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Sunday, 1 September 2013

सम्प्रेषण सिद्धान्त

          पश्चिमी आलोचकों में आई. ए. रिचर्डस का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्हें मनोवैज्ञानिक आलोचना पद्धति का प्रवर्तक माना जाता है। सम्प्रेषण सिद्धान्त उन्हीं के द्वारा प्रतिपादित है।
         सम्प्रेषण शब्द दो शब्दों के योग से बना है। सम् तथा प्रेषण। सम् का अर्थ है भली भांति और प्रेषण का अर्थ है किसी संदेश या वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना या भेजने की क्रिया। इस प्रकार सम्प्रेषण शब्द का अर्थ होगा किसी संदेश अथवा वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भली भांति पहुँचाना और सम्प्रेषण तभी होगा जब वस्तु उचित स्थिति में उचित स्थान पर पहुँच जाए।
           रिचर्डस पश्चिमी जगत् के आधुनिक काल के  समीक्षक है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने काव्यशास्त्र या सामाजिक उद्देश्य आदि के स्थान पर मनोविज्ञान को अपनी आलोचना का आधार बनाया। इसलिए उन्हें मनोवैज्ञानिक आलोचक माना जाता है। यह विश्व समोलना शास्त्र में सर्वथा एक नई वस्तु है जो रिचर्डस के द्वारा दी गई। पहले रचना होती थी जिसमें काव्यशास्त्र, अभिव्यंजना, सौन्दर्य सिद्धान्त, सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक आदि तत्त्व को आधार बनाया जाता था और रिचर्डस ने इन सबको छोड़कर पाठक के मनोविज्ञान को आधार बनाया। रिचर्डस ने मनोवैज्ञानिक आलोचना में पाठक और रचनाकार दोनों के मनोविज्ञान को आधार बनाया है। क्योंकि सम्प्रेषण के लिए रचनाकार और पाठक दोनों के मन की आवश्यकता है। सम्प्रेषण में वस्तु हमेशा दो वस्तु से सम्बन्ध रखती है। यहा दो वस्तु से अर्थ है रचनाकार और पाठक जिसे रिचर्डस ने समान रूप से आधार बनाया है क्योंकि सम्प्रेषण क्रिया में दोनों सापेक्ष होते है।
             कला और साहित्य में वस्तु सम्प्रेषित होती है किन्तु वह वस्तु ठोस नहीं होती। कला और साहित्य में आवेग का सम्प्रेषण होता है। आवेग एक सूक्ष्म वस्तु है और सूक्ष्म वस्तु का केवल अनुभव होता है। इसलिए रिचर्डस ने कहा कि सम्प्रेषण का अर्थ एक वस्तु का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं है। सम्प्रेषण में अनुभवों के सम्प्रेषण की क्रिया होती है किसी ठोस वस्तु या पदार्थ की नहीं। रिचर्डस ने अनुभूति या आवेग को मन से सम्बन्धित कहा है। मन एक ऐसी वस्तु है जो मनुष्य में एक जैसी नहीं होती। वह अखिल मन की कल्पना को निराधार सिद्ध करते है। प्रत्येक मनुष्य अलग-अलग मन रखता है और सम्प्रेषण क्रिया अलग-अलग मन में होती है। रचनाकार का एक मन अपना होता है और पाठक का निजि और स्वतंत्र मन होता है और इन दोनों में तादात्म्य नहीं होता दो मन के बीच समानता हो सकती है। समानता का अर्थ एक जैसा होना नहीं अपितु मात्रात्मक अनुकूलता।
             रिचर्डस ने सम्प्रेषण की परिभाषा इस प्रकार दी है --- सम्प्रेषण का अर्थ न तो आवेग का यथावत अंतरण(Strict transference) है और न ही व्यक्तियों के बीच अनुभूति का तादात्म्य(Identical Experience)। बल्कि कुछ अवस्थाओं में विभिन्न मनों की अनुभूतियों की अत्यंत समानता ही सम्प्रेषण है। सम्प्रेषण तब होता है जब वातावरण पर किसी मन की ऐसी क्रिया होती है कि दूसरा मन उससे प्रभावित हो उठता है और दूसरे मन की अनुभूति पहले मन की अनुभूति के समान होती है। साथ ही उस अनुभूति से अंशतः प्रेरित भी। दोनों अनुभूतियाँ थोड़ी या अधिक समान हो सकती हैं और दूसरी अनुभूति पहली पर आश्रित हो सकती है।

            इस परिभाषा में यह तीन बातें विचारणीय है------ आवेग का यथावत अंतरण नहीं होना।
                                                                             ------ आवेग की समानता
                                                                            ------- पहले मन की अनुभूति से प्रभावित होकर दूसरे मन में उठने वाली अनुभूति पहले वाले मन की अनुभूति का परिणाम है।

           इस क्रिया के दो पक्ष है रचनाकार और पाठक। रिचर्डस ने दोनों के लिए अपेक्षित गुणों की भी निर्धारणा की है। अर्थात् पाठक और रचनाकार दोनों को कैसा होना चाहिए। रचनाकार में अपूर्व अभिव्यंजना कौशल होना चाहिए। अनुभव की परिपक्वता पर ही अनुभूति की अभिव्यक्ति निर्भर करती है। अनुभूति की श्रेष्ठता ही अभिव्यक्ति की श्रेष्ठता को निर्धारित करती है। साथ ही पाठक को भी सहृदय होना चाहिए। अर्थात् किसी विषय को वह सुरूचि के साथ सुनने की समझने की, पढ़ने की ग्रहण करने की स्थिति में हो और यह स्थिति तब होती है जब वस्तु उसके मन के अनुकूल हो।  इसीलिए रचनाकार की अभिव्यंजना में यह बात भी सम्मिलित हे कि उसके द्वारा कही गयी बात दूसरों के मन के अनुकूल होनी चाहिए और उसकी ग्रहण शक्ति के सीमा के भीतर होनी चाहिए।
      

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