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Tuesday, 19 May 2020

इक्कीसवी सदी का भारत


देश मेरा बैठा है आज बारूद के ढेर पर,
पर राजनेता है कुर्सी के चर्चे पर।
देश मेरा है आज आतंक के निशाने पर,
पर राजनेता आपस में एक-दूसरे के निशाने पर।
भाषावाद,जातिवाद,क्षेत्रीयवाद यही सब रह गया है,
देश कब गया अंधेरे के गर्त में किसे खबर है
विकास के नाम पर तो वोट माँगे जाते है?

विशेष विशेष के कुछ और ही नाते आते हैं?
मगर गरीब की आबरु है आज भी ताक पर।
कोई दो अरब का आशियाना बनाए,
कही आशियाने ही जला दिए जाए।
कही है नौकरी और पढ़ाई पर रिजर्वेशन,
कही है पक्षपात और डिसक्रिमिनेशन।
देश मेरा आज किस ओर जा रहा है
किसे पता है,
किसे पता, क्या होगा आगे?
क्या यही है इक्कीसवी सदी का उभरता भारत।


Friday, 8 May 2020

रस परिचय – रस किसे कहते हैं? रस कैसे उत्पन्न होता है?


रस – भारतीय जीवन में रस एक सर्वव्यापक वस्तु है और सर्वव्यापक होने के कारण इसका सर्वत्र प्रयोग होता है। रस का इन सभी जगहों में अलग-अलग प्रयोग अर्थ आदि है। अर्थ निर्भर करता है लेने वाले पर। अर्थात् कोई किसी प्रसंग में अर्थ किस प्रकार लेता है उसी पर अर्थ निर्भर करता है। रस शब्द सबके लिए अलग-अलग अर्थ लेकर आता है। जैसे कि –

(क) प्राकृत्तिक वस्तु के रूप में रस का अर्थ है काठ का रस, फूल का रस, पत्ते का रस, फल का रस इत्यादि।

(ख) आयुर्वेद में रस का अर्थ है रसायन अथवा औषधि। उसे रस रसायन के नाम से कहा जाता है। आयुर्वेद में ही शरीर का मूल तत्व(वीर्य) को जो कि जीवन-मृत्यु का मूल है उसे भी रस कहा गया है।

(ग)  स्वाद के अर्थ में रस जैसे मधु रस, तीक्त रस, झाल रस इत्यादि।

(घ)  मधु के अर्थ में रस को लिया जाता है।

(ङ)  आध्यात्म के क्षेत्र में भी रस को भक्ति रूप में लिया जाता है। उसे मुक्ति भी कहते हैं।

(च) आनन्द के अर्थ में भी रस को लिया जाता है। इसे काव्यानन्द कहते है। जैसे संगीत सुनने से, नृत्य देखने पर, मूर्ति देखने पर भी आनन्द को प्राप्ति होती है। काव्य और सभी प्रकार के कलाओं को देखने से हमें आनन्द की प्राप्ति होती है।

उपरोक्त सभी रस का प्राथमिक परिचय है। उपरोक्त सभी बातों से स्पष्ट है कि रस हमारे संपूर्ण जीवन के प्रत्येक क्षण में, प्रत्येक तत्व में, प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है। रस के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

            साहित्य में रस का अर्थ है जब हम कोई साहित्यिक विधा पढ़ते है, सुनते है तो हमारे मन में उस विधा में वर्णित कथा या विचार पढ़कर जो अनुभूति होती है तथा उस अनुभूति से जो भाव जन्म लेता है जो कि हमारे चेहरे तथा शरीर में दिखायी देता है या जो हमारी अवस्था होती तो रस की उत्पत्ति होती है। जैसे कि हम कोई वीर रस से भरी कविता पढ़ते हैं तो हमारे शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न होती है, हमारी आँखों में गर्व दिखायी देता है। उसी प्रकार यदि हम कोई ट्रेजेडी वाला साहित्य पढ़ते हैं तो हम रोते हैं। इस स्थिति को हम काव्यानन्द कहा जाता है। उसी आनन्द को हम रस कहते हैं।

रस की उत्पत्ति कैसे होती है?  कोई कार्य या कोई परिणाम अपने-आप नहीं हो जाता है, जिसके पीछे कोई घटना या वस्तु होती है जिसे कारण कहा जाता है। घटना या वस्तु के बिना कार्य या परिणाम नहीं होगा। रस के उत्पादान कारण इस प्रकार –

            विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पतिः  -- (आचार्य भरतमुनि)

आचार्य भरतमुनि के अनुसार रस की उत्पत्ति विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस का आदि कारण है भाव। एक प्राणी किसी घटना, वस्तु, व्यक्ति, विचार आदि में से किसी एक के संपर्क में आने पर उसके चित्त(मन, heart) में एक प्रतिक्रिया होगी। इसका एक परिणाम होगा और यही परिणाम भाव कहलाएगी। यह परिणाम अनुकूल(favourable) भी हो सकता है या प्रतिकूल(adverse) भी हो सकता है। अनुकूल हुआ तो सुख होगा अर्थात् सुखात्मक भाव या प्रतिकूल हुआ तो दुख अर्थात् दुखात्मक भाव। किसी क्रिया का हमारी चेतना पर जो परिणाम होता है वही भाव है। क्योंकि चेतना का जगत काफी सूक्ष्म होता है इसीलिए भाव का स्वरूप भी काफी सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म (प्रत्यक्ष रूप से दिखायी नहीं देगा बल्कि उसकी अनुभूति होती है।) भाव की अवस्था में मनुष्य संसार में नहीं रहता। वह ममत्व और परत्व के बन्धन से मुक्त हो जाता है।



भाव को दो भागों में बाँटा गया है।

अस्थायी भाव
स्थायी भाव
अल्प अवधी अर्थात् थोड़े समय के लिए जिसका अस्तित्व होता है।
कुछ भाव ऐसे है जो कुछ दीर्घ काल तक शुष्क रूप से हमारे भीतर बने रहते हैं, इनको मिटाया नहीं जा सकता उनको स्थायी भाव कहते हैं। ये सदा शाश्वत बने रहने वाला भाव।



रस सिद्धान्त में रस नौ प्रकार के बताए गए हैं। परन्तु भक्तिकाल में भक्तिपरक रचनाओं में दो नयी प्रकार का भावों को भक्तिकाव्य में लक्ष्य किया गया तथा उसे रस के अंतर्गत जोड़ा गया। ये नए भाव थे (भक्ति एवं वात्सल्य)।

रस के प्रकार एवं उनके स्थायी भाव

स्थायी भाव                                                        निष्पन्न होने वाले रस

रति                                                                   श्रृंगार रस

हास                                                                  हास्य रस

शोक                                                                 करूण रस

क्रोध                                                                  रौद्र रस

उत्साह                                                               वीर रस

भय                                                                   भयानक रस

जुगुप्सा                                                              वीभत्स रस

विस्मय                                                              अद्भुत रस

निर्वेद                                                                शान्त रस

पुत्र विषयक रति                                                 वात्सल्य रस



विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव किसे कहते हैं?

विभाव – वि का अर्थ है विशेष अर्थात् विभाव का अर्थ है विशेष प्रकार का भाव। वास्तव में हेतु, कारण, प्रयोजन भाव को उत्पन्न करने वाले हेतु, कारण या प्रयोजन को विभाव कहते हैं।

            हमारी चेतना में स्थायी भाव, शाश्वत सनातन रूप में विद्यमान है जो अपने-आप नहीं जगते। इनको जगाने का काम कोई बाहरी क्रिया करती है। इसी प्रयोजन को विभाव कहा जाता है। क्योंकि इसके कारण भाव जैसी सूक्ष्म वस्तु का जागरण होता है इसलिए इसे विशेष भाव कहा जाता है। हमारी आत्मा में स्थायी भाव सदैव उपस्थित रहते हैं। परन्तु हम इन भावों को सदैव महूसस नहीं कर पाते हैं। ऐसे में जब कोई कारण या हेतु इन्हें प्रकट करता है तभी हमें ये स्थायी भाव महूसस होते हैं। जैसे कि किसी व्यक्ति द्वारा कही गयी कोई अटपटी बात या चुटकुले सुनकर हम सबको हंसी आती है। इसमें उस व्यक्ति द्वारा जो चुटकुला सुनाया गया है वही चुटकुला विभाव के रूप में काम करता है तथा हमारे मन में स्थित हास नामक स्थायी भाव को जगा देता है जिसे हम महसूस कर पाते हैं।

विभाव के दो मूल भेद है। एक है आलम्बन विभाव और दूसरा है उद्दीपन विभाव। भाव को जगने कोई आधार चाहिए, आधार न हो तो भाव नहीं जगेगा। जिस आधार पर भाव जगता है उस आधार को आलम्बन विभाव कहते हैं। भाव के जगने अर्थात रति नामक स्थायी भाव को रस के रूप में निष्पन्नः होने के लिए नायक और नायिका नामक आलम्बन विभाव चाहिए। जैसे रामायण में पुष्प-वाटिका प्रसंग में राम ने जानकी को देखा तो उनके हृदय में रति भाव जगा। इसलिए जानकी आलम्बन विभाव है और राम में रति भाव जगा इसलिए राम और राम का हृदय आश्रय है। जहाँ जाकर रस को आधार मिलता है, स्थायी भाव जागता है उसे आलम्बन विभाव कहते है। आल्मबन यहाँ देवी सीता है तथा उनके द्वारा की गयी चेष्टाएँ उद्दीपन विभाव कहलाएगी।

अनुभावआश्रय की चेष्टाएँ अनुभाव के अन्तर्गत आती है जबकि आलम्बन की चेष्टाएँ उद्दीपन के अन्तर्गत मानी जाती हैं। अनुभाव की परिभाषा देते हुए कहा गया है – अनुभावों भाव बोधकः अर्थात् भाव का बोध कराने वाले कारण अनुभाव कहलाते है। आश्रय की वे बाह्य चेष्टाएँ जिनसे यह पता चलता है कि उसके हृदय में कौन-सा भाव उत्पन्न हुआ है वह अनुभाव कहलाते हैं।

जैसे की राम जब देवी सीता को पुष्प-वाटिका में देखते हैं तो राम के मन में प्रेम उत्पन्न होता है। राम तब देवी सीता को एकटक देखते रहते हैं तथा मुस्कुराते हैं। उनका मुस्कुराना, एकटक देखना अनुभाव है। वही देवी सीता राम के इस प्रकार एकटक देखने पर वह भी उन्हें देखती रहती है तथा बाद में लज्जा वश अपनी पलके झुका लेती है। यहाँ देवी सीता आल्मबन है तथा उनका लजाना इत्यादि चेष्टाएँ उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत आते हैं।

संचारी भाव – संचरणशील (अस्थिर) मनोविकारों या चित्तवृत्तियों को संचारी भाव कहते हैं। ये भाव रस के उपयोगी होकर जलतरंग की भाँति उसमें संचरण करते हैं। इससे ये संचारी भाव कहे जाते हैं। इनका दूसरा नाम व्यभिचारी है। विविध प्रकार से अभिमुख और अनुकूल होकर चलने के कारण इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। ये स्थायी भाव के साथी है। रस के समान ही संचारी भाव भी व्यंजित या ध्वनित होते हैं। इनकी तैंतीस संख्या मानी गयी है।

ये तैंतीस भाव इस प्रकार है –1) निर्वेद 2) ग्लानि 3) शंका 4) असूया 5) मद 6) श्रम 7) आलस्य 8) दैन्य या दीनता 9) चिन्ता 10) मोह 11) स्मृति 12) धृति 13) व्रीड़ा 14) चपलता 15) हर्ष 16) आवेग 17) जड़ता 18) गर्व 19) विषाद 20) औत्सुक्य 21) निद्रा 22) अपस्मार 23) स्वप्न 24) विबोध 25) अमर्ष 26) अवहित्था 27) उग्रता 28) मति 29) व्याधि 30) उन्माद 31) त्रास 32) वितर्क 33) मरण

Saturday, 25 April 2020

मोइदा-ओइ-दे


कभी-कभी लगता है कि ज़िन्दगी यू ही बिना किसी झंझट के गुज़र जाती तो कितना अच्छा होता। पुरानी यादें जो बार-बार नज़रों के सामने आती है वह यह एहसास दिला जाती है कि आज जो ज़िन्दगी है या जो हुआ करती थी उसमें से कौन सी सबसे ज्यादा अच्छी है? क्योंकि आज सबकुछ होते हुए भी लोगों के पास कुछ नहीं है। घड़ियाँ है पर वक्त नहीं है, अनाज बहुत है पर भूख नहीं है, लोग बहुत है पर रिश्तें कही खो से गये हैं। बीते वक्त से चुनकर कुछ एक ऐसी ही घटनाएँ मुझे याद आती हैं। मैं बारवी कक्षा की छात्रा थी। पिताजी के साथ हम सभी अलोंग अरुणाचल प्रदेश के असम-रायफल्स केम्पस में रहा करते थे। रोज का टाईम-टेबल था पिताजी नहा-धोकर तैयार होकर असम-रायफल्स स्कूल पढ़ाने चले जाते। पिंकी (मेरी छोटी बहन) भी तैयार होकर पिताजी के साथ स्कूल चली जाती। मैं और भाई आलोक भी तैयार होकर आलोंग हाइयर सेकेन्डरी स्कूल चले जाते। माँ घर के कामों से फुर्सत पाकर सिलाई के काम में बैठती थी। उनको सिलाई बहुत अच्छी तरह आती है। क्रोशिये पर जब उनकी ऊंगलियाँ चलती तो इतने सुन्दर-सुन्दर मेज़-पोश बनते, हमारे लिए सुन्दर-सुन्दर स्वेटर बनाती थी जो देखने लायक होते थे। फ्रॉक तो ऐसे बनती थी जैसे कि रेडीमेड खरीदी हो। हम दोपहर को स्कूल से घर लौटते थे तो माँ के साथ ही भोजन करते थे। शाम का वक्त खेलने का होता या फिर पढ़ने के लिए बैठ जाते। घर की दिनचर्या हमारी बिलकुल साधारण सी थी। शाम को पिताजी के पास उनके कई स्टूडेन्ट पढ़ने आते। हफ्ते में तीन दिन वे दूसरी जगह पढ़ाने भी जाते थे। उनके आने के बाद हम सब अपने-अपने डाउट लेकर बैठ जाते थे। ज्यादातर गणित और विज्ञान के विषयों से सम्बन्धित होते थे। मेरी गणित तथा विज्ञान में कोई विशेष रुची नहीं थी। कल्पना की दुनिया में उन दिनों उड़ान भरा करती थी। अपने क्वाटर के आस-पास के दृश्यों के देख-देख कर न जाने क्या-क्या सोचती रहती थी। क्वाटर के आस-पास के नज़ारे भी तो इतने सुन्दर थे कि क्या कहने!! हमारे क्वाटर का मुख्य दरवाजा उत्तर दिशा की ओर खुलता था। बाहर एक बहुत छोटा सा आँगन था। जैसे कि सरकारी और विशेष कर आर्मी बटालियन में रहने वालों के घर होते हैं। वैसे हम जहाँ थे वहाँ गिनती के सिर्फ छः क्वाटर थे। सभी जाने पहचाने। आँगन के दाहिने तरफ खुली बड़ी सी जगह और उसके बाद नर्स अंकल का क्वाटर पड़ता था। उनके क्वाटर की तरफ देखने पर दूर पहाड़ी और घने जंगल दिखते थे। ये पूर्व दिशा की ओर था। रोज वहाँ से सूर्योदय का नज़ारा दिखता था। पश्चिम की दिशा की ओर भी उससे भी ऊँचा पहाड़ था। उस पहाड़ में स्थानीय लोगों के घरों तथा तरह-तरह के पेड़ पौधे, केले के पेड़, फूलों की क्यारियाँ तथा गमले और भी न जाने क्या-क्या। उनमें सूरज की रोशनी पड़ती थी तो सबकुछ कितने रंगीन हो जाते थे। आँगन के बाये तरफ एक सफेद जबाकुसुम का पौधा था। सावन के महिने तथा अन्य बारीश के दिनों में उसमें बहुत सारे सफेद जबाकुसुम फूल खिलते थे। साथ ही रेन ग्रास लिली के फूल भी खिलते थे।

            हम केम्पस के जिस हिस्से में रहते थे उस ओर से असम-रायफल्स के केम्पस से शहर की ओर जाने का रास्ता पड़ता था। मेन गेट के बाहर कई दुकाने थी । शहर से अक्सर एक बूढ़ी औरत लकड़ियाँ टेकते हुए भीख माँगने आया करती थी। थी तो वह वही की स्थानीय। हिन्दी भाषियों तथा अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोगों के कारण थोड़ी बहुत हिन्दी वह भी सीख गयी थी और प्रतिदिन ‘मैदा’(रोटी बनाने के लिए) की भीख माँगती थी। पर मुँह में दांत न होने की वजह से स्पष्ट बोल नहीं पाती थी और इशारों से समझाती थी कि उसे खाने के लिए रोटी चाहिए। वह खुद अपने हाथों से रोटी बनाकर खाएगी। हम उसे भीख देते थे। भीक्षा मांगने पर भीख देना भारतीय परिवारों में बहुत महत्व रखता है। खासकर परोपकार की भावना और पुण्य कमाने की लालसा सबसे अधिक है। पर जो भी हो उस बूढ़ी औरत से हफ्ते में दो बार मिलना हो ही जाता था। उसे देखकर यह कभी पता नहीं चलता था कि वह किसी बड़े घर की औरत रही होगी। पोशाक अरुणाचली और चेहरे पर ज़िन्दगी के थपेड़े और तिरस्कार साफ पता चलते थे। पर स्वाभिमान की भावना भी उतनी ही प्रबल दिखती थी। दो एक घर से उसे जितनी भीख मिलती थी उसके लिए काफी होता था तो वह वापस लौट जाती थी। मेहनती भी बहुत थी। पर बूढ़ी होने के कारण उसे कोई काम पर नहीं रख सकता था।           

             ऐसे ही एक दिन की बात है। पाहाड़ों पर अक्सर बादल ऐसे घूमते नज़र आते हैं जैसे कि वे बादल नहीं बल्कि कोई इन्सान हो। धीरे-धीरे बादलों के झुण्ड को चीरते हुए लकड़ी टेकते हुए बूड़ी अम्मा आ रही थी। उन दिनों खूब बारीश हो रही थी। इसलिए ठण्ड भी बहुत ज्यादा थी। बूड़ी अम्मा के शरीर पर कपड़े तो थे लेकिन वे शायद ठण्ड से बचने के लिए उतने काफी नहीं थे। वह हमारी लाइन में भीख मांगने आयी थी। एक तो ठण्ड उस पर से भूख। कैसी अवस्था होती है यह तो सिर्फ वही समझ सकती थी। वह आकर अपनी अरुणाचली तथा हिन्दी भाषा के मिश्रण में कहने लगी ---“मोइदा-ओइ-दे।” । हम सब भी उन्हें मोइदा-ओइ-दे बूढ़ी ही बुलाते थे। उसकी आवाज़ में भूख की पीढ़ा तथा आर्द्रता थी। हमारे क्वाटर के बायी तरफ जो कि मेन रोड से सटा था उसमें रहने वाली ऑन्टी ने उन्हें खाने के लिए कुछ दिया। फिर शायद उनसे कुछ कहने को हुई लेकिन बूढ़ी अम्मा कुछ न सुनते हुए दुबारा हम सभी के क्वाटर्स के सामने आकर भीख माँग रहीं थीं। जब वह हमारे घर के सामने आयी तो हमने भी अन्नदान दिया। लेकिन मन में न जाने किसी प्रकार का कोई संतोष नहीं हुआ। क्योंकि उन्हें जब भी मैं देखती तो लगता था कि उनके बारे में सबकुछ जान लू। उनका किचमिचाया हुआ चेहरा, दाँत को नाम पर केवल दो ही बचे है, सर पर एक कपड़ा पगड़ी के जैसे बांधे रहती थी। पाहाड़ी स्त्रियों के सिर पर कपड़ा माल ढोने तथा पाहाड़ी ठण्डक से बचने के लिए होता है। परन्तु यही कपड़ा उनकी पोशाक को और भी सुन्दर और विशेष बना देता है। हमारी मोइदा-ओइ-दे की पोशाक भी ऐसी ही थी। बस एक ही फ़र्क था कि कई पुराने मैले-कुचले कपड़े एक साथ पहने रखे थे उन्होंने। पहाड़ी रास्तों पर लगातार चलने की थकावट सबकुछ जैसे उन्हें अंदर से बहुत दुर्बल और दुखी कर रहा था। पर एक चीज़ थी, जब भी कोई उन्हें भीख देता तो वह उसे खुशी से आशीर्वाद जरूर देती। ये सब देखकर कभी-कभी सोचती कि विधाता की यह कैसी लीला है, जिस उम्र में उन्हें घर में आराम से रहना था, वह भिक्षा माँगकर अपना जीवन बिता रही हैं। भारत में वैसे भी भिक्षुको की कमी नहीं है। परन्तु वृद्धावस्था में किसी को भीख माँगते देख कुछ ज्यादा ही अजीब लगता है।

            एक दिन मैंने हमारे पास के क्वाटर के एक अंकल से यू ही इन बूढ़ी अम्मा के बारे में पूछ लिया था। तो पता चला कि आलोंग टाउन के ये कभी सबसे अमीर परिवार से हुआ करती थी। इनके चार-चार बेटे हैं, बड़ा घर है, गाड़ियाँ है। फिर एक दिन इनके पति ने किसी दूसरी महिला से शादी कर ली और इन्हें घर से निकाल दिया था। तब से ये भीख माँगकर अपना जीवन गुज़ार रही है। बस इतना ही पता है उनके बारे में। लेकिन जो भी हो उनको देखे बिना चैन नहीं आता था। हर हफ्ते न सही पर हर महीने का यही क्रम था। पर कभी-कभी सोचती थी कि एक बार कभी मौका मिले तो उन्हें पेट भर कर भोजन करता जरूर देखू। विधाता ने हमें यह मौका भी दिया। हमारी दादी माँ गुज़र चुकी थी। हर साल पिताजी घर पर उनकी बरसी मनाते थे और पूजा करते थे। सिलेठी परिवारों में एक रिवाज यह है कि दादी या नानी का यदि देहान्त हो तो उनके पोते या नाती द्वारा उनके श्राद्ध के समय पर एक छाता देना पड़ता है ताकि दिवंगत को स्वर्ग जाने में कोई कठिनाई न हो। उस दिन घर में जब पूजा हो रही थी तो यही बूड़ी अम्मा संयोग से भीख माँगने आयी। माँ ने उस दिन शुद्ध निरामिश भोजन बनाया था। पूजा लगभग समाप्त होने को आयी थी। हमने बूड़ी अम्मा को रोक लिया। वह भीख माँगने कही और जाना चाहती थी लेकिन हमने उन्हें किसी तरहा अपने घर पर रोक लिया। फिर पूजा समाप्त होते ही उन्हें केले के पत्ते पर भोजन परोसते हैं। उन्होंने इतना सारा भोजन कई शायद दिनों बाद देखा था। शायद इसीलिए वह इतना भोजन नहीं कर पा रही थी। उन्होंने जितना भोजन करना था सो किया लेकिन बाकी का उन्होंने अपनी थैली में भर लेना चाहा था। बेचारी क्या करती? कपड़े की मैली सी थैली में क्या-क्या भरती। फिर हमने किसी तरहा उन्हें कुछ डब्बों में भरकर भोजन बांध दिया। उसके बाद मुझे अचानक खयाल आया कि मेरा एक पुराना सलवार-सूट है जो मैं अब नहीं पहनती। मैंने उन्हें ले जाकर दिया तो उन्होंने उसे तुरंत पहन लिया। अपने बाकी मैले कपड़ों के ऊपर उस पुराने कुर्ते को पहन भी वह बहुत खुश हुई। आलोक ने उन्हें छाता भी दिया। उन्होंने ये सारी चिजे खुशी-खुशी ले ली। उसके बाद वह कई बार हमारे यहाँ भीख माँगने आती रही। शायद उन्हें ये लगता रहा होगा कि हम उन्हें खाने के लिए कुछ-न-कुछ देंगे। पर रोज-रोज हमारे लिए भी यह सम्भव नहीं हो पाता था। क्योंकि हम सभी घर से बाहर रहते थे और माँ घर के काम में व्यस्त या फिर क्वाटर के पीछे बने बागान में सब्जियों के पौधों में पानी डाल रही होती थी। इसलिए जब सम्भव होता उन्हें खाने के लिए हर रोज कोई-न-कोई  कुछ-न-कुछ ज़रूर दे देता था।  पर बहुत दिनों तक ये सिलसिला भी नहीं चला। दादी माँ की बरसी वाले दिन के बाद कुछ दिनों तक वे दिखी पर उसके बाद फिर वे हमें नहीं दिखी। विधाता जाने क्या हुआ? हमारी मोइदा-ओइ-दे बूढ़ी से दुबारा मुलाकात नहीं हुई। पर दादी माँ की बरसी के दिन जो अच्छे से मिले थे उतना आज तक याद है। 

            ये समृति कथा 1999-2000 के समय की है। अतः प्रकृति के नियम के अनुसार शायद वह अब इस लोक में नहीं है। प्रार्थना करती हूँ कि जहाँ भी वह रहे ईश्वर उनको शान्ति दे।

Saturday, 18 April 2020

पिता को समर्पित


मैं पिता हूँ

संतान की मंगल कामना में

रात-दिन न, थकने वाला,

न रुकने वाला,

निशब्द, निर्विकार,

चलने वाला प्राणी हूँ।



एक हँसी संतान की जो

मन को तृप्ति से भर दे

एक परिचय जो संतान से मिले

उसी की आशा में जीवन बिता दे

हाँ मैं वही पिता हूँ।



मेरी घड़ी चल जाती है

बरसों तक

मेरे कपड़े नए हो जाते है

हर महिने

मेरे जूते चल जाते हैं

हर महिने

हाँ मैं वही पिता हूँ।



बिटियाँ के रसोई के खिलौने से

पेट भर जाता है मेरा

बेटे की टॉय साईकिल से

दुनियाँ घूम लेता हूँ।

मेरे नाम कई है

बाबा, अप्पा, देवता

पप्पा, बाबू, डेडी, डूड

हाँ मैं वही पिता हूँ।



बेटे की इच्छाओं का

मैं आकाश हूँ

बिटियाँ के सुख का

मैं प्रकाश हूँ

हाँ मैं वही पिता हूँ।



जब माँ न हो पास

तो मैं ममता हूँ

जब दादी न हो पास

तो मैं रस भरी कथा हूँ

जब दादा न हो पास

तो मैं कंधे की सवारी हूँ

हाँ मैं वही पिता हूँ।



जग में माँ का स्थान

कोई न ले पाएगा।

लेकिन यह भी सच है कि

पिता न कोई यू ही बन जाएगा।

मैं निरन्तर तपने वाला

एक तपस्वी हूँ

हाँ मैं पिता हूँ।


Saturday, 4 April 2020

माहामारी नहीं नयी शुरूआत


सुन रे मानव

ये वक्त की पुकार है

ये धरती लगा रही

तुझे कब से गुहार है



तू सोचता होगा

ऐसा आज क्या हो गया?

क्यों घर पर तू कैद है,

क्या गुनाह तुझसे हो गया?



तो सुन क्या कहती है

ये धरती...

एक सुन्दर सा खज़ाना दिया था

धरती ने तुझे

एक हरा-भरा जमाना दिया था

धरती ने तुझे

खुद की तरक्की के लिए जो चाहे तू ले ले

धरती से सब दिया, सारे तकलीफ झेले



मगर तू स्वार्थ में अंधा हो

इन्सान की जगह असुर बना

हदे सारी पार कर दी

धरती के लिए नासूर बना





एक वक्त आया ऐसा कि

स्वार्थ में तू बना इतना अंधा

धरती का विनाश ही

बन गया था तेरा धंधा।



ये धरती जो तेरी माँ है,

आखिर कब तक सहती रहती

तू क्या सोचे

वह कभी कुछ तुझे न कहती?



आज बारी आयी है उसकी

जो तू भूल गया था कि

इसमें मनुष्य के अलावा भी रहते हैं

प्राणी और कई

याद दिलाने आयी है उनकी।



पर तू घबरा मत

ये न सोच कि खत्म हो जाएगा

अब तेरा सबकुछ

बल्कि खत्म होगा सिर्फ

तेरा स्वार्थ

तेरा लालच

तेरी ईर्ष्या

तेरा क्रोध



मत भूल कि इसी धरती में

एक बीज को भी टूटना पड़ता है

मिट्टी में मिलना पड़ता है

तभी नया रूप वह धारण कर पाता है



यही धरती आज समझाने आयी है

महामारी नहीं ये नयी शुरूआत है

घर पर बैठ कर अब सोचना जरा गौर से

धरती भी गुज़री है तेरी चाहतो के दौर से



अब कुछ पल ठहर जा

सब होगा ठीक इस बार

अंधेरा मिटेगा

आएगी नयी सुबहा बहार



पर वादा कर

तू न भूलेगा इस सीख को

लेकर चलेगा साथ

धरती के हर प्राणी को



काट मत पेड़ो को

पर काट अपने स्वार्थ को

गंदा न कर नदी को

साफ रख अपने मन को

बंजर ज़मी दिखे तो

लालच न करना

हो सके तो मानवता का मंदिर

उसमें बनाना।


Tuesday, 31 March 2020

तुम समझे नहीं

हँसते रहे मुझ पर तुम हर बार
जब से जताया मैंने अपना प्यार।
तुम समझे नहीं मेरे दिल की पुकार
दुतकारते रहे तुम मुझे प्यार से बार-बार।

बातें हर रोज हुआ करती थी हममें,
तुम सुनाते थे अपनी परेशानियाँ,
तुम्हारी परेशानियाँ सुन मुझे दुख होता था,
सोचती थी कैसे दूर करु तुम्हारी मुश्किलें,
तुम्हारी हँसी, तुम्हारी खुशी मेरे लिए सब कुछ था,
तुम्हारा दुखी चेहरा मुझे कभी न भाता था।

क्या करके तुम्हें सुख दे सकू,
ये सोचकर कितनी रातें गवाई।
क्या करके तुम्हें पा सकू,
ये सोचकर इबादतों में मंदिर गई।

जब भी कोई और तुम्हारे साथ होती थी,
मैं जलती, परेशान होती, कष्ट पाती थी।
तुम चिढ़ाते थे मुझे ऐसा देखकर,
फिर भी अपनी कुढ़न न दिखाती थी,
क्या पता तुम नाराज़ हो जाओ?

तुम्हें तारीफ पसंद नहीं है अपनी,
न मेरी, न किसी और की,
तुम्हें बनावटीपन नहीं भाता,
तुम कहते थे।
पर तुमने बनावटी दुख और परेशानी,
बयां की मेरे सामने,
गवां बनाया अपनी हर चालाकी का,
मज़ाक बनाया मेरा दुनिया के सामने।
स्वीकार न किया मेरी अस्मिता को कभी,
तुम्हारे बहकावे में मैं बह चली,
और किया वही जो न करना था कभी।

आज तुम सुखी हो,
और मैं तिल-तिल कर मर रही हूँ,
रोज सवेरे उठती हूँ,
ये सोचकर कि नहीं रोऊँगी,
लेकिन जब भी याद आती है,
उन लम्हों की जो बीते थे साथ-साथ,
रोना आता है मुझे,
रोना आता है मुझे,
हँसना भूल गयी हूँ,
तुम समझे नहीं कभी-भी मुझे,
कितना प्यार था इस दिल में तुम्हारे लिए।

Sunday, 21 July 2019

कुलवन्त सिंह की कविताएँ।




             हिन्दी साहित्य के विकास के बाद से आधुनिक युग में कई कवियों का उद्भव हुआ जिन्होंने आज तक अपनी अभूतपूर्व रचनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। वर्तमान युग में हिन्दी के नये कवियों का जन्म हो रहा है जिनकी कविताओं में पुराने काव्यशास्त्रीय गुणों के साथ-साथ नये कलेवर से साथ दिखते हैं। साथ-ही-साथ आधुनिक युग के समय के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पहलुओं को लेकर कवियों की विचारधारा भी हिन्दी काव्य जगत् को प्रभावित कर रही है। ऐसे ही एक कवि है कवि कुलवन्त सिंह।

            कवि कुलवन्त सिंह भाभा अटोमिक रिसर्च सेन्टर में कार्यरत वैज्ञानिक है। साधारणतः वैज्ञानिकों के प्रति आम लोगों की यह सोच होती है कि वे लोग केवल विज्ञान की दुनियाँ में सिमट कर रह जाते हैं, उनका वास्विक संसार से भी यदि नाता है तो भी उसके सांस्कृतिक पक्ष से दूर ही रहते होंगे। परन्तु यह सत्य नहीं है। वस्तुतः देखा जाए तो वैज्ञानिक ही होते हैं जो वास्तव में संसार के सृजनात्मक पक्ष की ओर अधिक रुचि रखते हैं। सृजन जहाँ होता है वहाँ एक तरफा सृजन नहीं होता बल्कि वहाँ उसका सामुहिक विकास भी होता है। उसी के साथ उसकी संस्कृति भी विकसित होती है जिसका एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है साहित्य। साहित्य समाज की पूरी छवि को अपने में समेट कर हमारे सामने उसके सार रूप में पेश करती है। साहित्य हमारे मानव समाज के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके साथ जो भी जुड़ता है वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समाज के हर पक्ष से जुड़ जाता है। कवि कुलवन्त सिंह जी की रचना में उपरोक्त सभी विशेषताएँ पायी जाती है। उसकी रचनाओं की सुन्दरता ऐसी है कि लगता ही नहीं है कि वे केवल वैज्ञानिक है बल्कि उसकी रचनाशीलता में एक उत्कृष्ट कवि के सारे तत्व मौजूद है।

            इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार है – निकुंज, चिरंतन, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, बाल-गीत इन्द्रधनुष। इनकी कविताओं में नीति सम्बन्धी बातें भी है तो छायावादी कविताओं की विचारधारा भी है। इन्होंने दोहों में भी रचनाएँ लिखी है तो मुक्त छन्द में भी कविताएँ लिखी है। सबसे पहले इनकी निकुंज की बात की जाए तो उनकी सबसे पहली कविता आत्मज्ञान मानव समाज के सामने एक सच्चा आदर्श प्रस्तुत करती है। कविता के बोल कुछ इस प्रकार है –

                        मिटाकर अहंकार

                        करो परोपकार

                        मिथ्या है संसार

                        सत्य है परमार्थ1

            इस कविता में अहंकार को मिटाकर परोपकार की ओर अग्रसर होने की बात कही गयी है। यह संसार मिथ्या है पर परमार्थ सत्य है। वैसे देखा जाए तो उपरोक्त कथन पहले थोड़ा असमंजस में डाल देती है फिर बार-बार पढ़ा जाए तो इसका गूढ़ अर्थ निकलकर यह आता है कि जहाँ अहंकार है वहाँ संसार मिथ्या है पर जहाँ अहंकार मिटाकर परमार्थ की ओर चले तो वही संसार सत्य दिखाई देता है। वस्तुतः कवि यह बताना चाहते हैं कि अहंकार के कारण व्यक्ति प्रायः यह भूल जाता है कि एक दिन प्रकृति के विधि के फेर में पड़कर उसका अहंकार अपने-आप ही टूट जाएगा। फिर इस अहंकार को व्यर्थ में पाल कर रखना क्यों? कवि आगे अपनी कविता में कहते हैं कि हमें अपने अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करना चाहिए। जब व्यक्ति का अज्ञान दूर होगा तब हम अच्छे कर्म कर सकेंगे। नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर सकेंगे। हमारे कर्म ही हमारे समाज की सेवा होगी। तभी कवि जीवन के सेवा के अर्थ मानते हैं। मन के सारे विकार, लोभ तथा स्वार्थ को दूर करके परमात्मा से एक हो जाना ही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। वस्तुतः यह कविता नीतिपरक पढ़ने में लगती है परन्तु इसके गूढ़ अर्थ में मानवतावादी मूल्य छिपा हुआ है। मानवतावादी मूल्यों का होना ही हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा वरदान है जो आज के व्यस्त समय में लोग भूल चुके हैं। कवि उसी बात को लोगों के सामने रख रहे हैं।

            उसी प्रकार उनकी एक ओर कविता है नमन इस कविता की भावना देशप्रेम से भरी हुई है। कवि ने कविता के प्रत्येक छन्द में भारतवर्ष की एक-एक खूबी को उजागर किया है। देश की संस्कृति उसके वैभव तथा वेद-वेदांत की, संतों एवं महापुरूषों की, साहित्यिक समृद्धि की, देवतुल्य नदियों के परम्परा की, रणभूमि में पराक्रम दिखाने वाले वीरों की, भारत को आज़ाद करने के लिए अपना बलिदान देने वाले महान बलिदानियों आदि सभी का गुणगान करती हुई यह कविता एक ही धारा में भारत के सम्पूर्ण स्वर्णिम इतिहास को हमारे सामने लाकर रख देती है। कविता की भाषा जितनी सरल है, भाव उतने ही सुन्दर तथा देशप्रेम की भावना को जन-जन तक सम्प्रेषित करनी की क्षमता रखती है। इस कविता की शब्द-शक्ति उस प्रसिद्ध उक्ति को सिद्ध करती है जिसमें रीतिकालीन आचार्य देव कहते थे कि अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणालीन, अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन।2 वस्तुतः शब्दों के प्रयोग पर ही कविता के भावनाओं तथा सौन्दर्य निर्भर करता है। छन्दों का मिलना जितना जरूरी होता है उतना ही छन्दों के मध्य भाव का बना रहना भी उतना ही महत्व रखता है। अपनी कविता माली में फूलों के जरिए नए हिन्दुस्तान के निर्माण की बात कह रहे हैं। यहाँ बहुरंगी पुष्प का अर्थ विभिन्न प्रकार की प्रतिभा वाले लोग। जब समाज में सभी वर्गों लोगों को  फूल की भांति खिलने तथा सुगंध के रूप में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया जाएगा तो जैसे एक बागीचा सुन्दर रंग-बिरंगे फूलों के खिलने से सुन्दर लगता है वैसे ही भारत देश भी सुन्दर और विकसित हो जाएगा। कवि अपनी कविता में माली बनकर वह इस बागीचे को तत्परता से तैयार करना चाहते हैं जहाँ प्रत्येक कुसुम रूपी अधरों पर मुस्कान बिखरी हो, प्रत्येक हृदय में प्रेम, सौहार्द, एकता, उन्नत एवं समृद्ध विचारधारा भरी हो। किसी प्रकार की ईर्ष्या तथा अमंगल की ओर ले जाने वाले विचारधारा कही भी न पनपने पाये। वह एक ऐसे प्रेम के वृक्ष को सींचना चाहते हैं जिसके लिए धरती ही स्वयं माली बन जाए। इसी प्रकार अपनी अगली कविता जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान में उन्होंने भारत देश के वीर जवानों तथा किसानों द्वारा निःस्वार्थ भाव की सेवा को अपनी कविता का विषय बनाकर भारतीय सेना के जवानों तथा किसानों को मान प्रदान किया ही है। साथ ही जय जवान जय किसान के साथ जय विज्ञान को जोड़कर न केवल नए प्रकार का प्रयोग किया बल्कि वैज्ञानिकों के प्रति भी लोगों के मन में सकारात्मक सोच जगे इसका भी प्रयास किया है। भारत देश को आज वास्तव में उपदेश देने वाले योगियों से अधिक कर्म योगियों की आवश्यकता है। जिसका ज़िक्र वे अपनी कविता के अंतिम पंक्तियों में करते हैं। अगली कविता भारत में वर्तमान भारत की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों तथा विषमताओं आदि को कविता में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है –

            फूँकना है यदि देश में प्राण

            बनाना है यदि भारत महान

            जीवन में सबके भरना होगा प्रकाश

            मुट्ठी भर देना होगा सबको आकाश

              X x x x x x x

            महलों की चाह नहीं सबको

            एक छत तो देनी होगी सबको,

            दो वक्त की रोटी खाने को मिल जाये,

            इज़्ज़त से इंसान जी पाये3

            उपरोक्त पंक्तियों में वर्तमान भारत की दशा तथा उसको किस दिशा में ले जाना है इस ओर भी संकेत किया गया है। वर्तमान भारत की दशा और दिशा दोनों की भ्रमात्मक है। एक तरफ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ है जहाँ भारत का संपूर्ण मध्यम वर्गीय परिवार रहता है। परन्तु समाज के अन्य निम्नवर्ग के लोग तथा दरिद्रों की दशा इतनी दयनीय है कि उनके पास रहने के लिए घर नहीं है। विभत्स रूप तो ऐसा है कि बड़े-बड़े शहरों में गगनचुंभी इमारतें है तो वही उसके नीचे, किनारे तथा शहर के किनारे झोपड़ियाँ तथा खप्पर बांधे भी लोग गुज़र-बसर कर रहे हैं। बड़े-बड़े राजनेताओं द्वारा भारत को विश्व की महान शक्ति बना देने की विचारधारा सुनने में जितनी अच्छी लगती है उतनी वास्तविकता में बहुत बुरी और विभत्स लगती है। कुलवन्त सिंह जी वास्तव में वर्तमान भारत की इस छवि को उदासीन लोगों के सामने आइने की तरहा स्पष्ट रूप से दिखा रहे हैं ताकि पाठक समाज को वास्तविकता का बोध हो।

             राष्ट्र, बलिदान, शहीद, अनेकता में एकता, देश के दुश्मन, स्वर्ण जयंती आदि सभी कविताओं में कुलवन्त सिंह जी की राष्ट्रवादी विचारधारा भरी हुई है। वे भारत के इतिहास, उसके स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिए वे अपनी इन कविताओं में देश की महान संस्कृति तथा देश के लिए बलिदान देने वालों को न भुलाकर उनके दिखाए मार्ग पर चलने बात कहते हैं। वास्तव में वर्तमान समय में स्वार्थी राजनैतिज्ञों की वजह से हम केवल सजे-सजाए नेता को याद करते रहे है। परन्तु जो क्रान्तिकारी थे जिन्होंने देश के लिए वास्तव में फाँसी, तोप तथा गोलियों की बौछार को भी हँसते-हँसते झेला है। हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा से शान्त प्रकृति वाली रही है। न तो हम कभी दूसरे देशों में गये उनपर अनाधिकार अपनी सत्ता स्थापित करने। परन्तु सुदूर पश्चिम देश तथा मध्य यूनानी देशों के स्वार्थी तथा नृसंश लुटेरे लोगों ने बार-बार देश पर आक्रमण करके उसके धर्म तथा संस्कृति को नुकसान पहुँचाया। अंत में ब्रिटिश आये जाकर अचानक लोगों में पराधीनता के प्रति स्वाधीनता के भाव जग गये जबकि यह बहुँत पहले होने चाहिए थे। इसके बाद देश ने आजादि के लिए लगातार 1857 से लेकर 1947 तक संघर्ष किया। परन्तु इतना सबकुछ होने के बावजूद आज भारतीय नौजवान तथा सभी अन्य लोग सबकुछ भूल चुके हैं। जिसे कवि कुलवन्त सिंह जी अपनी कविताओं द्वारा याद दिलाना चाहते हैं।

            स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले चुके सेनानियों के परिवार वालों की वर्तमान दशा पर भी उन्होंने कविता लिखी है। कैसी विडम्बना की बात है कि पिता ने जिस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद करने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया वही देश स्वतंत्र होने के बाद उसी स्वतंत्रता सेनानी के आदर्शों को ताक पर रख कर जैसे-तैसे चलने लगा। जिस देश के लोगों ने एक साथ स्वराज के लिए बड़े-बड़े आदर्शों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी वही लोग देश के स्वतंत्र होते ही स्वराज की जगह स्वार्थ के लिए आपस में ही लड़ने लगे। इस बीच वे उन स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार तथा उनके आदर्शों को भूल गए। उन स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की उपेक्षा के कारण उनके परिवार एक प्रकार से बर्बाद ही हो गए। उनके बेटे आज इसी स्वार्थपरता से लड़ रहा है। देश में खराब हुए सिस्टम से लड़ रहा है, भ्रष्टाचार से लड़ रहा है, हार रहा है और अपने देश से प्यार करने की सज़ा उसे उसके अपने ही देश के लोग ही दे रहे हैं –



                                                लड़ता रहा दीवानगी की हद तक,

                                                लोग देख उसे हँसते जब-तब।

                                                साथ देने न आया कोई उसका,

                                                लेकिन वह डटा रहा, जिगर था उसका।

                                                .........

                                                मगर वो अकेला ही था-

                                                हार गया, सब कुछ गंवा कर भी!

                                                इस सिस्टम के आगे उसकी कुछ न चली,

                                                टूट कर बिखर गया, सजा अपनों से मिली।4



            वास्तव में ही इस देश की यह हालत देख कर लगता है कि देश को आज़ाद जिस स्वराज के लिए करवाया गया था वह तो केवल कुछ लोगों के लिए ही पूर्ण हुआ है। केवल नाम के लिए लोग अपने बहुमूल्य मत देकर नेताओं को चुनते हैं पर वह नेता जनता की सेवा के बदले उन्हें लूट कर, उनपर अत्याचार कर, उन्हीं पर ही अपना शासन जमा कर उसी जनता को गुलाम बनाकर रख दिया है। स्वर्ण जयंती अपने देश के वर्तमान दुर्दशा को दर्शाती हुई कविता है। कवि कुलवन्त जी ने अपनी कविताओं द्वारा देश के पराधीन भारत के समय के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान भारत की परिस्थितियों की बहुत सजीवता है उकेरा है।



            इनकी कविताओं में जिस प्रकार देश के प्रति समर्पित राष्ट्रीय भावना भरी है उसी प्रकार समाज के अन्य पहलुओं के प्रति भी वे इतनी ही तत्परता से चिन्तन करते हैं। एक अच्छे कवि की यही पहचान होती है कि वह न केवल अपने देश के प्रति समर्पित हो बल्कि उस देश के समाज के प्रति भी सजग रहे, तथा समाज की दिशा और दशा में किसी भी प्रकार के परिवर्तन लाने वाले प्रत्येक विचारधाराओं के जन्म देने वाले उन सूत्रों से भी जुड़ा रहे। क्योंकि कवि कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता बल्कि वह पूरे संसार पर अपनी संवेदनशील तथा गहन विचारधारा एवं चिन्तन से परिवर्तन लाने वाला एक प्रेरक होता है। उसकी रचनाएँ उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी की अन्य मानव निर्मित जन-कल्याण में लगी हुई रचनाएँ होती हैं। वह भी एक निर्माता होता है जो कि अपनी रचनाओं में एक अच्छे समाज का निर्माण करता है, अच्छे संसार का निर्माण करता है। कलम, परिवर्तन, आदर्श, मानव-जीवन, खोना और विसंगतियाँ, प्रेरणा, दिशा और लड़ाई  जैसी कविताएँ सामाजिक मुद्दों से जुड़ी कविताएँ है। इन कविताओं ने कवि ने हर प्रकार के पहलुओं पर पाठकों का ध्यानाकर्षित किया है।

            सबसे पहले कलम कविता की बात करते हैं। कलम में कितनी शक्ति होती है इस बात को कविता में उद्धृत किया गया है। कलम से रचित कोई भी सुन्दर रचना किसी की भी दृष्टि बदल सकती है। समाज को प्रेरित करती है। साहित्य का निर्माण कर कलम ही उसे समाज का दर्पण बना देता है। कलम की ताकत से आज तक कई तख्त-ओ-ताज पलट गए हैं। कलम की धार को पहचानने वाला जब भी कलम अपने हाथों में लेता है तो उसमें शक्ति का संचार हो जाता है। इसी कलम से फिर वह नयी सृष्टि की रचना भी कर लेता है तथा फूल भी खिला देता है। लेकिन वर्तमान समय में यही कलम धारण करने वाला पथभ्रष्ट हो गया है। अब उसकी कलम पैसों के लिए सच को झूठ, झूठ को सच बना देता है। चाहे अखबार हो या कोई साहित्यिक रचना यदि लिखने वाला पथभ्रष्ट है तो उसकी रचना भी वैसी ही होगी जो समाज पर बुरा असर करेगी। सत्य ही है कि आज का लेखक पथभ्रष्ट हो रहा है। जो नहीं हुए हैं वे भी देश की भ्रष्ट-सिस्टम के आगे कुछ नहीं कर पा रहे है। ऐसे में कवि अपनी आशा नहीं छोड़ना चाहता है। वह फिर से नयी दिशा की ओर समाज को मोड़ना चाहता है ताकी नए और सुन्दर समाज की रचना हो। उसी प्रकार परिवर्तन कविता में कवि मूल्यों के बदल जाने की बात को लेकर चिन्तित हैं। परिवर्तन संसार का अटल नियम है। जो भी वस्तु इस संसार में जन्म लेती है समयानुसार उसमें परिवर्तन होता ही है। परन्तु यह परिवर्तन सृजनशील होता है। इस परिवर्तन को कोई रोक नहीं सका है आज तक। इसके महत्व को सभी ऋषियों ने भी स्वीकार किया है। लेकिन कुछ चीज़ों में परिवर्तन नहीं होता जो हमारी अनमोल धरोहर है जैसे धरती, आकाश, सूरज, चांद तारे इत्यादि। इनमें भी परिवर्तन होता है, केवल प्राकृतिक परिवर्तन जो हमारे जीवन तथा पालन-पोषण के लिए जरूरी होता है। उनका परिवर्तन सृष्टि की आवश्यकता के लिए होता है। पर मनुष्य के मूल्यों में परिवर्तन समाज के विकास के लिए यदि हो तो वह परिवर्तन स्वीकार्य हो सकता है। पर आज लोगों के मूल्यों में परिवर्तन केवल स्वार्थ के लिए होने लगा है। जिससे कवि विचलित है। जो मानवतावादी मूल्य थे आज केवल किताबों के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। इसी पर वे प्रश्न चिह्म लगा रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ।

            इसी प्रकार आदर्श कविता में आदर्श के महत्व तथा आदर्श से ईश्वर को पाने की बात करते हैं। मानव-जीवन में संघर्षों से न घबराते हुए आगे बढ़ने की बात कहते हैं। जैसे जीवन में नैतिक मूल्य जीवन का आधार होते हैं उसी प्रकार संघर्ष भी जीवन का आधार है। क्योंकि संघर्ष से मनुष्य का जीवन निखरता है। जिसमें मूल्य होते हैं वही विश्व में शांति को पा सकता है। जो कर्तव्यनिष्ठ होकर कर्म करता है वह अपने जीवन से अवनति तथा पतन को मिटा देता है। जिसमें जीवन दर्शन है उसमें नैसर्गिक प्रेम जग जाता है तथा सामाजिक मूल्यों द्वारा वह समाज में भाई-चारा फैलाता है। वास्तव में कवि यहाँ यह दर्शा रहे हैं कि जीवन में प्रेम, भाई-चारा, कर्तव्यनिष्ठा तथा मूल्यों का होना बहुत जरूरी है। उसी प्रकार आगे वह कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में ईश्वर बसता है परन्तु हम उसे बाहर ढूँढते है। हमें केवल अपने अंतर्मन में झांक ले तो सबकुछ मिल जाता है। उनका मानना है कि मानव अनुभूति, भावना, कला, प्रेम आदि से ओत-प्रोत है पर सारी भावनाएँ गौण रूप में पड़ी हुई है क्योंकि उसे रोजी-रोटी कमाने की पड़ी है। वास्तव में इनकी यह कविता मानव जीवन के वास्तविक स्वरूप को दर्शाती है। जीवन में मनुष्य को कई प्रकार के संघर्ष करना पड़ता है, उसकी मन की मासूमियत, कोमल भावनाएँ कई बार जीवन के इस संघर्ष में बार-बार आहत होते रहता है। कठिन-से-कठिन परिस्थितियों तथा घटनाओं के कारण वह भी एक प्रकार से प्रायः कठोर सा हो जाता है। वह रोजी-रोटी की तलाश में अपने-आप को खो ही बैठता है। इसीलिए कवि चाहता है कि लोग अपने भीतर बसे ईश्वर को पहचाने तथा सुख पूर्वक जीवन जिए। उनकी आगे की कविता खोना इसी बात की ओर ईशारा करती है कि आज के समय में मनुष्य अपने जीवन से कितने बहुमूल्य चीज़ों को खोता जा रहा है जिसके कारण उसके जीवन से खुशहाली चली गयी है। दुबारा इन चीजों को प्राप्त करना भी हमारा अधिकार है ताकि हम अपने जीवन को फिर से खुलशहाल कर सके। तभी अपनी इस कविता की अंतिम पंक्तियों में वह कहते हैं –

            खुशहाली बिखेरें चारों ओर

            हर पुष्प पल्लवित हो,

            आये नित नयी भोर।5



            कवि कुलवन्त जी की निकुंज में रचित हर कविता में कवि की आशावादी दृष्टिकोण झलकती है। यही तो एक सच्चे मानव की पहचान है। वस्तुतः जीवन में आशा का संचार यदि न हो तो मनुष्य कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता है। उसे आगे बढ़ने के लिए जितना संघर्ष करना पड़ता है, कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, उतना ही आशा वादी होकर भी रहना पड़ता है। आशा की नयी किरण उसे सदा सही रास्ता दिखाती है। तथा साहित्यकार की रचना में यदि आशा हो तो वह पाठकों को भी नया रास्ता दिखाता है। उसके जीवन को आलोकित करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कवि कुलवन्त जी वर्तमान युग के उन आशावादी तथा मानवीय मूल्यों से भरे कवि है जो कि समाज की आज इस विषम परिस्थिति में भी आशा की किरण दिखाकर उसे उन्नति के पथ की ओर ले जाना चाहते हैं।





संदर्भ ग्रन्थ

1 निकुंज काव्य संग्रह- कुलवंत सिंह, 2010, अहंकार कविता, पृ.सं-16


3. निकुंज, वही, पृ.सं- 22 भारत कविता

4. वही, पृ.सं- 27 देश के दुश्मन कविता

5 वही, पृ,लं –35 खोना कविता