*1. प्रस्तावना*
गुलाम बनाने वाले कविता धर्मवीर भारती के सामाजिक और राजनैतिक चिंतन का अच्छा उदाहरण है। इस कविता में कवि ने इतिहास के अलग अलग समय का जिक्र करके समझाया है कि शोषण करने वाली ताकतें समय के साथ अपना रूप बदलती रहती हैं। उनका मकसद हमेशा जंजीरें डालना ही होता है, चाहे तरीका युद्ध हो, व्यापार हो या आज की संस्कृति।
*2. कविता का सारांश*
कविता को तीन मुख्य ऐतिहासिक हिस्सों में समझ सकते हैं:
पहला चरण - प्राचीन काल आक्रमणकारी रूप:
शुरू में गुलाम बनाने वाले योद्धा बनकर आए। उनके हाथों में भाले थे और वे खैबर दर्रे को पार करके घोड़ों पर चढ़कर आए थे। यह समय ताकत और सीधी लड़ाई से गुलाम बनाने का था। इसमें मुगल, तुगलक जैसे शासक आते हैं जो तलवार के बल पर देश को जीतकर गुलाम बनाते थे।
दूसरा चरण - मध्यकाल व्यापारी रूप:
इसके बाद शोषण का तरीका बदला। अब वे व्यापार की अनुमति लेकर आए। यह अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा व्यापारिक कब्जा था। उनके एक हाथ में व्यापार की फाइलें थीं तो दूसरी ओर बंदूकें छिपी थीं। उन्होंने लड़ाई की जगह कूटनीति और व्यापार से देश को गुलाम बनाया।
तीसरा चरण - आधुनिक काल सांस्कृतिक और आर्थिक रूप:
आज के समय में गुलाम बनाने का तरीका सबसे छिपा हुआ और खतरनाक है। अब वे सैनिक या व्यापारी बनकर नहीं, बल्कि सैलानी, कैमरे, थैलियाँ और रंग-बिरंगी फिल्में लेकर आते हैं। यह सांस्कृतिक गुलामी का समय है, जहाँ मनोरंजन, विदेशी मदद और विज्ञापनों के पीछे गुलामी की जंजीरें छिपी होती हैं।
*3. कविता का मुख्य भाव*
सांस्कृतिक और नया उपनिवेशवाद: कविता कहती है कि आज की गुलामी लोहे की जंजीरों से नहीं, बल्कि दिमागी और आर्थिक निर्भरता से आती है। विदेशी फिल्में, पर्यटन और दिखावे की चीजें हमें बिना बताए गुलाम बना रही हैं।
छिपे हुए रूप को पहचानना: कवि बताते हैं कि रोटी और पर्चों के पीछे छिपी जंजीरें सबसे खतरनाक हैं। यह उन ताकतों पर तंज है जो मदद का लालच देकर देश की आजादी को बाँध लेती हैं।
सतर्क रहने का संदेश: कविता एक चेतावनी है कि इतिहास खुद को दोहराता है। अगर हम उनके नए रंग-बिरंगे चेहरों को नहीं पहचान पाए, तो हम फिर से अपनी आजादी खो देंगे।
*4. कविता का शिल्प*
प्रतीक:
खैबर की चट्टानें - विदेशी हमलों के पुराने रास्ते का प्रतीक। मुगल, तुगलक इसी रास्ते आए।
व्यापार की अनुमति - आर्थिक लूट का प्रतीक। अंग्रेज इसी तरह आए।
कैमरे और फिल्में - आज के सांस्कृतिक हमले और प्रचार का प्रतीक।
रोटी - आर्थिक मदद और लालच का प्रतीक।
भाषा: कविता की भाषा सीधी लेकिन गंभीर है। इसमें हिंदी के साथ उर्दू शब्दों जैसे व्यापार, अनुमति, बंदूकें, आदेश का सही प्रयोग हुआ है, जिससे इतिहास जीवंत लगता है।
चित्र योजना: कविता में दृश्य बहुत साफ हैं। घोड़ों की टापों की आवाज से लेकर रंग-बिरंगी फिल्मों तक, पढ़ने वाले के सामने पूरा इतिहास घूम जाता है।
शैली: यह संबोधन शैली की कविता है। इसमें लय है और बात को बार-बार दोहराकर जैसे "और भी पहले वे कई बार आए हैं" कवि अपनी बात मजबूत करता है।
व्यंग्य: "आदेश के मुताबिक बदले जाने वाले चेहरे" और "दो-दो आने वाले पर्चे" के जरिए आज के विज्ञापनों और प्रचार पर गहरा तंज किया गया है।
*5. निष्कर्ष*
धर्मवीर भारती की यह कविता हर समय के लिए सही है क्योंकि यह सिर्फ एक समय की गुलामी की बात नहीं करती, बल्कि शोषण की आदत की बात करती है। यह बताती है कि शोषण का ढंग नया हो सकता है, लेकिन उसकी बात पुरानी ही होती है। इसमें मुगलों-तुगलकों के तलवार के बल पर गुलाम बनाने से लेकर अंग्रेजों के व्यापार के बहाने देश पर कब्जा करने तक और आज की सांस्कृतिक गुलामी तक सबको जोड़ा गया है।
*उत्तर के लिए सुझाव:* परीक्षा में लिखते समय कविता की कुछ पंक्तियाँ जैसे "ढंग है नया, लेकिन बात यह पुरानी है" को उद्धरण के रूप में जरूर लिखें, इससे अंक अच्छे मिलते हैं।

