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Saturday, 11 March 2017

जालपा का चरित्र चित्रण

जालपा उपन्यास की नायिका है। उपन्यास के अन्य पात्रों की तुलना में वह उपन्यास में प्रमुख स्थान रखती है। वह उपन्यास का केन्द्र-बिंदु है और घटनाओं का विकास उसी के चरित्र के कारण होता है। जालपा का बचपन तथा प्रयाग का गृहस्थ-जीवन दुर्बलताओं से भरा पड़ा है। वह नारी की अनेक दुर्बलताओं से युक्त है, लेकिन रमानाथ के प्रयाग से जाने के बाद उसमें प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, साहस, बुद्धि, कौशल आदि अनेक गुणों का श्रीगणेश होता है। जालपा के प्रारंभिक चरित्र को देखकर कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता कि यह नारी इतनी कुशल, साहसी एवं क्षमता से युक्त हो जायेगी। वस्तुतः उसका चरित्र दुर्गुणों एवं दुर्बलताओं से गुणों एवं सफलता की ओर उन्मुख होता है। उसके चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार है।

1) आभूषण-प्रियता -- जालपा के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी आभूषण-प्रियता है। माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण वह बचपन से ही आभूषणों में पलती है। उसके पिता दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते तो जालपा के लिए कोई-न-कोई आभूषण अवश्य लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से भी अधिक प्रसन्न हो सकती है। गुड़िया और खिलौने को वह व्यर्थ समझते थे। जालपा अपनी माँ का चन्द्रहार देखकर हट करने लगती है। उसकी माँ उसे समझाती है कि उसके ससुराल से चन्द्रहार आयेगा। परन्तु सात साल बाद जब उसका विवाह होता है तो उसकी ससुराल से चन्द्रहार नहीं आता। वह इस बात से अत्यंत दुखी हो जाती है। उसे ऐसा लगता है कि उसकी देह में एक बूँद रक्त नहीं है। चन्द्रहार न मिलने पर वह दुखी होकर बाकी के गहने भी नहीं पहनती है। गहनों के चोरी हो जाने पर वह पूरी तरहा से टूट जाती है और सबसे हँसना-बोलना, खाना-पिना सब छोड़ देती है। रमानाथ  उसके दुख को देखकर उधार के गहने बनवा देने की बात करती है। जालपा अपने झूठ-मूठ के संयम को बनाए रखती है लेकिन अवसर मिलने पर तानों द्वारा गहने न होने का दुख प्रकट करती है। जालपा के आभूषण प्रियता के कारण ही रमानाथ कर्ज में डूब जाता है और दफ्तर के पैसों से ही कर्ज उतारने की बेवकूफी करने की सोचता है। बाद में यही कारण बनता है उसके प्रयाग से भाग जाने का। जालपा रमानाथ के प्रयाग छोड़कर अचानक चले जाने पर बदल सी जाती है। उसे अपनी भूल का एहसास होता है। वह अपनी सहेली रतन के पास अपना जड़ाउ कंगन बेचकर रमानाथ के ऊपर लगे गबन के इलजाम को मिटा देती है।

2) स्वाभिमान की भावना -- जालपा के चरित्र में स्वाभिमान की भावना देखी जा सकती है। जब जालपा के सारे गहने चोरी हो जाते है और उसके माता-पिता को पता चलता है कि जालपा चन्द्रहार न मिलने पर दुखी है और सबसे दूर-दूर रहती है तो उसकी माँ अपना चन्द्रहार पार्सल करके भेज देती है। लेकिन जालपा यह हार स्वीकार नहीं करती, क्योंकि वह किसी का एहसान नहीं लेना चाहती थी। वह अपनी माँ को दिखा देना चाहती थी कि वह गहनों की भूखी नहीं है। दूसरी बार उसका स्वाभिमान तब जागता है जब वह रमानाथ को लेने कलकत्ता पहुँचती है और उसे पता चलता है कि रमानाथ ने अपने स्वार्थ-सिद्ध के लिए कई सारे निर्दोष लोगों के खिलाफ अदालत में गवाही दी है। उसे यह बिलकुल स्वीकार नहीं था कि रमानाथ किसी निर्दोष को सजा दिलवाकर धन और वैभव हासिल करे और जालपा को गहने बनवा कर दे। वह रमानाथ को बहुत समझाने का प्रयास करती है और उसकी कायरता पर उसे फटकारती भी है।

3) बुद्धि-संपन्न और प्रभावशाली व्यक्तित्व -- जालपा अपने समाज तथा काल के मुकाबले बहुत बुद्धिशाली तथा प्रभावशाली थी। जहाँ अन्य स्त्रियाँ घर की चार दिवारी के अंदर सीमित थी वही जालपा रमानाथ के  नौकरी लगते ही अपने आस-पास की स्त्रियों में अपना प्रभाव जमा लेती है। सिर्फ इतना ही नहीं जब रमानाथ प्रयाग छोड़कर चला जाता है तो उसे ढूँढने का अनोखा तरीका निकाल लेती है। वह शतरंज की पहेली अखबार में प्रकाशित कराकर पति को खोज निकालने की योजना बना लेती है। वह इसमें सफल भी होती है। अपनी चतुराई से रमानाथ पर लगे गबन के इलजाम को भी मिटा देती है। 


4) सद् गुणों की मूर्ति -- जालपा में कुछ अच्छे गुण कूट-कूट भरे है। जब वह कलकत्ता पहुँचती है तो वह रमानाथ के झूट तथा कायरता के लिए उसे खूब फटकारती है। वह अपने-आप को खतरें में डालकर भी रमानाथ को इस गलत काम को करने से रोकने की कोशिश करती है। वह उस सभी तथा कथित डाकूओं की खोज-खबर निकाल लेती है जिनको रमानाथ की झूटी गवाही द्वारा फाँसी की सजा तथा जेल हो जाती है। वह दिनेश नामक स्कूल-मास्टर की सेवा करने लग जाती है। जालपा को यह बिलकुल स्वीकार नहीं था कि किसी के खून से अपने आराम का महल तैयार हो। वह अंत तक अपने सद्-व्यवहार से सबका मन मोह लेती है। रतन के पति का जब देहांत हो जाता है और उसका भतिजा मणिभूषण उसकी सारी जायदाद छल से अपने नाम कर लेता है तब जालपा ही रतन का साथ देती है। जालपा के सद् गुण देख कर जोहरा बाई भी अपने-आप को बदल लेती है जो कि एक वेश्या थी और केवल भोग-विलास का ही जीवन उसे पसन्द था।

इस प्रकार हम देख सकते है कि जालपा का चरित्र उपन्यास के सभी पात्रों से श्रेष्ठ। वह एक देशभक्त नारी है। देश के खिलाफ जाने वालों से वह घृणा करती है। आभूषण-प्रियता उसके चरित्र में पायी जाती है लेकिन जब परिस्थितियाँ बदल जाती है तो वह भी अपनी कमजोरियों को दूर करने की कोशिश करती है। वस्तुतः जालपा का स्वाभाविक श्रृंगार-प्रेम, परंपरागत रीति -रीवाजों को तोड़कर स्वतंत्र चिंतन की क्षमता, विशाल हृदयता, देशभक्ति व मानव-प्रेम की भावना, त्याग करने की अपार शक्ति उसे भारतीय नारी के नए रूप का प्रतीक बना देते हैं।

Wednesday, 25 January 2017

संदर्भ सहित व्याख्या

नाटक उस वक्त पास होता है जब रसिक समाज उसे पसंद कर लेता है। बारात का नाटक उस वक्त होता है जब राह चलते आदमी उसे पसंद कर लेते हैं। दयानाथ का भी नाटक पास हो गया।

प्रसंग :- प्रस्तुत गद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक गबन उपन्यास से लिया गया है। इसके लेखक प्रेमचन्द जी है। इस प्रसंग में प्रेमचन्द ने दिखाया है कि कैसे मध्यमवर्गीय परिवार लोगों में बाहर वाले क्या कहेंगे इसकी चिन्ता सताती रहती है। शादी-ब्याह जैसे मौके पर यदि कोई कमि रह जाए तो जैसे उनके लिए संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रमानाथ की शादी जालपा से तय हो चुकी है और अब बारात को ढंग से सजाकर न ले जाने का भय रमानाथ और दयानाथ दोनों से ही आय से अधिक खर्च करवा लेता है जिसका उन्हें बाद में फल भुगतना पड़ता है।

व्याख्या:- प्रस्तुत गद्यांश में प्रेमचन्द ने उस समय का वर्णन किया है जब रमानाथ का विवाह जालपा से तय हो जाता है। टीके में एक हजार की रकम समधी से पाकर-मितव्ययी तथा आर्दशवादी दयानाथ अपने आदर्शों पर टिक नहीं पाते और अपनी आय से अधिक व्यय कर देते हैं। वह भी मध्यवर्गीय-कुसंस्कार से जकड़े हुए, पात्र हैं जिनका विश्वास होता है कि नाटक की सफलता सहृदयों द्वारा उसके पसंद किये जाने में निहित होती है। नाटक की उत्कृष्टता की परख चाार-पाँच घंटों में होती है। पर बारात की उत्कृष्टता या निकृष्टता का पारखी मार्ग चलती भीड़ होती है जिसे वास्तविकता से नहीं वरन् बाह्य चमक-दमक से ही मतलब होता है। जितने मिनटों में बारात के संग-संग चलने वाला तमाशा, आतिशबाजी, भीड़ आदि जनता द्वारा पसंद किए जाते हैं तो बाराती अपने को धन्य मानते हैं अन्यथा उनके सारे करे-कराये पर पानी फिर जाता है।

विशेष :- प्रस्तुत संदर्भ में लेखक ने दुःसंस्कार-ग्रस्त मध्यवर्ग पर तीखा व्यंग्य किया है।

Wednesday, 18 January 2017

गबन की आधुनिक प्रासंगिकता


            प्रेमचन्द द्वारा रचित ग़बन उपन्यास में, भारतीय मध्यमवर्ग का यथार्थ चित्रण हुआ है। इस उपन्यास में उसकी सारी कमजोरियों के साथ-साथ उसकी खूबियाँ भी दिखायी देती है। उपन्यास में जितने भी मुख्य पात्र है सभी मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखते है। कुछ अमीर तथा अफसरशाह पात्र भी है जो कथानक के अन्त में आकर उसे रोचक मोड़ देते हुए अन्त तक ले जाते है। इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने शहरी जीवन को विशेषकर तत्कालीन भारत में उभरते मध्यमवर्ग के जीवन को जिस रूप में वर्णित किया है और आज के भारतीय मध्यमवर्ग में काफी कुछ समानताएँ देखने को मिलती है।कथानक की शुरूआत कुछ ऐसे होती है कि मुंशी दीनदयाल अपनी पुत्री जालपा को बचपन से ही खिलौनो की जगह कोई-न-कोई आभूषण लाकर देते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि जालपा इसी से प्रसन्न होगी बाकी सब चीजें व्यर्थ थी। जालपा आभूषणों से ही खेल-खेल कर बड़ी होती है। एक दिन दीनदयाल जालपा की माँ मानकी के लिए चन्द्रहार लेकर आते हैं तो जालपा को वह हार बहुत भा जाता है। वह भी उसी हार के लिए अपने पिता से कहती है तो उसके पिता जल्द लाने का वादा करते हैं परन्तु वह नहीं मानती। तब उसकी माँ कहती है कि ऐसा चन्द्रहार उसकी जब शादी होगी तब उसके ससुराल से आएगा। बाल मन इसी कल्पना को सच मानकर बहल जाता है। जालपा धीरे-धीरे बड़ी हो जाती है और आख़िरकार वह दिन भी आता है जब उसका विवाह दयानाथ के बेटे रमानाथ से तय हो जाती है। जालपा ससुराल वालों की कल्पना करती है कि वे लोग उसके माता-पिता से भी अधिक प्रेम करेंगे, विशेषकर उसे चन्द्रहार बनवाकर देंगे। परन्तु नियती में कुछ और लिखा होता है। दयानाथ एक अलग किस्म के व्यक्ति थे। कचहरी में नौकरी करने के बावजूद भी वह रिश्वत के खिलाफ थे। किसी प्रकार 50 रूपये की मासिक आय से अपने परिवार का पेट पालते थे। वही उनका बेटा रमानाथ कॉलेज में दो महिने पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ देता है। वह आधुनिक रंग-ढंग में डूबा हुआ नौजवान था। सैर-सपाटे, ताश इत्यादि, माँ तथा छोटे भाईयों पर रौब जमाना, दोस्तों की बदौलत शौक पूरा करना उसका काम था। जालपा से विवाह तय हो जाने पर वह अपने दोस्तों और जालपा के गाँव वालों पर प्रभाव डालना चाहता है परन्तु उसके पिता इस बात से साफ इन्कार कर देते है। फिर भी रमानाथ के जोर देने पर धूमधाम से बारात निकाली जाती है। उधर जालपा को ससुराल से चढ़ावे में चन्द्रहार आने की आशा थी जो पूरी नहीं होती है। विवाह के बाद रमानाथ जालपा पर अपने अमीर होने तथा हर प्रकार से सुखी-सम्पन्न होने को झूठ के ताने-बाने को बुनता है। वही दयानाथ पर विवाह में अनुशंगिक खर्चों के कारण कई सारे कर्ज चढ़ जाता है जिसे वह जालपा के गहनों द्वारा चुकाने की सोचते है।  जब जालपा के गहने इसी वजह से गायब हो जाते है तो जालपा शोक में डूब जाती है। वह सोचती रहती है कि जब ये लोग इतने धनी है तो क्यों  नहीं उसके गहने वापस बनवा देते है। जबकि परिवार की हालत कुछ और थी। रमानाथ जालपा से बहुत प्रेम करता था इसलिए वह जालपा के सामने सत्य को छुपाता फिरता था। अंत में रमानाथ नौकरी करके जालपा को गहने बनवा देने की सोचता है और अपने एक परिचित रमेश बाबू की मदद से म्यूनिसिपल बोर्ड में नौकरी कर लेता है। इसके बाद भी रमानाथ झूठ को नहीं छोड़ता, बल्कि वह अपने झूठ में और अधिक फंसता जाता है। वह अपनी आय अधिक बताता है। वह सर्राफ से उधार लेकर जालपा के लिए गहने बनाता है। जालपा भी अब अपने शोक से निकलकर घर तथा बाहर सभी से घुलने मिलने लगती है। इसी दौरान उसकी रतन नामक एक सम्भ्रान्त महिला से होती है। वह एक बड़े और बूढ़े वकील की पत्नी है। रतन को जालपा के जड़ाऊ कंगन बहुत अच्छे लगते है तो वह रमानाथ से इसी प्रकार के कंगन बनवा देने के लिए कहती है और रुपए दे देती है। रमानाथ इन्हीं रुपयों से सर्राफ के कर्जें उतारने तथा वैसे ही एक जोड़ा और कंगन बनवाने को कहता है तो सर्राफ सीधा इन्कार कर देता है। रतन को कंगन नहीं मिलते तो वह अपने रुपये वापस मांगती है। रतन के पैसे लौटाने के चक्कर में रमानाथ चुंगी के रुपये ही जालपा को लाकर दे देता है और जालपा भी अनजाने में वहीं रुपये रतन को दे देती  है। रमानाथ इस घटना से विचलित हो जाता है और उसे भय होने लगता है कि कही उसपर ग़बन करने का इलजाम न लगे। वह सबसे अपनी सारी परेशानी छुपाता फिरता है। अंत में वह एक चिट्ठी लिखकर जालपा को सारी बातें बताना चाहता है लेकिन वह भी उससे नहीं हो पाता। जालपा उसकी चिट्ठी पढ़ लेती है और रमानाथ को लगता है कि सारा भेद खुल जाने पर जालपा उससे घृणा करेगी वह डर से घर छोड़कर कलकत्ता भाग जाता है। वहाँ वह देवीदीन खटिक के यहाँ रहने लगता है। देवीदीन से भी वह अपनी वास्तविकता छुपाता है। उधर जालपा चिट्ठी पढ़कर अपने पति की वास्तविकता को समझ जाती है और अपने-आप को कोसने लगती है कि उसने गहनों का लालच किया ही क्यों था और अपने पति की इज्जत बचाने के लिए अपने सारे गहने रतन को बेचकर दफ्तर का सारा पैसा वापस कर देती है। रमानाथ इधर कलकत्ते में किसी प्रकार छुपकर जीवन बीताने की सोचता है लेकिन वह वहाँ की पुलिस के हाथों शक में उठा लिया जाता है। उससे पहले जालपा शतरंज की एक बाजी को अखबार में छपवाकर इनाम के 50 रुपये के जरिये पता कर लेती है कि रमानाथ कलकत्ते में है। वह उसे वहाँ ढूँढ भी लेती है लेकिन पुलिस के चक्रव्यू में फंसे रमानाथ को बहुत मुश्किल से अपने झूठ तथा वास्तविकता का बोध कराते हुए जालपा उसे छुड़ा पाती है।
            इस प्रकार हम देखते है कि पूरे कथानक में रमानाथ के झूठे रौब तथा उस झूठ से निकलने के लिए एक और झूठ का सहारा लेना ही उसके परिवार के बिखरने का कारण बनता है। आमतौर पर अन्य कई आलोचको में इस उपन्यास में स्त्रियों की आभूषण प्रियता को ही दोष माना है लेकिन ध्यान से यदि इस उपन्यास को पढ़ा जाए तो इसमें जालपा या रतन या किसी भी स्त्री पात्र का उतना दोष नहीं है। स्त्रियों के लिए स्वाभाविक बात होती है गहनों के प्रति उनका आकर्षण। भारतीय स्त्रियों की सुन्दरता की परिकल्पना में कभी भी कोई भी स्त्री बिना आभूषणों के सुन्दर ही नहीं दिखी है। यहाँ तक की सोने के आभूषण न हो तो वह चांदी या पीतल-तांबे के बने आभूषण पहनती है, यह भी न हो तो फूलों के बने आभूषण तो पहनती है। इतिहास में इसके कई उदाहरण दिखेंगे। फिर जालपा को तो बचपन से ही खिलौनो की जगह आभूषण दिये जाते रहे हैं तथा बाल मन में ही यही बातें डाली जाती रही है कि उसके ससुराल से उसके लिए चन्द्रहार आएगा। जालपा अपने पति के इस प्रकार घर छोड़कर चले जाने पर उसे दुख होता है तथा वह अंत में अपने इस लालच पर विजय पाने की ठान लेती है तथा उन सभी चीज़ों से मुक्ति पाने की सोचती है जिसके कारण यह सारी समस्याएँ खड़ी होती है। .....विपत्ती में हमारा मन अंतर्मुखी हो जाता है। जालपा को अब यही शंका होती थी कि ईश्वर ने मेरे पापों का यह दंड दिया है। आखिर रमानाथ किसी का गला दबाकर ही तो रोज रुपये लाते थे। कोई खुशी से तो न दे देता। यह रुपये देखकर वह कितनी खुश होती थी। इन्हीं रुपयों से तो नित्य शौक-श्रृंगार की चीज़ें आती रहती थी। उन वस्तुओं को देखकर अब उसका जी जलता था। यही सारे दुखों की मूल हैं। इन्हीं के लिए तो उसके पति को विदेश जाना पड़ा। वे चीज़ें उसकी आँखों में अब कांटों की तरह गड़ती थीं, उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं।....आख़िर एक दिन उसने इन चीजों को जमा किया- मखमली स्लीपर, रेशमी मोजे, तरह-तरह की बेलें, फीते, पिन, कंघियां, आईनें, कोई कहां तक गिनाए। अच्छा-खासा एक ढेर हो गया। वह इस ढेर को गंगा में डुबा देगी, और अब से एक नये जीवन का सूत्रपात करेगी।[1] इस प्रकार हम देख पाते है कि प्रेमचन्द ने यहाँ पर आकर जालपा की आभूषण तथा अन्य सुख-सुविधा की इच्छाओं पर रोक लगाया है। वैसे भी रमानाथ का घर छोड़कर जाने का कारण जालपा नहीं थी बल्कि रमानाथ का डर ही था जो उसे अपने परिवार से अलग कर देता है। रमानाथ के इस झूठ तथा दिखावे के ताने-बाने को प्रेमचन्द ने उपन्यास के शुरूआत से ही दर्शाया है। उसके विवाह के समय से ही यह सब शुरू हो जाता है यथा दयानाथ दिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझें, रमानाथ उसे परमावश्यक समझता था। बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गांव-भर में शोर मच जाय। पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था। रमानाथ ने मोटर पर जोर दिया। उसके मित्रों ने इसका अनुमोदन किया प्रस्ताव स्वीकृत हो गया... आतिशबाजियां बनवाईं, तो अव्वल दर्जें की। नाच ठीक किया, तो अव्वल दर्जे का, बाजे-गाजे भी अव्वल दर्जो के, दोयम या सोयम का वहां जिक्र ही न था। दयाना उसकी उच्छृंखलता देखकर चिंतित तो हो जाते थे पर कुछ कह न सकते थे। क्या कहते![2]  इसी प्रकार उसकी शादी के बाद भी रमानाथ को उसके झूठ के ताने-बाने तथा होने वाली समस्या का आभास होता रहता है परन्तु वह इसे नहीं त्यागता है। बल्कि वह और भी ज्यादा इसमें उलझता जाता है। जैसे कि सर्राफ से लिए उधार के गहनों का मोल चुकाने की बारी आती है तो दयानाथ सीधे-सीधे जालपा के गहनों को ही वापस लौटाकर उधार खत्म करना चाहते थे लेकिन रमानाथ सोचने पर मजबूर हो जाता है --- रमानाथ ने जवानों के स्वभाव के अनुसार जालपा से खूब जीट उड़ाई थी। खूब बढ़-बढ़कर बातें की थीं। जमींदारी है, उससे कई हजार का नफा है। बैंक में रुपये हैं, उनका सूद आता है। जालपा से अब अगर गहने की बात कही गई, तो रमानाथ को वह पूरा लबाड़िया समझेगी।[3] इसी प्रकार पूरे उपन्यास में रमानाथ के झूठ की परतों पर परत चढ़ती जाती है जिसमें जालपा  की आखों पर भ्रम का पर्दा चढ़ता ही जाता है। यही कारण है कि वह चन्द्रहार की जिद करती है, गहने चोरी हो जाने पर अत्यन्त दुखी हो जाती है। नामवर सिंह प्रेमचन्द के उपन्यासों पर चर्चा करते हुए कहते है कि आमतौर पर लोग कहते है कि गबन उपन्यास आभूषण प्रेम की कहानी है, यानी रमानाथ की बीबी जालपा गहना ज्यादा चाहती है। पूरा उपन्यास आभूषण प्रेम का उपन्यास कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने मध्यवर्गीय नायक रमानाथ की ढुलमुलयकीनी को दिखाते हुए मध्य वर्ग की कमजोरियों की ओर इशारा किया है। शहरी मध्यवर्ग का आदमी, किस तरह हिपोक्रेसी का शिकार होता है। मध्यवर्ग की स्थिति तो यह है कि परिस्थिति के कारण वह बीबी के सामने अपने खानदान की सम्पन्नता दिखाना चाहता है और अन्दर से वह इतना खोखला है कि एक छोटी-सी चीज़ बीबी को नहीं दे सकता है। इन दो स्थितियों के बीच ढुलकता, झूलता हुआ रमानाथ कहा जाता है? इस हद तक जाता है कि देशद्रोही हो जाता है।[4]
            गबन उपन्यास में भारतीय मध्यवर्ग का जो चित्रण हुआ है वह आज के युग में बहुत प्रासंगिक है। आज भी समाज में ऐसे कई लोग मौजूद है जो झूठे दावे के साथ अपना जीवन जीते है। विशेषकर युवा वर्ग में यह प्रवृत्ति अधिक नज़र आने लगी है। रमानाथ की ही भांति आज के युवा वर्ग आधुनिक भौतिक सुख-सुविधाओं को बाकी चीज़ों से अधिक महत्त्व देते है। सच्चाई, ईमानदारी, मेहनत, सरलता से कही अधिक अन्यों के सामने दिखावा करते रहते हैं। यही कारण है कि समाज किसी सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो पा रहा है। प्रेमचन्द ने जिस समय में ग़बन की रचना की थी उस समय भारतीय मध्यवर्ग के उदय का समय था। तभी से ही उनमें यह सारी प्रवृत्तियाँ उभरने लगी थी जो आगे चलकर किस रूप में परिणत होगा, शायद यह बात प्रेमचन्द समझ चुके थे। तभी उन्होंने जहाँ उसकी कमजोरियों को दर्शाया है वही जालपा के जरिए ही उसके सुधार का भी रास्ता दिखाया है कि जैसे जालपा अपने इच्छाओं को भुलाकर अन्त में अपने पति के ही हित के लिए उन क्रान्तिकारी लोगों की सेवा करने को तैयार हो जाती है जिन्हें डाकू बनाकर कलकत्ता पुलिस वाले सज़ा दिलवाने पर तुले हुए थे और जिसमें रमानाथ को झूठा गवाह बनाया जाता है। जालपा की इसी विशेषता को उजागर करते हुए रामदरश मिश्र कहते है कि जालपा में मध्यवर्गीय नारी की युवती सुलभ आकांक्षा ( आभूषण-प्रेम, भोग-विलास की प्रवृत्ति, ऊँचे समाज की नारियों से मिलने-जुलने और उनसे स्पर्धा करने की इच्छा, यानी ऊपरी चमक-दमक को ही जीवन-मूल्य मान लेने की आसक्ति) के साथ नारी की समस्त पीड़ा, अभाव, सत्यनिष्ठा, निश्चयशक्ति, सेवा-त्याग और सहानुभूति है। रमानाथ असत्य से असत्य पर पहुँचता है, जालपा असत्य से सीधे सत्य तक पहुँचती है। उसका मनोबल अधिक जागृत और निर्विकल्प है।[5] प्रेमचन्द ने ऐसा इसलिए दिखाया क्योंकि उन्हें अपने देश से प्रेम था तथा देश का हित, समाज का हित उनके लिए सर्वोपरि रहा है। तथा वह यह भी जानते है कि समाज का प्रत्येक वर्ग यदि सही ढंग से आगे नहीं बढ़ेगा तो देश को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलेगी। मध्यवर्ग एक ऐसा वर्ग है जिसके पास कुछ खोने के लिए भी है तो कुछ पाने के लिए भी है। वह न तो अभिजात्य वर्ग की तरह बेफिक्री के साथ जी सकता है, न ही जो जी में आए कर सकता है जिससे उसके मान-सम्मान में कोई आँच न आए। बल्कि यह वह वर्ग है जिसमें सदा एक भय सा बना रहता है कि जो कुछ भी हो लोगों के सामने बदनामी न हो। इसलिए वह किसी तरहा से घुट-घुट कर जीने पर मजबूर है। वही सर्वहारा वर्ग की तरह भी उसमें कोई गुण नहीं है। सर्वहारा वर्ग ने सदैव ही सारे अत्याचार सहे है। इन अत्याचारों के विरुद्ध उसमें आवाज़ उठाने की भी कोशिश करता रहा क्योंकि वह मध्यवर्ग की तरह खोखली आदर्शवादिता एवं मान-सम्मान के जंजाल में नहीं फंसा हुआ है। परन्तु मध्यवर्ग ऐसा नहीं कर सकता है। उसमें सदैव भय रहता ही है। दूसरी बात यह की पुरुष के मुकाबले स्त्रियों में अधिक मनोबल होता है। वह अपने प्रत्येक प्रकार की परिस्थितियों में भी जीना जानती है, संघर्ष करना जानती है। साथ ही प्रेमचन्द के उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता भी यही रही है कि उनके प्रत्येक नारी पात्र पुरुष पात्रों से कही अधिक सशक्त है। यद्यपि इस उपन्यास के पूरे कथानक के केन्द्र बिन्दु जालपा और रमानाथ ही रहे है परन्तु उपन्यास के दूसरे पात्रों की भी विशेषताओं ने भी इस उपन्यास को प्रासंगिक बनाया है। मुंशी दीनदयाल तथा दयानाथ जैसे व्यक्ति आज भी समाज में मौजूद है। मुंशी दीनदयाल जैसे लोग जो नियमित आय के अलावा भी अन्य प्रकार के स्रोतों से धन लाभ करते है यह बात समाज के लिए कोई नयी नहीं है। आज भी ऐसे कई लोग है जो अपना काम निकलवाने के लिए दफ्तरों के बाबूओं को रिश्वत देते है और अपना काम करवाते है। जमींदार के मुख्तार होने के नाते गाँव के लोगों पर अपनी हुकूमत चलाते है। आज़ादी के बाद भी कई सारे गाँवों में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बावजूद भी ऐसे कई लोग थे जिन्होंने अपनी इसी झूठी साख को बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उसी प्रकार दयानाथ जैसे आदर्शवादी लोग आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। देवीदीन खटिक तथा उसकी पत्नी समाज के निचले तबके का प्रतिनिधित्व करते है। इस उपन्यास में उनकी भूमिका बहुत अच्छे व्यक्ति के रूप में हुई है। जैसे रमानाथ को अपने घर में शरण देना, उसकी देखभाल करना, फिर जब जालपा भी रमानाथ को ढूँढते हुए कलकत्ता पहुँचती है तो देवीदीन उसका भी साथ देता है। यह सारी बातें यही दर्शाता है कि निचले तबको के लोगों में कही अधिक मानवीयता रहती है। जिसके कारण रमानाथ किसी गलत राह में तब तक नहीं जाता जब तक वह पुलिस के जाल में नहीं फँसता। उसी प्रकार रतन का पात्र भी यहाँ बड़ा सशक्त दिखायी देता है। वह धनी परिवार की स्त्री है फिर भी वह जालपा की वास्तविकता जानने पर भी उससे मित्रता बनाए रखती है। हालाकि उपन्यास में उसके साथ हुई त्रासदि को प्रेमचन्द वर्णित करते हुए अनमेल विवाह तथा मध्यवर्ग की धन लोलुपता एवं धोखाधड़ी( रतन के पति वकील साहब के भतीजे द्वारा किया गया धोखा) को भी सामने रखते है। आज भी ऐसे कई सारी घटनाएँ उदाहरण के तौर पर सामने रखे जा सकते है जिसमें अपनों के द्वारा ही अपनों को सम्पत्ति एवं जायदाद के लिए लूटा जाता है। विशेषकर स्त्रियों के साथ ही ऐसा होता है। उनके पति के मृत्यु के बाद सभी उनकी सम्पत्ति के दावेदार के रूप में खड़े हो जाते है। प्रेमचन्द के इस चीज को इस प्रकार उजागर किया है--- जायदाद मेरी जीविका का आधार होगी। इतनी भविष्य-चिंता वह कर ही न सकती थी। उसे इस जायदाद के खरीदने में, उसके संवारने और सजाने में वही आनंद आता था, जो माता अपनी संतान को फलते-फलते देखकर पाती है। उसमें स्वार्थ का भाव न था, केवल अपनेपन का गर्व था, वही ममता थी, पर पति की आंखें बंद होते ही उसके पाले और गोद के खेलाए बालक भी उसकी गोद से छीन लिए गए। उसका उन पर कोई अधिकार नहीं! अगर वह जानती कि एक दिन यह कठिन समस्या उसके सामने आएगी, तो वह चाहे रूपये को लुटा देती या दान कर देती, पर संपत्ति की कील अपनी छाती पर न गाड़ती। पंडितजी की ऐसी कौन बहुत बडी आमदनी थी। क्या गर्मियों में वह शिमले न जा सकती थी? क्या दो-चार और नौकर न रक्खे जा सकते थे? अगर वह गहने ही बनवाती, तो एक-एक मकान के मूल्य का एक-एक गहना बनवा सकती थी, पर उसने इन बातों को कभी उचित सीमा से आगे न बढ़ने दिया। केवल यही स्वप्न देखने के लिए! यही स्वप्न! इसके सिवा और था ही क्या! जो कल उसका था उसकी ओर आज आंखें उठाकर वह देख भी नहीं सकती! कितना महंगा था वह स्वप्न! हां, वह अब अनाथिनी थी। कल तक दूसरों को भीख देती थी, आज उसे ख़ुद भीख मांगनी पड़ेगी। और कोई आश्रय नहीं! पहले भी वह अनाथिनी थी, केवल भ्रम-वश अपने को स्वामिनी समझ रही थी। अब उस भ्रम का सहारा भी नहीं रहा![6] फिर भी रतन ने हार नहीं मानी। अपने भतीजे की आश्रिता होने या उसके द्वारा ठीक किये गए मकान में रहने के बजाए वह जालपा के घर चली जाती है। वहाँ वह उन लोगों की सेवा करते हुए रहना चाहती है ताकी वह मान-सम्मान के साथ जी सके। जालपा के यहाँ रतन के घर के जितने ऐशो-आराम की चीज़ें नहीं थी परन्तु प्रेम एवं आत्मीयता जरूर थी। यही कारण है वह उपन्यास के अंत तक जालपा के परिवार के साथ नज़र आती है।
            प्रेमचन्द ने इस उपन्यास की रचना की पीछे जो भी उद्देश्य रखा है, स्पष्ट है कि वह पाठक वर्ग के सामने यह बात रखना चाहते है कि झूठे दिखावे एवं खोखले विचारों से कुछ हासिल नहीं होता। मध्यवर्ग की समस्याओं को इस उपन्यास के जरिए उजागर करते हुए वह यही दर्शाना चाहते है कि असत्य के साथ जीना बहुत कठीन है बल्कि सत्य को स्वीकार करके जीना ज्यादा आसान है। मध्यवर्ग की यही सबसे बड़ी दुविधा रही है कि वह अपनी वास्तविकता जानता है परन्तु फिर भी उसमें इसे स्वीकार करके चलने की क्षमता कम है।
            अंत में प्रेमचन्द के उपन्यासों में इसी आधुनिकता के कारण आज भी उनके सभी उपन्यासो की प्रासंगिकता बनी हुई है और आगे भी पाठक वर्ग में वह पठनीय बने रहेंगे।

           
           




[1] गबन, प्रेमचन्द, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं113.
[2] गबन, प्रेमचन्द, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं.10.
[3] वही पृ.सं. 16.
[4] प्रेमचन्द- विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता,सम्पादक-मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और रेखा अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2006, अध्याय-3 राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का सन्दर्भ- नामवर सिंह, पृ.सं. 52-53
[5] हिन्दी उपन्यास-एक अन्तर्यात्रा, रामदरश मिश्र, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2008 अध्याय-2-प्रेमचन्द-चुग, पृ.सं. 50.
[6]  गबन, वही, पृ.सं. 193.

Friday, 11 September 2015

मेरा आज..........



 बन्द हो चुकी है किताब सपनों की
थम चुकी है कविता दिल के अरमानों की
रुक चुकी है कलम, रुक गए मेरे हाथ

विचार, विमर्श, कल्पनाएँ
सोच, समझ, सारी कलाएँ
रस,छन्द, अलंकार
सब धरे-के-धरे रह गए है
खो चुकी शक्ति शब्दों की भी
लगता है अब ऐसा,
जैसे लिखी ही नहीं थी कविता कभी

एक वक्त था जब धारा सी बहा करती थी
एक वक्त आज है जहाँ स्रोत ही सूख गया है
पर फिर भी धारा तो धारा है
जब से बही है मार्ग तो बना गयी है
वर्षा के होते ही फिर से बहेगी।

पर वर्षा होगी कब पता नहीं?
जीवन में ऐसा मोड़ आया
जिसकी मधुर कल्पना थी मन में कही
हाथ थाम कर दूर मंजिल तक पहुँचेंगे
आशा थी बड़ी।

हाथ थाम कर ले जा रहा है मुझे
मैं साथ चली जा रही हूँ
पर किस दिशा में
मुझे पता नहीं, पता नहीं, पता नहीं।

Friday, 26 June 2015

विभाजन – साहित्य में ।





            विभाजन-- विश्व-इतिहास में सदियों से भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से अखंड रहनेवाले भारत देश का भारत और पाकस्तान में बंट जाना। यह विभाजन ब्रिटिशों ने साम्प्रदायिक रूप से पहले राजनीतिज्ञों में, फिर आम लोगों में फैला दिया, जिसने विश्व-इतिहास में मानवता के नाम पर सबसे बड़ा कलंक लगाया। इसकी कालिमा अब भी भारत और उसके पड़ोसी मुल्कों में छायी हुई है। इस शब्द ने न केवल दो देशों को, या उसके लोगों को या दो अलग-अलग संस्कृतियों को विभाजित किया है बल्कि इसने सबसे बड़ा विभाजन किया है मनुष्य का उसकी मनुष्यता से।
            इतिहास के पन्नों पर झांककर देखने से सबके सामने सारी सच्चाई आ जाती है परन्तु उसे बार-बार दोहराना या उसकी चर्चा करना अब फ़िज़ूल-सा हो गया है, लेकिन इतिहास को हम नकार नहीं सकते। भारत-पाक-विभाजन विश्व-इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विभाजन रहा है। वैसे तो कई अन्य मुल्कों में भी विभाजन हुए परन्तु उनमें वह बात नहीं थी जिससे कि वह विश्व के लिए कोई त्रासदी ला खड़ा कर दे। हाँ,वहाँ भी दंगे-फसाद हुए, वहाँ भी राजनीतिज्ञों में विवाद हुए लेकिन वे इस हद तक न पहुँच पाये जो भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद हुआ,जिसकी आग में लगभग दो दशकों तक दोनों देश, विशेषकर भारत झुलसता रहा है। और आज भी भारत इस आग में धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। जब तक देश पराधीन था तब तक ब्रिटिश पराधीन भारत के लोगों में साम्प्रदायिक अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देते रहे। हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाने और अलग-अलग करने के लिए वे बहुत कुछ करते रहे। तब कुछ ही गिने-चुने लोग रहे होंगे जिन्होंने जातीय भावना  त्याग कर एक साथ विदेशी ताकत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उनका सपना आज़ाद भारत में सांस लेने का था। किसी ने तब यह नहीं सोचा था कि जो देश संस्कृति, वेश-भूषा, आपसी सद्भाव, प्रेम आदि से जुड़ा हुआ है सहसा यूँ अलग हो जाएगा जिसमें समाज, संस्कृति, धर्म, आर्थिक व्यवस्था सबकुछ जलकर राख हो जाएगा। देश को जब आज़ादी मिली, उसके तुरंत बाद उसे उसका सबसे भयावह परिणाम भी भुगतना पड़ा। इस खोखली स्वतंत्रता ने लोगों को एक पल में इतना अतिधार्मिक बना दिया कि उनके भीतर से धर्म, मानवता, अहिंसा, सत्य आदि प्रत्येक तत्व का नाश हो गया। भारत-पाक-विभाजन न केवल दो देशों का हुआ बल्कि दो अलग-अलग समाज, अलग संस्कृतियों के बीच भी हुआ है। इस विभाजन के वास्तविक रूप को देखा जाए तो समाज को ही सबसे बड़ी क्षति पहुँची है। इस विभाजन की वीभत्सता ने समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी है। पहले सांस्कृतिक दृष्टि से उसके विकास, एकता, उन्नति, श्रेष्ठता पर चोट लगी, उसका बंटवारा हो गया। दूसरे, आर्थिक संरचना पर प्रभाव भी पड़ा। जो आर्थिक स्थिरता धीरे-धीरे भारत में हो रही थी, वह इस विभाजन के कारण बिखर गयी। बसा-बसाया कारोबार आदि सबकुछ लोगों को छोड़कर जाना पड़ा, उनका विस्थापन होने लगा। तीसरे, बंटे हुए देशों के लोग जहाँ संदेह, भय और आतंक में जीने लगे, वहीं लोगों में कट्टरवाद तथा युद्धोन्माद भर गया। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो आज़ाद देश में जीने का सपना भी जो देखा वह सब इस विभाजन से पूरी तरह जर्जर हो गया। कुछ तो पागल तक हो गए जिनमें सबसे अधिक संख्या औरतों की थी। भारत-पाक विभाजन के कारणों, भयावह और वीभत्स रूप तथा उसके दुष्परिणामों के बारे में चर्चा करते हुए डॉ राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक भारत के विभाजन गुनहगार में लिखा है कि आगे हिन्दू-मुस्लिम दंगे ने हो इसलिए देश का विभाजन किया गया और विभाजन से वही इतनी अधिक मात्रा में हुआ जिसे रोकना चाहते कि आदमी बुद्धि और योग्यता से कोई भी निराश हो सकता है। छः लाख औरतें, बच्चे और आदमी मारे गए, अकसर इतना पागलपन हुआ कि लगता था कि हत्यारे लोग हत्या और बलात्कार के नए ढंग अनुभव करना चाह रहे हो। डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उखाड़ दिए गये और उन्हें जीविका व आश्रय के लिए ऐसे क्षेत्रों में जाना पड़ा जहाँ अपनत्व नहीं था।1 आम लोगों ने पहले भी साम्प्रदायिक झगड़े देखे थे। इतिहास में दो अलग-अलग धर्मों तथा संस्कृतियों में युद्ध होते ही रहे हैं लेकिन उसमें संघर्ष के साथ-साथ दो अलग-अलग संस्कृति तथा उसकी भाषा एवं लोगों में मेल-जोल हुआ, कई प्रकार के आदान-प्रदान हुए। परन्तु इस बार के इस संघर्ष में केवल आम लोगों की मासूमियत, उनकी मनुष्यता, उनके आपसी रिश्ते सब कुछ एक झटके में कटकर उनसे अलग हो गए। जब विभाजन के दंगे शुरू हुए तो उस वक्त हर एक आम आदमी अपने तथाकथित धर्म का होकर रह गया। वह इतना कट्टर हो गया कि वह बड़े-से-बड़ा पाप करने लगा। वह लोगों को काटने लगा, औरतों की अस्मत बिगाड़ने लगा, दूसरों के घरों को आग में झोकने लगा, छोड़कर गए लोगों के घरों में अपना अधिकार जमाने लग गया। यह सब कुछ हुआ देश के उत्तर पश्चिमी भाग पंजाब तथा पूर्वी भाग बंगाल में। लाखों की संख्या में न तो हिन्दु मर रहे थे न मुसलमान, बल्कि लोग मर रहे थे। दंगे का विरोध जिसने भी किया वह केवल आम आदमी था जिसका घर, जिसकी ज़िन्दगी, जिसके सारे सम्बन्ध इसमें जल रहे थे, कट रहे थे, मर रहे थे। वास्तविकता कि ओर देखा जाए तो कोई भी इस विभाजन को समझ नहीं पा रहा था, कोई भी नए मुल्क में जाने, वहाँ बसने और अपने पुराने मुल्क को छोड़ने को तैयार भी नहीं था। पर उसे मजबूरन जाना पड़ रहा था। तत्कालीन लोग बस इसलिए दूसरी जगह जा रहे थे क्योंकि उन्हें बस डर था कि कहीं उन्हें दंगाई मार न डालें। आज़ाद देश में जीने के लिए लोग एक समय अपनी बलि देने के लिए तत्पर थे तथा यह सपना देखा था कि प्रत्येक को उसके मौलिक अधिकारों के साथ सम्मान से जीने का अधिकार मिलेगा। कोई किसी पर अत्याचार नहीं करेगा, न किसी को गुलामी के विरोध में मारा जाएगा। सब गुलामी के छूटने के लिए मरने-मारने को तैयार थे, पर आज़ाद भारत ने देखा कि कैसे केवल अपने लिए और अपने तथाकथित धर्म के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे थे। तो वहीं कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें अपने धर्म से अधिक मानवता और मित्रता प्यारी थी। कुछ लोग अलग-अलग धर्म या सम्प्रदाय के होते हुए भी अपने मित्रों तथा उसके परिवार की रक्षा कर रहे थे, क्योंकि वे इस साम्प्रदायिक दंगे के विरुद्ध थे।
            विभाजन ने जहाँ तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक वातावरण को क्षति पहुँचायी है वहीं उसने साहित्य का भी रुख़ अपनी तरफ मोड़ दिया। साहित्य जहाँ नए-नए वादों को लेकर विकसित हो रहा था। हठात् इस नए तूफान ने आकर इसमें जगह ले ली। साहित्य में तब तक यथार्थ आ चुका था। साहित्यकार भी यथार्थवादी बन गया था। फिर वह भी उसी समाज का हिस्सा था जो विभाजन की पीड़ा ढो रहा था। अतः साहित्य में विभाजन के दर्द को महसूस किया जा सकता है। अलग-अलग भाषाओं में लगभग सभी साहित्यकारों ने विभाजन के दर्द, उसकी चीखें, उसकी वीभत्सता को अपने-अपने अंदाज़ में बयान किया है। कहा नहीं जा सकता कि किसमें सबसे अधिक इसकी अभिव्यक्ति हुई है क्योंकि सबपर ही इसका असर बहुत गहरा पड़ा है। कुछ कहानियों में विभाजन तथा उसके बाद की स्थिति कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है कि पढ़ते ही रोना आता है, मन में प्रश्नों की बाढ़ सी आ जाती है।
            खोयी हुई खुशबू में लेखक अफ़जल ने अपनी पूरानी स्मृतियों को कथा में स्थान दिया है। लेखक मुसलमान है परन्तु उनके मित्र तथा उनसे बेटे की तरह प्रेम करने वाले चाचा हिन्दू है। चाचा ने कभी बड़ी मन्नत से पायी हुई एक ऊँची नस्ल की घोड़ी की बच्छी जो उन्हें महाराजा कपूरथला से मिली थी उस पर चढ़ाकर पूरी हवेली में उसे घुमाया था, उसके बाद वह बच्छी मर गयी थी। फिर भी चाचा के माथे पर एक शिकन भी नहीं पड़ी थी। लेखक कहते हैं कि जितना प्यार उनके इस पिता के मुँहबोले भाई ने दिया था उतना प्यार उनके सगे चाचा ने भी उन्हें नहीं दिया था। वह क्यों इतना प्यार करते थे, लेखक कभी समझ नहीं पाए। लेखक ने हिन्दू-मुस्लिम मित्रता का उदाहरण देते हुए कहानी में लिखा कि फिर ऐसी आंधी चली जो इनसान को बेधकर और जमीन को सुनसान बना कर चली गयी। .......। तुमने भरी-पूरी हवेली और भरे हुए घर से, बस दो-चार वस्तुएं लीं, फिर मेरे चाचे, ताये और अब्बा उस गाड़ी को बर्छियों, छवियों और बन्दूकों के पहरे में लेकर चल दिये थे। ............रास्ते में लूटमार, कत्ल, हमले आदि का डर। और, पुल पर पहुँचकर जब मेरे पिता और आपने एक-दूसरे को बांहों में भरा तो दोनों बिलख-बिलखकर रोने लगे। आपको डेरे से, पुल से गुजरते और बार-बार मुड़कर पीछे देखते देखकर मेरे पिता कैसे बच्चों की तरह तड़प-तड़पकर रोये थे! आप आगे बढ़कर भीड़ में खो गये थे पर हम शाम तक क्यों पुल पर खड़े रोते रहे थे? और आखिर आपको खोकर, अपने और आपके उजड़े घरों में वापस लौट आये थे। उस समय मैं आठ साल का था और अब अड़तीस साल का हूं। मैंने कठिन-से-कठिन समय में भी अपने पिता को रोते नहीं देखा था, सिवाय उस दिन के। अब तो बस तुम्हारे नाम पर उनकी आंखें बुझ जाती हैं।2 विभाजन ने दरअसल लोगों से उनकी मित्रता, उनका बचपन सब कुछ छीन लिया। जहाँ इस कहानी में हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात नज़र आती है वही विभाजन के समय लोगों में किस प्रकार भय, आशंका तथा सबकुछ भूलकर कैसे अपनी ज़िन्दगी बचाने की उन्होंने कोशिश की उसको बहुत नाटकीय ढंग से अभिव्यक्त किया है लेखक कोहली ने।
अपनी कहानी बेज़बान में लेखक ने एक मुसाफ़िर के जरिए कथा को प्रस्तुत किया है। पूरी कथा में रेल यात्रा तथा उस यात्रा के दौरान घटित अनेक घटनाओं द्वारा लोगों के विभाजन के समय की दयनीय स्थिति को व्यक्त किया गया है। लेखक हिन्दुस्तान जा रहा है। उसके साथ उसका परिवार था, पर वह पहले ही ट्रेन से शायद कही ओर चले गए थे। लेखक दिल्ली जाने वाली एक ट्रेन में चढ़ गया है। वहाँ एक दम्पती तथा उनके साथ उनके दो बच्चे, एक सम्भ्रान्त परिवार की महिला और उसके दो जुड़वाँ बच्चे तथा आया समेत कई मुसाफिर थे। एक बेज़बान कुत्ता भी था। सफ़र के दौरान कुत्ते की हरकतों से महिला तथा दम्पती में कहा-सुनी होने लगती है। सभी कोई कैम्प से आए हुए थे और अपनी जान बचाने के लिए हिन्दुस्तान भाग रहे थे। दम्पती की एक सात-आठ महिने की बच्ची थी जो बहुत बीमार और प्यासी थी। ट्रेन जब लाहौर से निकली और एक सुनसान जगह पर जाकर रुकी, लोग डर रहे थे कि कही दंगाइयों ने तो ट्रेन को नहीं रोका, कोई हिम्मत करके खिड़की खोलकर भी नहीं देख रहा था। लेकिन रोशन जो उस बच्ची का पिता था पानी लेने के लिए नीचे उतर गया था जिससे सभी घबरा गए थे। बच्ची को पानी पिलाने के बाद वह थोड़ी स्वस्थ हुई थी। अचानक महिला का कुत्ता पानी की बाल्टी में मुँह डाल देता है और पानी को जूठा कर देता है जिसकी वजह से दुबारा दोनों में कहा-सुनी हो जाती है तथा कुत्ते को रोशन पैर से धकेल देता है। अंत में महिला के दोनों बच्चे भी प्यास के कारण थके हुए थे। उन्हें महिला वही जूठा पानी पिलाती है ताकि दिल्ली तक जाते-जाते वह स्वस्थ रहे। यह देखकर ट्रेन के बाकी यात्री भी वही पानी लेकर पीने लगते हैं। लेखक ने जहाँ इस प्रकार की परिस्थिति का वर्णन किया है वहीं लाहौर स्टेशन पर पहुँचने के समय में मुसाफ़िर के मन के भय, आतंक को भी अभिव्यक्ति दी है। मुसाफ़िर लाहौर देखना चाहता था पर उसकी आस कभी पूरी नहीं हुई लेकिन आज लाहौर आया भी है तो वह देख नहीं सकता क्योंकि वही लाहौर  आ रहा है, जिसकी पुरानी तंग गलियों में फँसे लक्षाधिक लोगों को चारों तरफ से घेरकर उनके घरों, मकानों, दुकानों के भीतर जलाया गया था...    वही लाहौर आ रहा है, जिसमें शाह आलमी दरवाजा है, जिसके निकट धू-धू जलते गुरुद्वारे में स्त्रियों-पुरुषों और बच्चों की चीखों को डुबोने के लिए खुशी के शादियाने बजाये गये थे... वही लाहौर आ रहा है, जिसके रेलवे स्टेशन पर आठ बोगियों में भरी लाशों को अमृतसर भेजा गया था और एक डिब्बे के पीछे यह लिख दिया गया था कि यह हमारी तरफ से नेहरू-पटेल को आजादी का तोहफा है...3 लोगों के मन में जो आतंक है वह सच है। यहाँ लेखक ने न केवल आतंक को चित्रित किया है बल्कि विभाजन के समय लोगों के मन में जो युद्धोन्माद था उसे भी उन्होंने स्पष्ट चित्रित किया है। लोग केवल विभाजन से ही इस प्रकार विक्षिप्त हो चुके थे कि बिना किसी दोष के ही एक-दूसरे को मारने लगे।
इसी प्रकार व्यथा का सरगम कहानी में अमृत राय ने विभाजन में तबाह हुई बन्नो की कथा को अभिव्यक्त किया है। वह सरहद के उस पार रहती थी। उसकी कभी शादी हुई थी, उसने भी कभी अपने सुनहले जीवन के सपने बुने थे। लेकिन विभाजन की आंधी ने सबकुछ उजाड़कर रख दिया। यहाँ तक की उसकी अस्मत को भी नहीं बख़्शा। वह अब इतनी दुखी है कि हँसना-रोना भी उसके लिए कष्टदायी हो गया है। बन्नो अब किसी तरह अपनी ज़िन्दगी जी रही है। पर बन्नो में फिर भी एक मानवीयता बची है। जब वह शाम को कुएँ से पानी लेने जाती है तो कुएँ के पास बनी कोठरी से किसी लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आती हैं। वह दूसरे धर्म की लड़की है। कुछ शरणार्थी लड़कों के गिरोह उसे उठा लाए हैं। वे लोग उसके साथ जबरदस्ती कर रहे हैं। बन्नो जब यह दृश्य देखती है तो उसे याद आता है कि उसके साथ भी कभी ऐसा हुआ था और तब उसके मन के जानवर को एक अजीब-सा संतोष मिलता है। पर पलभर में ही वह बदल जाती है, उसे ऐसा लगता है कि वह एक बड़े आईने के सामने खड़ी है और वह लड़की स्वयं बन्नो है और तभी बन्नो अपनी कटार से उस लड़की को मार देती है और स्वयं को भी मार डालती है। कितनी वीभत्सता है इस विभाजन में कि इसमें भले ही दोनों ओर के लोग मारे जाते हैं परन्तु स्त्रियाँ उनके साथ बलात्कार हर हाल में होता है। समाज में अब तक जितनी भी घटनाएँ घटित हुई है उसमें सबसे अधिक स्त्रियों को ही भुगतना पड़ा है। चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय की हों उनके साथ बलात्कार करना जैसे मर्दज़ात का तथाकथित धर्म बन गया है। अमृत राय ने जहाँ स्त्री पर हो रहे अत्याचार को अभिव्यक्त किया है वहीं विभाजन से विस्थापित हुए लोगों की विवशता तथा दयनीय स्थिति को भी चित्रित किया है।धन्यभाग जो दूसरा महायुद्ध हुआ, वर्ना न लड़ाई होती, न मिलिटरी की बारकें बनतीं और न आज मनुष्य की पशुता से भागकर शरण माँगनेवालों को टिकने का कहीं कोई ठिकाना होता! शरणार्थियों को ये बनी-बनायी बारकें यों मिल गयी गोया इन्हीं के लिए बनाई गयी हों। इन्हीं बारकों में अपने घरबार, खेती-किसानी, दुकानदारी से उखड़े हुए लोग अपना सारा सामान लिये-दिये पड़े थे। टीन के बड़े बक्स, मँझोले बक्स, छोटे बक्स, खाटों के पाये-पाटियाँ, सुतली या बाध, सब अलग-अलग मोड़कर रखी हुईं; चटाइयाँ, एकाध बाल्टी, लोटा, थाली, कनस्तर किसी-किसी के पास अपना हुक्का भी। यही उनकी सारी गिरस्ती थी। इसी गिरस्ती के घिरे-बँधे वे इस नई दुनिया में अपने लिए जगह बना रहे थे। बीवियाँ कुएँ से पानी ला रही थीं या रोटी पका रही थीं और बच्चे धूल में सने, कुछ सहमे-सहमे-से खेल रहे थे, लोहता की खाक का मिलान हजारा की खाक से करके यह पता लगा रहे थे कि पशुता के कीटाणु कहाँ ज्यादा हैं और अपने जेहन से उन डरावनी शक्लों को निकालने की कोशिश कर रहे थे, जिन्होंने उनकी नादान जिन्दगी को भी चारों तरफ से डर की रस्सियों से कस दिया था।4
इसी प्रकार चारा काटने की मशीन में उपेंद्रनाथ अश्क ने विस्थापन तथा दूसरों के घरों में कब्जा जमा लेने की एक घटना को व्यंग्यात्मक तरीके से अभिव्यक्त किया है। सरदार लहनासिंह चारा काटने की मशीन बेचा करते थे। विभाजन के समय इस्लामाबाद में मुसलमान भी अपनी जान की सलामती के लिए अपने-अपने घरों को छोड़कर भाग रहे थे। सरदार लहनासिंह की पत्नी ने जब सुना कि और लोग अब छोड़े गए मकानों में कब्जा जमाने लगे हैं तो वह भी उन्हें उकसाने लगी। सरदारनी की बात सुनकर वे भी इस्लामाबाद की गलियों में बढ़िया मकान ढूंढने निकलते हैं। संयोग से उन्हें अपना मित्र गुरदयालसिंह मिल जाता है जो एक मकान पर अपना कब्जा जमाने के लिए ताला तोड़ रहा होता है। लहनासिंह भी गली में एक घर ढूंढ लेते हैं। उस पर अपना कब्जा जमाने के लिए वे अपने साथ लाया बड़ा ताला लगा देते हैं। तभी उन्हें खयाल आया कि यदि वह अपने साथ दो-चार सामान भी लाए होते तो सही था। वह वापस जाकर घर का सामान बैल गाड़ी पर लादकर ले जाने लगते हैं तब उनकी सरदानी भी उनके साथ जाने का अनुरोध करती है। तब लहनासिंह उसे समझाते हैं कि जब और लोगों की औरतें भी वहाँ आकर रहने लगेगी तो वे उसे भी बुला लेंगे, क्योंकि वे यह जानते थे कि दंगे-फसाद में ज्यादातर औरतों को ही सहना पड़ता है इसलिए वे उसे उस गली में तब तक नहीं ले जाना चाहते थे जब तक कि वहाँ रहने लायक परिस्थिति न बने। लेकिन जब वे वहाँ अपना सामान लेकर पहुँचते हैं तब वहाँ और सरदारों के साथ उनकी पत्नियों को देखते है तो उन्हें भी अपनी भूल समझ में आ जाती है। वे तुरन्त अपना सामान नए मकान में रखकर अपनी पत्नी और बच्चों को लेने चलते हैं। जब वे लोग वापस अपने नए मकान में आते हैं तो देखते है कि वहाँ किसी दूसरे सरदार ने कब्जा जमा लिया है तथा उनके सारे सामान सिवाए चारा काटने की मशीन को छोड़कर सबकुछ पर भी कब्जा जमा लिया गया है। वे आगे बढ़कर जब यह कहना चाहते थे कि इस मकान पर उन्होंने कब्जा किया है तो दूसरे सरदार लड़ने पर आ जाते हैं। मजबूरन उन्हें वहाँ से दुबारा अपने पुराने मकान के डेरे पर वापस लौटना पड़ता है और उनके साथ उनकी चारा काटने की मशीन सिर्फ वापस आती है। इस कहानी में लोगों की विवशता, उनके विस्थापन, उनकी उम्मीद भले ही वह दूसरों के घरों की बदौलत ही हो, उनकी मानसिक दशा आदि को अश्क ने बहुत ही नाटकीय ढंग से प्रस्तुत अवश्य किया है किन्तु तत्कालीन समय में यह सब यथार्थ मे हो रहा था।
इसी प्रकार मुबीना या सकीना कहानी में लेखक गुरबख्श सिंह ने विभाजन के समय के भय, आतंक, लोगों के विस्थापन, मित्रों तथा परिजनों से बिछुड़न की कहानी को प्रस्तुत किया है। कहानी के मूल में कासम तथा जीनत नामक एक दम्पती की कथा है जो गाँव के जैलदार हासम अली के बेटे-बहू हैं। जैलदार का मित्र सरदार है। चारों तरफ गाँवों में हमले तथा लूटमार की खबरें उड़ रही थीं। जैलदार को इन बातों पर यकीन नहीं था। वह सोच रहा था कि ये सब अफवाहें हैं लेकिन जब उनके सरदार मित्र ने उन्हें खतरे से आगाह किया तो वे दुखी हो गये। उन्होंने गाँव की बड़े मस्जिद में सभा करवायी और सभी मुसलमानों को गाँव छोड़कर कहीं दूसरी सुरक्षित जगह चले जाने को कहा। लेखक ने यहाँ इस विभाजन से दुखी होते लोगों की मजबूरियों तथा गुस्से को एक छोटे-से क्षण में अभिव्यक्त कर दिया। यथा -- गाँव वापस लौटकर जैलदार ने बड़ी मस्जिद में एक सभा की और गाँव खाली कर देने का निर्णय लिया। सारे गाँव में विलाप होने लगा। रोते-धोते लोगों ने गठड़ियाँ बाँधीं, सिख बच्चों के साथ खेलते बच्चों को डरा-धमकाकर घर वापस लाया गया। किहरू ने शराज की बाँह पकड़ ली, ''नहीं ताई, इसको मैं नहीं जाने दूँगा।'' शराज की माँ ने यह कहते हुए कि इस गाँव से हमारा दाना-पानी उठ गया है, बेटे की बाँह छुड़ा ली।5 जैलदार का बेटा गाँव में रहना चाहता था और वह अपने पिता को समझा रहा था कि वह बाद में हर हाल में सुरक्षित अपनी पत्नी और बच्ची के साथ आ जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है। अंत में उन्हें वहाँ से भागना पड़ता है लेकिन मजबूरन उन्हें अपनी बच्ची मुबीना को छोड़कर भागना पड़ता है। वजह यह है कि यदि बच्ची रो पड़ी तो दंगाई आ जाएंगे और सब-के-सब मारे जाएंगे। विडम्बना की बात है कि ऐसी परिस्थिति के कारण कितने ही बच्चे अपने माता-पिता से बिछड़ गए। उन बिछड़े बच्चों के साथ क्या हुआ होगा या वे अपने माता-पिता से दुबारा मिल भी पाए थे या नहीं? बाद में उनकी बच्ची मुबीना एक चंगड़ दम्पती के हाथ लग जाती है। इधर जीनत अपनी बच्ची के लिए तड़पती रहती है। जब चंगड़ दमपती भी गाँव से निकलकर कैम्प पहुँचते हैं तब किसी तरह जीनत और कासम को अपनी खोयी हुई बच्ची की खबर मिल जाती है। लेकिन चंगड़ी बच्ची को वापिस करने को राज़ी नहीं होती क्योंकि उसके कोई औलाद नहीं थी। विभाजन में जहाँ पुरुषों में हैवानियत भरती जा रही थी वहीं स्त्रियों में मनुष्यता प्रबल होती जा रही थी। जीनत और चंगड़ी अंत में बच्ची को एक-साथ रहकर लाड-प्यार करते हुए रहने को तैयार हो गयीं।
            विभाजन में जहाँ हम इस प्रकार के घटनाओं को देख पाते हैं वहीं कई और ऐसी घटनाएँ भी घटी हैं जिनमें मनुष्यता कहीं प्रबल हो रही है तो कहीं मनुष्य के भीतर का दानव प्रबल रहा है। साथ-ही-साथ भुक्त-भोगी लोगों की मानसिकता पर भी एक विचित्र प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है, वे इस विभाजन के विरुद्ध हैं। उन्होंने चूंकि वर्षों से दोनों देशों तथा उसकी संस्कृतियों को एक साथ ही पनपते देखा है तथा वे इसी मिली-जुली संस्कृति में पैदा हुए हैं तो फिर कैसा ये विभाजन और कैसी ये कौम की सेवा। उनका विरोध इसीलिए और अति तीव्र हो जाता है। वे न सिर्फ इससे दुखी हैं बल्कि कई लोग तो ऐसी मानसिक दशा में पहुँच चुके हैं कि उन्हें दुनिया कि नज़रों में पागल कहा जा सकता है। परन्तु यदि ऐसा पागलपन सबमें होता तो शायद आज यह दो देश होने के बजाय एक महा देश होता और दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता था।
          भीष्म साहनी द्वारा लिखित कहानी अमृतसर आ गया है में लेखक ने दंगे की तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण किया है। पाकिस्तान बनाए जाने का एलान हुआ था और इसके कारण हर जगह ही मार-काट मची हुई थी। लोग अपनी जान बचाने के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे थे। लेखक भी उस ट्रेन में बैठा हुआ था। वहाँ बैठे अन्य मुसाफिरों से बातें हो रही थीं। हर कोई अपने-अपने इरादे से हिन्दुस्तान जा रहा था। लेखक के साथ एक सरदार, दो-तीन पठान तथा एक बाबू बैठे हुए बातें कर रहे थे। लेखक हिन्दुस्तान में आज़ादी का जश्न देखने जा रहा था। वजीराबाद स्टेशन पर जब गाड़ी रुकती है तो वहाँ की परिस्थिति बहुत खराब मिलती है। दंगे के कारण हर किसी पर आतंक छाया हुआ है। जब एक मुसाफ़िर पानी लेने स्टेशन में उतरता है तो वह दुबारा दौड़कर डर के मारे वापस आ जाता है। उसी वक्त एक आदमी अपनी पत्नी और बेटी को लेकर डिब्बे में घुसना चाहता था। परन्तु डिब्बे में सवार पठान उसे लात मारकर भगा देता है। गाड़ी जब स्टेशन से बाहर निकलती है तो आस-पास के दंगे तथा आगज़नी के नज़ारों से सभी डर जाते हैं। सभी सहमे-सहमे एक-दूसरे की तरफ देखने लगते हैं। तभी  गाड़ी एक और स्टेशन पर जाकर रुकती है। वहाँ एक भिश्ती लोगों को पानी पिलाने चला आता है। लेखक ने इस प्रसंग को ऐसे प्रस्तुत किया है हाँ, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लाँघकर आया और मुसाफिरों को पानी पिलाने लगा। लो, पियो पानी, पियो पानी। औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आए थे।बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मारे गए हैं। ... लगता था, वह इस मार-काट में अकेले पुण्य कमाने चला आया है।6 इस प्रकार देखा जाता है कि कुछ लोगों में मनुष्यता बाकी थी, नहीं तो आज उतने लोग भी जिन्दा न बचे होते दंगों में जितने बच गए थे। जहाँ देखो कट्टरवाद तथा युद्धोन्माद ही भरा पड़ा था, वहीं मानसिक रूप से त्रस्त लोगों की भी कमी नहीं थी। उन्हें यह विभाजन किसी भी प्रकार से सह्य नहीं था।
            सरहद के इस पार  में लेखिका नासिरा शर्मा ने रेहान नामक एक ऐसे पात्र को चित्रित किया है जो कि मानसिक रूप से परेशान है। वह एक पढ़ा-लिखा नौजवान है। वह पी. एच. डी कर रहा था, लेकिन उसका मन उजाड़ हो गया। उसे सुरैया नामक एक लड़की से प्रेम था। परन्तु सुरैया के घर वालों ने ये रिश्ता कुबूल नहीं किया। वहीं वह दो साल से नौकरी की तलाश में था। इन सब परिस्थितियों के कारण वह पागल-सा हो गया था। कुछ दो दिन पहले हिन्दू-मुसलमान दंगे होते हैं और फिर वातावरण शान्त होता है, लेकिन सबके मन में एक दहशत भरी हुई है। ऐसे में रेहान कभी-कभी चीखता-चिल्लाता दंगाइयों पर अपना गुस्सा निकालता है। वह जिस गली में रहता है वहाँ सभी घर हिन्दुओं के हैं और कुछ दो-चार घर ही हैं जो मुसलमानों के हैं। फिर भी वह हिन्दुओं को कातिल कहता है। क्योंकि उसे दुख है तो इस बात का कि जिस धरती पर उसके पूर्वजों ने साथ मिलकर जन्म लिया, पले-बड़े, जहाँ  मरकर वे इसी मिट्टी में दफ्न हुए, वहीं से उसे पाकिस्तानी कहकर भगाया जा रहा है। वह इस बात का कड़े तौर पर विरोध करता है, पर हर कोई उसे पागल समझता है। उसकी बातों को सभी नज़र-अंदाज़ करते हैं। घर वाले इस बात से डरते हैं कि कहीं किसी को यह बात बुरी लग गयी तो उसे जान से मार दिया जाएगा। तो उसकी दद्दा समझती है कि किसी ने उसपर जादू-टोना किया है। रेहान को बहुत गुस्सा आता है क्योंकि कोई उसकी बात समझने को तैयार नहीं है। उसी के मोहल्ले में रहनेवाला एक हिन्दू पण्डित नारायणजी डॉलर और पाउंड के लालच में मन्दिरों की मूर्तियों का सौदा करता है लेकिन उसे कोई नहीं गद्दार कहता, जबकि रेहान जो कि अपने वतन में जीना चाहता है उसे सब लोग या तो पागल या फिर पाकिस्तानी कहकर भगा देना चाहते हैं। वह दुबारा हुए दंगे-फसाद के कारण पागल हो उठता है और कहने लगता है मारो कातिलों को, मारो मेरे कातिलों को। सब नामर्द अन्दर बैठे हैं। कोई नहीं बाहर निकलता है। यह मेरा वतन है, मेरा वतन। देखता हूँ, कौन मुझे जीने से रोकता है? हिम्मत है तो आओ, निकलो।7 परन्तु रेहान के शकूर चचा उसे इसके लिए लात-घूसों से मारकर उसे ठीक करते हैं। उनकी नज़रों में रेहान की ये सब बातें बेहूदी हैं। उन्हें रेहान के सच्चे दिल से निकली बातों की कोई फिक्र नहीं बल्कि उन्हें मोहल्ले में शरमिंदगी झेलनी पड़ती है। गली में कर्फ्यू शुरू होने से पहले एक बम फटने की आवाज़ सुनायी पड़ती है। शकूर चचा के एक पहचान वाले कल्लन मियाँ बम फटने से मर जाते हैं। अफजल, उनका बेटा, बम बनाते समय बम फटने से मर जाता है। लेखिका ने यहाँ लोगों के मन में जहाँ नफरत या मानसिक विक्षिप्तता को दर्शाया है, वहीं नौजवानों को दहशतगर्द बनते हुए भी चित्रित किया है। तत्कालीन दंगे के वातावरण में चाहे किसी के पास खाने के लिए रोटी न हो, रहने को घर न हो परन्तु दूसरे धर्म को लोगों को कुचलने के लिए, मारने के लिए हथियार जरूर थे। रेहान रात को अधीर हो छप्परों के ऊपर टहल रहा होता है कि तभी उसे कहीं से एक लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनायी देती है। वह दलान में से नीचे उतरता है और आवाज़ की ओर जाता है। कमरे के भीतर एक हिन्दू लड़की को उसके मुसलमान दोस्त कर्फ्यू की अफ़रा-तफ़री में उठा लाते हैं। रेहान जब उनका विरोध करता है तो वे लोग उससे कहने लगते हैं कि दिन-भर तो तुम हिन्दुओं के बारे में बुरा-भला कहते हो और रात को इस लड़की के लिए हमदर्दी! रेहान उनकी बात नहीं मानता है और उस लड़की को उन लड़कों से बचाकर उसके घर पहुँचा आता है। रेहान को बाद में वही लड़के जान से मार देते हैं। लेकिन यहाँ लेखिका ने रेहान के भीतर जिस पागलपन या कहें देश के प्रति उसमें जो प्रेम है तथा उसके जरिये जिस नयी विचारधारा को प्रस्तुत किया गया है, वह सराहनीय है। रेहान के लिए विभाजन उन लोगों का पागलपन था जिन्हें वास्तव में देश से कोई प्रेम नहीं था तथा जो सिर्फ धार्मिक बने हुए थे।
वहीं टोबा टेक सिंह  पर लेखक उदय प्रकाश अपनी बात इस प्रकार कहते हैं कि  भारत-पाकिस्तान के बंटवारे विभाजन पर अनेक कहानियां, उपन्यास, समाजशास्त्रीय-राजनीतिक विश्लेषण आदि लिखे गए, लेकिन सआदत हसन मंटो की कहानी – 'टोबा टेक सिंह'-इस विभाजन के पीछे सक्रिय राजनीति और सांप्रदायिकता के उन्माद की अविस्मरणीय, सार्वभौमिक, कालजयी क्लासिक बन गई। जब पाकिस्तान के पागल बिशन सिंह को उसके गांव टोबा टेक सिंह से निकाल कर हिंदुस्तान भेजा जाता है तब वह दोनों देशों की सरहद पर मर जाता है।उसके शरीर का आधा हिस्सा हिंदुस्तान और आधा पाकिस्तान की सीमा में आता है। मरने से पहले पागल बिशन सिंह की गाली, भारत और पाकिस्तान के लहूलुहान बंटवारे पर एक ऐसी टिप्पणी बन जाती है, जो अब विश्व-कथा-साहित्य में एक गहरी, मार्मिक, अविस्मरणीय मनुष्यता की चीख़ के रूप में हमेशा के लिए उपस्थित है :"गुड़-गुड़ दी एनेक्सी दी वेध्याना दी मूंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ़ दी दुर्र फिट्टे मुंह......!" यह पागल, अराजक, निरर्थक, अतार्किक वाक्य 1947 के सांप्रदायिक उन्माद और देश के विभाजन के पीछे सक्रिय राजनीति की 'एबसर्डिटी' और पागलपन पर एक कालजयी टिप्पणी है.8
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विभाजन ने जहाँ तक सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक विभाजन या बिखराव किया वहीं इसने समाज में रहनेवाले भोले-भाले लोगों की मानसिकता को भी झकझोरकर रख दिया है और उनसे उनकी ज़िन्दगी, मासूमियत सबकुछ छीन लिया। उनके अपने भी उनसे बिछड़ गए। इस विभाजन ने कितना कुछ छीना है, क्या कुछ गुजरी है लोगों पर यह कहानियों में व्यक्त होते होते नहीं रुकती हैं और उसके फैलाव को आज हम नए-नए मोड़ पर देखते जा रहे हैं। बस, यह आशा रख सकते हैं कि भविष्य में ये विभाजन और न फैले।


संदर्भ ग्रन्थ :
1.    भारत विभाजन के गुनहगार( गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन) डॉ राममनोहर लोहिया ( अनु. ओंकार शरद), लोकभारती प्रकाशन, 2007, पृ.सं. 49.
2.    खोयी हुई खुशबू अफ़जल अहसन रंधावा, हिन्दी समय डॉट कॉम, विभाजन की कहानियाँ.
3.    बेज़बान द्रोणवीर कोहली, वही.
4.    व्यथा का सरगम अमृत राय, वही.
5.    मुबीना या सकीना- गुरुबख्श सिंह, वही.
6.    अमृतसर आ गया भीष्म साहनी, वही.
7.    सरहद के उस पार नासिरा शर्मा, वही.
8.    http://www.bbc.com/hindi/india/2013/09/130917_hindi_diwas_stories_akd.