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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

प्रभात वर्णन कविता का सार.................



            प्रभात वर्णन में हरिऔध जी ने प्रकृति के सबसे सुन्दर क्षण प्रभात की सुन्दरता एवं उसके मनोहरी दृश्यों का चित्रण किया है। प्रकृति में प्रभात में होने वाले हर प्रकार के हलचलों को कवि ने अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से चित्रित किया है। कवि ने प्रभात की सुन्दरता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रकृति का मानवीकरण किया है जिसके कारण यह कविता और अधिक सुन्दर एवं सरस बन गयी है।
          कवि कहते हैं प्रकृति रूपी वधू ने असित(काला) वस्त्र बदल कर सित(सफेद) वस्त्र पहना। अर्थात् रात की कालिमा दूर हो गयी और सुबह की रोशनी चारों और फैलने लगी। कवि आगे कहते हैं कि प्रकृति रूपी वधू ने अपने शरीर से तारकावलि(तारे, नक्षत्र समूह) का गहना उतार दिया। उसका यह नया स्वरूप, नया रंग पूरे नीले आसमान पर छा गया। अर्थात् रात में आकाश काला होता है तो उसमें तारे चमकने लगते है बिलकुल गहनों के जैसे दिखते हैं। परन्तु सुबह होते ही सूरज की रोशनी चारों और फैलने लगती है तो तारे छिप जाते हैं। सुबह होते ही चारों तरफ दिशाओं में राग छाने लगा अर्थात् चिड़ियों का चहचहाना, आदि चारों दिशा को रागमय कर देती है। राग प्रेम का दूसरा नाम भी है। सुबह होते ही चारों दिशाओं में प्रेम भी छाने लगा। निशा(रात) रूपी स्त्री ने अपना वदन(शरीर) छुपा लिया।
          कवि आगे कहते हैं कि उषा सुन्दरी अर्थात् दिन रूपी सुन्दरी आरंजित( हर प्रकार के रंगों से पूरी तरहा रंगी हुई) होकर सुख मनाने लगी।(सुहागिन स्त्रियाँ हमेशा रंगीन कपड़े पहनती है, कवि ने प्रकृति को, विशेष कर उषा सुन्दरी को सुहागिन के रूप में दर्शाने की कोशिश की है।) प्रकृति में प्रभात होते ही तरहा-तरहा के रंग दिखने लगे थे, उससे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे उषा सुन्दरी के कपड़े रंगीन हो गए हो। कवि कहते हैं कि जिस प्रकार तम्बू टांगा हुआ और तना हुआ रहता है, उसी प्रकार उषा सुन्दरी ने अपने होंठों में लाल रंग मयी आभा को ताना है। अर्थात् सुबह आकाश में चारो तरफ सूरज की लालिमा छायी हुई रहती है। नियति(भाग्य विधाता) के हाथों से चन्द्र की छवि छीनकर उसे छुपा दिया है और धरती पर से उज्जवल काली चादर उठ गयी है। अर्थात् रात को चन्द्र आकाश में चमकता है जिसके कारण धरती पर अंधेरे में सब कुछ चान्दी रंग में चमकता हुआ नज़र आता है। रात की कालिमा और चांदी का रंग एक सा हो जाता है। लगता है जैसे किसी ने धरती पर उजले काले रंग की चादर बिछा दी हो। जो सुबह के होते ही अपने आप गायब हो जाती है।
          कवि आगे कहते है कि प्रकृति में सुबह होते ही हृदय अपने-आप सरस(रस से भर जाना) हो जाता है। ओस की बून्दे भीगे हुए हृदय को और भी सरस बना देती है। फूलों, पत्तियों, फलों इत्यादि में ओस की बून्दे छा जाने के कारण सब कुछ अधिक रस मयी बन जाता है। उषा सुन्दरी ने ऐसे में और अधिक प्रसन्न होकर आसमान के निचले हिस्से से मोती बरसाने लगती है।(अर्थात् dew)। फिर खुले कंठ(गला) से मन खोल कर, मधुर(कमनीय) आवाज़ में बीन बजाने लगती है। अर्थात् सुबह होते ही चारों तरफ प्रकृति अलग-अलग रूपों में सुबह होने का एहसास कराती है। जैसे झरनों की आवाज़, पंछियों की चहचहाट आदि। कवि कहते हैं कि पंछियों ने भी उमंग भरे मधुर स्वर में चहचहाते हुए अपनी मधुर रागिनी सुनाई।
          ठण्डी-ठण्डी हवा बहने लगी और उनके छूने से कलियाँ विकसित होने लगी। पेड़ों का दल खुश हुआ तो लताएँ भी खुश होकर झूमने लगी। जलाशयों में कमल खिल उठे एवं नदियाँ भी ठण्डी हवा के छूने से झूम उठी, उनकी लहरें और अधिक खुशी से उछल-उछल कर बहने लगी। कवि कहते हैं कि जहाँ आकाश और धरती जुड़ती हुई नजर आती है, वहाँ तक का सारा वातावरण सुगंधित हो चुका है। अर्थात् सुबह होते ही चारों और फूल खिलने लगते हैं और ठण्डी हवा उनकी खुशबू को अपने में समेट कर चारों तरफ फैला देती है। भवरों का झुण्ड इस खुशबू से मंत्र-मुग्ध होकर इधर-उधर उड़ने लगते हैं।
          प्रभात होते ही सूरज का उदय होता है। वह बिलकुल बाल-रवि अर्थात् छोटा-सा सूरज लगता है जैसे की बच्चा हो। उसके उदय होते ही चारों तरफ सोने जैसी चमक के साथ किरणें फूट पड़ी। अंधकार से भरे आकाश में किरणें परम प्रकाशमय(रोशनी से भरी) बनकर टूट पड़ी। अर्थात् आकाश में अंधकार का नामो-निशान नहीं रहा। रात का अंधेरा पूरी तरहा से मिट गया। पूरा संसार सूरज की किरणों से जगमगा उठा है और धरती में कान्ति(glow) फैलने लगी। ऐसा लगने लगा जैसे किसी अलौकिक ज्योति पुंज अर्थात् किरणों का गुच्छों की सुन्दर मनोहर-सी थैली खुल गयी हो।
          कवि आगे कहते हैं कि सूर्योदय के साथ उसकी किरणें ऊँचे-ऊँचे पर्वतों एवं पहाड़ों में पड़ने लगी। जिस कारण ऐसा लग रहा था जैसे पर्वतो की चोटियों ने कोई मुकुट पहन लिया हो। जिसमें हजारों मणियाँ चमक रही हो। सूरज की सोने की किरणों का रंग पहाड़ो से गिरने वाले झरनों में मिल जाने पर ऐसा लग रहा था जैसे झरनों से पानी नहीं सोना बह रहा हो। सूरज की स्वर्णिम किरणों की चमक से मिलकर फूलों का गुच्छे आकर्षित लगने लगे। लताएँ और बेलियाँ भी सूरज के किरणें रूपी हाथ को छूकर चमक उठी। अर्थात् सूरज की किरणें रूपी हाथ अर्थात् प्रकाश पाकर सारी लताएँ चमक उठी।
          सूरज के उदय होते ही उसकी किरणें जब नदियों और जलाशयों में पड़ने पर कैसा मनोरम दृश्य होता है कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार से किया है। कवि कहते हैं कि सूरज की स्वर्णिम किरणों के तारों(तार) से जैसे कोई अतिसुन्दर चादर बुनी गयी हो, और उस चादर को सारे जलाशय के ऊपर बिछा कर रख दिया गया हो। इस कारण सारी नदियाँ और जलाशय बहुत आकर्षित लग रही है। ऐसा लग रहा है कि जैसे नदियाँ उमंगों से भर गयी है। अपने हृदय की उमंग को दिखाने के लिए उनकी लहरे उछल-उछल कर सूरज के प्रतिबिंब(परछाई) को लेकर खेल रही हैं।(सूरज की किरणें जब जलाशय में पड़ती है तो पानी चमकने लगता है तो ऐसा ही प्रतीत होता है जैसे वे सूरज की परछाई को लेकर खेल रही हैं।)
          नुकीले-नुकीले घास पर ओस की बूंदे पड़ी हैं। उनमें जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो ऐसा लगता है कि जैसे नुकीले घास पर किसी ने हीरों के कण(बहुत छोटे-छोटे टुकड़े) फैला दिये हो। उनकी हरित रंग की आभा(glow) उन ओस की बुन्दों से मिलकर और भी अधिक मनोरम दिखने लगते है। दूब पर थोड़ी बड़ी-बड़ी ओस की बूंदे पड़ी हुई है। जब उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है तो वे ओस की बूंदे मोतियों की माला जैसी लगती है जिसे दूब(दुर्बा एक प्रकार का छोटे आकार का तिनका पूजा में काम आने वाला) ने पहन कर रखा हो। और उससे वह और भी अधिक रमणीय लग रही है। सूरज की रोशनी इसी प्रकार बालू(sand) के टीले पर पड़ने लगती है तो वह भी आकर्षित लगने लगता है। बालू का एक-एक कण चांदी के कण के समान चमकने लगता है।
          जिस जगत को रात के अंधकार ने काला बना दिया था, वही जगत सूरज के उगने के बाद रंग-बिरंगा हो गया। कही हरियाली छाने लगी अर्थात् पेड़ो, पत्तों और लताओं के रंग, तो कही लाल रंग(लाल रंग के फूल या लाल-नारंगी रंग के सूरज का रंग) की आभा छाने लगी। जैसे-जैसे सूरज ऊपर और उठने लगा तो उसकी लालिमा धीरे-धीरे पीले रंग में बदलने लगा और आगे चलकर वह उज्जवल सफेद रंग में बदलने लगा। साथ ही साथ यह भी कह सकते हैं कि धरती पर भी तरहा-तरहा की चीज़े है जिनके रंग पीले या सफेद रंग के होते है जो सूरज के प्रकाश में चमकने लगे।
          इसी प्रकार सूर्योदय के होते ही लोग जाग गए, धरती जाग उठी। रात की जड़ता एवं आलसता भाग उठी। सब अपने-अपने कामों में लग गए। चिड़ियों का दाना चुगना, भंवरों का फूलों पर मधु के लिए मण्डराना, लोगों का सूर्य को जल चढ़ाना इत्यादि। ऐसा लगा जैसे कर्म का कोई स्रोत बहने लगा हो। प्रकृति ने अपनी नींद पूरी तरहा से त्याग दी हो। कवि आगे कहते हैं कि तमोगुण अर्थात् रात के समय की आलसता, जड़ता, आसुरी प्रवृत्तियाँ, भोग-विलास आदि हार गयी और सुबह की पवित्रता चारों और छा गयी। चकवी(मादा बतख) बड़े चावों से चकवे(नर बतख) के पास आ गयी।
          अंत में कवि कहते है कि सूर्योदय के होते ही ऐसा लगा जैसे दिन रूपी सुन्दरी ने सोने का मुकुट धारण किया हो एवं सूर्य की किरणों का पाकर सारे फूल खिल चुके हैं। प्रकृति ने ओस की बूंदे रूपी मोतियों की माला तथा खिले हुए फूलों का हार पहन लिया हो। उससे उसका शरीर अत्यंत आकर्षित और कमनीय लग रहा हैं। दिन रूपी सुन्दरी को देखकर प्रभात हँसते हुए अपने दोनों हाथों में खिला हुआ कमल लेकर आता है।

बुधवार, 28 जून 2017

स्त्री विमर्श बनाम स्त्री विमर्श




            वर्तमान समय में स्त्री की समाज में क्या भूमिका है, क्या स्थान है, क्या महत्त्व है इन सब चीज़ों की अलग से न तो बताने की जरूरत है न ही दिखाने की जरूरत है। वर्तमान युग में स्त्रियों ने समाज में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। इसीलिए स्त्री विमर्श, नारी संघर्ष आदि शब्दों की मेरे नजरिए में कोई आवश्यकता नहीं रही है। आज स्त्री जो संघर्ष कर रही हैं वह इसलिए नहीं की वह घर के चार दिवारी के अंदर बैठी है या उसे किसी भी प्रकार का अधिकार प्राप्त नहीं है। बल्कि वर्तमान युग में स्त्री को भी सब प्रकार के अधिकार तथा पद प्राप्त हो चुके है। ये युग वैश्विकरण का युग है जहाँ स्त्री पूरे विश्व में चाहे वह किसी भी समाज से हो, किसी भी प्रांत से हो अपनी छवि विश्व के सामने स्पष्ट कर चुकी है। अतः आज आवश्यकता है आज की स्त्री एवं आज के समाज के बीच यदि किसी प्रकार के मतभेद, टकराव, संघर्ष या सामंजस्य की बात हो तो उसकी चर्चा की जाए।
            वर्तमान समय में जहाँ नारी को शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, परिवार तथा समाज में स्वतंत्रता, व्यवसाय जगत हो या देश को चलाने लायक दायित्व, आदि सब कुछ मिल चुका है। वही समाज में नारी के प्रति सोच में बदलाव भी देखे जा रहें है। रूढ़ीवादी विचार में भी काफी परिवर्तन आया है। लेकिन अभी भी उतना परिवर्तन नहीं आया है कि हम कह सके कि नारी समाज में पूरी तरहा से सशक्त हो चुकी है। क्योंकि समाज में जितनी तेजी से वैश्विकरण हो रहा है उतनी तेजी से नारी समाज के प्रति अपराध के नये-नये तरीके भी निकल रहे हैं। या यू कह लीजिए कि नारी के विरुद्ध आपराधिक सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है बल्कि संशोधित रूप में वह सामने आया है। साथ-ही-साथ यह भी देखा जाता है कि नारी जहाँ-जहाँ अपना स्थान बनाती जा रही है वहाँ-वहाँ कुछ पुरूष या स्त्री ही उसकी शत्रु बनकर उसके सामने खड़ी है। आज विडम्बना की बात यह है कि नारी भी पुरूषों के समान आपराधिक मामले में दोषी पायी जाने लगी है। पुरूषों के जिन-जिन प्रवृत्तियों को स्त्रियाँ पसन्द नहीं करती थी या जिन-जिन आदतों से वह चिढ़ती थी वही सारी बातें स्त्रियों ने भी स्वयं अपना लिये है। पुरुष-स्त्री की एकसमानता की बात करते करते आज स्त्रियाँ भी पुरुष के सारे गुण-अवगुण अपनाने लगी है। फिर किस बात के लिए हम रोज-रोज यह आवाज उठाते हैं कि नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। अपनी श्रेष्ठता को ही जब कमजोरी समझकर कुछ स्त्रियों ने इसे सम्पूर्णतः ठुकरा दिया है। हाँ इस बात से भी हम विमुख नहीं हो सकते कि स्त्रियों के साथ आज भी अन्याय हो रहा है। लेकिन इस अन्याय को रोकने के लिए समाज की सोच के साथ-साथ स्त्रियों की सोच को भी बदलना जरूरी है तभी समाज को एक अच्छी दिशा मिलेगी। हमारे समाज के लिए सबसे अधिक आवश्यक है कि पुरुष-स्त्री को समान अधिकार से अधिक समान रूप से स्वस्थ विचारधारा, युक्ति-बुद्धि एवं अवसर दिए जाए। उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि दोनों ही एक-दूसरे के जीवन की पूर्ति तथा समाज के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक हैं। दोनों में ही एक-दूसरे के प्रति पारस्पारिक सम्मान की भावना रहनी चाहिए तब ही स्त्री-पुरुष को भिन्न रूप से न देखकर एक नागरिक रूप में देखा जाने लगेगा तथा वह समाज के लिए सबसे उपयुक्त होगा। अंत में यह कहा जा सकता है कि सृष्टि कर्ता ने इस संसार में मनुष्य के अलावा जितने प्राणियों को जन्म दिया है सबने अपनी क्षमता के अनुसार अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इसी प्रकार पुरूष प्रधान समाज बनाम स्त्री का भी संघर्ष जारी रहेगा। साथ-ही-साथ नारी को यह भी समझना आवश्यक है संघर्ष के दौरान हमारा नैतिक पतन न हो, धर्य के साथ आगे बढ़ना होगा,अन्यथा हमारा संघर्ष ही कमजोर और पथभ्रष्ट हो जाएगा।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

पिल्ज माईन्ड योर लेंग्वेज




 
1
बंगलुरू के व्यस्त जीवन और गाड़ियों के शोर-शराबे के बीच कमरे में बैठी नयना सुमित का इन्तज़ार कर रही थी। आज शुक्रवार है और शनिवार और रविवार की छुट्टियों का प्लान बना रही थी। सुमित के आने पर वह अपना प्लान बताएगी। बहुत दिन हुआ परिवार कही बाहर घुमने नहीं निकला। बच्चों की भी गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही है।
सुमित आज घर देर से आया। नयना चाय तैयार करती है। शावर लेने के बाद सुमित सीधे सोफे पर आकर लेट जाता है। नयना उसे चाय और स्नेक्स देती है और धीरे-धीरे मन में दो दिन की छुट्टी का कैसे मज़ा लिया जाए, क्या-क्या किया जाए, सुमित को बताने के लिए मन-ही-मन कोशिश करती है।
सुमित?
हूँ!
मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।
क्या बात? बोलो...
कल और परसों दो दिन की छुट्टी है। मैं सोच रही थी कि बहुत दिन हुए हम सब कही बाहर नहीं गए। बच्चों की छुट्टियाँ चल रही है। चलो न कही हो आए?
कैसे होगा? अचानक तुमने ये प्लान बना लिया। मुझसे पुछा तो होता।
क्यों क्या प्रॉब्लम है? कल क्यों नहीं जा सकते?
कल नहीं होगा। कल मेरे बॉस के यहाँ पार्टी है। हमें बुलाया है।
कल पार्टी है। हम दोनों को जाना है। पर बच्चे, उन्हें साथ लेकर जा सकते है?
Don’t worry. It’s a family party. हम बच्चों को साथ में ले चलेंगे।
नयना थोड़ी आश्वस्थ होती है। लेकिन उसे उतना अच्छा नहीं लगता क्योंकि पार्टियों में जा-जाकर वह थक चुकी है। एक वक्त था जब सुमित के साथ वह बहुत सारा समय बिता पाती थी। उसकी नयी-नयी शादी हुई थी और सुमित हर सप्ताहान्त उसे कही-न-कही बाहर घुमाने ले जाता था। समय अपनी गति से चलता गया और धीरे-धीरे दोनों के पास एक-दूसरे के लिए समय की कमी होने लगी। बच्चों को होने के बाद नयना उनके पालन-पोषण में व्यस्त हो गयी और सुमित भी अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने में जुट गया। नयना ने कभी इसकी शिकायत नहीं की। सुमित भी कभी नयना से किसी चीज की शिकायत नहीं करता। पर काम-काज के टेनशन में चिढ़-चिढ़ा जरूर हो गया था। जब-जब कभी परिस्थिति बिगड़ती तो नयना स्थिति को सम्भाल लेती थी।
            2
पार्टी में जाने के लिए सभी तैयार हो रहे थे। तभी सुमित को उसके किसी ऑफिस के कलीग का फोन आता है। सुमित उससे काफी देर तक बात करता है। बात-बात में वह बहुत उत्तेजित हो जाता है। फोन रखकर वह पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगता है। वह थोड़ा परेशान है और इसी परेशानी में उसके मुँह से निकलता है गा........चू..या!! नयना यह सुन लेती है। वह बच्चों को कमरे से बाहर भेज देती है और सुमित के पास आकर उसका कोट ठीक करने लगती है।
            तुम भी ना। तुमसे कितनी बार कहा है कि इस तरहा की गन्दी गालियाँ मुँह से मत निकाला करो। बच्चे सुनेंगे तो क्या सोचेंगे तुम्हारे बारे में। हम रोज उन्हें सिखाते है कि कभी-भी किसी को गन्दी गाली नहीं देनी चाहिए। और तुम हो कि। मुझे मालूम है कि तुम परेशान हो पर इसका मतलब ये नहीं कि तुम ऐसी गन्दी गालियाँ निकालो। इससे तुम्हारी परेशानी तो हल नहीं होगी। सुमित गुस्से से Please मुझे लेक्चर मत दो। मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। अगर तुम लोग तैयार हो चुके हो तो पार्टी के लिए चले?

पार्टी में बहुत से मेहमान के बीच सुमित, बच्चों और नयना को लेकर अपने बॉस से मिलवाने ले जाता है। नयना सुमित के बॉस से कई बार मिल चुकी थी। नयना को सुमित के बॉस से चिढ़ मचती थी। जब पहली बार सुमित शादी के बाद अपने बॉस और बाकी स्टाफ से मिलाने ले गया था तो उसके बॉस ने उसे (लौं) कहकर सम्बोधित किया था जो कि नयना को बिलकुल पसन्द नहीं आया था। वह आश्चर्यचकित हो गयी थी कि इतने पढ़े-लिखे व्यक्ति जो कम्पनी में भी अच्छी पोस्ट पर हो वह कितनी भद्दी भाषा का इस्तेमाल करता है। लेकिन उसके आश्चर्य की सीमा तब नहीं रही जब सुमित के मुखश्री से भी इसी प्रकार की गंदे शब्दों की गंगा बहते वह देखती। आम तौर पर बॉस और सुमित ऐसे ही बात किया करते थे जिससे नयना को चिढ़ थी। पार्टि में देर तक बातचीत, शोर-शराबा हो हल्ला मचता रहा। आखिरकार देर रात वे लोग घर आए। बच्चों को सुला चुकने के बाद नयना कमरे में आती है तो सुमित को अकेला मोबाइल लेकर हंसते हुए पाती है। नयना समझ जाती है कि आज फिर कोई मेसेज आया होगा। आमतौर पर वह सुमित का मोबाइल कभी-कभार ही देखती या इस्तेमाल करती वह भी जब उसे लम्बे समय के लिए अपनी माँ से बात करनी हो। सुमित उसे अपना मोबाइल दे देता था।
सुमित मोबाइल में मेसेज पढ़कर चुपचाप सो जाता है। उसने पार्टी में शराब भी पी थी इसलिए उसे जल्दी नींद आ जाती है। लेकिन नयना को नींद नहीं आती है। वह बेठे-बेठे सुमित का मोबाइल लेती है और उसमें व्हाट्सअप पर आए मेसेज पढ़ने लगती है। नयना के होश उड़ जाते है जब उसे उसमें अश्लील विडियो तथा गन्दें चुटकुलों की भरमार मिलती है। नयना उन चुटकुलों को और नहीं पढ़ पाती और सुमित पर उसे बहुत गुस्सा आता है। अगले दिन सुबह वह उठती है। रविवार का दिन था सो बाकी सभी देर से उठते है। नयना सुबह का नाश्ता तैयार कर चुकी थी पर बीती रात से वह परेशान थी। उसकी परेशानी की वजह ये थी कि सुमित का मोबाइल अक्सर बच्चे लेकर खेलने लगते है। वे बड़े हो रहे है और उन्हें मोबाइल की हर तरह की जानकारी है। क्या पता बच्चों ने भी ये सारे मेसेजेस पढ़ लिए होंगे। बच्चे इस तरहा की बातें जल्दी ही सीख लेते है।
घर के सभी लोग जब उठे तो नयना सबको नाश्ता देने लगी। सुमित की ओर वह गुस्से से देख रही थी। सुमित समझ नहीं पाता है कि नयना आज अजीब व्यवहार क्यों कर रही है। बच्चे नाश्ता खाने के बाद बाहर खेलने चले जाते है। सुमित नयना के अजीब व्यवहार का राज़ जानने के लिए उसके पास जाता है।
नयना?
हूँ?
क्या हुआ है तुम्हें? तुम इस तरहा अजीब से पेश क्यों आ रही हो?
क्यों मैंने क्या किया, मैं तो बिलकुल ठीक हूँ। तुम बताओं तुम्हें क्या हुआ है?
मुझे क्या होगा। मैं तो बिलकुल ठीक हूँ और फ्रेश फील कर रहा हूँ।
ऐ चलो न आज.....(नयना की कमर पर हाथ रखते हुए)
नयना उसे हटा देती है और सुमित की ओर गुस्से से अधिक दया भाव से देखती है।
सुमित?
हूँ....बोलो डार्लिंग?
कल मैंने तुम्हारा मोबाइल देख रही थी। कैसे-कैसे गंदे मेसेजेस और विडियोज आते हैं तुम्हें।
तो इसमें क्या हुआ। Its only for fun baby.
तुम्हें ये सारे गंदे जोक्स फनी लगते हैं? बिवी बस पैसों से ताल्लुक रखती है, पति को बेवजह परेशान करती है, ......पति से छुपाके दूसरे मर्दों से रिश्ता बनाती है,...अपने बच्चों....(गुस्से से)।
ओह! Come on baby, Naynaa…ये सब सिर्फ जोक्स है, सिर्फ हंसने हसाने के लिए। तुम इन सब को लेकर कुछ ज्यादा ही सोच रही हूँ।
मैं ज्यादा नहीं बल्कि सही सोच रही हूँ। इस तरहा के बेमाने जोक्स हंसने-हंसाने के लिए जरूर होंगे लेकिन यही आजकल लड़ाई-झगड़े की वजह बन चुकी है। जिन लोगों के साथ ऐसा सचमुच का भी होता होगा उनकी मानसिक दशा क्या होगी पता नहीं। दूसरों की ज़िन्दगी की तकलीफों को जोक्स की तरहा इस्तेमाल करना छी......शराब पीने से सारे गम दूर हो जाते है...पढ़ाई-लिखाई से कुछ हासिल नहीं होता.....ये सारे जोक्स।। सबसे बुरी बात यह है कि पत्नी हो या औरत सबको पैसों का लालची और मर्दों के पीछे भागने वाली बता-बता कर जोक्स के जरिए भी मजाक उढ़ाना।
अगर बच्चे इन सारे जोक्स को पढ़ेंगे तो क्या सिखेंगे। कुछ अच्छा तो जरूर नहीं सिखेंगे। तुम कभी इन सब चीजों के बारे में सोचते भी हो।
हलो। क्या सुबह-सुबह मूड खराब कर रही हो। लेक्चरर हो तो क्या घर में भी लेक्चर दोगी। और ये सारे जोक्स मैं सिर्फ पढ़ता हूँ। इनका वास्तविक ज़िन्दगी से लेना-देना नहीं है।
देख रही हूँ। कितना इस बात को फोलो कर रहे हो। हः
यार तुम भी ना। क्या चाहती हो तुम, बताओगी मुझे?
बस इस तरहा के जोक्स और अश्लील विडियोज तुम्हारे मोबाइल से हटा दो। ताकी बच्चे ये सब न देख पाए।
तुम भी क्या जब तब भाषण देती रहती हो। हटो मुझे अभी काम करने दो।

नयना गुस्से में तमतमाते हुए कमरे से निकल गयी और अपने-आप को घर के काम में व्यस्त करने लगी।

5
कुछ दिन बाद नयना को बच्चों के स्कूल से फोन आता है। टीचर बहुत अधिक क्रोध में थी और नयना और सुमित दोनों को आने के लिए कहती है। नयना को समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या हो गया कि दोनों को ही बुलाया गया हो।
नयना सुमित को फोन करके सब कुछ कहती है और अगले दिन बच्चों के स्कूल दोनों जाते हैं।
टीचर और प्रिंसिपल दोनों वहाँ पर मौजूद थे।

टीचर:  आइए! आइए! कैसे है दोनों आप?
नयना: जी नमस्ते। क्या बात है, आपने हम दोनों को बुलाया, कल आप कुछ डिस्टर्ब लग रही थी?
टीचर: देखिए मुझे आप दोनों से ही बात करनी है। आप दोनों अपने बच्चों को कैसी शिक्षा देते हैं?
नयना ये कैसी बात कर रही है आप। हम अपने बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा देते हैं।
टीचर तभी तो आपका बेटा गन्दी गालियाँ देता है।
सुमित What the f…? मेरा बेटा ऐसा कर ही नहीं सकता। जरूर आपसे कोई गलतफहमी हुई है।
टीचर Please mind your language. यदि आप दो-दो लेडिज के सामने इस तरहा से बातें करते हैं तो आप कैसे कह सकते है कि आपका बेटा इस तरहा से बात नहीं करता।
सुमित देखिए आप लोग तो कुछ कहिए मत ही कहिए...........


नयना इन सब बातों के बीच में अपना आपा पूरी तरहा से खो चुकी थी। उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसके शरीर से खाल उतार दी हो। जिन बच्चों को वह रात-दिन खुद पढ़ाती थी, नसिहते देती रहती थी, जिनके साथ समय बिताया करती थी। उन पर उसके गुणों को अपनाने की बजाए पिता के मुँह से सुनी दो-चार बार की गालियों का इतना असर कर गया था। उसे सुमित पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह गुस्से में वहाँ से उठी और चुपचाप बच्चों की तरफ मुड़ी और अपने बेटे को एक जोर दार तमाचा जड़ दिया। बच्चा बहुत जोर से रोने लगा और ये सब देखकर सुमित तथा टीचर और प्रिंसिपल सभी ने बहस छोड़ दी। नयना क्रोधित नेत्रों से सुमित की तरफ देख रही थी। फिर वह बिना कुछ बोले दोनों बच्चों को साथ में लेकर चली गयी। सुमित यह सब देखकर शर्मिंदा होता है। उसे लगता है जैसे नयना ने बेटे को नहीं बल्कि उसे तमाचा मारा है। लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था। सुमित के सामने सारे तथ्य थे जिससे यह स्पष्ट था कि उसके बच्चों ने जाने-अनजाने में गाली देना सीख लिया है और इसमें उसकी ही भूमिका थी। सुमित अब किसी पर भी गुस्सा ज़ाहिर नहीं कर सकता था।

                                                                       
                                                                                   
                                                                    
                                   

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

रमानाथ का चरित्र चित्रण

रमानाथ उपन्यास का नायक है। उपन्यास के पुरूष-पात्रों में उसका प्रमुख स्थान है। उपन्यास की सभी घटनाओं का वह केन्द्र-बिन्दु है। उसके चरित्र के कारण ही उपन्यास का कथानक विकसित होता चलता है। रमानाथ दयानाथ का पुत्र है। दयानाथ पचास रुपये मासिक पर कचहरी में नौकर थे। पिता की आय कम होने के कारण रमानाथ को कॉलिज छोड़ना पड़ा। पिता ने उससे साफ कह दिया कि मैं तुम्हारी डिग्री के लिए सबको भूखा और नंगा नहीं रख सकता, पढ़ना चाहते हो तो अपने पुरूषार्थ से पढ़ो। किन्तु रमानाथ में इतनी प्रेरणा एवं लगन नहीं थी कि वह ऐसा कर सके। बल्कि वह बिलकुल इसके विपरित था। वह सारा दिन शतरंज खेलता, सैर-सपाटे करता और माँ और छोटे भाइयों पर रोब जमाता। दोस्तों की बदौलत उसके सारे शौक पूरे होते थे। किसी का चेस्टर, किसी का जूता, किसी की घड़ी आदि लेकर अपने शौक पूरे करता। रमानाथ के इसी व्यवहार के कारण ही उसके पिता उसका विवाह कर देना अधर्म समझते थे क्योंकि जो व्यक्ति अपने प्रति लापरवाह हो वह भला अपनी पत्नी की जिम्मेदारी कैसे पूरा करेगा। लेकिन रमानाथ की माता जागेश्वरी के दबाव के कारण दयानाथ को जालपा वाला रिश्ता मान लेना पड़ा। रमानाथ में एक बात सबसे बुरी थी कि वह बहुत ही दिखावा करता था। जब उसका विवाह तय हुआ तो उसने ठान ली कि उसकी बारात ऐसी धूम-धाम से निकले कि गाँव भर के लोग देखते रह जाए और शोच मच जाए। उसे ठाट-बाठ से रहने का शौक था और विवाह के बाद भी उसकी आदतें वैसी-की-वैसी ही रही। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण विवाह में अत्यधिक खर्च हो गया और उसके पिता पर लोगों के पैसों का उधार हो गया। रमानाथ चाहता तो अपने पिता के कन्धे पर से उधार का बोझ हलका कर सकता था लेकिन उलटे उसने अपने पिता को ही दोषी ठहरा दिया। रमानाथ के चरित्र का अन्य विशेषताएँ इस प्रकार है।
1 कायर और झूठा अभिमान -- झूठा अभिमान रमानाथ  के चरित्र की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण उसके विवाह में शान-शौकत के लिए अंधाधुंध खर्च किया जाता है, जिससे सर्राफ के रुपये चुकाए नहीं जा सके। रमानाथ ने कभी भी जालपा के सामने अपने वास्तविक आर्थिक परिस्थिति के बारे में खुलकर नहीं बताया। बल्कि वह जालपा को हर बात में खूब बढ़ा-चढ़ाकर बोला करता था कि उसके पिता की जमीन्दारी है, बैंकों में पैसा रखा है। लेकिन जब विवाह के बाद जालपा के सारे गहने चोरी हो गये जो कि रमानाथ ने सर्राफ के उधार चुकाने हेतु की थी, तब भी रमानाथ को अकल नहीं आयी कि वह जालपा से सच कह डाले। जब जालपा से उसे प्रताड़ना मिलती है तो वह नौकरी की तलाश करता है। शतरंज की बदौलत उसका कई अच्छे-अच्छे व्यक्तियों से संपर्क था लेकिन संकोच के कारण किसी से भी अपनी वास्विक स्थिति प्रकट नहीं कह सकता था। जानता था कि ऐसा करना उसके हित में नहीं है। नौकरी लग जाने पर भी उसकी आदतें नहीं सुधरी बल्कि वह और अधिक ऐश्वर्य पर ध्यान देने लगा। इसी कारण उसके रुपये नहीं बचते थे। झूठे अभिमान के अलावा उसकी कायरता ने भी उसे पतन की ओर ढकेला था। दफ्तर के पैसों के गबन के बाद वह प्रयाग छोड़कर भाग जाना उसकी कायरता का पहला उदाहरण है। कलकत्ता में जब वह पुलिस के हत्थे चढ़कर झूठी गवाही देने पर मजबूर होता है तो जालपा उसे बार-बार समझाती है लेकिन उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सच कह कर अपना अपराध स्वीकार कर ले। बार-बार उसके सामने मौका मिलने पर भी वह अपना झूठा अभिमान और कायरता को नहीं छोडता है।

2 झूठ बोलने की आदत एवं रिश्तों की कदर ना करना -- रमानाथ के चरित्र की दूसरी विशेषता थी कि वह झूठ बहुत बोलता था और अपने नैतिक रिश्तों की भी कदर नहीं करता था। वह हर बार झूठी बात कहकर काम चलाने का आदि हो गया था। वह अपने माता-पिता से तो झूठ बोलता ही था, रतन जो उसकी पत्नी जालपा की अच्छी सहेली थी उससे भी झूठ बोलता रहा। उसके रुपयों को अपने उधार रुपये चुकाने के काम में लाता है और उसे झूठ कहकर टालता रहता है। जब उसे नौकरी मिलती है तो जालपा को वह कहता है कि तीस रुपये मासिक वेतन मिलेगा लेकिन अपने माता-पिता से वह बीस रुपये वेतन ही कहता है। रमानाथ अपने से हर बात पर झूठ बोलता है। लेकिन उपन्यास में जोहरा नामक पात्र का रमानाथ के जीवन में प्रवेश होता है तो वह उससे झूठ नहीं बोल पाता है। जोहरा के सामने उसका झूठ,कपट सब धरा-का-धरा रह जाता है। रतन, वकील साहब, देवीदीन, जग्गो आदि निश्छल पात्रों के साथ भी वह कपट एवं छल का व्यवहार करता है। पुलिस के झूठे प्रलोभनों में आकर वह किसी के साथ भी विश्वासघात करने से नहीं कतराता है।

3 हृदय की सरलता -- रमानाथ एक साधारण मनुष्य है जिसमें सारी दुर्बलताएँ भरी हुई है। रमानाथ के चरित्र में तब परिवर्तन आता है जब रमानाथ पुलिस के शिकंजे में होता है और जालपा जब उसे समझाती है कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है। बल्कि पुलिस अपना उल्लु सीधा करने के लिए रमानाथ को केवल इस्तेमाल कर रही है। रमानाथ अपनी दुर्बलताओं के कारण ही हमेशा से सबसे छल करता रहा है लेकिन उसने किसी का बुरा नहीं सोचा था। रमानाथ जानता था कि यदि उसने अदालत में पुलिस के कहने पर झूठी गवाही दी तो कई सारे निर्दोष लोगों की जिन्दगी बर्बाद हो जाएगी। वह हृदय से चाहता था कि ऐसा कुछ ना हो लेकिन उसकी कारयता के कारण ही वह सत्य का साथ नहीं दे पा रहा था। अंत में जब उसे यह बात समझ में आती है कि सत्य का साथ देना ही सही है तो वह अदालत में अपने सारी गलतियाँ स्वीकार करता है और डकैती के इलजाम में पकड़े गए सारे कैदियों को बचा लेता है। इसके अलावा वह जालपा से सच्चा प्यार भी करता था। देवीदीन तथा जग्गों के प्रति भी उसके मन में लगाव था तभी वह उनके तानों तथा बातों से प्रभावित हो जाता था।

अंत में प्रेमचन्द रमानाथ के चरित्र के जरिए यही बताना चाहते है कि मध्यमवर्गीय परिवारों में इस प्रकार की दुर्बलताएँ होती है लेकिन यदि उनका सही ढंग से संशोधन किया जाए तो समाज में फिर कभी भी ऐसी बुरी और उलझी हुई परिस्थितियाँ खड़ी नहीं होंगी।

शनिवार, 11 मार्च 2017

जालपा का चरित्र चित्रण

जालपा उपन्यास की नायिका है। उपन्यास के अन्य पात्रों की तुलना में वह उपन्यास में प्रमुख स्थान रखती है। वह उपन्यास का केन्द्र-बिंदु है और घटनाओं का विकास उसी के चरित्र के कारण होता है। जालपा का बचपन तथा प्रयाग का गृहस्थ-जीवन दुर्बलताओं से भरा पड़ा है। वह नारी की अनेक दुर्बलताओं से युक्त है, लेकिन रमानाथ के प्रयाग से जाने के बाद उसमें प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, साहस, बुद्धि, कौशल आदि अनेक गुणों का श्रीगणेश होता है। जालपा के प्रारंभिक चरित्र को देखकर कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता कि यह नारी इतनी कुशल, साहसी एवं क्षमता से युक्त हो जायेगी। वस्तुतः उसका चरित्र दुर्गुणों एवं दुर्बलताओं से गुणों एवं सफलता की ओर उन्मुख होता है। उसके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार है।

1) आभूषण-प्रियता -- जालपा के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी आभूषण-प्रियता है। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण वह बचपन से ही आभूषणों में पलती है। उसके पिता दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते तो जालपा के लिए कोई-न-कोई आभूषण अवश्य लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से भी अधिक प्रसन्न हो सकती है। गुड़िया और खिलौने को वह व्यर्थ समझते थे। जालपा अपनी माँ का चन्द्रहार देखकर हट करने लगती है। उसकी माँ उसे समझाती है कि उसके ससुराल से चन्द्रहार आयेगा। परन्तु सात साल बाद जब उसका विवाह होता है तो उसकी ससुराल से चन्द्रहार नहीं आता। वह इस बात से अत्यंत दुखी हो जाती है। उसे ऐसा लगता है कि उसकी देह में एक बूँद रक्त नहीं है। चन्द्रहार न मिलने पर वह दुखी होकर बाकी के गहने भी नहीं पहनती है। गहनों के चोरी हो जाने पर वह पूरी तरहा से टूट जाती है और सबसे हँसना-बोलना, खाना-पिना सब छोड़ देती है। रमानाथ  उसके दुख को देखकर उधार के गहने बनवा देने की बात करती है। जालपा अपने झूठ-मूठ के संयम को बनाए रखती है लेकिन अवसर मिलने पर तानों द्वारा गहने न होने का दुख प्रकट करती है। जालपा के आभूषण प्रियता के कारण ही रमानाथ कर्ज में डूब जाता है और दफ्तर के पैसों से ही कर्ज उतारने की बेवकूफी करने की सोचता है। बाद में यही कारण बनता है उसके प्रयाग से भाग जाने का। जालपा रमानाथ के प्रयाग छोड़कर अचानक चले जाने पर बदल सी जाती है। उसे अपनी भूल का एहसास होता है। वह अपनी सहेली रतन के पास अपना जड़ाउ कंगन बेचकर रमानाथ के ऊपर लगे गबन के इलजाम को मिटा देती है।

2) स्वाभिमान की भावना -- जालपा के चरित्र में स्वाभिमान की भावना देखी जा सकती है। जब जालपा के सारे गहने चोरी हो जाते है और उसके माता-पिता को पता चलता है कि जालपा चन्द्रहार न मिलने पर दुखी है और सबसे दूर-दूर रहती है तो उसकी माँ अपना चन्द्रहार पार्सल करके भेज देती है। लेकिन जालपा यह हार स्वीकार नहीं करती, क्योंकि वह किसी का एहसान नहीं लेना चाहती थी। वह अपनी माँ को दिखा देना चाहती थी कि वह गहनों की भूखी नहीं है। दूसरी बार उसका स्वाभिमान तब जागता है जब वह रमानाथ को लेने कलकत्ता पहुँचती है और उसे पता चलता है कि रमानाथ ने अपने स्वार्थ-सिद्ध के लिए कई सारे निर्दोष लोगों के खिलाफ अदालत में गवाही दी है। उसे यह बिलकुल स्वीकार नहीं था कि रमानाथ किसी निर्दोष को सजा दिलवाकर धन और वैभव हासिल करे और जालपा को गहने बनवा कर दे। वह रमानाथ को बहुत समझाने का प्रयास करती है और उसकी कायरता पर उसे फटकारती भी है।

3) बुद्धि-संपन्न और प्रभावशाली व्यक्तित्व -- जालपा अपने समाज तथा काल के मुकाबले बहुत बुद्धिशाली तथा प्रभावशाली थी। जहाँ अन्य स्त्रियाँ घर की चार दिवारी के अंदर सीमित थी वही जालपा रमानाथ के  नौकरी लगते ही अपने आस-पास की स्त्रियों में अपना प्रभाव जमा लेती है। सिर्फ इतना ही नहीं जब रमानाथ प्रयाग छोड़कर चला जाता है तो उसे ढूँढने का अनोखा तरीका निकाल लेती है। वह शतरंज की पहेली अखबार में प्रकाशित कराकर पति को खोज निकालने की योजना बना लेती है। वह इसमें सफल भी होती है। अपनी चतुराई से रमानाथ पर लगे गबन के इलजाम को भी मिटा देती है। 


4) सद् गुणों की मूर्ति -- जालपा में कुछ अच्छे गुण कूट-कूट भरे है। जब वह कलकत्ता पहुँचती है तो वह रमानाथ के झूट तथा कायरता के लिए उसे खूब फटकारती है। वह अपने-आप को खतरें में डालकर भी रमानाथ को इस गलत काम को करने से रोकने की कोशिश करती है। वह उस सभी तथा कथित डाकूओं की खोज-खबर निकाल लेती है जिनको रमानाथ की झूटी गवाही द्वारा फाँसी की सजा तथा जेल हो जाती है। वह दिनेश नामक स्कूल-मास्टर की सेवा करने लग जाती है। जालपा को यह बिलकुल स्वीकार नहीं था कि किसी के खून से अपने आराम का महल तैयार हो। वह अंत तक अपने सद्-व्यवहार से सबका मन मोह लेती है। रतन के पति का जब देहांत हो जाता है और उसका भतिजा मणिभूषण उसकी सारी जायदाद छल से अपने नाम कर लेता है तब जालपा ही रतन का साथ देती है। जालपा के सद् गुण देख कर जोहरा बाई भी अपने-आप को बदल लेती है जो कि एक वेश्या थी और केवल भोग-विलास का ही जीवन उसे पसन्द था।

इस प्रकार हम देख सकते है कि जालपा का चरित्र उपन्यास के सभी पात्रों से श्रेष्ठ। वह एक देशभक्त नारी है। देश के खिलाफ जाने वालों से वह घृणा करती है। आभूषण-प्रियता उसके चरित्र में पायी जाती है लेकिन जब परिस्थितियाँ बदल जाती है तो वह भी अपनी कमजोरियों को दूर करने की कोशिश करती है। वस्तुतः जालपा का स्वाभाविक श्रृंगार-प्रेम, परंपरागत रीति -रीवाजों को तोड़कर स्वतंत्र चिंतन की क्षमता, विशाल हृदयता, देशभक्ति व मानव-प्रेम की भावना, त्याग करने की अपार शक्ति उसे भारतीय नारी के नए रूप का प्रतीक बना देते हैं।

बुधवार, 25 जनवरी 2017

संदर्भ सहित व्याख्या

नाटक उस वक्त पास होता है जब रसिक समाज उसे पसंद कर लेता है। बारात का नाटक उस वक्त होता है जब राह चलते आदमी उसे पसंद कर लेते हैं। दयानाथ का भी नाटक पास हो गया।

प्रसंग :- प्रस्तुत गद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक गबन उपन्यास से लिया गया है। इसके लेखक प्रेमचन्द जी है। इस प्रसंग में प्रेमचन्द ने दिखाया है कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार लोगों में बाहर वाले क्या कहेंगे इसकी चिन्ता सताती रहती है। शादी-ब्याह जैसे मौके पर यदि कोई कमि रह जाए तो जैसे उनके लिए संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रमानाथ की शादी जालपा से तय हो चुकी है और अब बारात को ढंग से सजाकर न ले जाने का भय रमानाथ और दयानाथ दोनों से ही आय से अधिक खर्च करवा लेता है जिसका उन्हें बाद में फल भुगतना पड़ता है।

व्याख्या:- प्रस्तुत गद्यांश में प्रेमचन्द ने उस समय का वर्णन किया है जब रमानाथ का विवाह जालपा से तय हो जाता है। टीके में एक हजार की रकम समधी से पाकर-मितव्ययी तथा आर्दशवादी दयानाथ अपने आदर्शों पर टिक नहीं पाते और अपनी आय से अधिक व्यय कर देते हैं। वह भी मध्यवर्गीय-कुसंस्कार से जकड़े हुए, पात्र हैं जिनका विश्वास होता है कि नाटक की सफलता सहृदयों द्वारा उसके पसंद किये जाने में निहित होती है। नाटक की उत्कृष्टता की परख चाार-पाँच घंटों में होती है। पर बारात की उत्कृष्टता या निकृष्टता का पारखी मार्ग चलती भीड़ होती है जिसे वास्तविकता से नहीं वरन् बाह्य चमक-दमक से ही मतलब होता है। जितने मिनटों में बारात के संग-संग चलने वाला तमाशा, आतिशबाजी, भीड़ आदि जनता द्वारा पसंद किए जाते हैं तो बाराती अपने को धन्य मानते हैं अन्यथा उनके सारे करे-कराये पर पानी फिर जाता है।

विशेष :- प्रस्तुत संदर्भ में लेखक ने दुःसंस्कार-ग्रस्त मध्यवर्ग पर तीखा व्यंग्य किया है।

बुधवार, 18 जनवरी 2017

गबन की आधुनिक प्रासंगिकता


            प्रेमचन्द द्वारा रचित ग़बन उपन्यास में, भारतीय मध्यमवर्ग का यथार्थ चित्रण हुआ है। इस उपन्यास में उसकी सारी कमजोरियों के साथ-साथ उसकी खूबियाँ भी दिखायी देती है। उपन्यास में जितने भी मुख्य पात्र है सभी मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखते है। कुछ अमीर तथा अफसरशाह पात्र भी है जो कथानक के अन्त में आकर उसे रोचक मोड़ देते हुए अन्त तक ले जाते है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने शहरी जीवन को विशेषकर तत्कालीन भारत में उभरते मध्यमवर्ग के जीवन को जिस रूप में वर्णित किया है और आज के भारतीय मध्यमवर्ग में काफी कुछ समानताएँ देखने को मिलती है।कथानक की शुरूआत कुछ ऐसे होती है कि मुंशी दीनदयाल अपनी पुत्री जालपा को बचपन से ही खिलौनो की जगह कोई-न-कोई आभूषण लाकर देते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि जालपा इसी से प्रसन्न होगी बाकी सब चीजें व्यर्थ थी। जालपा आभूषणों से ही खेल-खेल कर बड़ी होती है। एक दिन दीनदयाल जालपा की माँ मानकी के लिए चन्द्रहार लेकर आते हैं तो जालपा को वह हार बहुत भा जाता है। वह भी उसी हार के लिए अपने पिता से कहती है तो उसके पिता जल्द लाने का वादा करते हैं परन्तु वह नहीं मानती। तब उसकी माँ कहती है कि ऐसा चन्द्रहार उसकी जब शादी होगी तब उसके ससुराल से आएगा। बाल मन इसी कल्पना को सच मानकर बहल जाता है। जालपा धीरे-धीरे बड़ी हो जाती है और आख़िरकार वह दिन भी आता है जब उसका विवाह दयानाथ के बेटे रमानाथ से तय हो जाती है। जालपा ससुराल वालों की कल्पना करती है कि वे लोग उसके माता-पिता से भी अधिक प्रेम करेंगे, विशेषकर उसे चन्द्रहार बनवाकर देंगे। परन्तु नियती में कुछ और लिखा होता है। दयानाथ एक अलग किस्म के व्यक्ति थे। कचहरी में नौकरी करने के बावजूद भी वह रिश्वत के खिलाफ थे। किसी प्रकार 50 रूपये की मासिक आय से अपने परिवार का पेट पालते थे। वही उनका बेटा रमानाथ कॉलेज में दो महिने पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ देता है। वह आधुनिक रंग-ढंग में डूबा हुआ नौजवान था। सैर-सपाटे, ताश इत्यादि, माँ तथा छोटे भाईयों पर रौब जमाना, दोस्तों की बदौलत शौक पूरा करना उसका काम था। जालपा से विवाह तय हो जाने पर वह अपने दोस्तों और जालपा के गाँव वालों पर प्रभाव डालना चाहता है परन्तु उसके पिता इस बात से साफ इन्कार कर देते है। फिर भी रमानाथ के जोर देने पर धूमधाम से बारात निकाली जाती है। उधर जालपा को ससुराल से चढ़ावे में चन्द्रहार आने की आशा थी जो पूरी नहीं होती है। विवाह के बाद रमानाथ जालपा पर अपने अमीर होने तथा हर प्रकार से सुखी-सम्पन्न होने को झूठ के ताने-बाने को बुनता है। वही दयानाथ पर विवाह में अनुशंगिक खर्चों के कारण कई सारे कर्ज चढ़ जाता है जिसे वह जालपा के गहनों द्वारा चुकाने की सोचते है।  जब जालपा के गहने इसी वजह से गायब हो जाते है तो जालपा शोक में डूब जाती है। वह सोचती रहती है कि जब ये लोग इतने धनी है तो क्यों  नहीं उसके गहने वापस बनवा देते है। जबकि परिवार की हालत कुछ और थी। रमानाथ जालपा से बहुत प्रेम करता था इसलिए वह जालपा के सामने सत्य को छुपाता फिरता था। अंत में रमानाथ नौकरी करके जालपा को गहने बनवा देने की सोचता है और अपने एक परिचित रमेश बाबू की मदद से म्यूनिसिपल बोर्ड में नौकरी कर लेता है। इसके बाद भी रमानाथ झूठ को नहीं छोड़ता, बल्कि वह अपने झूठ में और अधिक फंसता जाता है। वह अपनी आय अधिक बताता है। वह सर्राफ से उधार लेकर जालपा के लिए गहने बनाता है। जालपा भी अब अपने शोक से निकलकर घर तथा बाहर सभी से घुलने मिलने लगती है। इसी दौरान उसकी रतन नामक एक सम्भ्रान्त महिला से होती है। वह एक बड़े और बूढ़े वकील की पत्नी है। रतन को जालपा के जड़ाऊ कंगन बहुत अच्छे लगते है तो वह रमानाथ से इसी प्रकार के कंगन बनवा देने के लिए कहती है और रुपए दे देती है। रमानाथ इन्हीं रुपयों से सर्राफ के कर्जें उतारने तथा वैसे ही एक जोड़ा और कंगन बनवाने को कहता है तो सर्राफ सीधा इन्कार कर देता है। रतन को कंगन नहीं मिलते तो वह अपने रुपये वापस मांगती है। रतन के पैसे लौटाने के चक्कर में रमानाथ चुंगी के रुपये ही जालपा को लाकर दे देता है और जालपा भी अनजाने में वहीं रुपये रतन को दे देती  है। रमानाथ इस घटना से विचलित हो जाता है और उसे भय होने लगता है कि कही उसपर ग़बन करने का इलजाम न लगे। वह सबसे अपनी सारी परेशानी छुपाता फिरता है। अंत में वह एक चिट्ठी लिखकर जालपा को सारी बातें बताना चाहता है लेकिन वह भी उससे नहीं हो पाता। जालपा उसकी चिट्ठी पढ़ लेती है और रमानाथ को लगता है कि सारा भेद खुल जाने पर जालपा उससे घृणा करेगी वह डर से घर छोड़कर कलकत्ता भाग जाता है। वहाँ वह देवीदीन खटिक के यहाँ रहने लगता है। देवीदीन से भी वह अपनी वास्तविकता छुपाता है। उधर जालपा चिट्ठी पढ़कर अपने पति की वास्तविकता को समझ जाती है और अपने-आप को कोसने लगती है कि उसने गहनों का लालच किया ही क्यों था और अपने पति की इज्जत बचाने के लिए अपने सारे गहने रतन को बेचकर दफ्तर का सारा पैसा वापस कर देती है। रमानाथ इधर कलकत्ते में किसी प्रकार छुपकर जीवन बीताने की सोचता है लेकिन वह वहाँ की पुलिस के हाथों शक में उठा लिया जाता है। उससे पहले जालपा शतरंज की एक बाजी को अखबार में छपवाकर इनाम के 50 रुपये के जरिये पता कर लेती है कि रमानाथ कलकत्ते में है। वह उसे वहाँ ढूँढ भी लेती है लेकिन पुलिस के चक्रव्यू में फंसे रमानाथ को बहुत मुश्किल से अपने झूठ तथा वास्तविकता का बोध कराते हुए जालपा उसे छुड़ा पाती है।
            इस प्रकार हम देखते है कि पूरे कथानक में रमानाथ के झूठे रौब तथा उस झूठ से निकलने के लिए एक और झूठ का सहारा लेना ही उसके परिवार के बिखरने का कारण बनता है। आमतौर पर अन्य कई आलोचको में इस उपन्यास में स्त्रियों की आभूषण प्रियता को ही दोष माना है लेकिन ध्यान से यदि इस उपन्यास को पढ़ा जाए तो इसमें जालपा या रतन या किसी भी स्त्री पात्र का उतना दोष नहीं है। स्त्रियों के लिए स्वाभाविक बात होती है गहनों के प्रति उनका आकर्षण। भारतीय स्त्रियों की सुन्दरता की परिकल्पना में कभी भी कोई भी स्त्री बिना आभूषणों के सुन्दर ही नहीं दिखी है। यहाँ तक की सोने के आभूषण न हो तो वह चांदी या पीतल-तांबे के बने आभूषण पहनती है, यह भी न हो तो फूलों के बने आभूषण तो पहनती है। इतिहास में इसके कई उदाहरण दिखेंगे। फिर जालपा को तो बचपन से ही खिलौनो की जगह आभूषण दिये जाते रहे हैं तथा बाल मन में ही यही बातें डाली जाती रही है कि उसके ससुराल से उसके लिए चन्द्रहार आएगा। जालपा अपने पति के इस प्रकार घर छोड़कर चले जाने पर उसे दुख होता है तथा वह अंत में अपने इस लालच पर विजय पाने की ठान लेती है तथा उन सभी चीज़ों से मुक्ति पाने की सोचती है जिसके कारण यह सारी समस्याएँ खड़ी होती है। .....विपत्ती में हमारा मन अंतर्मुखी हो जाता है। जालपा को अब यही शंका होती थी कि ईश्वर ने मेरे पापों का यह दंड दिया है। आखिर रमानाथ किसी का गला दबाकर ही तो रोज रुपये लाते थे। कोई खुशी से तो न दे देता। यह रुपये देखकर वह कितनी खुश होती थी। इन्हीं रुपयों से तो नित्य शौक-श्रृंगार की चीज़ें आती रहती थी। उन वस्तुओं को देखकर अब उसका जी जलता था। यही सारे दुखों की मूल हैं। इन्हीं के लिए तो उसके पति को विदेश जाना पड़ा। वे चीज़ें उसकी आँखों में अब कांटों की तरह गड़ती थीं, उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं।....आख़िर एक दिन उसने इन चीजों को जमा किया- मखमली स्लीपर, रेशमी मोजे, तरह-तरह की बेलें, फीते, पिन, कंघियां, आईनें, कोई कहां तक गिनाए। अच्छा-खासा एक ढेर हो गया। वह इस ढेर को गंगा में डुबा देगी, और अब से एक नये जीवन का सूत्रपात करेगी।[1] इस प्रकार हम देख पाते है कि प्रेमचन्द ने यहाँ पर आकर जालपा की आभूषण तथा अन्य सुख-सुविधा की इच्छाओं पर रोक लगाया है। वैसे भी रमानाथ का घर छोड़कर जाने का कारण जालपा नहीं थी बल्कि रमानाथ का डर ही था जो उसे अपने परिवार से अलग कर देता है। रमानाथ के इस झूठ तथा दिखावे के ताने-बाने को प्रेमचन्द ने उपन्यास के शुरूआत से ही दर्शाया है। उसके विवाह के समय से ही यह सब शुरू हो जाता है यथा दयानाथ दिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझें, रमानाथ उसे परमावश्यक समझता था। बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गांव-भर में शोर मच जाय। पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था। रमानाथ ने मोटर पर जोर दिया। उसके मित्रों ने इसका अनुमोदन किया प्रस्ताव स्वीकृत हो गया... आतिशबाजियां बनवाईं, तो अव्वल दर्जें की। नाच ठीक किया, तो अव्वल दर्जे का, बाजे-गाजे भी अव्वल दर्जो के, दोयम या सोयम का वहां जिक्र ही न था। दयाना उसकी उच्छृंखलता देखकर चिंतित तो हो जाते थे पर कुछ कह न सकते थे। क्या कहते![2]  इसी प्रकार उसकी शादी के बाद भी रमानाथ को उसके झूठ के ताने-बाने तथा होने वाली समस्या का आभास होता रहता है परन्तु वह इसे नहीं त्यागता है। बल्कि वह और भी ज्यादा इसमें उलझता जाता है। जैसे कि सर्राफ से लिए उधार के गहनों का मोल चुकाने की बारी आती है तो दयानाथ सीधे-सीधे जालपा के गहनों को ही वापस लौटाकर उधार खत्म करना चाहते थे लेकिन रमानाथ सोचने पर मजबूर हो जाता है --- रमानाथ ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीट उड़ाई थी। खूब बढ़-बढ़कर बातें की थीं। जमींदारी है, उससे कई हजार का नफा है। बैंक में रुपये हैं, उनका सूद आता है। जालपा से अब अगर गहने की बात कही गई, तो रमानाथ को वह पूरा लबाड़िया समझेगी।[3] इसी प्रकार पूरे उपन्यास में रमानाथ के झूठ की परतों पर परत चढ़ती जाती है जिसमें जालपा  की आखों पर भ्रम का पर्दा चढ़ता ही जाता है। यही कारण है कि वह चन्द्रहार की जिद करती है, गहने चोरी हो जाने पर अत्यन्त दुखी हो जाती है। नामवर सिंह प्रेमचन्द के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए कहते है कि आमतौर पर लोग कहते है कि गबन उपन्यास आभूषण प्रेम की कहानी है, यानी रमानाथ की बीबी जालपा गहना ज्यादा चाहती है। पूरा उपन्यास आभूषण प्रेम का उपन्यास कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने मध्यवर्गीय नायक रमानाथ की ढुलमुलयकीनी को दिखाते हुए मध्य वर्ग की कमजोरियों की ओर इशारा किया है। शहरी मध्यवर्ग का आदमी, किस तरह हिपोक्रेसी का शिकार होता है। मध्यवर्ग की स्थिति तो यह है कि परिस्थिति के कारण वह बीबी के सामने अपने खानदान की सम्पन्नता दिखाना चाहता है और अन्दर से वह इतना खोखला है कि एक छोटी-सी चीज़ बीबी को नहीं दे सकता है। इन दो स्थितियों के बीच ढुलकता, झूलता हुआ रमानाथ कहा जाता है? इस हद तक जाता है कि देशद्रोही हो जाता है।[4]
            गबन उपन्यास में भारतीय मध्यवर्ग का जो चित्रण हुआ है वह आज के युग में बहुत प्रासंगिक है। आज भी समाज में ऐसे कई लोग मौजूद है जो झूठे दावे के साथ अपना जीवन जीते है। विशेषकर युवा वर्ग में यह प्रवृत्ति अधिक नज़र आने लगी है। रमानाथ की ही भांति आज के युवा वर्ग आधुनिक भौतिक सुख-सुविधाओं को बाकी चीज़ों से अधिक महत्त्व देते है। सच्चाई, ईमानदारी, मेहनत, सरलता से कही अधिक अन्यों के सामने दिखावा करते रहते हैं। यही कारण है कि समाज किसी सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो पा रहा है। प्रेमचन्द ने जिस समय में ग़बन की रचना की थी उस समय भारतीय मध्यवर्ग के उदय का समय था। तभी से ही उनमें यह सारी प्रवृत्तियाँ उभरने लगी थी जो आगे चलकर किस रूप में परिणत होगा, शायद यह बात प्रेमचन्द समझ चुके थे। तभी उन्होंने जहाँ उसकी कमजोरियों को दर्शाया है वही जालपा के जरिए ही उसके सुधार का भी रास्ता दिखाया है कि जैसे जालपा अपने इच्छाओं को भुलाकर अन्त में अपने पति के ही हित के लिए उन क्रान्तिकारी लोगों की सेवा करने को तैयार हो जाती है जिन्हें डाकू बनाकर कलकत्ता पुलिस वाले सज़ा दिलवाने पर तुले हुए थे और जिसमें रमानाथ को झूठा गवाह बनाया जाता है। जालपा की इसी विशेषता को उजागर करते हुए रामदरश मिश्र कहते है कि जालपा में मध्यवर्गीय नारी की युवती सुलभ आकांक्षा ( आभूषण-प्रेम, भोग-विलास की प्रवृत्ति, ऊँचे समाज की नारियों से मिलने-जुलने और उनसे स्पर्धा करने की इच्छा, यानी ऊपरी चमक-दमक को ही जीवन-मूल्य मान लेने की आसक्ति) के साथ नारी की समस्त पीड़ा, अभाव, सत्यनिष्ठा, निश्चयशक्ति, सेवा-त्याग और सहानुभूति है। रमानाथ असत्य से असत्य पर पहुँचता है, जालपा असत्य से सीधे सत्य तक पहुँचती है। उसका मनोबल अधिक जागृत और निर्विकल्प है।[5] प्रेमचन्द ने ऐसा इसलिए दिखाया क्योंकि उन्हें अपने देश से प्रेम था तथा देश का हित, समाज का हित उनके लिए सर्वोपरि रहा है। तथा वह यह भी जानते है कि समाज का प्रत्येक वर्ग यदि सही ढंग से आगे नहीं बढ़ेगा तो देश को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलेगी। मध्यवर्ग एक ऐसा वर्ग है जिसके पास कुछ खोने के लिए भी है तो कुछ पाने के लिए भी है। वह न तो अभिजात्य वर्ग की तरह बेफिक्री के साथ जी सकता है, न ही जो जी में आए कर सकता है जिससे उसके मान-सम्मान में कोई आँच न आए। बल्कि यह वह वर्ग है जिसमें सदा एक भय सा बना रहता है कि जो कुछ भी हो लोगों के सामने बदनामी न हो। इसलिए वह किसी तरहा से घुट-घुट कर जीने पर मजबूर है। वही सर्वहारा वर्ग की तरह भी उसमें कोई गुण नहीं है। सर्वहारा वर्ग ने सदैव ही सारे अत्याचार सहे है। इन अत्याचारों के विरुद्ध उसमें आवाज़ उठाने की भी कोशिश करता रहा क्योंकि वह मध्यवर्ग की तरह खोखली आदर्शवादिता एवं मान-सम्मान के जंजाल में नहीं फंसा हुआ है। परन्तु मध्यवर्ग ऐसा नहीं कर सकता है। उसमें सदैव भय रहता ही है। दूसरी बात यह की पुरुष के मुकाबले स्त्रियों में अधिक मनोबल होता है। वह अपने प्रत्येक प्रकार की परिस्थितियों में भी जीना जानती है, संघर्ष करना जानती है। साथ ही प्रेमचन्द के उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता भी यही रही है कि उनके प्रत्येक नारी पात्र पुरुष पात्रों से कही अधिक सशक्त है। यद्यपि इस उपन्यास के पूरे कथानक के केन्द्र बिन्दु जालपा और रमानाथ ही रहे है परन्तु उपन्यास के दूसरे पात्रों की भी विशेषताओं ने भी इस उपन्यास को प्रासंगिक बनाया है। मुंशी दीनदयाल तथा दयानाथ जैसे व्यक्ति आज भी समाज में मौजूद है। मुंशी दीनदयाल जैसे लोग जो नियमित आय के अलावा भी अन्य प्रकार के स्रोतों से धन लाभ करते है यह बात समाज के लिए कोई नयी नहीं है। आज भी ऐसे कई लोग है जो अपना काम निकलवाने के लिए दफ्तरों के बाबूओं को रिश्वत देते है और अपना काम करवाते है। जमींदार के मुख्तार होने के नाते गाँव के लोगों पर अपनी हुकूमत चलाते है। आज़ादी के बाद भी कई सारे गाँवों में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बावजूद भी ऐसे कई लोग थे जिन्होंने अपनी इसी झूठी साख को बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उसी प्रकार दयानाथ जैसे आदर्शवादी लोग आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। देवीदीन खटिक तथा उसकी पत्नी समाज के निचले तबके का प्रतिनिधित्व करते है। इस उपन्यास में उनकी भूमिका बहुत अच्छे व्यक्ति के रूप में हुई है। जैसे रमानाथ को अपने घर में शरण देना, उसकी देखभाल करना, फिर जब जालपा भी रमानाथ को ढूँढते हुए कलकत्ता पहुँचती है तो देवीदीन उसका भी साथ देता है। यह सारी बातें यही दर्शाता है कि निचले तबको के लोगों में कही अधिक मानवीयता रहती है। जिसके कारण रमानाथ किसी गलत राह में तब तक नहीं जाता जब तक वह पुलिस के जाल में नहीं फँसता। उसी प्रकार रतन का पात्र भी यहाँ बड़ा सशक्त दिखायी देता है। वह धनी परिवार की स्त्री है फिर भी वह जालपा की वास्तविकता जानने पर भी उससे मित्रता बनाए रखती है। हालाकि उपन्यास में उसके साथ हुई त्रासदि को प्रेमचन्द वर्णित करते हुए अनमेल विवाह तथा मध्यवर्ग की धन लोलुपता एवं धोखाधड़ी( रतन के पति वकील साहब के भतीजे द्वारा किया गया धोखा) को भी सामने रखते है। आज भी ऐसे कई सारी घटनाएँ उदाहरण के तौर पर सामने रखे जा सकते है जिसमें अपनों के द्वारा ही अपनों को सम्पत्ति एवं जायदाद के लिए लूटा जाता है। विशेषकर स्त्रियों के साथ ही ऐसा होता है। उनके पति के मृत्यु के बाद सभी उनकी सम्पत्ति के दावेदार के रूप में खड़े हो जाते है। प्रेमचन्द के इस चीज को इस प्रकार उजागर किया है--- जायदाद मेरी जीविका का आधार होगी। इतनी भविष्य-चिंता वह कर ही न सकती थी। उसे इस जायदाद के खरीदने में, उसके संवारने और सजाने में वही आनंद आता था, जो माता अपनी संतान को फलते-फलते देखकर पाती है। उसमें स्वार्थ का भाव न था, केवल अपनेपन का गर्व था, वही ममता थी, पर पति की आंखें बंद होते ही उसके पाले और गोद के खेलाए बालक भी उसकी गोद से छीन लिए गए। उसका उन पर कोई अधिकार नहीं! अगर वह जानती कि एक दिन यह कठिन समस्या उसके सामने आएगी, तो वह चाहे रूपये को लुटा देती या दान कर देती, पर संपत्ति की कील अपनी छाती पर न गाड़ती। पंडितजी की ऐसी कौन बहुत बडी आमदनी थी। क्या गर्मियों में वह शिमले न जा सकती थी? क्या दो-चार और नौकर न रक्खे जा सकते थे? अगर वह गहने ही बनवाती, तो एक-एक मकान के मूल्य का एक-एक गहना बनवा सकती थी, पर उसने इन बातों को कभी उचित सीमा से आगे न बढ़ने दिया। केवल यही स्वप्न देखने के लिए! यही स्वप्न! इसके सिवा और था ही क्या! जो कल उसका था उसकी ओर आज आंखें उठाकर वह देख भी नहीं सकती! कितना महंगा था वह स्वप्न! हां, वह अब अनाथिनी थी। कल तक दूसरों को भीख देती थी, आज उसे ख़ुद भीख मांगनी पड़ेगी। और कोई आश्रय नहीं! पहले भी वह अनाथिनी थी, केवल भ्रम-वश अपने को स्वामिनी समझ रही थी। अब उस भ्रम का सहारा भी नहीं रहा![6] फिर भी रतन ने हार नहीं मानी। अपने भतीजे की आश्रिता होने या उसके द्वारा ठीक किये गए मकान में रहने के बजाए वह जालपा के घर चली जाती है। वहाँ वह उन लोगों की सेवा करते हुए रहना चाहती है ताकी वह मान-सम्मान के साथ जी सके। जालपा के यहाँ रतन के घर के जितने ऐशो-आराम की चीज़ें नहीं थी परन्तु प्रेम एवं आत्मीयता जरूर थी। यही कारण है वह उपन्यास के अंत तक जालपा के परिवार के साथ नज़र आती है।
            प्रेमचन्द ने इस उपन्यास की रचना की पीछे जो भी उद्देश्य रखा है, स्पष्ट है कि वह पाठक वर्ग के सामने यह बात रखना चाहते है कि झूठे दिखावे एवं खोखले विचारों से कुछ हासिल नहीं होता। मध्यवर्ग की समस्याओं को इस उपन्यास के जरिए उजागर करते हुए वह यही दर्शाना चाहते है कि असत्य के साथ जीना बहुत कठीन है बल्कि सत्य को स्वीकार करके जीना ज्यादा आसान है। मध्यवर्ग की यही सबसे बड़ी दुविधा रही है कि वह अपनी वास्तविकता जानता है परन्तु फिर भी उसमें इसे स्वीकार करके चलने की क्षमता कम है।
            अंत में प्रेमचन्द के उपन्यासों में इसी आधुनिकता के कारण आज भी उनके सभी उपन्यासो की प्रासंगिकता बनी हुई है और आगे भी पाठक वर्ग में वह पठनीय बने रहेंगे।

           
           




[1] गबन, प्रेमचन्द, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं113.
[2] गबन, प्रेमचन्द, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं.10.
[3] वही पृ.सं. 16.
[4] प्रेमचन्द- विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता,सम्पादक-मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और रेखा अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2006, अध्याय-3 राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का सन्दर्भ- नामवर सिंह, पृ.सं. 52-53
[5] हिन्दी उपन्यास-एक अन्तर्यात्रा, रामदरश मिश्र, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2008 अध्याय-2-प्रेमचन्द-चुग, पृ.सं. 50.
[6]  गबन, वही, पृ.सं. 193.