा--
मेरा चेहरा विगड़ गया है
कुछ इस तरहा......
जैसे कोई घायल सड़क पर नीचे पड़ा है,
और उसे चारों ओर से लोगों ने घेर रखा है,
क्योंकि वह कोई चोर या मक्कार होगा,
जिसे झूठ बोलते या चोरी करते हुए रंगे हाखों पकड़ा हो।
उसके चेहरे पर से खून बह रहा है,
और हिसाब ले रहा है एक-एक कतरा झूठ बोलने की-चोरी करने की।
उसकी आँखें दहशत से चारों और देख रही है।
बार-बार माफी भी मांग रही है।
बहते आँसू बयान कर रहे,
"मुझसे गलती हो गई है, सच ये मैं मानता हुँ।"
"पर मजबूर था मैं।"
"मुझे माफ कर दो।"
उसका सर शर्म से झुका है।
वह अपना चेहरा छुपा रहा है।
पर दुनिया को होड़ लगी है उसके चेहरे को
देखने के लिए।
ताकि सबको पता चले वह कौन है।
मेरा चेहरा कुछ इस तरहा बिगड़ा है।

Friday, 4 June 2010

सवाल नज़रों का...........

उसने मुझे
बड़े गौर से
एक बार देखा,
उसकी नज़रों में
कई सवाल थे,
मेरी नज़रे भी
सवालों से भरी थी,
उसकी नज़रों के सवालों
को जानना चाहती थी,
पर जवाब किसी के
पास नहीं था,
सवाल ये नज़रो का था।

Tuesday, 4 May 2010

मेरे भीतर का इन्सान की दूसरी कड़ी............

मेरे भीतर की लड़की
सपनें बहुत देखती है
कभी-कभी तो सपनों में खो जाती है
कभी-कभी सपनों से ही डर जाती है
मेरे भीतर की लड़की
कल्पना जगत की निवासिनी है।

मेरे भीतर की लड़की
कभी-कभी हालातों को देखकर
निश्चय करती है
"मैं अभी ये करूँगी, वो करूँगी"
"जब तक लक्ष्य पूरा न होगा"
"चैन से नहीं रहूंगी"
लक्ष्य पूरा होने के बाद क्या-क्या होगा
ये सोचते-सोचते कल्पना जगत में
फिर से खो जाती है
निश्चय किया था क्या?निर्णय लिया था क्या?
भूल जाती है।

मेरे भीतर की लड़की
सुख-दुख की साथ जीती है
दुख बीता है जो उसके साथ
सुख में होकर भी नहीं भूलती है
दुख को याद करके वह
सुख में भी दुखी हो जाती है।

मेरे भीतर की लड़की
जितना हँसती है उतना रोती भी है
पर देख नहीं सकती किसी का भी रोना
चाहे वह शत्रु भी क्यों हो ना
मेरे भीतर की लड़की
बस सारी दुनियाँ को हँसते हुए देखना चाहती है।

Thursday, 22 April 2010

मेरे भीतर का इन्सान.........

मेरे भीतर का इन्सान
सागर के उन लहरों सी है
जो बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है

टकराती है क्या
बल्कि ढँढती है उस अधुरे इन्सान को
जिससे मिलकर मुझसी अधुरी इन्सान पूरी हो सके

पूरी कर सके
वह सारी अधुरी ख़्वाहिशें जो मैंने और उसने
देखे थे रात-भर अपनी-अपनी आँखों से
अपने-अपने कमरे में

मेरे भीतर का इन्सान
कभी-कभी तो उन्मत्त लहर बनकर
तट को ही नहीं बल्कि वहा खड़ी हर चीज को भीगों देती है
फिर देखने की कोशिश करती है
कि किसका वह सच्चा रूप है जो समाने लायक है
इस मन के सागर में

बार-बार वह यही करती है
ढूँढती है उसे जिसे दे सके प्यार का अंमृत जल
विश्वास और साथ का अथाह संसार
थक जाती है फिर भी वह यही करती है
बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है.............

Tuesday, 20 April 2010

एक दिन......

एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है

सूर्योदय से दिन की शुरूआत
सूर्यास्त से दिन का अन्त
बस इतनी सी बात ही सबके सामने रह जाती है
पर ये एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है

एक दिन किसी को याद करने में बीतता है
एक दिन किसी के खयाल में बीतता है

एक दिन कोई काम की तलाश में बीतता है
एक दिन भूख को मिटाने में बीतता है

एक दिन सवालों के जवाब ढूंढने में बीतता है
एक दिन उलझनों को सुलझाने में बीतता है

एक दिन बिखरे चीजों को समेटने में बीतता है
एक दिन कुछ चीजों को, खयालों को, सपनों को सवारने में बीतता है
एक दिन सपनों को सच करने की चाह में बीतता है

फिर भी ये एक दिन यूं ही बीत जाता है
और ये बात किसी के सोच में नहीं आता है
एक दिन जो हमारे सामने से बीत जाता है।

Monday, 19 April 2010

याद आते हो.............

याद आते हो.........

याद आते हो,
हर पल मुझे तुम याद आते हो
कुछ अनकही बातों में,
कुछ उभरते जज़बातों में।

तुम्हारे और मेरे बीच जो एहसास की डोर है,
उसके दोनों छोर पर हमारा दिल है।
अपने दिल की राह से जब तुम तक जाती हुँ
तब तुम याद आते हो।

जब दिसम्बर की सिकुड़ती रातों में
रज़ाई के नीचे मेरा मन सोता था
तब तुम याद आते थे।
जब उन दिनों चाँद भी बादलों की चादर ओढ़कर
अपनी रोशनी से जाहां को रोशन कर रहा था,
तब उस रोशनी में नहाया हुआ हर एक पल
तुम्हारी याद दिलाता था।

जब बारिश होती है
और मेरा जी प्यासा हो जाता है
तब तुम याद आते हो।

ये अजीब सी बात है कि
तुम्हारे और मेरे बीच कोई कड़ी छूटती नहीं है।
क्या हम एक हो चुके है साथी।

फूलों के रंगों में
मिट्टी की खूशबु में
पानी पर पड़ती परछाई में
तुम ही तो हो जो नज़र आते हो।
इन आँखों ने जो देखा है उन सबमे तुम्हें ही देखा है।
और जब आईने में मैं एक नज़र खुद से मिलाती हुँ
तो लगता है कि तुमसे नज़र मिला रही हुँ।

किताबों में न जाने कितने अनगिनत शब्द
हर शब्द का कुछ-कुछ अर्थ।
जब उन्हें पढ़ती हुँ
तो लगता है कि तुम्हारा नाम लेती हुँ।
क्योंकि तुम हर पन्ने में बसे हो।
जब पुराने पलटे पन्ने इक नज़र देखती हुँ
तब तुम याद आते हो।

और इस तरहा हर लम्हा गुज़र जाता है।
तुममे हम खोये रहते हैं,
पर बीता हर एक-एक पल
तुम्हारी याद दिलाता है।
क्योंकि उन बीतें लम्हों में तुम ही तो बीते थे
जो गज़ारे थे साथ हमने।

Saturday, 27 March 2010

मेरा डर।

मेरा डर
मुझे हर रात डराने चला आता है
पता नहीं
कितने अनगिनत
विक्राल,घिनौने,विचित्र चेहरों को लेकर
मेरे सामने ला खड़ा करता है?
उनके हाथों में हथियार नहीं होते
पर फिर भी मुझे उनसे डर लगता है।

वे सवाल पुछते है मुझसे
न जाने कैसे-कैसे?
उनके उन सवालों से
तानों से
फैसलों से
मेरे दिये गये जवाबों के बदले में लौटे जवाबों से
डर लगता है
रात को एक किताब बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।

जब मैं पलके मूंद कर
सब कुछ भूलाने की कोशिश करती हुँ
तो यही सब कुछ
फिर से मेरी बंद आँखों में भी चले आते हैं
अंधकार तब ब्रह्माण्ड में बदल जाता है
और ये सब बन जाते है ग्रह-नक्षत्र
और तब
मुझसे फिर जवाब चाहते हैं
जवाब के लिए खुद में वह लड़ पड़ते है
एक-दूसरे से खुद टकराते हैं
इन टकराहट का शोर
इतना भयानक है कि मुझे डर लगता है
मेरा डर
ज़लज़ला बनकर
डराने चला आता है।

जब बारिश की बूंदों में
उन बूंदों की ठण्डक में
डर की आग से राहत मिलती है
तो वहा भी चला आता है
बन जाता है तूफान
या सैलाब
बहा ले जाता मेरे सुकून से भरी दुनियाँ को
ले जाना चाहता है मुझे भी
बहा के
पानी में डूबे हुए अरमान
सपनों की लाशों सा बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।

मेरा अस्तित्व
मेरी कोशिश
मेरे जज़बात
मेरी ख़्वाहिश
मेरा काम
मेरे वादे
सब सब अब इस डर की चपेट में है
वक्त खाली बीतता देख कर
कुछ कोशिश करती हुँ
तब
खत्म हो चुका है वक्त
ये पैगाम बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
मेरा डर
हर रात मुझे डराने चला आता है।

Thursday, 25 March 2010

ज़रा दूरियां।

ज़रा दूरियाँ बढ़ जाने दो
ज़रा दिल को दूर जाने दो
जब प्यार नहीं दिलों में
तो क्या होना है रहके इनका पास-पास?

ज़रा यादों से मिट जाने दो
ज़रा सपनों से हट जाने दो
जब एहसास नहीं सीने में
तो क्या होना है रहके मेरा धड़कनों के पास?

ज़िन्दगी का झूट मैंने
सच मान लिया था
तेरे बातों को मैंने
प्यार मान लिया था
अब जाके सच का सामना हुआ है
कि मैंने क्या किया था।

ज़रा आँखों से अश्क बह जाने दो
ज़रा जी भर के मुझे रो लेने दो
जब ये किस्मत है मेरी
तो क्या होना है रखके इसे पास-पास?

Monday, 22 March 2010

न मजबूर करो किसी को।

माली कभी मजबूर नहीं करता
कली को खिल जाने के लिए
वक्त होता है उसका अपना
वह खिल जाती है।

धरती मजबूर न करती
बादलों को बरसने के लिए
सावन आता है तो
बादल बरस जाते हैं।

धूप-छाव तो होती है राहों में
पर राही मजबूर नहीं किसी के लिए
चलता जाता है वह रुकता न कभी
जब मंजिल आती है
ठहर जाता है वह मंजिल की छाव में।

प्यार में क्या मजबूरी है
प्यार तो होता है अपने ही आप
दिल मजबूर नहीं प्यार के लिए
वह यू ही करता प्यार
प्यार पाए न पाए वह
प्यार होता है करता जाता है प्यार।

Tuesday, 9 March 2010

रिश्तें

रिश्तों के कई रंग होते हैं
कुछ नाम के, कुछ बेनाम
पर सबको पड़ता है निभाना
क्योंकि यही दुनिया का दस्तूर है।

और कुछ रिश्ते ऐसे
होते है
जैसे चलती बस की खिड़की
से देखो तो छूटते नज़ारे जैसे।

इन रिश्तों को निभाने में
सबका दिल तो रखना पड़ता है
पर सच है कि
इनको निभाने में दिल कई बार
टूटते हैं
कितना बड़ा सच है ये
पर समझते नहीं,कितने अजीब होते हैं
रिश्तें।

Tuesday, 23 February 2010

शीत की प्रभात में

शीत की प्रभात में
मैं कहु प्रकृति की बात।
उसके हरियाली आँचल में
फैला घना कोहरा,
बीच में से आती सूरज की किरणें,
लगते सोना खरा।
या यू लगता जैसे
सफेद सोने में चमक रहा हो
पीले पत्थर की चमक
ये है प्रकृति की दमक।

ओस की बूँदें हैं या
प्रकृति ने किया अभी स्नान।
भीगे पत्ते भीगी कलियाँ,
काँपते फूलों की पंखुरियाँ।
गेंदे, अतोशि,गुलाब,डालिया
करते इसका श्रृंगार।
शीत की शोभा का क्या कहना।

Friday, 19 February 2010

भूख गरीबी की।

कविता - भूख

अनिश्चित जीवन में

निश्चित माया।

विचार मग्न मन,

पर दुर्बल काया।

झुकी रीढ़ की हड्डी,

पर झुकी न जीवन जीने की आशा।

चले जा रहे अनिश्चित पथ पर,

पर नहीं निश्चित है ठौर-ठिकाना।

हाथ उठाकर आशीश देते है,

मांगते केवल दो मूठ चावल।

भूख की तड़पन है मुख पर,

पर वाणी है निश्छल।

सड़क का किनारा है संसार इनका,

सड़क पर व्यतीत है जीवन इनका,

साथी बना है दुर्भाग्य इनका,

पर नहीं है निर्बल मन इनका।

मुर्झाए चेहरे पर अब भी है जीने की लालसा,

पर बनाया हमने ही इन्हें भिखारी।

जो हमें आज-तक देते आए है दुआएँ इतनी,

क्यों इनके लिए हमारी मानवता हारी।

कभी जीवन इनका भी बीता होगा,

सुखमय, सुदृढ़, सुयौवन।

पर नियति का भी खेल अजीब

जाना पड़ा इन्हें ही वन।

वन कैसा ?

भीड़-भाड़ लोगों से भरे जंगल

धुआँ उड़ाते वाहन।

सिंह नाद से भी भयंकर मशीनों के गर्जन।

जहाँ मानवता पिसती जाती है जीवन के दो

पाटो की चक्की में।

जहाँ भावना, सम्मान बह जाती नयनों से

दूसरों की दी गाली से।

जहाँ पूँजीपतियों का झुण्ड है,

सत्ता पर बैठे शेर की फैकी झूठन को खाने के लिए।

जो निर्बल, कोमल सीधे मानवों को

फाँसते अपनी नीति से।

जहाँ मिल-बाँट खाते हैं रिश्वत की रोटी लिए।

वन

जहाँ केवल स्वार्थ जीता है,

मरता है परोपकार उसके पंजों के प्रहार से।

जहाँ कर्म ही कर्म से टकराता है।

जहाँ विचार ही विचार से टकराता है।

जहाँ बदलते हैं पल-पल में दल

हो जैसे वह विहगों का दल,

बदले जो मौसम में अपना घर।

ऐसे वन में आकर

इन बूढ़ी हड्डियों का जीवन संग्राम फिर शुरू होता है,

पर अब उसमें अंतर ही अंतर है।

सर से पाँव तक

परिश्रम की बूँद है साक्षी।

पर नहीं है संतुष्टि मोटे मालिकों को

जितना कर पाए इस उम्र में भी,

क्या जाएगा अगर मिल जाए उतने की ही मजदूरी।

पर दिखा रहे उन्हें काम में हुई खामियाँ,

बता रहे वे बहाना न देने का कहकर अपनी मजबूरी।

ठोकर खाते,

लड़खड़ाते कदम,

फटे कपड़े,

और मुह में दम

भिक्षा की झोली लिए,

घर-घर जाते हैं।

दो मूठ चावल की बस दया मांगते हैं।

हाथ उठाकर आशीश देते हैं।

भूख की क्या मजबूरी देखो,

क्या-क्या दिन दिखलाता है।

Tuesday, 16 February 2010

मेरे सपने

सपने हज़ार लहरों सी,
आँखों की साहिल से टकराती है।
पलकों के खुलते ही,
यथार्थ के चट्टानों से टकराकर टूट जाती है।

बेख़ोफ़ से लहरें सी
बार-बार चली आती है
धरती से मन को समाने के लिए।
पर विशाल धरती से मन का
एक हिस्सा ही समाता है।
बाकि सच के लिए।

Friday, 12 February 2010

विशाल गगन

विशाल गगन
लिए मेघों का धन
मन्द पवन भी
संग चली आती है।

अतृप्त नयन
में बसी आशा घन
शीतल पवन
छूने को
व्याकुल हुआ मन।

व्याकुल हुआ मन
हो गया चंचल
तुम संग
उस क्षण को
फिर से
जीने के लिए।

आनन्द विभोर
होकर
वसन्त के वरण
प्रेम से ऋतु-राग
गाने के लिए।

Wednesday, 20 January 2010

वापसी और अकेली कहानी में व्यक्त अकेलापन

भारतीय साहित्य की कुछ आधारभूत विशेषताएं रही हैं। परिवार भाव उनमें से एक है। मध्यकालीन काव्य 'रामायण' और उससे पहले 'महाभारत' और समस्त पौराणिक वाङ्मय में एक भरा-पूरा परिवार देखते हैं। उस समय लोग सुख या दुख का भोग परिवार के साथ करते थे। तब व्यक्ति अपने परिवार का एक अटूट अंग था। आधुनिक युग के महान उपन्यास 'गोदान' में भी होरी का एक परिवार देखते है।इस अत्याधुनिक काल में आकर यह पारिवारिक चेतना विलुप्त हो गई है। अब मनुष्य व्यक्तिवादी बन गया है। ऐसी अवस्था में वृद्ध आयु-वर्ग के नर और नारी परिवार के लिए समान उत्तरदायित्व होते थे।आज यह भाव विलुप्त हो चुका है मनुष्य नितांत अकेला हो गया है। अकेलेपन की यह त्रासदी वृद्ध आयु-वर्ग के नर-नारी भोगते दिखायी दे रहे है। अब वृद्ध नर-नारी वृद्धाश्रम भेज दिये जाते हैं। घर में उनकी उपस्थिति पहले सुख का विषय माना जाता था अब वे बोझ हो गये हैं। उनकी उपस्थिति से परिवार के दूसरे लोग अपनी स्वतंत्रता में बाधा समझते हैं। समाज की इस अवस्था का प्रभाव साहित्य पर पड़ना स्वाभाविक था। इस परिवर्तित पारिवारिक विश्रृंखलता को दो कहानियाँ, 'उषा प्रियंवदा' कृत 'वापसी' और 'मन्नू भंडारी' कृत 'अकेली', बहुत ही संवेदनात्मक रूप में प्रसतुत करती है


उषा प्रियंवदा कृत 'वापसी' और मन्नू भंडारी कृत 'अकेली' कहानियाँ अकेलेपन की ऐसी दास्तां है जिसे पढ़कर पाठक कहानी के पात्र के प्रति एक तीव्र पीड़ा अनुभव करता है। यद्यपि दोनों कथाओं में अकेलेपन की अलग-अलग परिस्थितियाँ हैं। दोनों में अकेलेपन की अपनी अलग-अलग वजह है। फिर भी, दोनों कहानियों के मुख्य पात्रों में एक समानता है। दोनों वृद्ध हैं और अपने अपने परिवार से दूर है। दोनों को ही अपनों ने अपने से दूर कर दिया है। गजाधर बाबू जो कि 35 साल की नौकरी के बाद ये सोचकर घर लौटते है कि अब वे अपने परिवार के साथ खुशी से दिन गुज़ारेंगे पर घर जाते ही उनकी उपस्थिति से घर के लोगों का उनके प्रति अजीब व्यवहार होता है। जैसे कि वे लोग उनके आने से खुश नहीं है। जैसे कि वे लोग यह समझते हो कि बाबू जी उनके हंसी-मज़ाक के कारण उनसे नाखुश हो! इसी तरह अकेली बुआ यही सोचकर अपनी सगे-सम्बन्धियों के घर में शादी में मदद करती है कि वह भी तो उन्हीं लोगों के परिवार का एक हिस्सा है। शादी के दिन तक वह काम-काज सम्भालती है पर शादी में उसे कोई भी आमंत्रित तक नहीं करता है। बुआ खुद ही सारे काम सम्भालती है। अकेली है, बेटा भी जीवित नहीं जो इस वृद्धावस्था में सहारा बने, पति भी पुत्र शोक से घर छोड़कर संन्यासी बनकर घूम रहे हैं।बस आस-पड़ोस की कुछ जान-पहचान वाली स्त्रियाँ है जो उनसे हंसी-ठठ्टा करती हैं। बुआ बड़े अरमानों से राह देखती है कि कोई तो उन्हें बुलाने आएगा पर कोई भी नहीं आता है। वह अपने घर की छत पर अकेली राह तकती रहती है।

गजाधर बाबू का भी यही हाल है। वे सोचते है कि सब लोग उनके आने से खुश है, वे उनकी बात मानेंगे और अपने दिल की बात कहेंगे। पर गजाधर बाबू के लिए यह एक कोरी कल्पना साबित हुई। न तो कोई उनसे बात करना चाहता है न ही किसी के पास समय है। यहाँ तक कि उनकी पत्नी के पास भी। गजाधर बाबू क्या चाहते हैं,क्या कहना चाहते है, घर में वह एक अभिभावक की हैसियत से है , इन बातों का घर के लोगों के लिए कोई मतलब नहीं। सब बस अपने ही धुन में मगन होकर चले जा रहे है। यहाँ तक कि गजाधर बाबू की छोटी बेटी, तक उनसे किसी भी बात की इजाजत लेने की ज़रूरत नहीं समझती ।

इस प्रकार दोनों कथाकारों ने दिखाया कि किस प्रकार अपनो का ही अपनो के प्रति उपेक्षा का भाव उनके अकेलेपन का कारण बन जाता है। यह अकेलापन वह भी उस उम्र में जिसमें सबसे ज्यादा अपने जीवनसाथी के साथ की ज़रूरत होती है अगर न मिले तो इन्सान टूट सा जाता है। तभी तो अकेली बुआ अपने मन की बात को मन में ही दबाकर अकेले जी रही है, रोती भी है तो मन के भीतर क्योंकि उनके रोने को कोई भी नहीं समझ सकता है। अपनी अकेलेपन की इस दुनिया में जी रही है किसी तरह से दिन और वक्त को गिनकर। यही हाल गजाधर बाबू का है जो कि अपनो की उपेक्षा पाकर वापस उसी ज़िन्दगी में चले जाते है जहाँ से लौटते है। उन्हें कितनी मानसिक और आत्मिक पीड़ा का अनुभव होता है जब वह अपनी पत्नी को साथ चलने को कहते हैं तो वह मना कर देती है। उनके बच्चे भी केवल उनके जैसे जाने की प्रतीक्षा में थे कि कब वे जाएं और वे सिनेमा देखने चले।

ऐसा अकेलापन और जब उसे दूर करने की आस लेकर अपनो के पास जाना और उनसे केवल उपेक्षा पाना इन्सान को दुख और केवल दुख के सिवा कुछ नहीं दे सकता है यह बात दोनों कहानियों से स्पष्ट होती है।




मधुछन्दा चक्रवर्ती

हिन्दी विभाग,असम विश्वविद्यालय

सिलचर, 788011