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Monday, 11 August 2014

भूषण के कविताओं की व्याख्या -- पार्ट 2



दारुन दुगुन दुरजोधन तें अवरंग
भूषन भनत जग राख्यो छल मढ़िकैं।
धरम धरम, बल भीम, पैज अरजुन,
नकुल अकिल, सहदेव तेज, चढ़िकैं।
साहि के शिवाजी गाजी करयो दिल्ली माँहि,
चंड पाँडवनह तें पुरुषारथ सु बढ़िकैं।
सूने लाखभौन ते कढ़े वै पाँच राति मैं,
जु धौस लाल चौकी ते अकेलो आयो कढ़िकै।

व्याख्या कवि भूषण शिवाजी की राजनीतिक बुद्धि की प्रशंसा करते हुए कहते है कि ये औरंगजेब बिलकुल दुर्योधन के समान अधर्मी है। उसने छल से ही सब कुछ अपने कब्जे में कर रखा है। परन्तु शिवाजी उसे भी छलकर आज़ाद हो जाते हैं। क्योंकि शिवाजी का धर्म युधिष्ठिर के समान है, बल भीम के समान, प्रतिज्ञा अर्जुन के समान, बुद्धि नकुल के समान तथा तेज सहदेव के समान है। इन सबकी सम्मिलित शक्ति से ही शिवाजी ने दिल्ली में अपना कमाल दिखा दिया। वे पाँच पांडव तो दुर्योधन के लाक्षागृह से रात को भाग निकले थे जब वहाँ कोई नहीं था। लेकिन शिवाजी की विशेषता यह है कि वे दिन-दहाड़े इतने सारे सैनिकों के बीच से ही अपना कौशल दिखाते हुए कैद से मुक्त हो गए। उन्होंने प्रतिदिन गरीबों के मिठाई बाटने के बहाने अवसर पाकर एक दिन टोकरी में बैठ कर औरंगजेब के कैद से मुक्त हो गए।

 
वेद राखे विदित पुरान परसिद्ध राखे,
राम नाम राख्यो अति रसना सुघर मैं।
हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन को,
काँधे मैं जनेऊ राख्यो माला राखी गर मैं।
मीड़ि राखे मुगल मरोड़ि राखे पातसाह,
बैरी पीसि राखे बरदान राख्यो कर मैं।
राजन की हद्द राखी तेग-बल सिवराज,
देव राखे देवल स्वधर्म राख्यों घर मैं।

व्याख्या कवि भूषण ने शिवाजी को धर्म-रक्षक वीर के रूप में चित्रित किया है। जब औरंगजेब सम्पूर्ण भारत में देवस्थानों को नष्ट कर रहा था, वेद-पुराणों को जला रहा था, हिन्दुओं की चोटी कटवा रहा था, ब्राह्मणों के जनेऊ उतरवा रहा था और उनकी मालाओं को तुड़वा रहा था, तब शिवाजी महाराज ने ही मुगलों को मरोड़ कर और शत्रुओं को नष्ट कर सुप्रसिद्ध वेद-पुराणों की रक्षा की, लोगों को राम नाम लेने की स्वतंत्रता प्रदान की, हिन्दुओं की चोटी रखी, सिपाहियों को अपने यहाँ रखकर उनको रोटी दी, ब्राह्मणों के कंधे पर जनेऊ, गले में माला रखी। देवस्थानों पर देवताओं की रक्षा की और स्वधर्म की घर-घर में रक्षा की।

 
गढ़नेर, गढ़-चांदा, भागनेर, बीजापुर,
नृपन की नारी रोय, हाथन मलति हैं।
करनाट, हबस, फिरंगह, बिलायत,
बलख, रूम अरि-तिय छतियाँ दलति हैं।
भूषन भनत साहि सिवराज, एते मान,
तब धाक आगे चहुँ दिशा बबलति हैं।
तेरो चमू चलिबे की चरचा चले तें,
चक्रवर्तिन की चतुरंग चमू विचलति हैं।

व्याख्या कवि भूषण शिवाजी के आतंक का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि गढ़नेर(नगरगढ़), चाँदागढ़, भागनेर( गोलकुण्डा का भाग नगर) तथा बीजापुर के राजाओं की स्त्रियाँ हाथ मलन लग जाती है रोने लग जाती हैं। वही कर्नाटक, हबशियों का देश, विदेशी राज्य, बलख(तुर्किस्तान का एक नगर) तथा रूम तक के शत्रु राजाओं की स्त्रियाँ भी छाती पीटती रह जाती हैं। शिवाजी की धाक सुनकर सभी दिशाये उबलने लग जाती हैं। यदि कही यह चर्चा सुनाई दे जाती है कि शिवाजी की सेना आ रही है तो बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राटों की भी चतुरंगिणी सेनाये तक विचलित हो जाती है।

Friday, 8 August 2014

भूषण की कविताओं की व्याख्या




चकित चकत्ता चौंकि उठै बार-बार,
दिल्ली दहसति चित चाहे खरकति है
बिलखि बदन बिलखात बिजैपुर-पति
फिरत फिरगिन की नारी फरकति है
थर-थर काँपत कुतुब साहि गोलकुंडा
हहरि हवसि भूप भीर भरकति है
राजा सिवराज के नगारन की धाक सुनि
केते पातसाहन की छाती दरकति है।


व्याख्या भूषण कहते है कि चाक पक्षी बारम्बार चौंक कर उठ जाता है। दिल्ली के राजा का चित्त दहशत से बार-बार खरक जाता है। बिजापुर के राजा का तो शरीर ही बिलख उठता है और वे बच्चों जैसे बिलख-बिलख कर रोने लग जाते है। फ़िरंगियों की औरतें तो चिड़ियाँ की भाँति फरक जाती है। वही परिवार सहित गोलकुंडा के साह भी थर-थर काँप जाते है। भीरु, कायर तथा भोग-विलास में लिप्त राजाओं के हृदय भय से भर जाते है। जब राजा शिवाजी के (युद्ध के लिए प्रस्थान की घोषणा) नगाड़े की धाक सुनाई देती है तो कितने ही बादशाहों की छाती धड़कने लगती है।


आपस की फूट ही ते सारे हिन्दुताने टूटे,
टूटयो कुल रावन अनीति अति करते।
पैठिगो पताल बलि बज्रधर ईरषा ते,
टूट्यो हिरन्याक्ष अभिमान चित्त धरते
टूट्यो सिसुपाल वासुदेव जू सो बैर करि,
टूटो है महिष दैत्य अधम बिचरते।
राम कर छुवत ही टूट्यो ज्यों महेस चाप,
टूटी पातसाहो सिवराज संग लरते।

व्याख्या कवि भूषण कहते है कि आपस की फूट की वजह से ही सारा हिन्दुस्तान बिखर गया। जैसे रावण की अतिरिक्त अनीति के कारण उसके भाई विभिषण के साथ झगड़ा हो जाता है और उसके कुल का नाश हो जाता है। कवि भूषण कहते है कि राजा बलि इन्द्र से ईर्ष्या करते हि भगवान बामन के द्वारा पाताल भेज दिये जाते हैं। हिरन्याश जब यह अभिमान धर लेता है कि वह भगवान से भी श्रेष्ठ है वह भगवान जैसा भी सबकुछ कर सकता है तो भगवान विष्णु के द्वारा उसका अभिमान टूट जाता है। शिशुपाल भगवान कृष्ण को अभिमान के चलते गालियाँ देने लगता है, उनसे बैर कर लेता है, परन्तु उसका भी सुदर्शन चक्र के द्वारा वध करके उसका अभिमान मिटा दिया जाता है। महिषासुर दैत्य के मन में अधम विचार उपजते ही वह भी मारा जाता है। जिस प्रकार श्रीराम के हाथ लगते ही शिवजी का धनुष टूट जाता है उसी प्रकार शिवाजी के साथ लड़ते ही कई बादशाहों की कमर टूट जाती है।


जै जयंति जै आदि सकति जै कालि कपर्दिनि।
जै मधुकैटभ-धलनि देवि जै महिष-विमर्दिनि,
जै चमुंड जै चंड-मुंड भंडासुर खंडिनि,
जै सुरक्त जै रक्त-बीज विड्डाल बिहंडिनि,
जै जै निसुंभ सुंभद्दलनि, भनि भूषन जै जै भवनि
सरजा समत्थ शिवराज कहँ, देहि बिजै जै जगजननि।

व्याख्या कवि भूषण कहते है कि जय हो जयंति माँ दुर्गा, आदिशक्ति की। आपकी जय हो। आप काली है, कपर्दिनी है। जय हो मधु-कैटभ को छलने वाले, उन्हें मारने वाली, आपकी जय हो। हे महिषासुर को मारने वाली, हे चामुंडे, चंड-मुंड का दमन करने वाली आपकी जय हो। हे जगदम्बे, भंडासुर का नाश करने वाली, छिन्नमस्ता का रूप धर रक्त-बीज का विध्वंस करने वाली, हे शुम्भ-निशुम्भ का समूल नाश करने वाली आपकी जय हो। हे भवानी आपकी जय हो। हे काली आपसे ये राजा शिवाजी प्रार्थना करता है कि मेरी विजय हो। मैं आपसे विजय का कामना करता हूँ।



श्रीनगर नयपाल जुमिला के छितिपाल
भेजत रिसाल, चौरं, गढ़,कही बाज की
मेवार, ढुंडार मारवाड़ औ बुंदेलखंड,
झारखंड बाँधों-धनी चाकरी इलाज की
भुवन जे पूरब पछाँह नरनाह ते वै,
ताकत पनाह दिलीपति सिरताज की।
जगत को जैतवार जीत्यो अवरंगजेब
न्यारी रीति भूतल निहारी सिवराज की।


व्याख्या कवि भूषण ने अपने इस छन्द में शिवाजी के आत्मसम्मान तथा उनकी नीति की प्रशंसा की है। वह कहते है कि श्रीनगर, नेपाल, मेवाड़, जयपुर, मारवाड़, बुंदेलखण्ड, रीवाँ आदि भारत के उत्तर, पूर्व तथा पश्चिम के जितने भी शासक है सभी दिल्लीपति औरंगजेब का आदेश पाते ही, उसके भय से अपनी सेनाये, चमर, किला, घोड़े, बाज़ आदि नज़राने के रूप में भेंट कर देते है। वे इतने कायर और डरपोक है कि दिल्लीपति की सेवा करने या उनकी अधीनता मान लेने में ही अपनी सुरक्षा मान लेते है। उसकी ताकत के आगे झुक जाते है। जबकि दक्षिण के राजा शिवाजी ही अकेले ऐसे राजा थे जिनकी नीति सर्वथा भिन्न थी। वे इस प्रकार की अधीनता को अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध समझते थे। उन्होंने कभी भी औरंगजेब की अधीनता स्वीकार नहीं की।