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Friday, 12 February 2010

विशाल गगन

विशाल गगन
लिए मेघों का धन
मन्द पवन भी
संग चली आती है।

अतृप्त नयन
में बसी आशा घन
शीतल पवन
छूने को
व्याकुल हुआ मन।

व्याकुल हुआ मन
हो गया चंचल
तुम संग
उस क्षण को
फिर से
जीने के लिए।

आनन्द विभोर
होकर
वसन्त के वरण
प्रेम से ऋतु-राग
गाने के लिए।

1 comment:

  1. वाह वाह वाह...............

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