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Sunday, 11 May 2014

दावानल



           रामू प्रतिदिन लकड़ियाँ काट कर नंदूलाल लकड़वाला के पास दे आता था। गाँव से थोड़ी दूर जंगल था जहाँ उसके साथ कई लकड़वाहे जाते थे और जंगल से उन्ही पेड़ो को काट कर ले आते जो बूड़े हो जाते थे। नए या किसी बड़े पेड़ को काटने की इजाजत नहीं थी। सरकार ने जंगलों में पेड़ों की कटाई पर सख्त कानून बनाए है। फॉरेस्ट ऑफिसर के कड़े नजरो के सामने प्रतिदिन का ये कारोबार होता है। जहाँ-जहाँ ज्यादा पेड़ काटे गए है, वहाँ-वहाँ नए-नए पौधों को लगवाया जाता है। सब जानते है फॉरेस्ट ऑफिसर सूरजन सिंह जी प्रकृति के भक्त है। आस-पास के जितने गाँव के पास वाले जंगलों की हिफाजत का जिम्मा दिया गया है, सरजन सिंह जी उन सभी इलाकों में प्रकृति भक्त के रूप में मशहूर है। सभी लकड़वाहे उनसे संतुष्ट न होने पर भी उनकी इज्जत करते है। इतनी सख्ती और प्रकृति के सम्पदा का ज्ञान देने पर भी जंगलों में चोरियाँ हो ही जाया करती थी। इसीलिए वे गाँव के बच्चों एवं स्त्रियों को जागरुक कर रहे थे जिसमें रामू और उसके साथी जोर-शोर से हिस्सा लेते थे।

          रामू एक साधारण लकड़वाहा था। उसकी पत्नी बिंदो (बिंदेश्वरी) और उसके चार बच्चे थे। दो बेटी लक्ष्मी और कामाख्या और दो बेटे बिरजू भोला। माता-पिता प्यार से इन सभी को लाखी, कम्मो, बिरजूवा और सबसे छोटे को भोले बाबा बुलाते थे। रामू को अपनी बड़ी बेटी लाखी के विवाह की बड़ी चिन्ता थी। इस साल वह अठारह की हो चुकी थी और बारहवी पास भी कर चुकी थी। घर की आर्थिक हालत के चलते वह आगे नहीं पढ़ सकती थी। फिर भी रामू यह चाहता था कि वह अपने जीवन में कुछ बन जाए या फिर कोई ऐसा लड़का मिल जाए जो उसका जीवन सवाँर दे। लेकिन ऐसे पढ़े-लिखे लड़के कहाँ मिलते है आजकल? और मिलते भी है तो लाखो का दहेज मांगते है। रामू कर्ज नहीं लेना चाहता है पर इतने पैसे जुगाड़ करते-करते लाखी की उम्र बढ़ती जाएगी। घर बैठा कर इतने समय तक रखना उसके लिए छुपा हुआ धन खुले में रख देने के बराबर था। गाँव का एक छठा हुआ बदमाश बाँके लाखी पर नजर टिकाए हुए था। बड़ी मुश्किल से रामू का शहर के एक स्कूल के मास्टर का रिश्ता मिला। लड़के वाले दहेज नहीं माँगते थे। बस लड़की अच्छी हो और शादी धूमधाम से हो। लड़का मास्टर था अतः आधुनिक खयाल का था। रामू को जैसे स्वर्ग मिल गया। लेकिन यहाँ भी पैसे की बात थी। दहेज न सही लेकिन शादी के और खर्च भी थे, गहने, बारातियों की आवभगत, लड़के के लिए शगुन का सामान इत्यादि। ले देकर पाँच लाख का खर्चा होता है। रामू अभी यह रिश्ता चाहकर भी नहीं छोड़ सकता था क्योंकि ऐसा उसके जीवन में पहला मौका था जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही थी। वरना गाँव में कितनी ही शादी ऐसी उसने देखी जहाँ पर रीति से, रस्म से पहले दहेज की रक्म बढ़ती ही जाती है। जो दे सकते थे उन लोगों ने दिया जो नहीं दे पाए बारात उनके घर से लौट जाती। कईओं की लड़कियाँ दहेज के कारण ससुराल की दया से पिता के घर पड़ी हुई है। रामू जानता था कि लड़के के परिवार वाले अच्छे लोग है। लड़के के माता-पिता पढ़े-लिखे है और पिता एक समाज सेवी संस्था से जुड़े हुए है। कभी लकड़ी का कारोबार वे भी करते थे लेकिन मुनाफा ज्यादा न हुआ। बाद में शहर जाकर बसे वही उनकी मुलाकात महावीर जी के साथ होती है जो समाज सेवी संस्था चलाते थे। रामू के लिए ये बहुत खुशी की भी बात थी और चिंता की भी। अतः रामू ऑफिसर सूरजन सिंह जी के पास गया और बेटी के विवाह के लिए कर्ज माँगने लगा। सूरजन सिंह जी ने सारी बातें समझ कर उससे कहा देख रामू पैसे तो मैं तुझे दिलवा दूँगा, लेकिन वक्त पर तू यदी लौटा नहीं पाया तो फिर क्या करेगा।.....मालिक मैंने सोचा है कि अपने पुश्तैनी जमीन का कुछ हिस्सा बेच दूँगा और घर को भी गिरवी रखूँगा। बाकी आप दे दो मालिक।...अरे मूर्ख दो-दो जगह से कर्ज़ क्यों लेगा?” “घर क्या तो गाँव के उस पाटिल के पास रखेगा? तू जानता नहीं के एक बार उसके कर्ज़ के शिकंजे में जो फँसा वह फँसा ही रह जाता है।...मालिक। तो क्या करे हम? कुछ समझ में नहीं आता।...एक काम कर तू बैंक से लोन ले ले। गैरेन्टी पर मैं दस्तखत कर दूँगा।...मालिक बहुत महरबानी होगी।
          किसी प्रकार रामू को कर्ज़ मिल जाता है और लाखी की शादी का दिन तय हो जाता है।

          बारात आ चुकी है.......................

अरे!  द्वार पर कोई जाओ रे, जँवाई जी खड़े है। आरती उतारो
अरे लाखी की माँ, आरती की थाली सजी नहीं अब तक?”
अजी आती हूँ, आती हूँ।
चलो चलो। लाखी के दूलहे को देखकर आते है।
अे लाखी। तेरा दूलहा तो बड़ा बांका है रे।
क्यों नहीं। सहरी जो ठहरे। सुना है लकड़ियों के कारोबार में चाचा जी का काफी मुनाफा न हुआ था। सो सहर जाकर बस गए। वहा रहकर फिर से छोटा-मोटा सा लकड़ी बेचने की दुकान डाली सो जम गयी और अब काफी आमदनी होती है
हमरी लाखी राज करेगी ससुराल में
अरे राम नारायण जी। इधर आइए, इधर आइए।
सम्बन्धी जी। किसी चीज की जरूरत थी का? हमने आप की माँग का पूरा खियाल रखते हुए सारा इंतजाम किया है। फिर भी कौनो चीज की कमी हो तो हमका कहिए।
अरे नहीं नहीं। इ बात नहीं है। हम तो आपको कुछ लोगों से मिलवाने वाले थे। ये रहे प्रताप सिंह जी हमारे पड़ोसी, लकड़ी का कारोबार भी करते है, हम इन्हीं के साथ ही दुकान लगाते है। ये है महावीर जी। समाज सेवी है। इनकी संस्था से ही हमरा उद्धार हुआ है......
अरे दुल्हन को ले आइए, मोहरत हो गया है।
हाँ...हाँ... आओ आओ।
शहनाई की गूंज, लोगों की हँसी-मजाक और शोर में शादी का काम निपटा। दुल्हन अगले दिन सबको आँसूओं के सागर में डूबो ससुराल को विदा हो गयी।

लाखी ससुराल चली गयी है। भगवान उसको सुखी रखे यही कामना है मेरी।...
जी मालिक...
बहुत अच्छे भाग लेकर आयी है तेरी छोकरी, देखना ससुराल वाले भी उसके भाग को सराहेंगे।
जी मालिक। बस अब यही खुशी को देख-देख हम अपना सारा कर्ज़ा उतारेंगे।...
अरे हाँ रामू। तूने तो बताया नहीं कि क्या करेगा, कैसे उतारेगा।
मालिक हम सोच रहे थे कि लकड़ियो का एक बार अच्छा मुनाफा मिल जाए तो
अरे रामू तू जानता है न कि ये मुमकिन नहीं, सरकार का दबाव इतना है कि हर दिन 10 टन से ज्यादा कटवाया नहीं जा सकता, उस पर से तेरे आदमी भी चोरियाँ करते है, कहाँ से बेचेगा तू लकड़ियाँ? आधा तो नंदूलाल ही ले जाता है। ऐसा करते-करते कई साल लग जाएंगे।
मालिक तो फिर आप बताईए हम का करे।..
मेरे खयाल से लकड़ियो से ज्यादा फायदा कोयला बेचने में है। अभी सर्दियों के मौसम में पहाड़ी प्रदेशों और आस-पास के जिलों में कोयले की खपत ज्यादा होगी। जो तू ज़रा से लकड़ियों से चिल्लड़ कमाता है वही ज़रा-सा कोयला बहुत मुनाफा दिलाएगी। फिर गाँव के दिक्खवा माई के इलाके में बहु कोयला मिलता है। मैं सारा इन्तजाम करवा दूँगा।
ना-ना मालिक दक्खिवा माई के इलाके में हमको ना भेजिए। आप तो जानते ही हो वहा कितना खतरा है। साथ ही लाखन लुटेरे का इलाका है वह हमको बिना दाम के नहीं छोड़ेगा।
          रामू के गाँव में दक्खिवा माई और लाखन लुटेरा काफी मशहूर थे। दक्खिवा माई सदियों से अपने कोपाग्नि ने भस्म करने की वजह से मशहूर थी और लाखन गाँव का मशहूर छटा हुआ बदमाश खूनी लुटेरा था। पुलिस उसे पकड़ना चाहती थी लेकिन दक्खिवा माई के घने जंगल में वह जा छुपा था। उसे पकड़ने के लिए पुलिस की एक टुकड़ी वहाँ गयी भी थी लेकिन उस घने जंगल ने उन्हें निगल लिया था। मगर रामू को वहा जाना ही था क्योंकि उसे अपना कर्ज़ा चुकाना था। वह वहाँ जाना न चाहता था मगर कर्ज़ के राक्षस के भय ने उसे मजबूर कर दिया। रामू जैसे-तैसे खुद को तैयार कर वहाँ जाने लगा। उसकी पत्नी बिन्दों उसे रोक रही थी, अपने सुहाग की दुहाई दे रही थी। रामू ने भी दिलासा दिया कि वह ज्यादा दूर नहीं जाएगा।
          घने जंगल में रामू डरा सहमा-सा चला जा रहा है। दक्खिवा माई को मन-ही-मन याद करके, विनती करते कृपा रखने को कहते हुए चला जा रहा था। सहसा उसे लगा जैसे कोई उसका पीछा कर रहा है। मुड़कर वह देखता है तो कोई दिखायी नहीं देता। रामू जैसे-तैसे कोयले की घाटी के करीब पहुँचा कि तभी उसे किसी भारी भरकम शरीर ने जकड़ लिया। वह और कोई नहीं लाखन था।
लाखन भैया, लाखन भैया....हमका छोड़ दो, छोड़ दो
छोड़ दे तुमको मरदूत, पुलिस का आदमी बनकर आया है साला...
हम पुलिस वाले की तरफ से नहीं आए हैं। हमरी बात तो सुनो लाखन
आ...आ.... आ........
          लाखन से रामू कुछ कह पाता, इससे पहले लाखन रामू पर जोर-जोर से घूसे जमाने लगा। कोयले के एक बड़े से टुकड़े से लाखन ने रामू को चित्त कर दिया। बाद में उसकी लाश को पीपल के पेड़ के नीचे लाकर आग लगा दी।
          दूसरे दिन गाँव के लोगों को लगा कि रामू भी दक्खिवा माई के कोपाग्नि से मर गया। बिन्दो पछाड़ खा-खा कर पति के शव के पास रोने लगी। लाखी, कम्मो, बिरजूवा और भोला पिता से लिपट कर रोने लगे। आस-पास जितने गाँव वाले इकट्ठा हुए थे सब रोने लगे। कुछ लोगों को लाखन की करतूत पर संदेह होने लगा था, लेकिन कौन इस पचड़े में पड़े। सो चुपकी लगा गए। ऑफिसर सूरजन सिंह भी पछताने लगे कि क्यों उसे दक्खिवा माई के जंगल जाने की बात सुझायी।

          श्राद्ध के अगले दिन सूरजन सिंह बिन्दो से मिलने आया। सफेद साड़ी, बिखरे बाल, जमीन पर बैठी वह उजड़े सुहाग के दर्द को आँसुओं से कम करने में लगी थी। सूरजन सिंह को उसके मुरझाए चेहरे और हालत को देखकर एक बार तरस आया पर उससे ज्यादा उसे ये परेशानी थी कि रामू के कर्ज़ के लिए उसने गैरेंटी दी थी। अब बैंक वाले उसे परेशान करेंगे। पाँच लाख की रक्म यू तो इतनी बड़ी न थी पर फिर भी इतनी रकम कौन आजकल रखता है। कही लूट-खसूट हो जाए तो?
बिन्दो। कैसी हो बहन?”बिन्दो आँसू भरे नेत्रों से देखने लगी और फिर फूट-फूट कर रोने लगी। सूरजन सिंह कुछ सकपकाया, कुछ असमंजस में पड़ा और धीरे-धीरे कहने लगा....
बहन रोओ मत, जो तुम्हारे साथ हुआ है उसका दुख मुझे भी बहुत है। दरअसल मैं ही दोषी हूँ। रामू को कर्ज़ा दिलाते वक्त मैंने गैरेंटी पर दस्तखत किए थे। समय पर न चुकाने पर बैंक वाले तुम्हारे घर के साथ-साथ मुझ पर भी जुर्माना लगा देते। इसीलिए मैंने उसे वहाँ जाने की सलाह दी थी। मुझे लगा गाँव वालों की बातें महज अफवाहें है। पर क्या मालूम था कि ये सब सच हो जाएगा।
          बिन्दो दुख में ये सारी बातें समझ नहीं पा रही थी। बस इतना ही समझ पायी कि सूरजन सिंह की सलाह पर रामू की यह दशा हुई। मारे क्रोध के वह सूरजन सिंह की और मुखातिब हो कोसने को उतर आयी। लेकिन तभी उसे अपनी बेबसी का एहसास हुआ। वह ऑफिसर सूरजन सिंह का कुछ नहीं कर सकती थी। वैसे भी उसका कोई दोष न था इस हादसे में। बल्कि उसके परिवार पर सूरजन सिंह ने बहुत उपकार किए थे। लाखी का बियाह भी उन्होंने ही करवाया। वह हारकर अपने भाग्य को कोसने लगी। सूरजन सिंह उसकी मनोभावना समझ गए थे लेकिन फिर भी वे कहने लगे.....
देखो बिन्दो। मुझे कोई हर्ज़ न होगा पाँच लाख दे देने में। लेकिन तुम जानती हो कि इतनी रकम आजकल कोई जेब में लेकर नहीं चलता। फिर में जानता हूँ कि तुम्हारे पास अब कुछ न बचा है। पुश्तों की ज़मीन बिक गयी है और ये घर रामू ने मुझे गैरेंटी के लिए गिरवी रखवाया था। अब अगर तू बैंक का कर्ज़ा नहीं उतार पायी तो हो सकता है वे तुझ पर जुर्माना डाल दे या ये घर ही हड़प ले या फिर मुझे जेल ले जाए तो क्या करेगी? कुछ सोचा है।....बिन्दो जानती थी कि बैंक का कर्जा जमीनदारों के कर्जे जैसा खतरनाक होता है। वही उसे कानून का कुछ पता न था। उस पर से ये सब सुन वह घबरा गयी। सूरजन सिंह ने जो कहा सब सच था। वह सोच ही रही थी कि सूरजन सिंह की आवाज़ कानो में पड़ी......
तेरे परिवार के लिए जितना किया, क्या बदले में मुझे जेल जाने देगी।
सच ही बिन्दो असमंजस में पड़ गयी। उसने कहा--पर मालिक अब क्या कर सकते है, मुझे तो कुछ भी पता नहीं।
तुझे ज्यादा कुछ नहीं करना है। ये घर मेरे पास रेहन रख गया था रामू। तू बस इन कागजात पर दस्तखत कर दें। मैं बाकी सब सम्भाल लूंगा। सूरजन सिंह कुछ कागज अपने साथ लाया था जिसपर वह बिन्दों, जो सिर्फ दस्तखत करना सीखी थी, के दस्तखत लेता है।
देख तू अपने बच्चों को लेकर इसी घर में रह। यह तेरा ही घर है। बस दुनियाँ के वास्ते अब इसे मेरा कह दिया करना।
          बिन्दो अगली सुबह अपने बच्चों समेत और कुछ सामान लेकर अनजान दिशा की ओर निकल पड़ी। उसके स्वाभिमान को यह स्वीकार न था कि वह किसी पराए के घर आश्रिता बन कर रहे। अपने बच्चों को भी वह यही शिक्षा देती थी। उसने तय कर लिया था कि कही उसे मजदूरी करने को मिल जाए तो वह अपना और बच्चों का पेट पाल लेगी।



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