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Monday, 18 July 2011

बुल बुला.............

बुल बुला

शरत काल के रविवार की एक दोपहर टी.वी में अलग-अलग चैनेलों में पुरानी फिल्म, नाच-गाने के या मनोरंजन के सस्ते एपिसोड के रिविज़न, कही इन पर चर्चाएं और समाचार चैनेलों में एक-या-दो समाचार बुलेटिन के भाषांतर करके रिपिटेशन तथा हरेक मिनट के बाद दो-ढाइ मिनट के कॉमर्शियल ब्रेक से तंग आकर मिनाक्षी टीवी बन्द करके सोफे में लेट गयी थी। पास में एक डायरी पड़ी थी। कुछ ही दिन पहले पापा ने उसके पच्चीसवे जन्मदिन में उसे एक सुन्दर डायरी दी थी। वैसे तो पापा जन्मदिन में उसे आर्शिवाद के अलावा कोई उपहार देने की रुचि नहीं रखते। पर मिनाक्षी को कविता लिखने का बहुत शौक था और वह जब भी कोई कविता सोचती तो तुरंत ही किसी खाली कॉपी या पन्ने पर लिख डालती थी। संयोग से पापा ने उसकी लिखी दो-एक कविताएँ पढ़ ली और उन्हें काफी पसंद भी आयी। इसीलिए उन्होंने उसके पच्चीसवे जन्मदिन पर सुन्हरी जिल्द वाली एक डायरी लाकर उसे दी और कहा कि यदि तुम लिखने में रुचि रखती हो तो अपनी रचनाएँ व्यवस्थित रूप में लिखकर संजोकर रखो। क्या पता भविष्य में ये तुम्हारे ही किसी काम आ जाए। उसने कुछ कविता डायरी में उतार ली थी। वह डायरी के पन्ने पलटने लगी और किसी खयाल में खो गयी।
उस समय वह कॉलेज में पढ़ती थी। वे लोग अरुणाचल के सियांग जिले में रहते थे। उसके पिता वही एक स्कूल में अध्यापक थे। मिनाक्षी के दिन की शुरुआत पूजा के लिए फूल चुनने से होती थी। वह रोज फूल चुनती और पूजा घर में रखकर खुद तैयार होकर कॉलेज चली जाती थी। जिस रास्ते से होकर वह रोज़ गुज़रती वह एक पहाड़ी रास्ता था जिसके एक तरफ खाई नुमा था तो दूसरी तरफ ऊँचे ढलान जैसी जगह। उस जगह को किसी कारणवश फौजी की एक छावनी बिठायी गयी थी। रास्ते के बिलकुल नज़दीक एक बंकर और एक कैनटीन था। कैनटीन ऐसा बनाया गया था कि रास्ते से आने-जाने वाले लोगों को कैनटीन में बैठे लोग देख सकें लेकिन रास्ते के लोग आसानी से न देख सकते थे। मिनाक्षी का रोज़ यही से आना-जाना होता था क्योंकि ये रास्ता उसकी कॉलेज को सीधा जाता और शॉर्टकट था। कुछ अन्य स्थानीय लोग भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे। मिनाक्षी प्रतिदिन जब भी जाती तो उसे प्रायः आभास होता था कि कोई उसे बड़े गौर से देखता है। यहाँ तक कि जब वह आँखों से ओझल सी होने लगती तो उसका पीछा भी कोई करता है। मिनाक्षी इस घटना को अब-तक हज़म कर चुकी थी क्योंकि ये अब रोज़ की बात थी। उसे लगता था कि एक दिन रुककर वह उन आँखों की खबर ले, लेकिन कॉलेज जाना उसके ज्यादा ज़रूरी था। इसके अलावा उसके पास समय नहीं था। पर मिनाक्षी जानती थी एक-न-एक दिन वह इसका पता लगा ही लेगी। संयोग वश ऐसा प्रसंग आ पड़ा। एक शाम बहुत ही जोरो की बारिश और तुफान ने सियांग में कोहराम- सा मचा दिया था। रास्तों में जगह-जगह भू-स्खलन और पेड़ गिरने से आवा जाही पर तो असर पड़ा ही मिनाक्षी के कॉलेज जाने में भी मुश्किलें आ पड़ी। जिस रास्ते से वह रोज आना जाना करती थी उस रास्ते पर एक बड़ा-सा पेड़ आधा उखड़ कर झुक गया था और एक बिजली के खम्बे से लटक गया । फौजीयों ने जैसे-तैसे रास्तें को खाली किया, ताकि उनकी और बाकी लोगों की आवा-जाही बन्द न हो। लेकिन कुदरत जब कुछ ठानती है तो करके ही छोड़ती है। अब तक स्थिति सामान्य थी लेकिन सोमवार की शाम को फिर से तूफान और बारिश हुई। इस बार भू-स्खलन नहीं हुए न पेड़ गिरे, लेकिन फिर भी कही-कही कुछ ऐसी घटना हुई। जो पेड़ उस रास्ते में बिजली के खम्बे पर लटका था वह गिर गया। जहाँ से वह गिरा वहाँ एक गड्डा हो गया। अब उसमें पानी भरा हुआ था जिसमें बिजली के खुले तार के एक हिस्सा टूट कर गिर गया जा गिरा।
आज मिनाक्षी के इम्तेहान का रिज़ल्ट आना था। वह वही देखने जा रही थी। संयोग वश वही आँखें फिर से मिनाक्षी की तरफ मुड़ गयी और इस बार मिनाक्षी ने उसे देख लिया। ये आँखे बहुत नज़दीक थी और मोहनी इतनी कि मिनाक्षी भी खो गयी। पर पैर आगे बढ़ रहे थे। जैसे-तैसे मिनाक्षी ने संकोच से आँखें फेर ली लेकिन फेरते ही गड्डे के पानी में उसका पैर पड़ गया। एक चीख निकली और मिनाक्षी वही बेहोश हो जाती है। फिर क्या हुआ कुछ उसे पता नहीं।
मिनाक्षी को जब होश आता है तो वह अपने-आपको आर्मी होस्पिटल में पाती है। आँखें खोलते ही वह उन्हीं आँखों से मिलती है जो प्रतिदिन उसका पीछा करती थी। ये आँखें अब पूरी सूरत लिए हुए थी। एक आर्मी डॉक्टर की। नाम मेजर डॉ सुबोध मुखर्जी की थी। सुबोध रोज़ाना ही सुबह की शिफ्ट खत्म करके रास्ते के किनारे बने वेट-कैनटीन में साफ-सफाई और खाने-पीने की चीज़ों की गुणवत्ता की जांच करने आता था। यह उसकी ड्यूटी का एक हिस्सा था। वही रोज़ मिनाक्षी को देखा करता था। मिनाक्षी ने भी उसे कई बार देखा लेकिन ऊँचे ढलान के कारण ज्यादा स्पष्ट नहीं देख सकती थी।
“अब कैसा लग रहा है?”
“बहुत सर दर्द और अजीब सा लग रहा है।”
“हाँ! बहुत जोर का झटका लगा था तुम्हें और फिर तुम बेहोश हो गयी थी।”
“मैं कितनी देर से यहाँ हुँ?”
“ज्यादा नहीं आधे घण्टे से। मैंने तुम्हें दवा इन्जेक्ट करके दी थी उसके बाद तुम थोड़े देर ही होश में आ गयी।”
मिनाक्षी उठने की कोशिश करती है तो सुबोध उसे उठने नहीं देता है। वह उसके कन्धे पर अचानक ही हाथ रख देता है। मिनाक्षी एहसास होता है कि जैसे फिर से कोई बिजली उसके शरीर में चली गयी है। संयोग भी ऐसा कि कमरा खाली था। वहाँ जो पास में नर्स थी वह कही चली जाती है। मिनाक्षी के मन में कुछ सवाल उठ रहे होते है लेकिन वह संकोच में होती है। लेकिन कमरा खाली देख वह थोड़ी हिम्मत बांध सुबोध से पूछ बैठती है –आपसे एक सवाल पूछू, आप नाराज़ तो नहीं होंगे?
“नहीं।”
“आप ही है न जो रोज़ मुझे देखते रहते हैं और मेरा पीछा करते है?”
मेजर सुबोध अब स्वयं थोड़ा लज्जित अनुभव करता है। लेकिन भावनाएँ प्रबल हो तो मनुष्य से बहुत कुछ करवा ही लेता है। फिर इस सवाल का जवाब देना कौनसा मुश्किल था। वह जवाब देता है – जी हाँ।
“क्यों?”
“क्योंकि आप मुझे अच्छी लगती हैं। आपको देखते ही मैं अपने-आपको रोक नहीं सकता था।”
मिनाक्षी को जवाब सुनकर अब लज्जा महसूस हुई कि उसने ये सवाल क्यों पूछा। मिनाक्षी अब न तो सुबोध से आँखें मिला पा रही थी न ही उसे वहाँ ठहरना मंजूर हो रहा था। वह वहाँ से घर जाने के लिए कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में वह नर्स किसी दूसरे फौजी अफ्सर के साथ वहाँ आ पहुँचती है। ये अफ्सर छावनी का सबसे बड़ा अधिकारी था। उसने आते ही मेजर डॉ सुबोध से सवाल किया।
अफ्सर – मेजर! अब ये लड़की कैसी है।
मेजर सुबोध – बिलकुल ठीक है सर।
अफ्सर – वैसे कौन है ये लड़की, इसने कुछ बताया है अपने बारे मे?
मेजर सुबोध – नहीं सर। अभी ही बस होश में आयी है।
अफ्सर – क्या हुआ था इसे। मुझे बताया गया है कि इसे बिजली का झटका लगा था और आप इसे कैम्पस के अंदर ले आए है।
मेजर सुबोध – जी ये सच। ये लड़की हमारे कैन्टीन के सामने से गुजरने वाले रास्ते से जा रही थी। वहाँ एक गड्डे है जिसमें एक पेड़ और बिजली के नंगे तार गिरे हुए है। ये लड़की वही फंस गयी थी। अगर सामने मैं और कुछ जवानों ने नहीं देखा होता और इसकी चीख नहीं सुनी होती तो ये लड़की नहीं बचती सर। इसीलिए सर इसे बचाने के लिए मैंने ही इसे कैम्पस में लाने का हुक्म दिया। वैसे आपको रिपोर्ट करने के लिए मैंने अर्दली को भेजा था।
अफ्सर – इट्स ओके डॉक्टर। आपने इस लड़की की जान बचाकर बहुत अच्छा किया। गुड जॉब।
अफ्सर अब मिनाक्षी की तरह मुड़कर उससे सवाल पूछता है— कैसा लग रहा है बेटी? तुम कहा रहती हो और तुम्हारे पापा का नाम क्या है और वे क्या करते है? तुम्हारा नाम क्या है?
मिनाक्षी – जी मेरा नाम मिनाक्षी गांगुली है। मेरे पिताजी का नाम श्री सत्यजीत गांगुली है। वे यहाँ सियांग हाई स्कूल में मेथ्स के टीचर है। मैं यहाँ पास के शाइनी कॉलनी में रहती हुँ।
अफ्सर – तुम इस रास्ते से कहा जा रही थी, क्या तुम्हें पता नहीं कि यहाँ पर रास्ता कल रात से बन्द है?
मिनाक्षी – जी में डी-पी आर्ट्स एण्ड कॉमर्स कॉलेज में पढ़ती हुँ। मेरा रिज़ल्ट आज आउट हुआ है। मैं वही देखने जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि यहाँ रास्ता बन्द है।
अफ्सर – हूं। ठीक है। तुम घर जाना चाहती हो?
मिनाक्षी – जी।
अफ्सर – ठीक! जवान सूनो। इसे इसके घर तक छोड़ आओ। डॉक्टर आपने इसे दवाई दे दी है?
मेजर सुबोध – जी मैने प्रेस्किपशन लिख दिया है। (मिनाक्षी की तरफ मुड़कर) – आप ये दवाई वक्त पर ले लीजिएगा। और थोड़ा रेस्ट कीजिए क्योंकि आप बहुत कमज़ोर हैं।
मिनाक्षी घर पहुँचती है तो घर के लोग रिज़ल्ट जानने की उत्सुकता लिए बैठे थे। लेकिन सब कुछ जानने के बाद माँ मिनाक्षी को आराम करने कमरे में भेज देती है। उसके पापा जवान से पुछते है कि क्या हुआ। जवान उन्हें सब बता देता है। ईश्वर का धन्यवाद कर गांगुली साहब जवान को वापस भेज देते है। बाद में उन्हें फोन से मिनाक्षी का रिज़ल्ट पता चलता है कि वह अच्छे नम्बरो से पास हो चुकी है। मिनाक्षी हफ्ते भर के लिए कॉलेज जा नहीं पाती है। रास्ता भी बन्द था और वह खुद में भी कमज़ोर थी। लेकिन सबसे ज्यादा जिस बात ने उसे परेशान कर रखा था वह ये कि उसे क्या हुआ है। जब से मेजर सुबोध से वह मिली और उसकी बात सुनी उसे एक पल भी चैन नहीं मिला। शायद उसे भी मेजर सुबोध अच्छा लगने लगा था लेकिन ये बात वह कैसे उसे बताती, कैसे ये बात किसी से कहती। दोस्तों से बोलती तो वे लोग इस बात को गोसिप की तरह पूरे कॉलेज में फैला देते। उपाय से पहले ही बदनामी हाथ आ जाती। मिनाक्षी अपने माँ-पापा से सारी बातें शेयर करती थी। वह अपने माँ-पापा से भी ये बात कहना चाहती थी लेकिन संकोच ज्यादा हो रहा था। उससे भी ज्यादा मेजर सुबोध को भी कहना हो तो कैसे कह सकती थी। फौजी छावनी के भीतर जाने की मनाही थी और फौजीयों को भी सिविलियन्स से मिलना-जुलना मना था। किसी विशेष परिस्थिति में या आपात स्थिति में ही किसी सिविलियन्स की मदद या भेंट हो जाती थी वह अलग बात थी।
हफ्ते भर बाद मिनाक्षी स्वस्थ भी हो गयी और उस तरफ रास्ता भी खुला। मिनाक्षी आज फिर उसी रास्ते से कॉलेज जा रही थी। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग थी। वैसे तो ढलान के उस तरह छावनी में आम दिनों की तरह हलचल थी लेकिन आज कुछ ज्यादा थी। सबसे अजीब बात ये थी कि आज मेजर सुबोध वहाँ नहीं था। मिनाक्षी कुछ सोचते-सोचते कॉलेज चली गयी। जब वह फिर वही से लौटने लगी तो उसने देखा कि फौजी गाड़ियों की कतार है। शायद यहाँ से छावनी उठने वाली है। सभी अपने सामान और दूसरी चीज़ें गाड़ियों में लाद रहे है और गाड़ियाँ एक-एक कर रवाना हो गयी। एक छोटी जीप भी वहाँ से रवाना होती है जिसमें कुछ अफ्सरों के साथ मेजर सुबोध भी बैठा है। मिनाक्षी को देख सहज ही सुबोध की आँखें मिलती है और मुस्कुराती है। मिनाक्षी भी मुस्कुराती है। ये आखरी भेंट थी दोनों की। मिनाक्षी वही रास्तें पर खड़ी रही और सजल नेत्रों से मुस्कुराती रही और मेजर सुबोध उसे हाथ हिलाते हुए विदा लेता है और आँखों से ओझल हो जाता है।
धीरे-धीरे वह घर पहुँची। उस समय उसके मन में क्या चल रहा था आज इतना स्पष्ट रूप में उसे याद नहीं। पर इतना याद है कि वह बड़े मानसिक असमंजस में थी, शायद इसके बाद भी कुछ दिनों तक जो काल के प्रभाव से धीरे-धीरे फीका होता गया पर मिटा नहीं।