प्रस्तावना और पृष्ठभूमि
कौशल्या बैसंत्री द्वारा रचित 'दोहरा अभिशाप' (1999) हिंदी दलित साहित्य की एक मील का पत्थर रचना है। यह आत्मकथात्मक उपन्यास केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह आजादी से पूर्व और उसके बाद के उस शोषित समाज का दस्तावेज़ है जो जाति और लिंग के दोहरे बोझ तले दबा हुआ था। लेखिका ने अपने जीवन के 28 प्रकरणों के माध्यम से नागपुर की श्रमिक बस्तियों से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक के संघर्ष को जीवंत किया है। यह उपन्यास हमें बताता है कि एक दलित स्त्री के लिए अभिशाप केवल बाहरी समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके अपने घर की चारदीवारी भी उससे अछूती नहीं है।
श्रमिक जीवन और परिवार की विडंबना
लेखिका के माता-पिता नागपुर की एम्प्रेस मिल में कठिन परिश्रम करते थे। पिता मशीनों में तेल डालते थे और माँ धागा विभाग में कार्यरत थीं। इस श्रमिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बच्चों की मृत्यु के रूप में सामने आती है। उचित स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और घोर गरीबी के कारण लेखिका की माँ को पाँच बेटियों और बेटों की मृत्यु का शोक मनाना पड़ा। यह समाज की उस भयावह स्थिति को दर्शाता है जहाँ एक माँ के नसीब में केवल बच्चों को खोना लिखा था। इसके बावजूद, माँ का यह दृढ़ संकल्प कि उनकी बची हुई संतानें, विशेषकर बेटियाँ शिक्षित हों, उपन्यास का एक अत्यंत प्रेरणादायी पहलू है।
बस्ती की महिलाओं का नारकीय जीवन और सामाजिक कुरीतियाँ
लेखिका ने दलित बस्ती की महिलाओं की स्थिति का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। यहाँ महिलाएँ न केवल आर्थिक तंगी से जूझ रही थीं, बल्कि वे पितृसत्तात्मक कुरीतियों की भी शिकार थीं। 'पाट प्रथा' (विधवा पुनर्विवाह) जैसी परंपराएँ दिखावे के लिए प्रगतिशील लग सकती थीं, लेकिन वास्तव में वे महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाती थीं। दोबारा विवाह करने वाली महिला को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था और उसे शुभ कार्यों से वर्जित रखा जाता था। लेखिका की अपनी नानी (आजी) का जीवन इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिन्हें बहु-विवाह और पति की प्रताड़ना के कारण घर छोड़ना पड़ा। बस्ती में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा और गाली-गलौज आम बात थी, जहाँ पुरुष अपनी हताशा अक्सर अपनी पत्नियों पर निकालते थे।
जातिगत भेदभाव का जटिल ढांचा
उपन्यास की एक विशेष बात यह है कि लेखिका ने केवल सवर्ण-दलित भेदभाव की ही बात नहीं की, बल्कि दलित समाज के भीतर की उप-जातीय ऊंच-नीच को भी उजागर किया है। महार, माँग, चमार और गोंड जैसी जातियों के बीच रोटी का व्यवहार तो था, लेकिन बेटी का व्यवहार (विवाह) वर्जित था। लेखिका ने दिखाया है कि कैसे भेदभाव की यह जड़ें इतनी गहरी थीं कि एक शोषित वर्ग स्वयं अपने ही भीतर एक और शोषित वर्ग पैदा कर रहा था। सस्ता होने के कारण कसाई से गाय का मांस खरीदकर खाना और गरीबी के कारण पुराने कपड़ों में गुज़ारा करना उस समय की कड़वी सामाजिक सच्चाई थी।
शिक्षा के लिए संघर्ष और पहचान का संकट
लेखिका की शिक्षा की यात्रा कांटों भरी रही। 'भिड़े कन्याशाला' में पढ़ाई के दौरान उन्हें अपनी जाति छिपानी पड़ी क्योंकि उस समय के वातावरण में दलित होने का अर्थ अपमान और सामाजिक बहिष्कार था। शिक्षा के माध्यम से लेखिका ने अपनी पहचान तो बनाई, लेकिन पहचान का यह संकट उनके जीवन भर साथ रहा। दलित छात्र संघों से जुड़ना और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर बौद्ध धर्म की ओर अग्रसर होना, लेखिका के जीवन का वह मोड़ था जहाँ से उनमें प्रतिरोध की शक्ति पैदा हुई।
वैवाहिक जीवन का 'दोहरा अभिशाप'
उपन्यास का शीर्षक तब पूरी तरह सार्थक होता है जब लेखिका अपने वैवाहिक जीवन का वर्णन करती हैं। देवेन्द्र बैसंत्री से विवाह के बाद, जो स्वयं उच्च शिक्षित और एक उच्च पद पर थे, लेखिका को लगा था कि शायद अब संघर्ष समाप्त हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत थी। शिक्षित होने के बावजूद उनके पति का व्यवहार अत्यंत पुरुषवादी और संकीर्ण था। घर के भीतर उन्हें जिस मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, वह यह साबित करता है कि एक दलित स्त्री के लिए शिक्षा और पद भी उसे घरेलू पितृसत्ता से मुक्ति नहीं दिला पाते। यही वह 'दोहरा अभिशाप' है—एक समाज से मिला अपमान और दूसरा अपनों से मिली प्रताड़ना।
सामाजिक चेतना और आत्मनिर्भरता की ओर
अपने जीवन के अंतिम चरणों में लेखिका ने सामाजिक सक्रियता को ही अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण के विरोध और महिला अधिकारों के लिए निरंतर आवाज़ उठाई। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से भेंट करना और दिल्ली की सड़कों पर दलित महिलाओं के हक के लिए जुलूस निकालना लेखिका की अदम्य जिजीविषा को दर्शाता है। शाहबानो केस जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्ट राय और महिला संगठनों के भीतर भी दलित महिलाओं की उपेक्षा पर उनका प्रहार यह बताता है कि नारीवाद की मुख्यधारा में भी दलित स्त्री की आवाज़ कहीं दबी हुई थी।
निष्कर्ष
'दोहरा अभिशाप' केवल एक व्यक्तिगत व्यथा नहीं है, बल्कि यह संघर्ष की एक ऐसी गाथा है जो शिक्षा और आत्म-शक्ति (Self-Power) के महत्व को रेखांकित करती है। लेखिका का यह अनुभव कि "अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए आत्म-शक्ति की आवश्यकता है," आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी सीख है। यह उपन्यास हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या वह स्थितियां बदली हैं, जिनका सामना लेखिका ने किया था। विद्यार्थियों के लिए यह उपन्यास न केवल एक साहित्यिक कृति है, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के संघर्ष को समझने का एक अनिवार्य माध्यम है।

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