मेरे भीतर की लड़की
सपनें बहुत देखती है
कभी-कभी तो सपनों में खो जाती है
कभी-कभी सपनों से ही डर जाती है
मेरे भीतर की लड़की
कल्पना जगत की निवासिनी है।
मेरे भीतर की लड़की
कभी-कभी हालातों को देखकर
निश्चय करती है
"मैं अभी ये करूँगी, वो करूँगी"
"जब तक लक्ष्य पूरा न होगा"
"चैन से नहीं रहूंगी"
लक्ष्य पूरा होने के बाद क्या-क्या होगा
ये सोचते-सोचते कल्पना जगत में
फिर से खो जाती है
निश्चय किया था क्या?निर्णय लिया था क्या?
भूल जाती है।
मेरे भीतर की लड़की
सुख-दुख की साथ जीती है
दुख बीता है जो उसके साथ
सुख में होकर भी नहीं भूलती है
दुख को याद करके वह
सुख में भी दुखी हो जाती है।
मेरे भीतर की लड़की
जितना हँसती है उतना रोती भी है
पर देख नहीं सकती किसी का भी रोना
चाहे वह शत्रु भी क्यों हो ना
मेरे भीतर की लड़की
बस सारी दुनियाँ को हँसते हुए देखना चाहती है।
मंगलवार, 4 मई 2010
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
मेरे भीतर का इन्सान.........
मेरे भीतर का इन्सान
सागर के उन लहरों सी है
जो बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है
टकराती है क्या
बल्कि ढँढती है उस अधुरे इन्सान को
जिससे मिलकर मुझसी अधुरी इन्सान पूरी हो सके
पूरी कर सके
वह सारी अधुरी ख़्वाहिशें जो मैंने और उसने
देखे थे रात-भर अपनी-अपनी आँखों से
अपने-अपने कमरे में
मेरे भीतर का इन्सान
कभी-कभी तो उन्मत्त लहर बनकर
तट को ही नहीं बल्कि वहा खड़ी हर चीज को भीगों देती है
फिर देखने की कोशिश करती है
कि किसका वह सच्चा रूप है जो समाने लायक है
इस मन के सागर में
बार-बार वह यही करती है
ढूँढती है उसे जिसे दे सके प्यार का अंमृत जल
विश्वास और साथ का अथाह संसार
थक जाती है फिर भी वह यही करती है
बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है.............
सागर के उन लहरों सी है
जो बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है
टकराती है क्या
बल्कि ढँढती है उस अधुरे इन्सान को
जिससे मिलकर मुझसी अधुरी इन्सान पूरी हो सके
पूरी कर सके
वह सारी अधुरी ख़्वाहिशें जो मैंने और उसने
देखे थे रात-भर अपनी-अपनी आँखों से
अपने-अपने कमरे में
मेरे भीतर का इन्सान
कभी-कभी तो उन्मत्त लहर बनकर
तट को ही नहीं बल्कि वहा खड़ी हर चीज को भीगों देती है
फिर देखने की कोशिश करती है
कि किसका वह सच्चा रूप है जो समाने लायक है
इस मन के सागर में
बार-बार वह यही करती है
ढूँढती है उसे जिसे दे सके प्यार का अंमृत जल
विश्वास और साथ का अथाह संसार
थक जाती है फिर भी वह यही करती है
बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है.............
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
एक दिन......
एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है
सूर्योदय से दिन की शुरूआत
सूर्यास्त से दिन का अन्त
बस इतनी सी बात ही सबके सामने रह जाती है
पर ये एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है
एक दिन किसी को याद करने में बीतता है
एक दिन किसी के खयाल में बीतता है
एक दिन कोई काम की तलाश में बीतता है
एक दिन भूख को मिटाने में बीतता है
एक दिन सवालों के जवाब ढूंढने में बीतता है
एक दिन उलझनों को सुलझाने में बीतता है
एक दिन बिखरे चीजों को समेटने में बीतता है
एक दिन कुछ चीजों को, खयालों को, सपनों को सवारने में बीतता है
एक दिन सपनों को सच करने की चाह में बीतता है
फिर भी ये एक दिन यूं ही बीत जाता है
और ये बात किसी के सोच में नहीं आता है
एक दिन जो हमारे सामने से बीत जाता है।
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है
सूर्योदय से दिन की शुरूआत
सूर्यास्त से दिन का अन्त
बस इतनी सी बात ही सबके सामने रह जाती है
पर ये एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है
एक दिन किसी को याद करने में बीतता है
एक दिन किसी के खयाल में बीतता है
एक दिन कोई काम की तलाश में बीतता है
एक दिन भूख को मिटाने में बीतता है
एक दिन सवालों के जवाब ढूंढने में बीतता है
एक दिन उलझनों को सुलझाने में बीतता है
एक दिन बिखरे चीजों को समेटने में बीतता है
एक दिन कुछ चीजों को, खयालों को, सपनों को सवारने में बीतता है
एक दिन सपनों को सच करने की चाह में बीतता है
फिर भी ये एक दिन यूं ही बीत जाता है
और ये बात किसी के सोच में नहीं आता है
एक दिन जो हमारे सामने से बीत जाता है।
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
याद आते हो.............
याद आते हो.........
याद आते हो,
हर पल मुझे तुम याद आते हो
कुछ अनकही बातों में,
कुछ उभरते जज़बातों में।
तुम्हारे और मेरे बीच जो एहसास की डोर है,
उसके दोनों छोर पर हमारा दिल है।
अपने दिल की राह से जब तुम तक जाती हुँ
तब तुम याद आते हो।
जब दिसम्बर की सिकुड़ती रातों में
रज़ाई के नीचे मेरा मन सोता था
तब तुम याद आते थे।
जब उन दिनों चाँद भी बादलों की चादर ओढ़कर
अपनी रोशनी से जाहां को रोशन कर रहा था,
तब उस रोशनी में नहाया हुआ हर एक पल
तुम्हारी याद दिलाता था।
जब बारिश होती है
और मेरा जी प्यासा हो जाता है
तब तुम याद आते हो।
ये अजीब सी बात है कि
तुम्हारे और मेरे बीच कोई कड़ी छूटती नहीं है।
क्या हम एक हो चुके है साथी।
फूलों के रंगों में
मिट्टी की खूशबु में
पानी पर पड़ती परछाई में
तुम ही तो हो जो नज़र आते हो।
इन आँखों ने जो देखा है उन सबमे तुम्हें ही देखा है।
और जब आईने में मैं एक नज़र खुद से मिलाती हुँ
तो लगता है कि तुमसे नज़र मिला रही हुँ।
किताबों में न जाने कितने अनगिनत शब्द
हर शब्द का कुछ-कुछ अर्थ।
जब उन्हें पढ़ती हुँ
तो लगता है कि तुम्हारा नाम लेती हुँ।
क्योंकि तुम हर पन्ने में बसे हो।
जब पुराने पलटे पन्ने इक नज़र देखती हुँ
तब तुम याद आते हो।
और इस तरहा हर लम्हा गुज़र जाता है।
तुममे हम खोये रहते हैं,
पर बीता हर एक-एक पल
तुम्हारी याद दिलाता है।
क्योंकि उन बीतें लम्हों में तुम ही तो बीते थे
जो गज़ारे थे साथ हमने।
याद आते हो,
हर पल मुझे तुम याद आते हो
कुछ अनकही बातों में,
कुछ उभरते जज़बातों में।
तुम्हारे और मेरे बीच जो एहसास की डोर है,
उसके दोनों छोर पर हमारा दिल है।
अपने दिल की राह से जब तुम तक जाती हुँ
तब तुम याद आते हो।
जब दिसम्बर की सिकुड़ती रातों में
रज़ाई के नीचे मेरा मन सोता था
तब तुम याद आते थे।
जब उन दिनों चाँद भी बादलों की चादर ओढ़कर
अपनी रोशनी से जाहां को रोशन कर रहा था,
तब उस रोशनी में नहाया हुआ हर एक पल
तुम्हारी याद दिलाता था।
जब बारिश होती है
और मेरा जी प्यासा हो जाता है
तब तुम याद आते हो।
ये अजीब सी बात है कि
तुम्हारे और मेरे बीच कोई कड़ी छूटती नहीं है।
क्या हम एक हो चुके है साथी।
फूलों के रंगों में
मिट्टी की खूशबु में
पानी पर पड़ती परछाई में
तुम ही तो हो जो नज़र आते हो।
इन आँखों ने जो देखा है उन सबमे तुम्हें ही देखा है।
और जब आईने में मैं एक नज़र खुद से मिलाती हुँ
तो लगता है कि तुमसे नज़र मिला रही हुँ।
किताबों में न जाने कितने अनगिनत शब्द
हर शब्द का कुछ-कुछ अर्थ।
जब उन्हें पढ़ती हुँ
तो लगता है कि तुम्हारा नाम लेती हुँ।
क्योंकि तुम हर पन्ने में बसे हो।
जब पुराने पलटे पन्ने इक नज़र देखती हुँ
तब तुम याद आते हो।
और इस तरहा हर लम्हा गुज़र जाता है।
तुममे हम खोये रहते हैं,
पर बीता हर एक-एक पल
तुम्हारी याद दिलाता है।
क्योंकि उन बीतें लम्हों में तुम ही तो बीते थे
जो गज़ारे थे साथ हमने।
शनिवार, 27 मार्च 2010
मेरा डर।
मेरा डर
मुझे हर रात डराने चला आता है
पता नहीं
कितने अनगिनत
विक्राल,घिनौने,विचित्र चेहरों को लेकर
मेरे सामने ला खड़ा करता है?
उनके हाथों में हथियार नहीं होते
पर फिर भी मुझे उनसे डर लगता है।
वे सवाल पुछते है मुझसे
न जाने कैसे-कैसे?
उनके उन सवालों से
तानों से
फैसलों से
मेरे दिये गये जवाबों के बदले में लौटे जवाबों से
डर लगता है
रात को एक किताब बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
जब मैं पलके मूंद कर
सब कुछ भूलाने की कोशिश करती हुँ
तो यही सब कुछ
फिर से मेरी बंद आँखों में भी चले आते हैं
अंधकार तब ब्रह्माण्ड में बदल जाता है
और ये सब बन जाते है ग्रह-नक्षत्र
और तब
मुझसे फिर जवाब चाहते हैं
जवाब के लिए खुद में वह लड़ पड़ते है
एक-दूसरे से खुद टकराते हैं
इन टकराहट का शोर
इतना भयानक है कि मुझे डर लगता है
मेरा डर
ज़लज़ला बनकर
डराने चला आता है।
जब बारिश की बूंदों में
उन बूंदों की ठण्डक में
डर की आग से राहत मिलती है
तो वहा भी चला आता है
बन जाता है तूफान
या सैलाब
बहा ले जाता मेरे सुकून से भरी दुनियाँ को
ले जाना चाहता है मुझे भी
बहा के
पानी में डूबे हुए अरमान
सपनों की लाशों सा बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
मेरा अस्तित्व
मेरी कोशिश
मेरे जज़बात
मेरी ख़्वाहिश
मेरा काम
मेरे वादे
सब सब अब इस डर की चपेट में है
वक्त खाली बीतता देख कर
कुछ कोशिश करती हुँ
तब
खत्म हो चुका है वक्त
ये पैगाम बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
मेरा डर
हर रात मुझे डराने चला आता है।
मुझे हर रात डराने चला आता है
पता नहीं
कितने अनगिनत
विक्राल,घिनौने,विचित्र चेहरों को लेकर
मेरे सामने ला खड़ा करता है?
उनके हाथों में हथियार नहीं होते
पर फिर भी मुझे उनसे डर लगता है।
वे सवाल पुछते है मुझसे
न जाने कैसे-कैसे?
उनके उन सवालों से
तानों से
फैसलों से
मेरे दिये गये जवाबों के बदले में लौटे जवाबों से
डर लगता है
रात को एक किताब बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
जब मैं पलके मूंद कर
सब कुछ भूलाने की कोशिश करती हुँ
तो यही सब कुछ
फिर से मेरी बंद आँखों में भी चले आते हैं
अंधकार तब ब्रह्माण्ड में बदल जाता है
और ये सब बन जाते है ग्रह-नक्षत्र
और तब
मुझसे फिर जवाब चाहते हैं
जवाब के लिए खुद में वह लड़ पड़ते है
एक-दूसरे से खुद टकराते हैं
इन टकराहट का शोर
इतना भयानक है कि मुझे डर लगता है
मेरा डर
ज़लज़ला बनकर
डराने चला आता है।
जब बारिश की बूंदों में
उन बूंदों की ठण्डक में
डर की आग से राहत मिलती है
तो वहा भी चला आता है
बन जाता है तूफान
या सैलाब
बहा ले जाता मेरे सुकून से भरी दुनियाँ को
ले जाना चाहता है मुझे भी
बहा के
पानी में डूबे हुए अरमान
सपनों की लाशों सा बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
मेरा अस्तित्व
मेरी कोशिश
मेरे जज़बात
मेरी ख़्वाहिश
मेरा काम
मेरे वादे
सब सब अब इस डर की चपेट में है
वक्त खाली बीतता देख कर
कुछ कोशिश करती हुँ
तब
खत्म हो चुका है वक्त
ये पैगाम बनकर
मेरा डर
डराने चला आता है।
मेरा डर
हर रात मुझे डराने चला आता है।
गुरुवार, 25 मार्च 2010
ज़रा दूरियां।
ज़रा दूरियाँ बढ़ जाने दो
ज़रा दिल को दूर जाने दो
जब प्यार नहीं दिलों में
तो क्या होना है रहके इनका पास-पास?
ज़रा यादों से मिट जाने दो
ज़रा सपनों से हट जाने दो
जब एहसास नहीं सीने में
तो क्या होना है रहके मेरा धड़कनों के पास?
ज़िन्दगी का झूट मैंने
सच मान लिया था
तेरे बातों को मैंने
प्यार मान लिया था
अब जाके सच का सामना हुआ है
कि मैंने क्या किया था।
ज़रा आँखों से अश्क बह जाने दो
ज़रा जी भर के मुझे रो लेने दो
जब ये किस्मत है मेरी
तो क्या होना है रखके इसे पास-पास?
ज़रा दिल को दूर जाने दो
जब प्यार नहीं दिलों में
तो क्या होना है रहके इनका पास-पास?
ज़रा यादों से मिट जाने दो
ज़रा सपनों से हट जाने दो
जब एहसास नहीं सीने में
तो क्या होना है रहके मेरा धड़कनों के पास?
ज़िन्दगी का झूट मैंने
सच मान लिया था
तेरे बातों को मैंने
प्यार मान लिया था
अब जाके सच का सामना हुआ है
कि मैंने क्या किया था।
ज़रा आँखों से अश्क बह जाने दो
ज़रा जी भर के मुझे रो लेने दो
जब ये किस्मत है मेरी
तो क्या होना है रखके इसे पास-पास?
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अश्क में बह गए अभी।,
मेरे दिल का ग़म है
सोमवार, 22 मार्च 2010
न मजबूर करो किसी को।
माली कभी मजबूर नहीं करता
कली को खिल जाने के लिए
वक्त होता है उसका अपना
वह खिल जाती है।
धरती मजबूर न करती
बादलों को बरसने के लिए
सावन आता है तो
बादल बरस जाते हैं।
धूप-छाव तो होती है राहों में
पर राही मजबूर नहीं किसी के लिए
चलता जाता है वह रुकता न कभी
जब मंजिल आती है
ठहर जाता है वह मंजिल की छाव में।
प्यार में क्या मजबूरी है
प्यार तो होता है अपने ही आप
दिल मजबूर नहीं प्यार के लिए
वह यू ही करता प्यार
प्यार पाए न पाए वह
प्यार होता है करता जाता है प्यार।
कली को खिल जाने के लिए
वक्त होता है उसका अपना
वह खिल जाती है।
धरती मजबूर न करती
बादलों को बरसने के लिए
सावन आता है तो
बादल बरस जाते हैं।
धूप-छाव तो होती है राहों में
पर राही मजबूर नहीं किसी के लिए
चलता जाता है वह रुकता न कभी
जब मंजिल आती है
ठहर जाता है वह मंजिल की छाव में।
प्यार में क्या मजबूरी है
प्यार तो होता है अपने ही आप
दिल मजबूर नहीं प्यार के लिए
वह यू ही करता प्यार
प्यार पाए न पाए वह
प्यार होता है करता जाता है प्यार।
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