हिंदू समाज में नारी की स्थिति आज भी अत्यंत हास्यास्पद और विरोधाभासी बनी हुई है। विडंबना यह है कि जिस हिंदू समाज में नारी के उग्र और शक्तिशाली स्वरूप 'माता काली' की पूजा की जाती है, वही समाज किसी भी स्त्री को जींस या अन्य वेस्टर्न आउटफिट में देखकर उसे फौरन भोग की वस्तु मान बैठता है।
आज तक किसी भी धर्मगुरु या कथावाचक ने हिंदू समाज को यह बुनियादी सीख नहीं दी कि वे अपनी बेटी के माता-पिता से दहेज न लें, ससुराल में बेटी के मुंह पर उसके माता-पिता को अपमानित न करें, और दहेज के लिए उसे प्रताड़ित न करें। बेटी के जन्म पर मातम मनाना और किसी अन्य के घर बेटी होने पर सांत्वना देकर उसका अपमान करना हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। कोई भी धर्मगुरु पुरुषों को यह नहीं सिखा पाया कि महिलाओं का सच्चा आदर-सत्कार कैसे किया जाए, उनके निर्णयों को स्वीकार करना कैसे सीखा जाए, उनके स्वतंत्र अस्तित्व को कैसे अपनाया जाए और यदि वह पुरुष से अधिक कामयाब हो जाए, तो उससे ईर्ष्या न करके उसकी सफलता का सम्मान कैसे किया जाए।
समाज की घटिया मानसिकता का एक और काला सच यह है कि बलात्कार जैसी वीभत्स घटना की शिकार बेटी को ही दोषी मान लिया जाता है, जबकि अपराधी समाज की आड़ से उसे जबरन या छल से उठाकर दुष्कर्म करते हैं। दूधमुंही नन्ही बच्ची से लेकर बूढ़ी औरत तक को ये दरिंदे नहीं छोड़ते। किसी भी धर्मगुरु ने आज तक हिंदू परिवारों को वेदों में महिलाओं को दिए गए अधिकारों, उनकी शिक्षा और गरिमामई स्थिति के बारे में पूरे समाज को जागरूक नहीं किया।
आज हिंदू परिवारों की लड़कियों का पतन केवल तथाकथित 'लव जिहाद' के कारण नहीं हो रहा है, बल्कि स्वयं हिंदू समाज अपनी वैदिक परंपरा की उन महान परंपराओं को भूल चुका है, जहाँ महिलाओं की स्थिति अत्यंत गौरवशाली थी। आज समाज केवल अपनी सुविधावादी सोच के अनुसार हिंदू बहु-बेटियों की इज्जत और चरित्र तय करता है—जात-पात, रंग-रूप, अमीरी-गरीबी और संस्कारी बनाम मॉडर्न खयालातों के नाम पर भेदभाव किया जाता है। सच ही तो है कि इन मर्दों का भी क्या भरोसा!
जितने घृणित तरीके से हिंदू समाज ने महिलाओं के अस्तित्व और एक मनुष्य के रूप में उनके मौलिक अधिकारों को दबाया है, तथा लड़कियों के ज़हन में बलात्कार के भय को इस हद तक विकराल बना दिया है, उसी का परिणाम है कि आज लड़कियां घर के दो-चार पुरुषों को छोड़कर पूरे पुरुष समाज से भयभीत रहते हुए भी खुद को आगे बढ़ा रही हैं और देश-दुनिया में अपना अभूतपूर्व योगदान दे रही हैं।
यह भारतीय हिंदू समाज ही है जो दिखावे के लिए विदेशी महिलाओं के सामने कभी उनकी तो कभी अपनी भारतीय महिलाओं को अपनी इच्छा से सम्मान देता है, लेकिन विदेशी महिलाओं के बाल छोटे होने पर उन्हें 'परकटी' कहकर अपमानित भी करता है। हमारे समाज में जब कथावाचक या धर्मगुरु 25 साल की लड़की के चरित्र पर सवाल उठाते हैं और 14 साल की उम्र में शादी की वकालत करते हैं, तो उनके विचार किसी भी कट्टरपंथी समाज से अलग नहीं प्रतीत होते।
इनकी दोगली सोच और व्यक्तिगत आक्षेपों के सहारे कथावाचक बनकर हिंदू समाज को बेवकूफ बनाने से कहीं बेहतर यह है कि हिंदू समाज स्वयं वेद, शास्त्र, पुराण और अपने सभी धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करे। अपनी बहु-बेटियों को भी इनका अध्ययन कराए, तभी हिंदू समाज में वास्तव में सच्चा जागरण आ पाएगा और हिंदू नारियों का अधपतन रुक सकेगा।
"यदि हम अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों की ओर दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों में कभी भी पितृसत्तात्मक जकड़बंदियों या महिलाओं को हीन समझने का कोई स्थान नहीं था। माता सीता द्वारा स्वयंवर में 'शिवधनुष' को सहजता से उठाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि उस युग में स्त्रियों को केवल कोमल और अबला नहीं माना जाता था, बल्कि उनमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक बल का पूर्ण विकास किया जाता था। इसी प्रकार, महाभारत की नारी पात्र—चाहे वह द्रौपदी हों, कुंती हों या गांधारी—कभी किसी पुरुष की छाया मात्र नहीं रहीं। द्रौपदी का भरी सभा में अपने अधिकारों के लिए खुलकर प्रश्न पूछना और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेना यह साबित करता है कि वैदिक और महाकाव्य काल में महिलाओं को एक स्वतंत्र, सशक्त और सम्मानित अस्तित्व प्राप्त था।
आज विडंबना यह है कि आधुनिक हिंदू समाज अपनी उन महान और गौरवशाली परंपराओं को पूरी तरह भुला चुका है, जहाँ गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने बड़े-बड़े ऋषियों को शास्त्रार्थ में चुनौती दी थी। आज समाज ने अपनी सुविधावादी और संकीर्ण सोच के तहत महिलाओं के अधिकार और गरिमा को सीमित कर दिया है। यदि हिंदू समाज को वास्तव में एक सच्चे और वैचारिक जागरण की ओर बढ़ना है, तो उसे कथावाचकों की सतही और दोगली बातों से बाहर निकलकर अपने मूल वेद, शास्त्र और पुराणों का अध्ययन स्वयं करना होगा। जब तक हम अपनी बहु-बेटियों को शास्त्रों के उस वास्तविक और प्रगतिशील ज्ञान से परिचित नहीं कराएंगे, तब तक समाज में व्याप्त यह पाखंड और महिलाओं का यह मानसिक अधपतन समाप्त नहीं हो सकता।"

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Thank you for your support