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Tuesday, 11 July 2017

प्रभात वर्णन कविता का सार.................



            प्रभात वर्णन में हरिऔध जी ने प्रकृति के सबसे सुन्दर क्षण प्रभात की सुन्दरता एवं उसके मनोहरी दृश्यों का चित्रण किया है। प्रकृति में प्रभात में होने वाले हर प्रकार के हलचलों को कवि ने अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से चित्रित किया है। कवि ने प्रभात की सुन्दरता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रकृति का मानवीकरण किया है जिसके कारण यह कविता और अधिक सुन्दर एवं सरस बन गयी है।
          कवि कहते हैं प्रकृति रूपी वधू ने असित(काला) वस्त्र बदल कर सित(सफेद) वस्त्र पहना। अर्थात् रात की कालिमा दूर हो गयी और सुबह की रोशनी चारों और फैलने लगी। कवि आगे कहते हैं कि प्रकृति रूपी वधू ने अपने शरीर से तारकावलि(तारे, नक्षत्र समूह) का गहना उतार दिया। उसका यह नया स्वरूप, नया रंग पूरे नीले आसमान पर छा गया। अर्थात् रात में आकाश काला होता है तो उसमें तारे चमकने लगते है बिलकुल गहनों के जैसे दिखते हैं। परन्तु सुबह होते ही सूरज की रोशनी चारों और फैलने लगती है तो तारे छिप जाते हैं। सुबह होते ही चारों तरफ दिशाओं में राग छाने लगा अर्थात् चिड़ियों का चहचहाना, आदि चारों दिशा को रागमय कर देती है। राग प्रेम का दूसरा नाम भी है। सुबह होते ही चारों दिशाओं में प्रेम भी छाने लगा। निशा(रात) रूपी स्त्री ने अपना वदन(शरीर) छुपा लिया।
          कवि आगे कहते हैं कि उषा सुन्दरी अर्थात् दिन रूपी सुन्दरी आरंजित( हर प्रकार के रंगों से पूरी तरहा रंगी हुई) होकर सुख मनाने लगी।(सुहागिन स्त्रियाँ हमेशा रंगीन कपड़े पहनती है, कवि ने प्रकृति को, विशेष कर उषा सुन्दरी को सुहागिन के रूप में दर्शाने की कोशिश की है।) प्रकृति में प्रभात होते ही तरहा-तरहा के रंग दिखने लगे थे, उससे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे उषा सुन्दरी के कपड़े रंगीन हो गए हो। कवि कहते हैं कि जिस प्रकार तम्बू टांगा हुआ और तना हुआ रहता है, उसी प्रकार उषा सुन्दरी ने अपने होंठों में लाल रंग मयी आभा को ताना है। अर्थात् सुबह आकाश में चारो तरफ सूरज की लालिमा छायी हुई रहती है। नियति(भाग्य विधाता) के हाथों से चन्द्र की छवि छीनकर उसे छुपा दिया है और धरती पर से उज्जवल काली चादर उठ गयी है। अर्थात् रात को चन्द्र आकाश में चमकता है जिसके कारण धरती पर अंधेरे में सब कुछ चान्दी रंग में चमकता हुआ नज़र आता है। रात की कालिमा और चांदी का रंग एक सा हो जाता है। लगता है जैसे किसी ने धरती पर उजले काले रंग की चादर बिछा दी हो। जो सुबह के होते ही अपने आप गायब हो जाती है।
          कवि आगे कहते है कि प्रकृति में सुबह होते ही हृदय अपने-आप सरस(रस से भर जाना) हो जाता है। ओस की बून्दे भीगे हुए हृदय को और भी सरस बना देती है। फूलों, पत्तियों, फलों इत्यादि में ओस की बून्दे छा जाने के कारण सब कुछ अधिक रस मयी बन जाता है। उषा सुन्दरी ने ऐसे में और अधिक प्रसन्न होकर आसमान के निचले हिस्से से मोती बरसाने लगती है।(अर्थात् dew)। फिर खुले कंठ(गला) से मन खोल कर, मधुर(कमनीय) आवाज़ में बीन बजाने लगती है। अर्थात् सुबह होते ही चारों तरफ प्रकृति अलग-अलग रूपों में सुबह होने का एहसास कराती है। जैसे झरनों की आवाज़, पंछियों की चहचहाट आदि। कवि कहते हैं कि पंछियों ने भी उमंग भरे मधुर स्वर में चहचहाते हुए अपनी मधुर रागिनी सुनाई।
          ठण्डी-ठण्डी हवा बहने लगी और उनके छूने से कलियाँ विकसित होने लगी। पेड़ों का दल खुश हुआ तो लताएँ भी खुश होकर झूमने लगी। जलाशयों में कमल खिल उठे एवं नदियाँ भी ठण्डी हवा के छूने से झूम उठी, उनकी लहरें और अधिक खुशी से उछल-उछल कर बहने लगी। कवि कहते हैं कि जहाँ आकाश और धरती जुड़ती हुई नजर आती है, वहाँ तक का सारा वातावरण सुगंधित हो चुका है। अर्थात् सुबह होते ही चारों और फूल खिलने लगते हैं और ठण्डी हवा उनकी खुशबू को अपने में समेट कर चारों तरफ फैला देती है। भवरों का झुण्ड इस खुशबू से मंत्र-मुग्ध होकर इधर-उधर उड़ने लगते हैं।
          प्रभात होते ही सूरज का उदय होता है। वह बिलकुल बाल-रवि अर्थात् छोटा-सा सूरज लगता है जैसे की बच्चा हो। उसके उदय होते ही चारों तरफ सोने जैसी चमक के साथ किरणें फूट पड़ी। अंधकार से भरे आकाश में किरणें परम प्रकाशमय(रोशनी से भरी) बनकर टूट पड़ी। अर्थात् आकाश में अंधकार का नामो-निशान नहीं रहा। रात का अंधेरा पूरी तरहा से मिट गया। पूरा संसार सूरज की किरणों से जगमगा उठा है और धरती में कान्ति(glow) फैलने लगी। ऐसा लगने लगा जैसे किसी अलौकिक ज्योति पुंज अर्थात् किरणों का गुच्छों की सुन्दर मनोहर-सी थैली खुल गयी हो।
          कवि आगे कहते हैं कि सूर्योदय के साथ उसकी किरणें ऊँचे-ऊँचे पर्वतों एवं पहाड़ों में पड़ने लगी। जिस कारण ऐसा लग रहा था जैसे पर्वतो की चोटियों ने कोई मुकुट पहन लिया हो। जिसमें हजारों मणियाँ चमक रही हो। सूरज की सोने की किरणों का रंग पहाड़ो से गिरने वाले झरनों में मिल जाने पर ऐसा लग रहा था जैसे झरनों से पानी नहीं सोना बह रहा हो। सूरज की स्वर्णिम किरणों की चमक से मिलकर फूलों का गुच्छे आकर्षित लगने लगे। लताएँ और बेलियाँ भी सूरज के किरणें रूपी हाथ को छूकर चमक उठी। अर्थात् सूरज की किरणें रूपी हाथ अर्थात् प्रकाश पाकर सारी लताएँ चमक उठी।
          सूरज के उदय होते ही उसकी किरणें जब नदियों और जलाशयों में पड़ने पर कैसा मनोरम दृश्य होता है कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार से किया है। कवि कहते हैं कि सूरज की स्वर्णिम किरणों के तारों(तार) से जैसे कोई अतिसुन्दर चादर बुनी गयी हो, और उस चादर को सारे जलाशय के ऊपर बिछा कर रख दिया गया हो। इस कारण सारी नदियाँ और जलाशय बहुत आकर्षित लग रही है। ऐसा लग रहा है कि जैसे नदियाँ उमंगों से भर गयी है। अपने हृदय की उमंग को दिखाने के लिए उनकी लहरे उछल-उछल कर सूरज के प्रतिबिंब(परछाई) को लेकर खेल रही हैं।(सूरज की किरणें जब जलाशय में पड़ती है तो पानी चमकने लगता है तो ऐसा ही प्रतीत होता है जैसे वे सूरज की परछाई को लेकर खेल रही हैं।)
          नुकीले-नुकीले घास पर ओस की बूंदे पड़ी हैं। उनमें जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो ऐसा लगता है कि जैसे नुकीले घास पर किसी ने हीरों के कण(बहुत छोटे-छोटे टुकड़े) फैला दिये हो। उनकी हरित रंग की आभा(glow) उन ओस की बुन्दों से मिलकर और भी अधिक मनोरम दिखने लगते है। दूब पर थोड़ी बड़ी-बड़ी ओस की बूंदे पड़ी हुई है। जब उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है तो वे ओस की बूंदे मोतियों की माला जैसी लगती है जिसे दूब(दुर्बा एक प्रकार का छोटे आकार का तिनका पूजा में काम आने वाला) ने पहन कर रखा हो। और उससे वह और भी अधिक रमणीय लग रही है। सूरज की रोशनी इसी प्रकार बालू(sand) के टीले पर पड़ने लगती है तो वह भी आकर्षित लगने लगता है। बालू का एक-एक कण चांदी के कण के समान चमकने लगता है।
          जिस जगत को रात के अंधकार ने काला बना दिया था, वही जगत सूरज के उगने के बाद रंग-बिरंगा हो गया। कही हरियाली छाने लगी अर्थात् पेड़ो, पत्तों और लताओं के रंग, तो कही लाल रंग(लाल रंग के फूल या लाल-नारंगी रंग के सूरज का रंग) की आभा छाने लगी। जैसे-जैसे सूरज ऊपर और उठने लगा तो उसकी लालिमा धीरे-धीरे पीले रंग में बदलने लगा और आगे चलकर वह उज्जवल सफेद रंग में बदलने लगा। साथ ही साथ यह भी कह सकते हैं कि धरती पर भी तरहा-तरहा की चीज़े है जिनके रंग पीले या सफेद रंग के होते है जो सूरज के प्रकाश में चमकने लगे।
          इसी प्रकार सूर्योदय के होते ही लोग जाग गए, धरती जाग उठी। रात की जड़ता एवं आलसता भाग उठी। सब अपने-अपने कामों में लग गए। चिड़ियों का दाना चुगना, भंवरों का फूलों पर मधु के लिए मण्डराना, लोगों का सूर्य को जल चढ़ाना इत्यादि। ऐसा लगा जैसे कर्म का कोई स्रोत बहने लगा हो। प्रकृति ने अपनी नींद पूरी तरहा से त्याग दी हो। कवि आगे कहते हैं कि तमोगुण अर्थात् रात के समय की आलसता, जड़ता, आसुरी प्रवृत्तियाँ, भोग-विलास आदि हार गयी और सुबह की पवित्रता चारों और छा गयी। चकवी(मादा बतख) बड़े चावों से चकवे(नर बतख) के पास आ गयी।
          अंत में कवि कहते है कि सूर्योदय के होते ही ऐसा लगा जैसे दिन रूपी सुन्दरी ने सोने का मुकुट धारण किया हो एवं सूर्य की किरणों का पाकर सारे फूल खिल चुके हैं। प्रकृति ने ओस की बूंदे रूपी मोतियों की माला तथा खिले हुए फूलों का हार पहन लिया हो। उससे उसका शरीर अत्यंत आकर्षित और कमनीय लग रहा हैं। दिन रूपी सुन्दरी को देखकर प्रभात हँसते हुए अपने दोनों हाथों में खिला हुआ कमल लेकर आता है।

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