पुस्तक का नाम- आत्मा की गहराइयों से: कुसुमों से कंटक तक
कवि का नाम - डॉ ज्ञानेंद्र पाण्डेय
प्रकाशक -Notionpress.com
संस्करण- अक्टूबर 2025
अमेजन पर उपलब्ध है।
समीक्षक - डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
डॉ. ज्ञानेन्द्र पाण्डेय जी की यह कृति मानव मन के उन अनछुए कोनों को टटोलती है जहाँ प्रेम, विरह और आध्यात्मिकता का संगम होता है। पुस्तक का शीर्षक ही इसके भीतर बसे भाव-जगत की झलक दे देता है—फूलों से लेकर काँटों तक का सफर, जो वास्तव में जीवन का ही एक चक्र है।
*भावनात्मक गहराई और शैली*
पाण्डेय जी की कविताओं में एक ऐसी पवित्रता है जो आज के दौर में दुर्लभ है। उन्होंने प्रेम को केवल एक शारीरिक आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि एक 'साधना' के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा सरल है परंतु अत्यधिक प्रभावशाली है, जो सीधे हृदय को छूती है। विशेषकर "नेह की नव-अर्चना" जैसी रचनाओं में उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब वासनाओं का त्याग होता है, तभी सच्चे प्रेम का जन्म होता है।
*विरह और प्रतीक्षा*
पुस्तक में विरह का वर्णन बहुत ही मार्मिक है। "चिर-विरह की साधना" और "झर-झर झरती वेदना" जैसी कविताएँ दिखाती हैं कि कैसे जुदाई भी एक तपस्या बन सकती है। प्रेम में मिली ठोकर और उसके बाद उठने वाले सवाल "प्यार की सौगंध" में बहुत सुंदरता से उकेरे गए हैं।
*विशेष आकर्षण: "चूड़ियों की हुंकार"*
"चूड़ियों की हुंकार" कविता स्त्री के स्वाभिमान और उसकी आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। यह कविता बताती है कि स्त्री का सौंदर्य केवल आभूषणों में नहीं, बल्कि उसकी आवाज़ और उसके अस्तित्व की गूँज में है।
*काव्य पंक्तियाँ जो मन को छू लेती हैं*
पिया चांहि लाऔ गहने हजार
आजु मैं नाहीं पहिरौंगी
लाइलौन .....
मेरो तौ लागो देस में ध्यानु
जिसम पै बखतरु पहिरौंगी
*निष्कर्ष*
यह पुस्तक केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक आत्मा का दूसरी आत्मा से संवाद है। डॉ. पाण्डेय ने शब्दों के माध्यम से विश्वास, समर्पण और दर्द को जो स्वरूप दिया है, वह पाठकों को देर तक सोचने पर मजबूर करता है। आपकी साधारण लेकिन सुसंस्कृत भाषा शैली के अनुरूप यह समीक्षा पुस्तक के हर पहलू को न्याय देती है। शुद्ध और निर्मल प्रेम की खोज करने वालों के लिए यह कृति एक अनमोल उपहार है।
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