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बुधवार, 19 जून 2024

जादू का कालीन में व्यक्त सामाजिक समस्याएं।

जादू का कालीन दरसल एक ऐसा नाटक है जिसमें समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अशिक्षा, राजनीतिक अनैतिकता, ग़रीबी, भुखमरी जो कि अपनी जड़े गहरी जमा चुकी है उसे ही एक व्यंग्यात्मक शीर्षक के जरिये मृदुला गर्ग जी ने दर्शाया है। भारत देश का गाँव देश की वास्तविक छवि को दर्शाता है। गाँव जहाँ हरे-भरे खेत-खलिहान हो, जहाँ आस-पास घने जंगल, तालाबों और नदियों और कूवों में पानी हो एक शहरी के मन में गाँव कि यही तस्वीर झलकती है। लेकिन जादू के कालीन में सभी गाँव सुखा और अकाल की चपेट में हैं। वहाँ गाँव के लोग पारंपरिक खेती के काम को छोड़ कर मजदूरी कर रहे हैं। लेकिन मजदूरी भी भ्रष्टाचार पर निर्भर करती है। अगर ठेकेदार अच्छी सड़कें बनायेगा तो वह बारिश में नहीं बहेगा न धसेगा। पर अच्छी सड़क बनती है तो गाँव के लोगों को  नयी सड़क बनाने का काम कहाँ से मिलेगा? ये एक व्यंग्यात्मक उदाहरण है समाज में फैले भ्रष्टाचार की। रमई और माई के संवाद से यही पता चलता है। वही सरकार की गाँव के प्रति उदासीन दृष्टिकोण के कारण अब गाँव वाले जो की जंगलों पर निर्भर है वह भी अब गाँव वालों के हाथ से चला गया है और वह सरकार के कब्जे में है। उसे सरकार ने रिज़र्व कर लिया है। अब गाँव वाले बिना मजदूरी, बिना खेती, बिना पानी के मजबूरी में अपने बच्चों को ही काम पर भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं। भूख से  बिलबिलाते बच्चे आखिर उनके माता पिता का भी क्या दोष। उन्हें भी पता है कि कालीन कारखानों में बच्चों की दुर्गती हो सकती है। लेकिन कमाई का जरिया ना हो और सिर पर ग़रीबी और भुखमरी की तलवार लटकी हो तो इंसान परिस्थिति का शिकार हो ही जाता है। वही कारखाने के मालिक द्वारा यह दिखाया गया है कि कैसे निचले दफ्तर के कर्मचारी, लेबर ऑफिसर और नेता तक इस कुचक्र में शामिल होकर पैसों के लालच में कालीन का व्यवसाय गलत तरीके से चलाने दे रहे हैं और कारखाने के मालिक जैसे लोग खुद लाभ कमा रहे हैं। उन्हें किसी मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ता है। बल्कि वे कमिशन देकर अपना काम सुचारु रूप से चला रहे है। बच्चों की सेहत, उन्हें भरपेट भोजन, शिक्षा इत्यादि की किसी को फिकर नहीं है। बच्चे गेहूँ में घुन की तरह पीस रहे है। यद्यपि उनके मन में आजादी का सपना है, शिक्षा और अच्छे भोजन का सपना भी देखते है लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। बच्चों की माओं के मन में चिन्ता जहाँ दिखती है वही उनके पिता बच्चों से ही आमदनी करने की सोचते है। केशो का बाप और संतो का बाप दोनों पैसे लेकर अपने बच्चों को दलालो के हाथ बेच देना यही दर्शाता है। 

वही सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार भी जब बच्चों को कारखाने से मुक्त करवाते है तो उन्हें दुबारा सही जीवन मिले इसका कोई व्यावहारिक उपाय या तरीका नहीं ढूंढ पाते हैं। गाँव के बच्चों को गाय और सिलाई मशीन देकर वे जैसे अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है। वही केशो जो कि पढ़ना चाहता था उसे भी शहर में घरेलू नौकर ही बनना पड़ता है। जब संतो कि दादी गाँव की वास्तविक आवश्यकता जंगल और पानी की मांग करती है तो उसे चुप करा दिया जाता है। सुखा के कारण उनको दी गयी गायें भी सुख कर अधमरी हो जाती है जिस पर कलेक्टर गाँव वालों पर ही नाराज़ होता है। लाखन जैसे बच्चे जो कि क्षणिक समाधान और क्षणिक लाभ के चक्कर में आकर इस बाल मजदूरी के कुचक्र में फँसा रहना ही चाहता है। काम काज और अन्न के अभाव में रमई और तीसरा गाँव वाला अपनी बेटियों की शादी कर देना चाहते हैं जो कि समाज में बाल विवाह की समस्या को उजागर करता है। वे दोनों लड़के के बाप से महज साड़े सात सौ- आठ सौ रुपए लेकर बच्चियों को बेचने के लिए राज़ी हो जाते है। 

डाक बंगला प्रश्नोत्तर

ममदू कौन था?

घोड़े वाला

इरा किस होटल में रुकी थी?

एल्पाइन होटल

इरा का पालन पोषण किसने किया?

नौकरानियों

कौन बतरा के बंगले का चक्कर लगाता था?

विमल

डॉ साहब के बच्चों के नाम क्या थे?

रंजन और विजन

इरा की सहेली का नाम क्या है?

दमयंती

शीला किसकी प्रेमिका थी?

बतरा

इरा अपनी कहानी किसे सुनाती है?

तिलक

डॉ साहब की उम्र क्या थी?

पचास से ऊपर

बतरा कौन सा खेल खेलते थे?

पोकर


संदर्भ सहित व्याख्या

१. आदमी से भागना भी चाहती हूँ, और उसी के पास रहना भी चाहती हूँ। शिकायतें भी उसी से हैं और प्यार भी उसी से हैं। 

संदर्भ:- प्रस्तुत गद्यांश डाक बंगला से लिया गया है। इस उपन्यास के रचैता कमलेश्वर जी है। 

प्रसंग:- किसने किससे कहा- इरा ने तिलक से कहा। 

व्याख्या:- इरा ने अपनी कहानी तिलक को सुनाई जिसमें उसने यह बताया कि कैसे उसके जीवन में अलग-अलग पुरुषों के कारण उसे कितने कष्ट और मुसीबतें झेलनी पड़ी है। पहले विमल जिससे इरा प्रेम करती थी परन्तु विमल खुद ही संकीर्ण मानसिकता वाला और कमजोर व्यक्तित्व वाला था जो उसे दिल्ली अकेले छोड़ कर बंबई भाग गया था। वो शंकालु भी हो गया था। फिर बतरा ने इरा के साथ अन्याय किया। वह उसके बच्चे की माँ भी बनने वाली थी लेकिन बतरा ने छल से उस बच्चे को गिरवा दिया। वही डॉ चंद्रमोहन से भी जब शादी हुई तो उसने भी केवल इरा से शरीरिक सुख ही पाना चाहा। इरा के कथन का अर्थ ये था कि उसके जीवन में जो भी पुरुष आया उन्होंने उसे विलास की वस्तु के रूप में देखा, उससे यही चाहा। इरा को वास्तविक प्रेम और अधिकार वाला जीवन साथी भी नहीं मिला। उसे ऐसा आदमी चाहिए था जो इरा को प्यार करे और उसे समझे। जैसे इरा के मन में किसी भी पुरुष को देखने पर प्रेम और ममता की भावना जगती रही है उसे भी वही चाहिए। परन्तु पुरुषों के संसार में नारी को भोग विलास मात्र समझना यही इरा की सबसे बड़ी शिकायत है। 


जादू का कालीन संदर्भ प्रसंग व्याख्या

 बरखा ना हुई, पिछले बरस बनी सड़क जौन की तौन  मौजूद है। ना बही, ना धँसी। मुझे बी लौटा दिया

संदर्भ:- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक जादू का कालीन नामक नाटक से ली गयी है। इसके नाटकार है मृदुला गर्ग। 

प्रसंग:- किसने किससे कहा- रमई ने माई से कहा। रमई माई को मजदूरी का काम न मिलने की वजह बता रहा है। 

व्याख्या:- लेखिका मृदुला गर्ग जी ने इस नाटक में ग्रामीण समाज की समस्याओं का चित्रण करते हुए दिखाना चाहा है कि किस प्रकार गाओं के लोग सुखा और अकाल पड़ने से अब शहरों में मजदूरी करने के लिए मजबूर है। और देश में भ्रष्टाचार की जड़े कितनी मजबूत है। 

जब माई गाओं के पास सड़क बनने की उम्मीद से अपना नंबर लगा आने की बात कहती है तो रमई उसे बताता है कि इस बार बारिश ना होने की वजह से सड़क अभी भी अच्छी ही है। अब उस सड़क में ना गड्ढ़े है ना ही वो बारिश में बही है। ना ही किसी जगह से धसी है। ऐसे में अच्छी सड़क को दुबारा बनाने का विचार भी नहीं आयेगा। वही गाँव के लोग जो इन कामों से मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते है उनके लिए भी और कोई दूसरे काम की भी उम्मीद नहीं है। वही गाँव में जबरदस्त सुखा पड़ने से वे खेती भी नहीं कर सकते है जिससे गरीबी और भुकमरी की समस्या उत्पन्न हो गयी है। इसी कारण रमई और माई जैसे लोग परेशान है। 

वही सड़कों की बारिश में धसने और बहने की बात से पता चलता है कि इस प्रकार के कामों में ठेकेदारों और सड़क बनवाने वालों के बीच भ्रष्टाचार की जड़े कितनी ज्यादा गहरी हो चुकी है। 

जादू का कालीन प्रश्नोत्तर

 जादू का कालीन के नाटककार कौन है?

मृदुला गर्ग

संतो के पिता का नाम क्या है?

रमई

भले मानुष की संस्था का नाम क्या है?

सेवा संघ

किसकी उमर पूछी न जाती है?

लड़के की 

हरियाणा सरकार की गाये किसने डॉनेट की थी?

कलेक्टर साहब

केशों और संतों किस गाँव में रहते थे?

सरसताल

जंगल अब किसका हो गया है?

सरकार का

औरतें लड़कियों को बिठा कर क्या गीत गाती है?

कन्या विदा का



सोमवार, 29 अप्रैल 2024

सिलचर की दुर्गा पूजा

 

सिलचर हमारा प्यारा शहर सिलचर, असम का एक छोटा सा मगर खुद्दार और शांति का शहर सिलचर अपनी कई विशेषताओं के लिए यहाँ रहने वाले प्रत्येक सिलचर वासियों के मन में एक खास जगह लिए रहता है। कह सकते हैं कि आप सिलचर के बाहर तो जा सकते हैं मगर सिलचर आपके अंदर से बाहर नहीं निकलेगा।

            आज जिस विषय के बारे में हम बात करने वाले हैं वह है सिलचर की दुर्गा पूजा के बारे में। जी हाँ अब कुछ ही दिन बाकी है दुर्गा पूजा आने में और सिलचर एक ऐसा शहर है जहाँ की दुर्गा पूजा बहुत सारे बातों में मायने रखता है। विशेष कर आर्थिक रूप एवं आध्यात्मिक दृष्टि से। दुर्गा पूजा एक ऐसा पर्व है जो प्रत्येक बंगाली के जीवन में विशेष स्थान रखता है। महालया से शुरु कर विजया दशमी तक हर बंगाली इस उत्सव का आनंद मनाता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब हो इस उत्सव में विशेष रूप से प्रसन्न होकर अपनी तरह से मनाने की तैयारी करता है। फिर जब ये उत्सव पारिवारिक न होकर सार्वजनीन हो तो इसकी बात ही अलग होती है। बड़े-बड़े सुन्दर ढंग से सजाए पूजा पंडालों में माँ के भक्तों की भीड़ लग जाती है। तब न जाति देखी जाती है न ही वर्ण। सभी माँ के भक्त है। सभी माँ को प्रसन्न करने के लिए अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार तैयार होकर सुबह-सुबह उनके चरणों में अंजली देने को चले आते हैं। ये उत्सव इस लिए और खास बन जाता है क्योंकि इसमें जातिय दिवारें नहीं होती है।

इन सुनहरे पलों की शुरुआत ही महालया से हो जाती है। महालया के दिन सुबह चार बजे उठना फिर और रेडियो पर बंगाल के प्रसिद्ध गायक विरेन्द्र कृष्ण भद्र की आवाज़ में महिषासुर मर्दिनी का यादगार गायन और चंडी पाठ को सुनना एक ऐसा काम होता था जिसे करने के बाद गर्व की अनुभूति होती। सचमुच ये पाठ है कि इतना महान की आज भी हर बंगाली जब भी इसे सुनता है तो उसके मन में आनंद का संचार तो होता ही है फिर रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं। फिर तो कुछ दिन बीतते ही दुर्गा पूजा शुरु हो जाती है। चारों तरफ जोर-शोर से तैयारी होने लगती है। पंडाल बनने लगते हैं, सड़कों के इर्द-गिर्द लाइटों की सजावट, माँ दुर्गा की मूर्तियों को लेने जाने वालों का जयकारा लगाते हुए जाना। घर-घर चंदा मांगने के लिए समूह में आते लोगों का तांता। चारों तरफ श्यामा संगीत और ढाकी का ढाक बजाना। बाज़ार में दुकानों में लोगों की भीड़ लग जाती है नए कपड़ों के लिए। नए-नए फैशन के कपड़े तो आज लोग खरीद कर खूब सज लेते हैं। लेकिन एक समय था जब लोग विशेष कर महिलाएँ और लड़कियाँ सलवार कमीज के अनसीले कपड़े लाकर दर्जी से अपने हिसाब से अपने फैशन की पसंद के अनुसार सिवालती थी। पुरुषों में धोती और कुर्ता या फिर सिंपल शर्ट के लिए शर्ट के पीस खरीदने का दौर था। पूजा के एक-दो महीने से पहले ही दर्जियों की व्यस्तता का अंदाज लगाना मुश्किल होता था। महालया के बाद यदि कपड़े सीलने के लिए दर्जी के पास ले जाओ तो वह कभी-कभी मना तक कर देता था। कई बार समय पर नए कपड़े मिलते तक नहीं थे। फिर कई बार तो लोगों को पिछले साल के पुराने लेकिन जिन्हें एक ही बार पहना गया हो उन्हीं कपड़ों में सप्तमी और अष्टमी निकालनी पड़ती थी। फिर नवमी में बिलकुल नए कपड़े। ये तो निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की बात है। गरीब परिवारों में दुर्गा पूजा में नए कपड़े पहनना एक सपने जैसा होता था। तब वे किन-किन माध्यमों से नए कपड़े लाते थे ये तो वे जाने या फिर उनके भगवान। लेकिन उनमें भी पूजा के प्रति इतना उत्साह था कि वे अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर पूजा देखने आते थे। उनमें इस बात की फ़िक्र नहीं थी कि कोई क्या सोचता होगा। विडम्बना की बात है कि आज लोगों में इन सब बातों  का कोई मोल नहीं रह गया है। लोग एक-दूसरे के कपड़ों से उन्हें मान देते हैं। वही महिलाओं ने भी अपनी शालीनता को त्याग कर अजीबो-गरीब ब्लाउज, छोटे -छोटे कपड़े पहनकर स्वयं को स्वतंत्र नारी का तमगा देकर इस उत्सव की मर्यादा को ही गिरा दिया है। जबकि एक समय था कि बंगाली स्त्रियों का मर्यादित आचारण एक मिसाल की तरह था। भले ही फैशन किया जाए पर उसके लिए अंग प्रदर्शन करना वह भी ऐसे पवित्र अवसर पर वह पूजा का आनन्द नहीं बल्कि स्वयं के वैचारिक पतन और दुर्दशा को दर्शाता है।