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Monday, 24 September 2012

निर्वासन.......

रोज देखती हूँ
सड़क के इस पार से उस पार
जाते हुए उसे।
बूढ़ी हड्डीयों ने जवाब दे दिया है
पर नहीं इरादों में कमी
जी रहा है बरसों से ऐसे ही
झेल रहा है न जाने किसी का दिया हुआ निर्वासन
शताब्दियों से चलता आ रहा है
यही समाज का समानतावाद.................

Monday, 14 May 2012

चाह कर भी


चाह कर भी

चाह कर भी
कह नहीं पाते है दिल की बात
हो जाते है गुमसुम
दर्द भरे, अजनबी हालात

अनजाने वो हो जाते हैं
जो हैं बरसों जान-पहचाने
क्यों करते है ऐसा
बोलो हम क्या जाने

रिश्तें टूट चुके है पर
अभी भी हैं निभाते हुए
अपने थे कभी यें
पर अब पराए हुए

दोनों की मंजिल नहीं है एक
तो चलना क्यों साथ-साथ
हमराही की गुंजाइश कहाँ है
अब तो तन्हा है हालात।

Monday, 16 April 2012

जब तुम मिले..............

जब तुम मिले
मुझसे
ज़िन्दगी के इस मोड़ पर
मैंने दिल को एक बार नहीं
हज़ार बार रोका

जब तुम बातें करने लगे
मुझसे
तरंगों के गुम हो जाने पर
मैंने ख़यालों, तरानों को भी
अनसुना सा किया
कानों में उँगलियाँ भी फेर ली
पर दिल की धड़कन सुनाई देती रही

जब तुम्हारी नज़रें
मुझसे
बार-बार टकराती रही
चाहा की फेर लू नज़रे तुम पर से
पर तुम ही हर कही नज़र आने लगे
जब तुम मिले

जब तुमने कुछ नहीं कहा था
मुझसे
मगर मैं सुनती रही वही बातें
खुद से
तुमने तो बार-बार समझाया था मुझे
पर मैं समझकर भी नहीं समझी
बार-बार यही सोचती रही
कि
तुम मुझे क्यों मिले
जब तुम मिले।

Monday, 2 April 2012

घनी आबादी के बीच एक औरत
चलती रहती है अपनी आँखे फाड़-फाड़
खोजती है शिकार
किशोर लड़कियों के
ताकि सूना सके
अपनी अपूरित वासना और
मर्दों से मिले दूतकार को
जब भी कोई आती है उसके दायरे में
बिना मर्द के विषय की बात-चीत नहीं होती
जब तक वह अपनी मनमानी न करे
उसके सम्मान की जीत नहीं होती।

Friday, 17 February 2012

फैसला................

फ़ैसला

1
“आज इतने दिन हो गए है, सुमन के बाबा क्या तुम्हें उसकी याद नहीं आती?”
“याद तो आती है, पर क्या करू गुस्से में घर से निकाल दिया और अब उससे बात करते भी डर लगता है, पता नहीं वापस आएगा भी या नहीं?”
“देखिए! बेटा है वह आपका, आपकी बात ज़रूर मानेगा। एक बार कोशिश तो कीजिए।”
“देखो प्रताप की माँ मुझे तुम जोर न दिया करो। अगर उसे अपने माँ-बाप की कद्र है तो वह ज़रूर वापस लौटेगा और नहीं तो नहीं। लेकिन मेरा फैसला अटल है।”
“क्या हो गया है मेरे घर को? हे भगवान, एक तरफ बाप-बेटे लड़-झगड़कर अलग हो गए है और मैं अपने बच्चों से मिल नहीं पा रही। दोनों बाप-बेटे नहीं समझते कि मेरे लिए ये लोग कितने अनमोल है। दोनों की ज़िद के चलते मेरा घर उजड़ गया है।”
(गुस्से से)“मैंने नहीं कहा था प्रताप को कि वह शहर जाकर नौकरी के साथ-साथ उस लड़की से भी शादी कर ले। उसने अपनी ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला लिया और हमसे सलाह –मश्विरा करना भी उचित नहीं समझा। एक बार इन्डीपेन्डन्सी क्या दे दी वह अपनी हद को ही भूल गया। माँ-बाप के साथ ऐसा कोई करता है क्या?”
“तुम भी तो जिद्दी हो उसकी तरह। अगर उसने लड़की पसन्द की है तो ठीक ही की होगी। इतना भरोसा नहीं तुम्हें उसपर। आखिर उन्हें ही तो जीवन भर साथ रहना है। हमारा-तुम्हारा क्या है, आज है कल नहीं। पर वे तो जीते रहेंगे ना। क्यों दोनों को स्वीकार नहीं किया तुमने। घर से निकाल दिया उसे। सुमन भी इसी गम में चली गयी घर से। कहती है बाबा जब तक भैया को वापस नहीं बुलाते तब तक मैं भी न आऊंगी। भला ये भी कोई बात हुई। मेरी किसी को चिन्ता नहीं। मैं अभागन न बाप को ही समझा पाती हुँ न बच्चों के पास जा पाती हुँ। मुझे किस बात की सज़ा मिल रही है।”
“प्रमिला तुम शान्त रहो। अधिक उत्तेजित न हो। तुम्हारा बल्डप्रैशर हाई हो जाएगा। पिछले महिने ही तुम्हारी तबियत खराब हुई थी। चिन्ता मत करो मैं जल्द ही दोनों को वापस लाने का उपाय करता हुँ।”
“हे भगवान! क्या-क्या दिन देखने पड़ रहे है।”




2
प्रताप और सविता एक ही दफ्तर में काम करते है। दोनों ही अलग-अलग शहर से। प्रताप लखनऊ का रहने वाला है और सविता हिमाचल से है। प्रताप को आज लगभग चार बरस हो चुके है अपने परिवार से अलग हुए। प्रताप को आज भी वह दिन याद है जब वह घर से निकला था तो बाबा ने उससे कहा था कि “देखो बेटा! तुम अब बढ़े शहर जा रहे हो। वहाँ जाकर तुम ज़िन्दगी के अलग-अलग रंग-रूप देखोगे। बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जो तुम्हारी सोच से परे हो सकता है और अच्छे-बूरे रूप देखने को मिलेंगे। अभी तुम बढ़े हो गए हो, अब तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं है। अपने पैरो पर तुम खुद खड़े हो चुके हो, अच्छी नौकरी है तुम्हारी, मन लगाकर काम करना और अपनी मर्जी से ज़िन्दगी को जीना। अब बात-बात पर मुझसे बच्चों की तरह पूछना छोड़ दो और खुद से फैसले लेने की काबलियत बनाओ। तुम्हारे साथ हमारा आशिर्वाद है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।” प्रताप इन्हीं बातों को याद करके आश्चर्य में पड़ा है कि आखिर जब बाबा ने खुद अपने सारे फैसले लेने का हक दिया ही है तो फिर सविता के मामले में वह क्यों नहीं मान जाते है। कितना कुछ तो मैंने यहाँ आने के बाद किया लेकिन बाबा ने एक बार भी तो नहीं टोका। फिर आज वे हमें अपने आप से दूर क्यों किए हुए है?
प्रताप को याद आता है वह पल जब उसने पहली बार ऑफ़िस जॉयन किया था। सविता जिसे देखते ही प्रताप मुग्ध हो गया था। सविता बहुत खूबसूरत तो नहीं थी पर उसकी बातें किसी के भी दिल में जगह बनाने के लिए काफी थी। सविता का बाते, उसके काम, उसके कार्यशैली ने प्रताप को मोह लिया था। प्रताप सविता का असिसटेन्ट था, दस-दस घण्टे साथ काम करना पड़ता था। जब दो लोग साथ काम करते है तो एक-दूसरे की खूबियों और कमियों को अच्छी तरह जान लेते है। उससे भी अच्छी बात तब होती है जब सबकुछ जानने के बाद भी लोग एक-दूसरे को दोस्त या प्यार के रूप में स्वीकार करते है। सविता और प्रताप ऑफ़िस में एक अच्छे कॉलीग की तरह ही नहीं पेश आते थे बल्कि निजि ज़िन्दगी में भी अच्छे दोस्त ही बन गए थे। प्रताप मन-ही-मन सविता को चाहता था। प्रताप को वह पल याद आता है जब वह अपनी मन की बात सविता के जन्म दिन पर उसे खास अपनी तरफ से दि गयी छोटी सी दावत में उससे कहता है। सविता प्रताप की मन की बात अस्वीकार नहीं कर पाती है, क्योंकि सविता को प्रताप में सबसे अच्छी बात यही लगती है कि प्रताप सच में ही उससे प्यार करता था जो उस उसकी हर काम में या बातों में नज़र आती थी। और जब-जब सविता ने प्रताप को अपनी ज़रूरत के समय चाहा उसे सदा पाया भी। सविता को और क्या चाहिए था, जब कोई आपसे सच्चा प्यार करता हो और सदा आपके ज़रूरत में आपके पास हो तो किसी और चीज़ की क्या ज़रूरत है।
प्रताप को तमाम सारी बातें याद आती है। प्रताप अपनी मन की सारी बातें किसी अपने से कहना चाहता था। मगर इसी सोच में था कि किससे कहे ताकि उसके प्यार को एक सुन्दर अनजाम तक वह पहुँचा सके। आज तक उसने अपनी हर बात अपने बाबा से ही कही है। प्रताप बाबा से इस बारे में बात करना चाहता है लेकिन बाबा क्या सोचेंगे, शायद नहीं मानेंगे या मान भी सकते है। प्रताप इसी दुविधा में पड़ा है कि वह किससे कहे। “माँ से कहता हुँ। हाँ माँ यदि बाबा को मना ले तो सविता को अपनी जीवन संगीनी बनाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। हाँ ये हो सकता है।” प्रताप माँ को बताने की सोचता है तभी खयाल आता है कि माँ सविता के बारे में सुनने से उसे देखना जरूर चाहेंगी। “सविता को माँ से कैसे मिलवाऊ?”। “पर माँ से मिलाना भी तो ज़रूरी है, उनसे मंजूरी मिलेगी तभी तो बाबा को वह मना सकेंगी, लेकिन सविता के बारे में सुनकर माँ के खयाल बदल भी तो सकते है शायद उन्हें नौकरी करने वाली पसन्द न आए?”तभी प्रताप को सुमन याद आती है। छोटी बहन ही सही लेकिन मेरे हर राज़ को वह जानती है और माँ-बाबा से यथा सम्भव छुपा सकती है, “यस! सुमन को बताता हुँ, वही कुछ उपाय कर सकती है।” प्रताप सुमन को फोन करके अपने फ्लैट बुला लेता है। सुमन दिल्ली में वर्कींग व्हीमेन हॉस्टल में रहती थी और एक बी.पी.ओ में काम कर रही थी जो कि प्रताप के यहाँ से लगभग पचास की.मी दूर था।
सुमन के आते ही प्रताप उसे लेकर एक रेस्टरा में चल देता है। दोनों भाई-बहन में बाते होती है। सुमन को प्रताप और सविता के बारे में सारी बातें समझ में आ जाती है।
“भईया सविता मुझे अच्छी लगी। मॉर्डन है, सोफिस्टिकेटेड है और तुमसे प्यार भी करती है। तुम्हें उसी से शादी करनी चाहिए।”
“लेकिन माँ-बाबा का क्या? वे लोग सविता को एक्सेप्ट करेंगे? मुझे तो इसी बात की चिन्ता है। Oh God! What should I do?”
“तुम माँ-बाबा की चिन्ता मत करो। मैं उन्हें वक्त आने पर समझा लूंगी। पहले तुम सविता से शादी का फैसला फाइनल करलो।”
“हाँ,मैंने फैसला कर लिया है। मैं सविता से ही शादी करूंगा। उसके अलावा मैं और किसी का नहीं हो सकता।”
“Chill भईया। अब तुम सविता से पूछों वह क्या चाहती है। अगर उसका भी मन यही कहता है तो तुम दोनों जल्द-से-जल्द शादी करलो।”
“मैं कल सविता डेट पर ले जा रहा हुँ। उसे कल प्रपोज़ कर दूंगा। ये देखों मैंने उसके लिए रिंग खरीदी है।”
“वाव! Diamond ring! भईया आप तो बहुत ही रोमांटिक हो।”
“हट पागल।”
“ओके ब्रो। मैं अब चलती हुँ। आज रात मेरी शिफ्ट है। मुझे अभी देर हो रही है। मैं इतवार के दिन घर जा रही हुँ। तुम चिन्ता मत करना मैं बाबा से और माँ से बात कर लूंगी।”
“मैं तुम्हें हॉस्टल तक छोड़ देता हुँ। चलो।”

3
“माँ, बाबा। कहा है आप लोग? मैं कब से पुकार रही हुँ।”
“अरे सुमन! तु आ गयी बिट्टो। मेरी लाडली बेटी।” ( सुमन को बाबा अपने गले लगाते है और दोनों एक-दूसरे को स्नेह दृष्टि से देखते है।)
“कैसी है मेरी बच्ची। कितनी दुबली हो गयी हो तुम। हॉस्टल वाले मेरी लाडो को कुछ खिलाते-पिलाते नहीं है क्या?”
“ओफ ओ! बाबा मैं बिलकुल ठीक हुँ। इनफैक्ट आप बहुत कमजोर हो गए हो। Where is Mom?”
“तेरी माँ पड़ोस गयी है। आज शर्मा जी के यहाँ संगीत है शाम को। तेरी माँ वही गयी है मेहन्दी लगवाने।”
“तो क्या रिमझिम की शादी हो रही है?”
“हाँ बहुत ही अच्छा लड़का मिला है उसे। फॉरन में रहता है। अच्छी नौकरी है और लड़के वालों को रिमझिम पसन्द आ गयी।”
“वाव! देट्स ग्रेट।”
“अब लगता है तेरी भी जल्द से शादी कर देनी चाहिए। ताकि प्रताप के लिए भी लड़की ढूँढना शुरू करे तेरी माँ। जब से रिमझिम की शादी की खबर सुनी है वह भी दिन रात यही सपने देख रही है कि कब तुझे विदा करे।”
“बाबा! मैं आप सबको छोड़ कर कही जाने वाली नहीं हुँ।”
“अरे सुमन तु आ गयी बिटियाँ।”
“माँ! कैसी हो। वाव तुम्हारे हाथ में लगी महन्दी कितनी अच्छी लग रही है।”
“भगवान करे तेरे हाथों में जल्दी से महन्दी लग जाए तो प्रताप का भी लगन करवाऊँ।”
“मेरी बात छोड़ो माँ, मैं दादो के बारे में बहुत जरूरी बात करने आयी हुँ।”
“क्या बात करनी है।”
“पहले चलो तो कमरे में।”



4.
“सुनिए जी। सुमन प्रताप के बारे में कुछ कहना चाहती है।”
“क्या कहना चाहती है?”
“बाबा, भईया शादी करना चाहते है।”
“तो?”
“भईया ने लड़की भी पसन्द करली है।”
“क्या प्रताप ने लड़की पसन्द करली? और हमसे कहा तक नहीं।”
“देखिए नाराज़ मत होईए। एक बार लड़की देख लेते हैं क्या पता पसन्द आ जाए।”
“प्रताप को लड़कियों के बारे में क्या मालूम। बच्चा है अभी।”
“अगर बच्चा है तो फिर उसकी शादी करने की क्या ज़रूरत है।”
“देखो सुमन की माँ मुझसे फालतू बहस मत करो।”
“देखिए आखिर शादी के बाद प्रताप को ही तो अपनी पत्नी के साथ ज़िन्दगी भर साथ रहना है।”
“प्रताप के लिए सही लड़की कौन हो सकती है यह मैं जानता हुँ।”
“पर प्रताप उससे प्यार करता है।”
“जानता हुँ। लेकिन प्यार कर लेना ही सबकुछ नहीं होता। ज़िम्मेदारी नाम की भी कोई चीज होती है।”
“देखिए बहू आएगी तो ज़िम्मेदारी अपने-आप ही उठा सकेगी।”
“मैं कुछ नहीं जानता। अगर तुम तीनों ने मिलकर फैसला ले लिया है तो फिर रहने दो। मेरी इजाजत की क्या ज़रूरत है।”
“बाबा। Please मान जाईए ना।”
“सुमन!”


5.
टेबल पर लाल और सफेद गुलाब(सविता के पसन्द के) का गुलदस्ता, कुछ जलती मोबत्तियाँ और हाथ में हीरे की अंगूठी लिए प्रताप बेसब्री से सविता का इंतज़ार करता है। जैसे ही सविता आती है प्रताप उसे गले लगाकर स्वागत करता है। फिर हाथ पकड़कर उसे बिठाता है। सविता थोड़ी हैरान है क्योंकि आज से पहले प्रताप ने कभी ऐसी डेट नहीं अरेंज की। उसपर भी सविता प्रताप से नाराज़ थी क्योंकि प्रताप ने उससे कई दिन बात नहीं की थी(सविता को पता नहीं था कि प्रताप किस कश्मकश में था)। सविता की नाराज़गी से प्रताप और भी ज्यादा परेशान हो गया था। सोच रहा था कि क्या करके वह सविता के मनाए।
“प्रताप! तुम ठीक तो हो ना?”
“हाँ मेम बिलकुल ठीक हुँ।”
“मेम?”
“सविता!”
“क्या बात है साफ-साफ कहोगे या मैं जाऊ?”
“कुछ नहीं बस तुमसे कुछ बात कहनी है।”
“कहो क्या कहना है तुम्हें।”
“सविता आज तुम्हे जो मैंने सोम्स एण्ड सन्स की जो फाइल भेजी उसे तुमने ध्यान से पड़ा तो?”
“तुम मुझे डेट पर ऑफ़िस की फ़ाइलें पढ़वाने लाये हो।”
“नहीं सविता। एक्चुएली तुमसे बहुत ज़रूरी बात कहनी है।”
“तो कहो न।”
“सविता मैं जब यहाँ आया था तो तुम्हारा असिसटेंट था।”
“तो तुम तो अब भी मेरे जूनियर ही हो।”
“सविता मुझे फिर से प्रमोशन चाहिए।”
“तुम पागल हो गए हो क्या? डेट पर तुम अपनी गर्ल फ़्रेण्ड के साथ आए हो, किसी कम्पनी के सिनियर सुपरवाइज़र के साथ ऑफ़िश्यिल मीटिंग पर नहीं। ”
“सविता मेरी बात समझने की कोशिश करो।”
“क्या समझु?”
“सविता क्या तुम मेरी ज़िन्दगी भर के लिए सुपरवाइज़र और मैं तुम्हारा एसिसटेंट बनकर इस लाईफ़ में जी सकता हुँ।”
“क्या?”
“आइ मीन। चौबिस घण्टे, सात दिन, पता नहीं कितने साल लेकिन जब तक हम दोनों जीते है तब तक के लिए क क क्या त त तुम मेरी गर्ल फ़्रेण्ड के बजाए लीगल अम अम वाईफ़ और सुपरवाइज़र बनना चाहोगी। मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारी डाट खाने को त त तैयार हुँ। पील्ज़।”
(हंसकर)“प्रताप तुम पागल हो गए हो क्या, इतनी सी बात को इतने घुमा-फिराकर कहने की क्या ज़रूरत थी। तुम सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो।”
“तुम्हारे गुस्से से वाकिफ़ हुँ। इतने वक्त से साथ काम जो कर रहे हैं। तुम मुझपर नाराज़ थी।”
“ओह प्रताप! ओफ़कोर्स मैं तुमसे ही शादी करूंगी। मुझे भी अच्छा लगेगा अगर मेरी डाट कोई ज़िन्दगी भर खाने को तैयार है तो।”

प्रताप सविता को अंगूठी पहनाता है और फिर बाकी सारी बातें भी होती है। प्रताप की दुविधा सुनकर सविता उसे सीविल मेरिज की सलाह देती है। प्रताप को यह सलाह उचित मालूम होती है। तीस दिन बाद कोर्ट में सविता और प्रताप सीविल मेरिज के लिए आते हैं। गवाह के बतौर प्रताप सुमन और अपने सबसे अच्छे दोस्त निखिल को बुला लेता है और सविता अपनी दो सहेलियों के साथ आती है।
प्रताप के घर उसी दिन ये खबर पहुँच जाती है। प्रमिला मन-ही-मन एक द्वन्द्व में फंसी होती है। एक तरफ बेटे की शादी से खुश भी है और नयी बहू को देखने का उत्साह भी। साथ ही दुखी भी इसलिए की अपने बेटे की शादी में वह जो कुछ करना चाहती थी पारिवारिक झमेले और इस हड़बड़ी की शादी में नहीं हो पाता है। उधर प्रताप के पिता को यह रिश्ता किसलिए मंजूर नहीं था यह भी समझ में नहीं आता है। घर का माहौल इसी विषय से गर्म-गर्म सा हो जाता है। प्रमिला इसी द्वन्द्व में रहकर अपनी बहू के स्वागत की तैयारियाँ में लगी रहती है कि तभी प्रताप और सविता अपने दोस्तों के साथ घर में प्रवेश करते हैं। प्रमिला खुशी-खुशी हाथ में आरती की थाली लेते हुए आगे बढ़ती है। प्रताप के पिता अपने कमरे से यह दृश्य देख रहे होते है।