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Friday, 11 September 2015

मेरा आज..........



 बन्द हो चुकी है किताब सपनों की
थम चुकी है कविता दिल के अरमानों की
रुक चुकी है कलम, रुक गए मेरे हाथ

विचार, विमर्श, कल्पनाएँ
सोच, समझ, सारी कलाएँ
रस,छन्द, अलंकार
सब धरे-के-धरे रह गए है
खो चुकी शक्ति शब्दों की भी
लगता है अब ऐसा,
जैसे लिखी ही नहीं थी कविता कभी

एक वक्त था जब धारा सी बहा करती थी
एक वक्त आज है जहाँ स्रोत ही सूख गया है
पर फिर भी धारा तो धारा है
जब से बही है मार्ग तो बना गयी है
वर्षा के होते ही फिर से बहेगी।

पर वर्षा होगी कब पता नहीं?
जीवन में ऐसा मोड़ आया
जिसकी मधुर कल्पना थी मन में कही
हाथ थाम कर दूर मंजिल तक पहुँचेंगे
आशा थी बड़ी।

हाथ थाम कर ले जा रहा है मुझे
मैं साथ चली जा रही हूँ
पर किस दिशा में
मुझे पता नहीं, पता नहीं, पता नहीं।

Friday, 26 June 2015

विभाजन – साहित्य में ।





            विभाजन-- विश्व-इतिहास में सदियों से भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से अखंड रहनेवाले भारत देश का भारत और पाकस्तान में बंट जाना। यह विभाजन ब्रिटिशों ने साम्प्रदायिक रूप से पहले राजनीतिज्ञों में, फिर आम लोगों में फैला दिया, जिसने विश्व-इतिहास में मानवता के नाम पर सबसे बड़ा कलंक लगाया। इसकी कालिमा अब भी भारत और उसके पड़ोसी मुल्कों में छायी हुई है। इस शब्द ने न केवल दो देशों को, या उसके लोगों को या दो अलग-अलग संस्कृतियों को विभाजित किया है बल्कि इसने सबसे बड़ा विभाजन किया है मनुष्य का उसकी मनुष्यता से।
            इतिहास के पन्नों पर झांककर देखने से सबके सामने सारी सच्चाई आ जाती है परन्तु उसे बार-बार दोहराना या उसकी चर्चा करना अब फ़िज़ूल-सा हो गया है, लेकिन इतिहास को हम नकार नहीं सकते। भारत-पाक-विभाजन विश्व-इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विभाजन रहा है। वैसे तो कई अन्य मुल्कों में भी विभाजन हुए परन्तु उनमें वह बात नहीं थी जिससे कि वह विश्व के लिए कोई त्रासदी ला खड़ा कर दे। हाँ,वहाँ भी दंगे-फसाद हुए, वहाँ भी राजनीतिज्ञों में विवाद हुए लेकिन वे इस हद तक न पहुँच पाये जो भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद हुआ,जिसकी आग में लगभग दो दशकों तक दोनों देश, विशेषकर भारत झुलसता रहा है। और आज भी भारत इस आग में धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। जब तक देश पराधीन था तब तक ब्रिटिश पराधीन भारत के लोगों में साम्प्रदायिक अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देते रहे। हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाने और अलग-अलग करने के लिए वे बहुत कुछ करते रहे। तब कुछ ही गिने-चुने लोग रहे होंगे जिन्होंने जातीय भावना  त्याग कर एक साथ विदेशी ताकत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उनका सपना आज़ाद भारत में सांस लेने का था। किसी ने तब यह नहीं सोचा था कि जो देश संस्कृति, वेश-भूषा, आपसी सद्भाव, प्रेम आदि से जुड़ा हुआ है सहसा यूँ अलग हो जाएगा जिसमें समाज, संस्कृति, धर्म, आर्थिक व्यवस्था सबकुछ जलकर राख हो जाएगा। देश को जब आज़ादी मिली, उसके तुरंत बाद उसे उसका सबसे भयावह परिणाम भी भुगतना पड़ा। इस खोखली स्वतंत्रता ने लोगों को एक पल में इतना अतिधार्मिक बना दिया कि उनके भीतर से धर्म, मानवता, अहिंसा, सत्य आदि प्रत्येक तत्व का नाश हो गया। भारत-पाक-विभाजन न केवल दो देशों का हुआ बल्कि दो अलग-अलग समाज, अलग संस्कृतियों के बीच भी हुआ है। इस विभाजन के वास्तविक रूप को देखा जाए तो समाज को ही सबसे बड़ी क्षति पहुँची है। इस विभाजन की वीभत्सता ने समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी है। पहले सांस्कृतिक दृष्टि से उसके विकास, एकता, उन्नति, श्रेष्ठता पर चोट लगी, उसका बंटवारा हो गया। दूसरे, आर्थिक संरचना पर प्रभाव भी पड़ा। जो आर्थिक स्थिरता धीरे-धीरे भारत में हो रही थी, वह इस विभाजन के कारण बिखर गयी। बसा-बसाया कारोबार आदि सबकुछ लोगों को छोड़कर जाना पड़ा, उनका विस्थापन होने लगा। तीसरे, बंटे हुए देशों के लोग जहाँ संदेह, भय और आतंक में जीने लगे, वहीं लोगों में कट्टरवाद तथा युद्धोन्माद भर गया। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो आज़ाद देश में जीने का सपना भी जो देखा वह सब इस विभाजन से पूरी तरह जर्जर हो गया। कुछ तो पागल तक हो गए जिनमें सबसे अधिक संख्या औरतों की थी। भारत-पाक विभाजन के कारणों, भयावह और वीभत्स रूप तथा उसके दुष्परिणामों के बारे में चर्चा करते हुए डॉ राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक भारत के विभाजन गुनहगार में लिखा है कि आगे हिन्दू-मुस्लिम दंगे ने हो इसलिए देश का विभाजन किया गया और विभाजन से वही इतनी अधिक मात्रा में हुआ जिसे रोकना चाहते कि आदमी बुद्धि और योग्यता से कोई भी निराश हो सकता है। छः लाख औरतें, बच्चे और आदमी मारे गए, अकसर इतना पागलपन हुआ कि लगता था कि हत्यारे लोग हत्या और बलात्कार के नए ढंग अनुभव करना चाह रहे हो। डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उखाड़ दिए गये और उन्हें जीविका व आश्रय के लिए ऐसे क्षेत्रों में जाना पड़ा जहाँ अपनत्व नहीं था।1 आम लोगों ने पहले भी साम्प्रदायिक झगड़े देखे थे। इतिहास में दो अलग-अलग धर्मों तथा संस्कृतियों में युद्ध होते ही रहे हैं लेकिन उसमें संघर्ष के साथ-साथ दो अलग-अलग संस्कृति तथा उसकी भाषा एवं लोगों में मेल-जोल हुआ, कई प्रकार के आदान-प्रदान हुए। परन्तु इस बार के इस संघर्ष में केवल आम लोगों की मासूमियत, उनकी मनुष्यता, उनके आपसी रिश्ते सब कुछ एक झटके में कटकर उनसे अलग हो गए। जब विभाजन के दंगे शुरू हुए तो उस वक्त हर एक आम आदमी अपने तथाकथित धर्म का होकर रह गया। वह इतना कट्टर हो गया कि वह बड़े-से-बड़ा पाप करने लगा। वह लोगों को काटने लगा, औरतों की अस्मत बिगाड़ने लगा, दूसरों के घरों को आग में झोकने लगा, छोड़कर गए लोगों के घरों में अपना अधिकार जमाने लग गया। यह सब कुछ हुआ देश के उत्तर पश्चिमी भाग पंजाब तथा पूर्वी भाग बंगाल में। लाखों की संख्या में न तो हिन्दु मर रहे थे न मुसलमान, बल्कि लोग मर रहे थे। दंगे का विरोध जिसने भी किया वह केवल आम आदमी था जिसका घर, जिसकी ज़िन्दगी, जिसके सारे सम्बन्ध इसमें जल रहे थे, कट रहे थे, मर रहे थे। वास्तविकता कि ओर देखा जाए तो कोई भी इस विभाजन को समझ नहीं पा रहा था, कोई भी नए मुल्क में जाने, वहाँ बसने और अपने पुराने मुल्क को छोड़ने को तैयार भी नहीं था। पर उसे मजबूरन जाना पड़ रहा था। तत्कालीन लोग बस इसलिए दूसरी जगह जा रहे थे क्योंकि उन्हें बस डर था कि कहीं उन्हें दंगाई मार न डालें। आज़ाद देश में जीने के लिए लोग एक समय अपनी बलि देने के लिए तत्पर थे तथा यह सपना देखा था कि प्रत्येक को उसके मौलिक अधिकारों के साथ सम्मान से जीने का अधिकार मिलेगा। कोई किसी पर अत्याचार नहीं करेगा, न किसी को गुलामी के विरोध में मारा जाएगा। सब गुलामी के छूटने के लिए मरने-मारने को तैयार थे, पर आज़ाद भारत ने देखा कि कैसे केवल अपने लिए और अपने तथाकथित धर्म के लिए लोग एक-दूसरे को मार रहे थे। तो वहीं कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें अपने धर्म से अधिक मानवता और मित्रता प्यारी थी। कुछ लोग अलग-अलग धर्म या सम्प्रदाय के होते हुए भी अपने मित्रों तथा उसके परिवार की रक्षा कर रहे थे, क्योंकि वे इस साम्प्रदायिक दंगे के विरुद्ध थे।
            विभाजन ने जहाँ तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक वातावरण को क्षति पहुँचायी है वहीं उसने साहित्य का भी रुख़ अपनी तरफ मोड़ दिया। साहित्य जहाँ नए-नए वादों को लेकर विकसित हो रहा था। हठात् इस नए तूफान ने आकर इसमें जगह ले ली। साहित्य में तब तक यथार्थ आ चुका था। साहित्यकार भी यथार्थवादी बन गया था। फिर वह भी उसी समाज का हिस्सा था जो विभाजन की पीड़ा ढो रहा था। अतः साहित्य में विभाजन के दर्द को महसूस किया जा सकता है। अलग-अलग भाषाओं में लगभग सभी साहित्यकारों ने विभाजन के दर्द, उसकी चीखें, उसकी वीभत्सता को अपने-अपने अंदाज़ में बयान किया है। कहा नहीं जा सकता कि किसमें सबसे अधिक इसकी अभिव्यक्ति हुई है क्योंकि सबपर ही इसका असर बहुत गहरा पड़ा है। कुछ कहानियों में विभाजन तथा उसके बाद की स्थिति कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है कि पढ़ते ही रोना आता है, मन में प्रश्नों की बाढ़ सी आ जाती है।
            खोयी हुई खुशबू में लेखक अफ़जल ने अपनी पूरानी स्मृतियों को कथा में स्थान दिया है। लेखक मुसलमान है परन्तु उनके मित्र तथा उनसे बेटे की तरह प्रेम करने वाले चाचा हिन्दू है। चाचा ने कभी बड़ी मन्नत से पायी हुई एक ऊँची नस्ल की घोड़ी की बच्छी जो उन्हें महाराजा कपूरथला से मिली थी उस पर चढ़ाकर पूरी हवेली में उसे घुमाया था, उसके बाद वह बच्छी मर गयी थी। फिर भी चाचा के माथे पर एक शिकन भी नहीं पड़ी थी। लेखक कहते हैं कि जितना प्यार उनके इस पिता के मुँहबोले भाई ने दिया था उतना प्यार उनके सगे चाचा ने भी उन्हें नहीं दिया था। वह क्यों इतना प्यार करते थे, लेखक कभी समझ नहीं पाए। लेखक ने हिन्दू-मुस्लिम मित्रता का उदाहरण देते हुए कहानी में लिखा कि फिर ऐसी आंधी चली जो इनसान को बेधकर और जमीन को सुनसान बना कर चली गयी। .......। तुमने भरी-पूरी हवेली और भरे हुए घर से, बस दो-चार वस्तुएं लीं, फिर मेरे चाचे, ताये और अब्बा उस गाड़ी को बर्छियों, छवियों और बन्दूकों के पहरे में लेकर चल दिये थे। ............रास्ते में लूटमार, कत्ल, हमले आदि का डर। और, पुल पर पहुँचकर जब मेरे पिता और आपने एक-दूसरे को बांहों में भरा तो दोनों बिलख-बिलखकर रोने लगे। आपको डेरे से, पुल से गुजरते और बार-बार मुड़कर पीछे देखते देखकर मेरे पिता कैसे बच्चों की तरह तड़प-तड़पकर रोये थे! आप आगे बढ़कर भीड़ में खो गये थे पर हम शाम तक क्यों पुल पर खड़े रोते रहे थे? और आखिर आपको खोकर, अपने और आपके उजड़े घरों में वापस लौट आये थे। उस समय मैं आठ साल का था और अब अड़तीस साल का हूं। मैंने कठिन-से-कठिन समय में भी अपने पिता को रोते नहीं देखा था, सिवाय उस दिन के। अब तो बस तुम्हारे नाम पर उनकी आंखें बुझ जाती हैं।2 विभाजन ने दरअसल लोगों से उनकी मित्रता, उनका बचपन सब कुछ छीन लिया। जहाँ इस कहानी में हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात नज़र आती है वही विभाजन के समय लोगों में किस प्रकार भय, आशंका तथा सबकुछ भूलकर कैसे अपनी ज़िन्दगी बचाने की उन्होंने कोशिश की उसको बहुत नाटकीय ढंग से अभिव्यक्त किया है लेखक कोहली ने।
अपनी कहानी बेज़बान में लेखक ने एक मुसाफ़िर के जरिए कथा को प्रस्तुत किया है। पूरी कथा में रेल यात्रा तथा उस यात्रा के दौरान घटित अनेक घटनाओं द्वारा लोगों के विभाजन के समय की दयनीय स्थिति को व्यक्त किया गया है। लेखक हिन्दुस्तान जा रहा है। उसके साथ उसका परिवार था, पर वह पहले ही ट्रेन से शायद कही ओर चले गए थे। लेखक दिल्ली जाने वाली एक ट्रेन में चढ़ गया है। वहाँ एक दम्पती तथा उनके साथ उनके दो बच्चे, एक सम्भ्रान्त परिवार की महिला और उसके दो जुड़वाँ बच्चे तथा आया समेत कई मुसाफिर थे। एक बेज़बान कुत्ता भी था। सफ़र के दौरान कुत्ते की हरकतों से महिला तथा दम्पती में कहा-सुनी होने लगती है। सभी कोई कैम्प से आए हुए थे और अपनी जान बचाने के लिए हिन्दुस्तान भाग रहे थे। दम्पती की एक सात-आठ महिने की बच्ची थी जो बहुत बीमार और प्यासी थी। ट्रेन जब लाहौर से निकली और एक सुनसान जगह पर जाकर रुकी, लोग डर रहे थे कि कही दंगाइयों ने तो ट्रेन को नहीं रोका, कोई हिम्मत करके खिड़की खोलकर भी नहीं देख रहा था। लेकिन रोशन जो उस बच्ची का पिता था पानी लेने के लिए नीचे उतर गया था जिससे सभी घबरा गए थे। बच्ची को पानी पिलाने के बाद वह थोड़ी स्वस्थ हुई थी। अचानक महिला का कुत्ता पानी की बाल्टी में मुँह डाल देता है और पानी को जूठा कर देता है जिसकी वजह से दुबारा दोनों में कहा-सुनी हो जाती है तथा कुत्ते को रोशन पैर से धकेल देता है। अंत में महिला के दोनों बच्चे भी प्यास के कारण थके हुए थे। उन्हें महिला वही जूठा पानी पिलाती है ताकि दिल्ली तक जाते-जाते वह स्वस्थ रहे। यह देखकर ट्रेन के बाकी यात्री भी वही पानी लेकर पीने लगते हैं। लेखक ने जहाँ इस प्रकार की परिस्थिति का वर्णन किया है वहीं लाहौर स्टेशन पर पहुँचने के समय में मुसाफ़िर के मन के भय, आतंक को भी अभिव्यक्ति दी है। मुसाफ़िर लाहौर देखना चाहता था पर उसकी आस कभी पूरी नहीं हुई लेकिन आज लाहौर आया भी है तो वह देख नहीं सकता क्योंकि वही लाहौर  आ रहा है, जिसकी पुरानी तंग गलियों में फँसे लक्षाधिक लोगों को चारों तरफ से घेरकर उनके घरों, मकानों, दुकानों के भीतर जलाया गया था...    वही लाहौर आ रहा है, जिसमें शाह आलमी दरवाजा है, जिसके निकट धू-धू जलते गुरुद्वारे में स्त्रियों-पुरुषों और बच्चों की चीखों को डुबोने के लिए खुशी के शादियाने बजाये गये थे... वही लाहौर आ रहा है, जिसके रेलवे स्टेशन पर आठ बोगियों में भरी लाशों को अमृतसर भेजा गया था और एक डिब्बे के पीछे यह लिख दिया गया था कि यह हमारी तरफ से नेहरू-पटेल को आजादी का तोहफा है...3 लोगों के मन में जो आतंक है वह सच है। यहाँ लेखक ने न केवल आतंक को चित्रित किया है बल्कि विभाजन के समय लोगों के मन में जो युद्धोन्माद था उसे भी उन्होंने स्पष्ट चित्रित किया है। लोग केवल विभाजन से ही इस प्रकार विक्षिप्त हो चुके थे कि बिना किसी दोष के ही एक-दूसरे को मारने लगे।
इसी प्रकार व्यथा का सरगम कहानी में अमृत राय ने विभाजन में तबाह हुई बन्नो की कथा को अभिव्यक्त किया है। वह सरहद के उस पार रहती थी। उसकी कभी शादी हुई थी, उसने भी कभी अपने सुनहले जीवन के सपने बुने थे। लेकिन विभाजन की आंधी ने सबकुछ उजाड़कर रख दिया। यहाँ तक की उसकी अस्मत को भी नहीं बख़्शा। वह अब इतनी दुखी है कि हँसना-रोना भी उसके लिए कष्टदायी हो गया है। बन्नो अब किसी तरह अपनी ज़िन्दगी जी रही है। पर बन्नो में फिर भी एक मानवीयता बची है। जब वह शाम को कुएँ से पानी लेने जाती है तो कुएँ के पास बनी कोठरी से किसी लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आती हैं। वह दूसरे धर्म की लड़की है। कुछ शरणार्थी लड़कों के गिरोह उसे उठा लाए हैं। वे लोग उसके साथ जबरदस्ती कर रहे हैं। बन्नो जब यह दृश्य देखती है तो उसे याद आता है कि उसके साथ भी कभी ऐसा हुआ था और तब उसके मन के जानवर को एक अजीब-सा संतोष मिलता है। पर पलभर में ही वह बदल जाती है, उसे ऐसा लगता है कि वह एक बड़े आईने के सामने खड़ी है और वह लड़की स्वयं बन्नो है और तभी बन्नो अपनी कटार से उस लड़की को मार देती है और स्वयं को भी मार डालती है। कितनी वीभत्सता है इस विभाजन में कि इसमें भले ही दोनों ओर के लोग मारे जाते हैं परन्तु स्त्रियाँ उनके साथ बलात्कार हर हाल में होता है। समाज में अब तक जितनी भी घटनाएँ घटित हुई है उसमें सबसे अधिक स्त्रियों को ही भुगतना पड़ा है। चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय की हों उनके साथ बलात्कार करना जैसे मर्दज़ात का तथाकथित धर्म बन गया है। अमृत राय ने जहाँ स्त्री पर हो रहे अत्याचार को अभिव्यक्त किया है वहीं विभाजन से विस्थापित हुए लोगों की विवशता तथा दयनीय स्थिति को भी चित्रित किया है।धन्यभाग जो दूसरा महायुद्ध हुआ, वर्ना न लड़ाई होती, न मिलिटरी की बारकें बनतीं और न आज मनुष्य की पशुता से भागकर शरण माँगनेवालों को टिकने का कहीं कोई ठिकाना होता! शरणार्थियों को ये बनी-बनायी बारकें यों मिल गयी गोया इन्हीं के लिए बनाई गयी हों। इन्हीं बारकों में अपने घरबार, खेती-किसानी, दुकानदारी से उखड़े हुए लोग अपना सारा सामान लिये-दिये पड़े थे। टीन के बड़े बक्स, मँझोले बक्स, छोटे बक्स, खाटों के पाये-पाटियाँ, सुतली या बाध, सब अलग-अलग मोड़कर रखी हुईं; चटाइयाँ, एकाध बाल्टी, लोटा, थाली, कनस्तर किसी-किसी के पास अपना हुक्का भी। यही उनकी सारी गिरस्ती थी। इसी गिरस्ती के घिरे-बँधे वे इस नई दुनिया में अपने लिए जगह बना रहे थे। बीवियाँ कुएँ से पानी ला रही थीं या रोटी पका रही थीं और बच्चे धूल में सने, कुछ सहमे-सहमे-से खेल रहे थे, लोहता की खाक का मिलान हजारा की खाक से करके यह पता लगा रहे थे कि पशुता के कीटाणु कहाँ ज्यादा हैं और अपने जेहन से उन डरावनी शक्लों को निकालने की कोशिश कर रहे थे, जिन्होंने उनकी नादान जिन्दगी को भी चारों तरफ से डर की रस्सियों से कस दिया था।4
इसी प्रकार चारा काटने की मशीन में उपेंद्रनाथ अश्क ने विस्थापन तथा दूसरों के घरों में कब्जा जमा लेने की एक घटना को व्यंग्यात्मक तरीके से अभिव्यक्त किया है। सरदार लहनासिंह चारा काटने की मशीन बेचा करते थे। विभाजन के समय इस्लामाबाद में मुसलमान भी अपनी जान की सलामती के लिए अपने-अपने घरों को छोड़कर भाग रहे थे। सरदार लहनासिंह की पत्नी ने जब सुना कि और लोग अब छोड़े गए मकानों में कब्जा जमाने लगे हैं तो वह भी उन्हें उकसाने लगी। सरदारनी की बात सुनकर वे भी इस्लामाबाद की गलियों में बढ़िया मकान ढूंढने निकलते हैं। संयोग से उन्हें अपना मित्र गुरदयालसिंह मिल जाता है जो एक मकान पर अपना कब्जा जमाने के लिए ताला तोड़ रहा होता है। लहनासिंह भी गली में एक घर ढूंढ लेते हैं। उस पर अपना कब्जा जमाने के लिए वे अपने साथ लाया बड़ा ताला लगा देते हैं। तभी उन्हें खयाल आया कि यदि वह अपने साथ दो-चार सामान भी लाए होते तो सही था। वह वापस जाकर घर का सामान बैल गाड़ी पर लादकर ले जाने लगते हैं तब उनकी सरदानी भी उनके साथ जाने का अनुरोध करती है। तब लहनासिंह उसे समझाते हैं कि जब और लोगों की औरतें भी वहाँ आकर रहने लगेगी तो वे उसे भी बुला लेंगे, क्योंकि वे यह जानते थे कि दंगे-फसाद में ज्यादातर औरतों को ही सहना पड़ता है इसलिए वे उसे उस गली में तब तक नहीं ले जाना चाहते थे जब तक कि वहाँ रहने लायक परिस्थिति न बने। लेकिन जब वे वहाँ अपना सामान लेकर पहुँचते हैं तब वहाँ और सरदारों के साथ उनकी पत्नियों को देखते है तो उन्हें भी अपनी भूल समझ में आ जाती है। वे तुरन्त अपना सामान नए मकान में रखकर अपनी पत्नी और बच्चों को लेने चलते हैं। जब वे लोग वापस अपने नए मकान में आते हैं तो देखते है कि वहाँ किसी दूसरे सरदार ने कब्जा जमा लिया है तथा उनके सारे सामान सिवाए चारा काटने की मशीन को छोड़कर सबकुछ पर भी कब्जा जमा लिया गया है। वे आगे बढ़कर जब यह कहना चाहते थे कि इस मकान पर उन्होंने कब्जा किया है तो दूसरे सरदार लड़ने पर आ जाते हैं। मजबूरन उन्हें वहाँ से दुबारा अपने पुराने मकान के डेरे पर वापस लौटना पड़ता है और उनके साथ उनकी चारा काटने की मशीन सिर्फ वापस आती है। इस कहानी में लोगों की विवशता, उनके विस्थापन, उनकी उम्मीद भले ही वह दूसरों के घरों की बदौलत ही हो, उनकी मानसिक दशा आदि को अश्क ने बहुत ही नाटकीय ढंग से प्रस्तुत अवश्य किया है किन्तु तत्कालीन समय में यह सब यथार्थ मे हो रहा था।
इसी प्रकार मुबीना या सकीना कहानी में लेखक गुरबख्श सिंह ने विभाजन के समय के भय, आतंक, लोगों के विस्थापन, मित्रों तथा परिजनों से बिछुड़न की कहानी को प्रस्तुत किया है। कहानी के मूल में कासम तथा जीनत नामक एक दम्पती की कथा है जो गाँव के जैलदार हासम अली के बेटे-बहू हैं। जैलदार का मित्र सरदार है। चारों तरफ गाँवों में हमले तथा लूटमार की खबरें उड़ रही थीं। जैलदार को इन बातों पर यकीन नहीं था। वह सोच रहा था कि ये सब अफवाहें हैं लेकिन जब उनके सरदार मित्र ने उन्हें खतरे से आगाह किया तो वे दुखी हो गये। उन्होंने गाँव की बड़े मस्जिद में सभा करवायी और सभी मुसलमानों को गाँव छोड़कर कहीं दूसरी सुरक्षित जगह चले जाने को कहा। लेखक ने यहाँ इस विभाजन से दुखी होते लोगों की मजबूरियों तथा गुस्से को एक छोटे-से क्षण में अभिव्यक्त कर दिया। यथा -- गाँव वापस लौटकर जैलदार ने बड़ी मस्जिद में एक सभा की और गाँव खाली कर देने का निर्णय लिया। सारे गाँव में विलाप होने लगा। रोते-धोते लोगों ने गठड़ियाँ बाँधीं, सिख बच्चों के साथ खेलते बच्चों को डरा-धमकाकर घर वापस लाया गया। किहरू ने शराज की बाँह पकड़ ली, ''नहीं ताई, इसको मैं नहीं जाने दूँगा।'' शराज की माँ ने यह कहते हुए कि इस गाँव से हमारा दाना-पानी उठ गया है, बेटे की बाँह छुड़ा ली।5 जैलदार का बेटा गाँव में रहना चाहता था और वह अपने पिता को समझा रहा था कि वह बाद में हर हाल में सुरक्षित अपनी पत्नी और बच्ची के साथ आ जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है। अंत में उन्हें वहाँ से भागना पड़ता है लेकिन मजबूरन उन्हें अपनी बच्ची मुबीना को छोड़कर भागना पड़ता है। वजह यह है कि यदि बच्ची रो पड़ी तो दंगाई आ जाएंगे और सब-के-सब मारे जाएंगे। विडम्बना की बात है कि ऐसी परिस्थिति के कारण कितने ही बच्चे अपने माता-पिता से बिछड़ गए। उन बिछड़े बच्चों के साथ क्या हुआ होगा या वे अपने माता-पिता से दुबारा मिल भी पाए थे या नहीं? बाद में उनकी बच्ची मुबीना एक चंगड़ दम्पती के हाथ लग जाती है। इधर जीनत अपनी बच्ची के लिए तड़पती रहती है। जब चंगड़ दमपती भी गाँव से निकलकर कैम्प पहुँचते हैं तब किसी तरह जीनत और कासम को अपनी खोयी हुई बच्ची की खबर मिल जाती है। लेकिन चंगड़ी बच्ची को वापिस करने को राज़ी नहीं होती क्योंकि उसके कोई औलाद नहीं थी। विभाजन में जहाँ पुरुषों में हैवानियत भरती जा रही थी वहीं स्त्रियों में मनुष्यता प्रबल होती जा रही थी। जीनत और चंगड़ी अंत में बच्ची को एक-साथ रहकर लाड-प्यार करते हुए रहने को तैयार हो गयीं।
            विभाजन में जहाँ हम इस प्रकार के घटनाओं को देख पाते हैं वहीं कई और ऐसी घटनाएँ भी घटी हैं जिनमें मनुष्यता कहीं प्रबल हो रही है तो कहीं मनुष्य के भीतर का दानव प्रबल रहा है। साथ-ही-साथ भुक्त-भोगी लोगों की मानसिकता पर भी एक विचित्र प्रकार का प्रभाव पड़ रहा है, वे इस विभाजन के विरुद्ध हैं। उन्होंने चूंकि वर्षों से दोनों देशों तथा उसकी संस्कृतियों को एक साथ ही पनपते देखा है तथा वे इसी मिली-जुली संस्कृति में पैदा हुए हैं तो फिर कैसा ये विभाजन और कैसी ये कौम की सेवा। उनका विरोध इसीलिए और अति तीव्र हो जाता है। वे न सिर्फ इससे दुखी हैं बल्कि कई लोग तो ऐसी मानसिक दशा में पहुँच चुके हैं कि उन्हें दुनिया कि नज़रों में पागल कहा जा सकता है। परन्तु यदि ऐसा पागलपन सबमें होता तो शायद आज यह दो देश होने के बजाय एक महा देश होता और दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता था।
          भीष्म साहनी द्वारा लिखित कहानी अमृतसर आ गया है में लेखक ने दंगे की तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण किया है। पाकिस्तान बनाए जाने का एलान हुआ था और इसके कारण हर जगह ही मार-काट मची हुई थी। लोग अपनी जान बचाने के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे थे। लेखक भी उस ट्रेन में बैठा हुआ था। वहाँ बैठे अन्य मुसाफिरों से बातें हो रही थीं। हर कोई अपने-अपने इरादे से हिन्दुस्तान जा रहा था। लेखक के साथ एक सरदार, दो-तीन पठान तथा एक बाबू बैठे हुए बातें कर रहे थे। लेखक हिन्दुस्तान में आज़ादी का जश्न देखने जा रहा था। वजीराबाद स्टेशन पर जब गाड़ी रुकती है तो वहाँ की परिस्थिति बहुत खराब मिलती है। दंगे के कारण हर किसी पर आतंक छाया हुआ है। जब एक मुसाफ़िर पानी लेने स्टेशन में उतरता है तो वह दुबारा दौड़कर डर के मारे वापस आ जाता है। उसी वक्त एक आदमी अपनी पत्नी और बेटी को लेकर डिब्बे में घुसना चाहता था। परन्तु डिब्बे में सवार पठान उसे लात मारकर भगा देता है। गाड़ी जब स्टेशन से बाहर निकलती है तो आस-पास के दंगे तथा आगज़नी के नज़ारों से सभी डर जाते हैं। सभी सहमे-सहमे एक-दूसरे की तरफ देखने लगते हैं। तभी  गाड़ी एक और स्टेशन पर जाकर रुकती है। वहाँ एक भिश्ती लोगों को पानी पिलाने चला आता है। लेखक ने इस प्रसंग को ऐसे प्रस्तुत किया है हाँ, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लाँघकर आया और मुसाफिरों को पानी पिलाने लगा। लो, पियो पानी, पियो पानी। औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आए थे।बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मारे गए हैं। ... लगता था, वह इस मार-काट में अकेले पुण्य कमाने चला आया है।6 इस प्रकार देखा जाता है कि कुछ लोगों में मनुष्यता बाकी थी, नहीं तो आज उतने लोग भी जिन्दा न बचे होते दंगों में जितने बच गए थे। जहाँ देखो कट्टरवाद तथा युद्धोन्माद ही भरा पड़ा था, वहीं मानसिक रूप से त्रस्त लोगों की भी कमी नहीं थी। उन्हें यह विभाजन किसी भी प्रकार से सह्य नहीं था।
            सरहद के इस पार  में लेखिका नासिरा शर्मा ने रेहान नामक एक ऐसे पात्र को चित्रित किया है जो कि मानसिक रूप से परेशान है। वह एक पढ़ा-लिखा नौजवान है। वह पी. एच. डी कर रहा था, लेकिन उसका मन उजाड़ हो गया। उसे सुरैया नामक एक लड़की से प्रेम था। परन्तु सुरैया के घर वालों ने ये रिश्ता कुबूल नहीं किया। वहीं वह दो साल से नौकरी की तलाश में था। इन सब परिस्थितियों के कारण वह पागल-सा हो गया था। कुछ दो दिन पहले हिन्दू-मुसलमान दंगे होते हैं और फिर वातावरण शान्त होता है, लेकिन सबके मन में एक दहशत भरी हुई है। ऐसे में रेहान कभी-कभी चीखता-चिल्लाता दंगाइयों पर अपना गुस्सा निकालता है। वह जिस गली में रहता है वहाँ सभी घर हिन्दुओं के हैं और कुछ दो-चार घर ही हैं जो मुसलमानों के हैं। फिर भी वह हिन्दुओं को कातिल कहता है। क्योंकि उसे दुख है तो इस बात का कि जिस धरती पर उसके पूर्वजों ने साथ मिलकर जन्म लिया, पले-बड़े, जहाँ  मरकर वे इसी मिट्टी में दफ्न हुए, वहीं से उसे पाकिस्तानी कहकर भगाया जा रहा है। वह इस बात का कड़े तौर पर विरोध करता है, पर हर कोई उसे पागल समझता है। उसकी बातों को सभी नज़र-अंदाज़ करते हैं। घर वाले इस बात से डरते हैं कि कहीं किसी को यह बात बुरी लग गयी तो उसे जान से मार दिया जाएगा। तो उसकी दद्दा समझती है कि किसी ने उसपर जादू-टोना किया है। रेहान को बहुत गुस्सा आता है क्योंकि कोई उसकी बात समझने को तैयार नहीं है। उसी के मोहल्ले में रहनेवाला एक हिन्दू पण्डित नारायणजी डॉलर और पाउंड के लालच में मन्दिरों की मूर्तियों का सौदा करता है लेकिन उसे कोई नहीं गद्दार कहता, जबकि रेहान जो कि अपने वतन में जीना चाहता है उसे सब लोग या तो पागल या फिर पाकिस्तानी कहकर भगा देना चाहते हैं। वह दुबारा हुए दंगे-फसाद के कारण पागल हो उठता है और कहने लगता है मारो कातिलों को, मारो मेरे कातिलों को। सब नामर्द अन्दर बैठे हैं। कोई नहीं बाहर निकलता है। यह मेरा वतन है, मेरा वतन। देखता हूँ, कौन मुझे जीने से रोकता है? हिम्मत है तो आओ, निकलो।7 परन्तु रेहान के शकूर चचा उसे इसके लिए लात-घूसों से मारकर उसे ठीक करते हैं। उनकी नज़रों में रेहान की ये सब बातें बेहूदी हैं। उन्हें रेहान के सच्चे दिल से निकली बातों की कोई फिक्र नहीं बल्कि उन्हें मोहल्ले में शरमिंदगी झेलनी पड़ती है। गली में कर्फ्यू शुरू होने से पहले एक बम फटने की आवाज़ सुनायी पड़ती है। शकूर चचा के एक पहचान वाले कल्लन मियाँ बम फटने से मर जाते हैं। अफजल, उनका बेटा, बम बनाते समय बम फटने से मर जाता है। लेखिका ने यहाँ लोगों के मन में जहाँ नफरत या मानसिक विक्षिप्तता को दर्शाया है, वहीं नौजवानों को दहशतगर्द बनते हुए भी चित्रित किया है। तत्कालीन दंगे के वातावरण में चाहे किसी के पास खाने के लिए रोटी न हो, रहने को घर न हो परन्तु दूसरे धर्म को लोगों को कुचलने के लिए, मारने के लिए हथियार जरूर थे। रेहान रात को अधीर हो छप्परों के ऊपर टहल रहा होता है कि तभी उसे कहीं से एक लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनायी देती है। वह दलान में से नीचे उतरता है और आवाज़ की ओर जाता है। कमरे के भीतर एक हिन्दू लड़की को उसके मुसलमान दोस्त कर्फ्यू की अफ़रा-तफ़री में उठा लाते हैं। रेहान जब उनका विरोध करता है तो वे लोग उससे कहने लगते हैं कि दिन-भर तो तुम हिन्दुओं के बारे में बुरा-भला कहते हो और रात को इस लड़की के लिए हमदर्दी! रेहान उनकी बात नहीं मानता है और उस लड़की को उन लड़कों से बचाकर उसके घर पहुँचा आता है। रेहान को बाद में वही लड़के जान से मार देते हैं। लेकिन यहाँ लेखिका ने रेहान के भीतर जिस पागलपन या कहें देश के प्रति उसमें जो प्रेम है तथा उसके जरिये जिस नयी विचारधारा को प्रस्तुत किया गया है, वह सराहनीय है। रेहान के लिए विभाजन उन लोगों का पागलपन था जिन्हें वास्तव में देश से कोई प्रेम नहीं था तथा जो सिर्फ धार्मिक बने हुए थे।
वहीं टोबा टेक सिंह  पर लेखक उदय प्रकाश अपनी बात इस प्रकार कहते हैं कि  भारत-पाकिस्तान के बंटवारे विभाजन पर अनेक कहानियां, उपन्यास, समाजशास्त्रीय-राजनीतिक विश्लेषण आदि लिखे गए, लेकिन सआदत हसन मंटो की कहानी – 'टोबा टेक सिंह'-इस विभाजन के पीछे सक्रिय राजनीति और सांप्रदायिकता के उन्माद की अविस्मरणीय, सार्वभौमिक, कालजयी क्लासिक बन गई। जब पाकिस्तान के पागल बिशन सिंह को उसके गांव टोबा टेक सिंह से निकाल कर हिंदुस्तान भेजा जाता है तब वह दोनों देशों की सरहद पर मर जाता है।उसके शरीर का आधा हिस्सा हिंदुस्तान और आधा पाकिस्तान की सीमा में आता है। मरने से पहले पागल बिशन सिंह की गाली, भारत और पाकिस्तान के लहूलुहान बंटवारे पर एक ऐसी टिप्पणी बन जाती है, जो अब विश्व-कथा-साहित्य में एक गहरी, मार्मिक, अविस्मरणीय मनुष्यता की चीख़ के रूप में हमेशा के लिए उपस्थित है :"गुड़-गुड़ दी एनेक्सी दी वेध्याना दी मूंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ़ दी दुर्र फिट्टे मुंह......!" यह पागल, अराजक, निरर्थक, अतार्किक वाक्य 1947 के सांप्रदायिक उन्माद और देश के विभाजन के पीछे सक्रिय राजनीति की 'एबसर्डिटी' और पागलपन पर एक कालजयी टिप्पणी है.8
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विभाजन ने जहाँ तक सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक विभाजन या बिखराव किया वहीं इसने समाज में रहनेवाले भोले-भाले लोगों की मानसिकता को भी झकझोरकर रख दिया है और उनसे उनकी ज़िन्दगी, मासूमियत सबकुछ छीन लिया। उनके अपने भी उनसे बिछड़ गए। इस विभाजन ने कितना कुछ छीना है, क्या कुछ गुजरी है लोगों पर यह कहानियों में व्यक्त होते होते नहीं रुकती हैं और उसके फैलाव को आज हम नए-नए मोड़ पर देखते जा रहे हैं। बस, यह आशा रख सकते हैं कि भविष्य में ये विभाजन और न फैले।


संदर्भ ग्रन्थ :
1.    भारत विभाजन के गुनहगार( गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन) डॉ राममनोहर लोहिया ( अनु. ओंकार शरद), लोकभारती प्रकाशन, 2007, पृ.सं. 49.
2.    खोयी हुई खुशबू अफ़जल अहसन रंधावा, हिन्दी समय डॉट कॉम, विभाजन की कहानियाँ.
3.    बेज़बान द्रोणवीर कोहली, वही.
4.    व्यथा का सरगम अमृत राय, वही.
5.    मुबीना या सकीना- गुरुबख्श सिंह, वही.
6.    अमृतसर आ गया भीष्म साहनी, वही.
7.    सरहद के उस पार नासिरा शर्मा, वही.
8.    http://www.bbc.com/hindi/india/2013/09/130917_hindi_diwas_stories_akd.


Friday, 8 May 2015

उषा प्रियंवदा की कहानियों में निहित अकेलेपन की समस्या।




              
          उषा प्रियंवदा हिन्दी कथा जगत् में विशिष्ट कथाकार के रूप में जानी जाती है। 1961 में इनका पहला कहानी-संग्रह फिर बसंत आया पाठक जगत् के सामने आया और उसके बाद उनकी कई कहानी एवं उपन्यास पाठक जगत् को मिलते गए। उषा प्रियंवदा की इन सभी कथाओं में यथार्थ युगबोध निहित है। बदलते आधुनिक भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्तों में बदलाव, बेकारी, अकेलापन, उदासी, नारी अस्मिता जैसी कई महत्त्वपूर्ण विषय उनकी कथाओं में अभिव्यक्त हुई है। वैसे तो उनकी कहानियाँ विभिन्न प्रकार के मुद्दों को लेकर होते है लेकिन सभी कहानियों में कुछेक तत्व समान रूप से दिखायी पड़ते है। वे है अकेलापन, उदासी, निराशा इत्यादि जो कि आज के आधुनिक भौतिकवादि जगत् की देन है। लोग आज अपने जीवन में भौतिक सुखों की तलाश में सबसे ज्यादा भटकते है, साथ में यह भी कह सकते हैं कि वे अन्य सुखों की तलाश में भी भटकते रहते है जिसके कारण वे अपने आस-पास की ज़िन्दगी में जो कुछ भी है या जो कोई भी है उनसे दूर हो जाते है या कट जाते है जिससे साथ वाला अकेला हो जाता है। अतः उषा जी ने अपनी कहानियों में जो कुछ भी व्यक्त किया है वह हमारे सामने कई सवाल विचार के लिए छोड़ जाती है। इसलिए उनकी कहानी इस दौर में ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उनके कहानी लिखने की एक विशेष कला है कि वे अपने मुद्दों को सीधे-सीधे बयान नहीं करतीं बल्कि एक विशेष वातावरण तैयार करती हैं जिसमें पात्र चढ़ता-उतरता रहता है। उनके मानसिक उतार-चढ़ाव, उनके व्यवहार, उनकी बात-चीत आदि से ही सारी स्थिति स्पष्ट हो जाती है। उनकी कहानियों की विशेषता की चर्चा करते विजयमोहन सिंह का कहना है कि उनकी कहानी एक विशेष प्रकार का मानसिक तथा परिवेशगत वातावरण रचती है, जिसमें उदासी, अकेलापन और बाहर या दूसरे से न जुड़ पाने की एक अभिशप्त स्थिति अंकित की जाती है। वह प्रायः उच्च शिक्षा प्राप्त कामकाजी आधुनिक स्त्री की नियति बन जाती है। खासतौर पर एक ऐसी स्त्री जो स्वतन्त्र, निजी और लीक से तनिक हटकर जीना चाहती है। यद्यपि उनकी सर्वाधिक चर्चित कहानी वापसी एक भिन्न प्रकार की कहानी है। उसमें एक सेवानिवृत व्यक्ति का अभिशप्त रूप व्यक्त किया गया है। वह वापस उसी दुनिया में (परिवार) नहीं जा सकता जहाँ वह जाना चाहता है, या जा सकता है। आधुनिक पारिवारिक संरचना की यह अनिवार्य नियति है।1
उषा प्रियंवदा की कहानियों में जो निहित युगबोध है उसमें सबसे अधिक स्वर जो उभरकर आता है वह है अकेलापन और उदासी। आज इस भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में व्यक्ति चाहे कितना भी अपने मित्र, परिचित, प्रेमी या परिवार के साथ रह ले लेकिन कही-न-कही से कभी-न-कभी वह अपने-आप को अकेला महसूस करता है उदास रहने लगता है और अकेलेपन की ओर अग्रसर होता है। क्योंकि उसके मन में वर्तमान परिस्थिति में जो कुछ भी घटित होता है उसे वह स्वीकार नहीं कर पाता। उसके प्रतिकूल यदि कोई बात हो जाए तो वह जैसे उससे भागता फिरता है। साथ ही व्यक्तिगत जीवन में हर प्रकार की सुख-सुविधा की चाह की भाग-दौड़ में वह या तो सबको पीछे छोड़ आता है और फिर अकेला हो जाता है या साथ वाले को अकेला बना देता है। उषा प्रियंवदा की कुछ ऐसी ही कहानी है जिसमें आज के युग की सबसे बड़ी चुनौति अकेलेपन की समस्या जो या तो परिस्थितियों ने खड़ी की है या व्यक्ति ने स्वयं चाहा है। इस समस्या को उनकी कुछ प्रमुख कहानियों में देखा जा सकता है जो हे वापसी, सम्बन्ध, नींद, ज़िन्दगी और गुलाब के फूल, स्वीकृति। इन सभी कहानियों के स्त्री या पुरूष पात्र किसी-न-किसी कारण से अकेले नज़र आते हैं। इन सभी कहानियों में पात्र अपने अकेलेपन से छुटकारा भी पाने की कोशिश करते है तो कही वे अकेलेपन में ही जीना चाहते है। सभी कहानियों में परिवेश भिन्न है, परिस्थिति भिन्न है परन्तु समस्या एक ही। वापसी कहानी की बात की जाए तो इसका पात्र गजाधर बाबू पैंतीस साल की नौकरी से रिटायर्ड होकर घर लौटता है लेकिन परिवार के लोगों की उनके प्रति व्यवहार तथा उदासीनता ने उन्हें अकेले कर दिया है। जहाँ वे एक तरफ अपने परिवार से जुड़ना चाहते है वही उनके परिवार वालों को उनकी उपस्थिति खटकती रहती है। अंततः हारकर वे वापस अपनी उसी अकेलेपन की दुनियाँ में चले जाते हैं जहाँ से वह लौटे थे। यहाँ तक कि उनके चले जाने के बाद उनकी चारपाई तक को भी कमरे से बाहर निकाल देने के लिए उनकी पत्नी कह देती है। जिसके लिए गजाधर बाबू जो कि उसके पति है उससे कोई नाता नहीं बल्कि कमरे और डिब्बे-बर्तनों से है। एक दूसरी जगह छोटी-सी नौकरी करके वह अपने जीवन के इर्द-गिर्द घिरे अकेलेपन को भरना चाहते हैं।2
          सम्बन्ध कहानी की मुख्य पात्र है श्यामला। श्यामला एक पढ़ी-लिखी महिला है। जो कि विदेश में रहती है। एक समय उसका भी भरा-पूरा परिवार था जिसकी जिम्मेदारियाँ उसे उठानी पड़ती थी, लेकिन जब उसके परिवार के सभी लोग अपने-अपने जीवन में स्थिर हो जाते हैं तो वह उन्हें छोड़कर विदेश चली आती है। उसके परिवार वाले बीच-बीच में उसे वापस लौट आने के लिए कहते हैं लेकिन वह उन सबसे कटकर अकेले अपनी इच्छानुसार जीवन बीताना चाहती है। विदेश में रहकर वह फ्रीलांस काम करती है। वह सर्जन नामक एक व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है जो कि एक डॉक्टर है। सर्जन जहाँ काम करता है उसी अस्पताल के पास वाली पहाड़ी के एक कॉटेज में अकेले रहती है। सर्जन नियमित रूप से उससे मिलने उसके कॉटेज आता-जाता रहता है। सर्जन उससे प्यार करता है और श्यामला भी उससे प्यार करती है। लेकिन उसे किसी भी प्रकार की कमिटमेंट वाली ज़िन्दगी नहीं चाहिए। सर्जन ने जब उससे एक बार अपने प्यार का ज़िक्र करते हुए कहा था कि वह अपने परिवार को छोड़कर उसके पास आ जाएगा तब श्यामला कह उठती है क्या हम ऐसे ही नहीं रह सकते, प्रेमी, मित्र, बन्धु। क्या वह सब छोड़ना ज़रूरी है ? मैं तो कुछ नहीं माँगती।3 वस्तुतः श्यामला सर्जन के मुताबिक जीती नहीं। श्यामला सबसे कटकर रहती है जिसे वह देख नहीं पाता। उषा प्रियंवदा ने श्यामला के अकेलेपन की चाह तथा उसकी अपने प्रति की उदासीनता को सर्जन के मन में उठ रही भावनाओं के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त किया है वह लेटा-लेटा श्यामला को देखता है, दुबली-पतली साँवली श्यामला, अविवाहित शरीर अभी भी गठा हुआ है, उसमें युवावस्था की लचक है, चेहरे पर लावण्य आकर थम गया है, कभी-कभी नींद में उसकी बाँहें सर्जन को ऐसे कस लेती हैं, जैसे कभी अलग न होने देंगी और वह कहती है कि मन में कुछ नहीं बचा। कभी-कभी वह उसके कन्धे झिंझोड़कर कहना चाहता, जागो श्यामला, यह वैरागीपन तुम्हारा सहज स्वभाव नहीं है। हँसो, बोलो, आकंठ डूबकर प्यार करो, पर वह अब कहता नहीं। सिर्फ़ उस दिन की आशा में है जब श्यामला अपने आप जागेगी। अपने को काटकर रखने की बजाय जुड़ना चाहेगी। पर कभी ऐसा होगा भी?4 श्यामला के इस प्रकार अकेले स्वतंत्र रूप से रहने के पीछे उसके स्वार्थ-भरे सुख की चाह है। लेकिन यह अकेलापन उसकी भटकन है जो उसने खुद चुनी है। वह अपनी भावनाओं को भी मन में गहरे अंधेरे में छोड़कर जीने लगती है तभी कहानी में एक मोड़ आता है। कहानी की शुरूआत में एक लड़की जो कि सर्जन के चिकित्साधीन थी वह मर जाती है जिससे सर्जन को बहुत दुख होता है। वह लड़की वासत्व में भारतीय थी और श्यामला से उसके कॉटेज में मिलती है जिससे श्यामला की मित्रता होती है। श्यामला को जब पता चलता है कि वह लड़की वही है तो वह अपने-आपको रोक नहीं पाती और रोने लगती है और तब सर्जन उसे नहीं रोकता क्योंकि वह चाहता है कि श्यामला में फिर से भावनाओं का स्त्रोत उमड़ आए।
          वही नींद कहानी की नायिका अपने पति से अलग हो जाने का दर्द पाती है। वह विदेश में उसके पति के साथ आकर रहती है लेकिन दोनों अलग हो जाते है। उसे यह अकेलापन बहुत खटकता है वह उससे डरती है मैं बहुत कम चीज़ों से डरती हूँ न रोग से, न गरीबी से, न ठंड से, डरती हूँ तो बस एक लम्बी, अँधेरी रात के अकेलेपन से। और, उसके त्राण के लिए ही इधर-उधर भटकती हूँ।5 वह अकेलापन दूर करना चाहती है। उसे रात को अकेले नींद नहीं आती है। डॉक्टर उसे बचाना चाहता है। डॉक्टर के मुताबिक यह उसकी मानसिक बिमारी है जिससे उभरकर वह यदि आ जाए तो फिर से अपना घर बसा सकती है। लेकिन वह नहीं मानती कि वह बीमार है । वह कहती है भी है कि नहीं, मैं रूग्ण नहीं हूँ, न मुझमें कोई मानसिक विकृति है। वह डॉक्टर, मेरा मनोविद् झूठ कहता है। मैं पूर्णतया स्वस्थ हूँ। मैं केवल साथ ढूँढती हूँ, कम्पेनियनशिप, तुम्हें जिलाए रखने के लिए।6  कहानी के अंत में नायिका अपने पुराने घर जहाँ वह और उसका पति आकर रहा करते थे वहाँ जाती है। उसकी पति के साथ बीते वक्त को तलाशने। उसे इस अकेलेपन ने बहुत सताया है जिससे उसे नींद नहीं आती और वह नींद की गोलियाँ लेती है। वह उसी टूटे घर के कमरे में अंत में बैठकर उन गोलियों के सहारे सो जाती है।
          ज़िन्दगी और गुलाब के फूल   कहानी में सुबोध भी इसी प्रकार के अकेलेपन, खालीपन तथा उदासी की ओर अग्रसर होता है। सुबोध कभी अच्छी नौकरी किया करता था। तब उसके परिवार में उसकी अच्छी स्थिति थी। परन्तु जब सुबोध ने आत्मसम्मान के खातिर नौकरी छोड़ दी तो उसकी स्थिति खराब हो जाती है। उसकी बहन वृन्दा की नौकरी लग जाने के बाद उसके साथ परिवार में नौकरो जैसा बर्ताव होने लगता है। उसके कमरे से कालीन, मेज, अरामकुर्सी आदि सबकुछ वृन्दा के कमरे में भेज दी जाती है। उसका खाना भी उसके कमरे में यू ही ठण्डा पड़ा रहता है। यहाँ तक कि उसकी शोभा नामक लड़की से विवाह होने वाला था वह भी टूट जाता है। बार-बार अपनी बहन से आहत होते रहने पर एक बार वह झूंझला उठता है कितने दिनों से गन्दे कपड़े पहन रहा हूँ। पन्द्रह दिन में नालायक धोबी आया, तो उसे भी कपड़े नहीं दिये गये। तुम माँ बेटी चाहती क्या हो ? आज मैं बेकार हूँ, तो मुझसे नौकरों-सा बर्ताव किया जाता है। लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर।7 अंततः वह अपनी उदासी और खालीपन के साथ समझौता करते हुए जीने पर विवश हो जाता है। डॉ देवेच्छा के शब्दों में आत्मसम्मान के एक बिन्दु पर सुबोध अपनी नौकरी से त्याग-पत्र देता है। कोई और काम न मिलने के कारण उसकी स्थिति बिगड़ने लगती है। घर में वह व्यर्थ होने लगता है और निरन्तर उपेक्षा के क्रूर कशाघात पाने लगता है। शोभा का अन्यत्र वाग्दान हो जाता है। यह स्थिति उसे तोड़ जाती है। शोभा का प्रस्तावित पति उसके और शोभा के बीच तीसरा व्यक्ति बनकर आता है और उसे न केवल शोभा से ही अपदस्थ करता है प्रत्युत संपूर्ण परिवार में स्थगित कर जाता है।8 यहाँ जो सुबोध के साथ उपेक्षा का व्यवहार सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि वह बेकार है घर की आर्थिक जिम्मेदारी नहीं ले सकता। निरंतर मिल रही उपेक्षा एवं क्रूर व्यवहार से सुबोध के आत्मसम्मान को ही गहरा आघात मिलता है जिससे उसके जीवन में उदासी और अकेलापन छा जाता है। जिस कारण वह न तो घर सही समय पर आता है न उसे घर में चल रही गतिविधियों में कोई रुचि रह जाती है।
          स्वीकृति की जपा को भी अकेलेपन का दंश झेलना पड़ता है। जपा अपने पति के सत्य के साथ अमेरीका रहने आती है। उसके मन में नए विवाह के बाद एक सुन्दर संसार गढ़ने की होती है कि सत्य उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मिशिगन में पंद्रह सौ डॉलर नौकरी पर लगवा देता है क्योंकि सत्य को अपने लिए एक बड़े घर की चाह है, सुन्दर फर्निचर और महंगे टाइल्स के साथ जिसके लिए वह जपा को कड़े तेवर में समझाता है कि वर्तमान परिस्थिति में वे लोग जिस प्रकार रह रहे हैं वहाँ इस प्रकार की नौकरी की आवश्यकता है और फिर वही उसे अकेला छोड़ आता है। जपा जब-जब भी अपने विवाहित संसार को बसाने की बात करती है तब-तब सत्य उसे रोक देता है। शादी की पाँचवी वर्षगांठ मनाने पहुँचे जपा के मन में किसी भी प्रकार की उमंग या अपेक्षा के बजाए ठंडेपन और निरपेक्षता का भाव है जो उसे सत्य से बार-बार प्राप्त होता रहा है। सत्य की इच्छानुसार ही उसे चलना पड़ता है जिस कारण वह इसी विवाहित जीवन से ऊब सी महसूस करने लगती है। वह अपने सहकर्मी (वाल) के प्रति आकर्षित होती है तथा उसके साथ कुछ अच्छे पल बिताती है। पाँचवी वर्षगांठ मनाने के लिए जब सत्य उसे वाशिंटन द्वीप ले आता है और जपा उससे यहा आने का कारण पूछती है तो सत्य का जवाब कि प्रोफ़ेसर साइमन ने सुझाया था। उन्होंने कहा कि यहाँ आकर या तो सम्बन्ध दृढ़ हो जाते हैं, या फिर टूट ही जाते हैं, बिलकुल।9  यह सुनकर उसे आश्चर्य होने लगता है। रिश्ते में बन्धे होकर भी इस प्रकार की बात करना वस्तुतः मन के भीतर के खालीपन को दर्शाता है। यही एकाकीपन आगे चलकर विभिन्न रूपों में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ एवं समस्याएँ खड़ी करता है। जिसे हम अलग-अलग समझ बैठते हैं। सम्बन्धों का विखराव या टूटना ही या उसके प्रति उदासीनता का भाव ही व्यक्ति को पहले अपने-आप में ही अकेला कर देता है। जो कि उषा प्रियंवदा की कहानियों में बार-बार उभरकर आती है। परिवार में साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के मनोभावों को न समझना, उनकी उपेक्षा करना इसी प्रकार की समस्याओं को जन्म देता है। अपनों से पाए इस प्रकार के आघातों से व्यक्ति परेशान होता है, अपने-आप को अकेला पाता है तथा इससे निबटने के लिए दूसरे-तीसरे व्यक्ति का सहारा लेने की कोशिश करता है। वह पहले से नहीं जुड़ पाता तो दूसरे से जुड़ना चाहता है लेकिन वह जुड़ाव पूर्ण नहीं हो पाता है। वह व्यक्ति स्वयं को खालीपन से बाहर निकलने के लिए भटकता रहता है। जब वह ऐसा नहीं कर पाता तो गहरी उदासी में डूबता चला जाता है। हालांकि उषा प्रियंवदा की कहानियों में अन्य समस्याएँ भी स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुई है परन्तु वह एक प्रकार से समग्र आधुनिक समाज की समस्याएँ है।  आधुनिक समाज की समस्याएँ चाहे जैसी भी हो व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती ही है। जिसके परिणाम इस प्रकार निकलकर आते हैं। आज के युग के भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में लोगों के जीवन के मूल्य एवं मान्यताएँ बदलते जा रहे हैं। आर्थिक, सामाजिक तरह-तरह की समस्याएँ व्यक्तिगत रूप से सभी को प्रभावित करते जा रहे हैं, ऐसे में कमज़ोर या परिस्थिति से हारा हुआ व्यक्ति अपने आस-पास से जुड़कर रहने के बजाए सबसे कटने पर विवश हो जाता है या फिर नए रिश्तों की तलाश में भटकता रह जाता है। जब तक वह अपनी तलाश पूरी नहीं कर लेता या उसमें असफल रह जाता है तब तक वह हताशा, निराशा, घुटन, मृत्युबोध, मूल्य संकट, आत्मकेन्द्रियता, अजनबीपन और अकेलेपन से भर जाता है। लिहाजा लेखिका अपनी कहानियों में इन समस्याओं से उभरकर आने के लिए जीवन के आदर्श एवं व्यवहारिक मूल्यों पर आस्था रखने वाले पात्रों की भी संरचना की है जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में भटकने से बच जाए।


संदर्भ :
1.    बीसवी शताब्दी का हिन्दी साहित्य विजयमोहन सिंह, राजकमल प्रकाशन, 2005, नई दिल्ली, पृ. सं 191.
2.    वापसी और अकेली कहानी में व्यक्त अकेलापन मधुछन्दा चक्रवर्ती, मुक्त कथन, अंक 13, RNI No 27186/75. 2009
3.    सम्बन्ध(कितना बड़ा झूठ)- उषा प्रियंवदा, राजकमल प्रकाशन, 2010, पृ.सं 13.
4.    वही पृ.सं 11.
5.    वही (नींद कहानी) पृ.सं 55.
6.    वही (नींद कहानी) पृ.सं 57.
7.    ज़िन्दगी और गुलाब के फूल (कहानी)
8.    पचासोत्तरी हिन्दी कहानी- तीसरे आदमी की अवधारणा महिला कहानीकारों के संदर्भ में डॉ देवेच्छा, आत्माराम एण्ड सन्स, पृ.सं 68-69.
9.    स्वीकृति (कितना बड़ा झूठ)....पृ.सं 75.