रविवार, 21 जून 2026

2 sem BBA NEP scheme notes

 यहाँ माधव राव सप्रे जी द्वारा लिखित निबंध 'योग्यता और व्यवसाय का चुनाव' पर आधारित संपूर्ण अध्ययन सामग्री दी जा रही है। 

एक शब्द वाले पंद्रह लघु प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मनुष्य जीवन का सफल होना किस बात पर निर्भर करता है?

उत्तर. व्यवसाय।

प्रश्न 2. इच्छा न होने पर भी धनवान मनुष्यों को आलस्य से बचने के लिए क्या करना पड़ता है?

उत्तर. कार्य।

प्रश्न 3. बहुत-से युवक किस बात से डर और घृणा करते हैं?

उत्तर. व्यवसाय।

प्रश्न 4. कुछ युवक स्वयं रोटी के प्रश्न को हल करना क्या समझते हैं?

उत्तर. बेइज्जती।

प्रश्न 5. उद्योगरहित और कार्यहीन मनुष्यों का मन किसका निवास स्थान होता है?

उत्तर. शैतान।

प्रश्न 6. सेवानिवृत्त होने पर बड़े अधिकारी को सरकार से उपहार स्वरूप क्या मिला?

उत्तर. पेंशन।

प्रश्न 7. मनुष्य का मन किसके समान होता है जो खाली रहने पर स्वयं को पीसने लगता है?

उत्तर. पनचक्की।

प्रश्न 8. मनुष्य जीवन के असफल होने के मुख्य कितने कारण बताए गए हैं?

उत्तर. दो।

प्रश्न 9. हमारे देश के पढ़े-लिखे शिक्षित लोग किस प्रकार का कार्य करना अधिक पसंद करते हैं?

उत्तर. मानसिक।

प्रश्न 10. पढ़े-लिखे युवकों में शारीरिक श्रम के प्रति क्या उत्पन्न हो गई है?

उत्तर. घृणा।

प्रश्न 11. भारतवर्ष में इन दिनों कौन सी मानसिक बीमारी निरंतर बढ़ रही है?

उत्तर. बाबूसाहिबी।

प्रश्न 12. बहुधा युवावस्था में किस तत्व के कारण युवक हताश होकर अपना व्यवसाय छोड़ देते हैं?

उत्तर. कष्ट।

प्रश्न 13. गुलाब के फूल को देखने पर उसमें क्या मिलने की बात कही गई है?

उत्तर. काँटे।

प्रश्न 14. अपनी योग्यता की डींग हाँकने वाले युवकों को दुनिया क्या समझकर उनका तिरस्कार करती है?

उत्तर. आत्म-प्रशंसक।

प्रश्न 15. लेखक के अनुसार व्यवसाय को किसी बुरे कर्म का क्या नहीं समझना चाहिए?

उत्तर. प्रायश्चित।

संदर्भ, प्रसंग और व्याख्या वाले नोट्स

पंक्तियाँ: "प्रत्येक मनुष्य के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय, रोजगार, धन्धे अथवा पेशे की आवश्यकता है... और धनवान तथा धनहीन कोई भी मनुष्य इससे बच नहीं सकता।"

संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ पंडित माधव राव सप्रे द्वारा रचित विचारप्रधान परामर्श निबंध 'योग्यता और व्यवसाय का चुनाव' से ली गई हैं।

प्रसंग: इन पंक्तियों में लेखक ने मानव जीवन में कर्म और व्यवसाय की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट किया है कि श्रम से कोई भी बच नहीं सकता।

व्याख्या: लेखक का कथन है कि संसार में प्रत्येक मनुष्य को अपना जीवन चलाने के लिए किसी न किसी आजीविका या काम को चुनना ही पड़ता है। मनुष्य जीवन का असली अर्थ और उसकी सफलता इसी बात पर टिकी है कि वह कितनी बुद्धिमत्ता से अपने लिए सही काम का चुनाव करता है। समाज में कुछ लोग बहुत समृद्ध हो सकते हैं जिन्हें पेट भरने के लिए संघर्ष न करना पड़े, परंतु उन्हें भी अपने जीवन को सुखी रखने और आलस्य के जाल से बचने के लिए कोई न कोई कार्य अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार कर्म करना मनुष्य का मूल स्वभाव है, जिससे अमीर या गरीब कोई अछूता नहीं रह सकता।

पंक्तियाँ: "मनुष्य जीवन के असफल होने के दो मुख्य कारण हैं; पहला यह कि वह कभी-कभी अपनी स्वाभाविक कार्य शक्ति के विरुद्ध व्यवसाय में लग जाता है... और कामचलाऊ अनुभव न हो जाए तब तक सहसा कोई काम शुरू न करना चाहिए।"

संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ पंडित माधव राव सप्रे द्वारा रचित विचारप्रधान परामर्श निबंध 'योग्यता और व्यवसाय का चुनाव' से ली गई हैं।

प्रसंग: इस अंश में लेखक ने जीवन-संग्राम में मनुष्यों की असफलता के दो सबसे प्रमुख व्यावहारिक कारणों पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या: लेखक समझाते हैं कि लोग अपने करियर या व्यवसाय में दो बड़ी गलतियों के कारण असफल होते हैं। पहली गलती यह है कि वे अपनी आंतरिक रुचि, स्वभाव और स्वाभाविक योग्यता को पहचाने बिना किसी ऐसे काम में लग जाते हैं जो उनके अनुकूल नहीं होता। दूसरी बड़ी भूल यह है कि लोग बिना पूरी कुशलता प्राप्त किए या बिना किसी बुनियादी अनुभव के जल्दबाजी में किसी नए काम को शुरू कर देते हैं। जब तक व्यक्ति को अपने काम का व्यावहारिक और कामचलाऊ अनुभव न हो जाए, तब तक उसे अचानक कोई बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए क्योंकि बिना सोचे-समझे शुरू किए गए काम में असफलता निश्चित होती है।

पंक्तियाँ: "बहुत से युवक अपनी योग्यता की डींग हाँके बिना सन्तुष्ट नहीं होते... इस व्यवसाय को तुम अपने किसी पाप का प्रायश्चित मत समझो, केवल कर्त्तव्य समझकर उसके सम्पादन में दत्तचित्त हो जाओ।"

संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ पंडित माधव राव सप्रे द्वारा रचित विचारप्रधान परामर्श निबंध 'योग्यता और व्यवसाय का चुनाव' से ली गई हैं।

प्रसंग: निबंध के इस अंतिम भाग में लेखक ने उन युवकों को फटकार लगाई है जो अपने काम को छोटा समझते हैं और अपनी झूठी योग्यता का रोना रोते रहते हैं।

व्याख्या: लेखक कहते हैं कि समाज में ऐसे अनेक युवक हैं जो हमेशा यह शिकायत करते हैं कि उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार सही अवसर नहीं मिला, अन्यथा वे बहुत यशस्वी होते। वे अपनी असफलताओं का दोष परिस्थितियों, ग्रहों या साधनों की कमी पर मढ़ते रहते हैं। लेखक सचेत करते हैं कि ऐसी आत्म-प्रशंसा करने वालों को दुनिया केवल बड़बोला समझकर उनका तिरस्कार करती है। यदि मनुष्य में वास्तव में कोई योग्यता है, तो वह संसार के सामने स्वतः ही प्रकट हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को अपने वर्तमान व्यवसाय को कोई सजा या पाप का प्रायश्चित नहीं मानना चाहिए, बल्कि उसे अपना परम कर्तव्य समझकर पूरे मन से उसमें जुट जाना चाहिए।

विस्तृत सारांश और उद्देश्य

पंडित माधव राव सप्रे जी ने अपने इस निबंध में युवाओं को जीवन में सही करियर चुनने, कर्म के प्रति निष्ठा रखने और श्रम का महत्व समझने के लिए बहुत ही व्यावहारिक और मूल्यवान परामर्श दिया है।

निबंध की शुरुआत में लेखक मानव जीवन में कर्म की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। उनका मानना है कि संसार में कर्म करना मनुष्य का बुनियादी धर्म है। चाहे कोई धनवान हो या निर्धन, कर्म से कोई बच नहीं सकता। अमीर लोग भले ही आजीविका के कष्ट से दूर हों, परंतु अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखने और आलस्य रूपी रोग से बचने के लिए उन्हें भी सक्रिय रहना पड़ता है। लेखक खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं कि आज के अनेक नवयुवक अपने माता-पिता पर आश्रित रहकर श्रम करने से कतराते हैं और आत्मनिर्भर बनने को अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वे भूल जाते हैं कि खाली बैठने वाले व्यक्ति का दिमाग शैतान का घर बन जाता है। लेखक ने एक सरकारी अधिकारी का उदाहरण दिया है जो सेवानिवृत्ति के बाद काम न होने के कारण अवसाद और आलस्य से घिर गया और अंततः श्रमहीन जीवन के दुख से व्याकुल हो उठा। लेखक ने मानव मन की तुलना एक पनचक्की से की है, जिसमें यदि गेहूं न डाला जाए तो वह स्वयं के ही पाटों को पीसकर नष्ट हो जाती है।

आगे लेखक ने जीवन की दौड़ में असफल होने के दो मुख्य कारणों का विश्लेषण किया है। पहला कारण है अपनी स्वाभाविक प्रकृति और योग्यता के विपरीत जाकर किसी व्यवसाय को चुनना। दूसरा कारण है बिना उचित तैयारी, कुशलता और कामचलाऊ अनुभव के किसी काम को अचानक शुरू कर देना। लेखक का मानना है कि भारतवर्ष में पढ़े-लिखे शिक्षित वर्ग में शारीरिक श्रम के प्रति एक गहरी घृणा बैठ गई है। वे आठ रुपये की मामूली नौकरी करके दफ्तर में मुंशी बनना स्वीकार कर लेंगे, परंतु जिससे अधिक आय हो सके ऐसा कोई शारीरिक श्रम या हुनर अपनाने में उन्हें लज्जा आती है। लेखक ने इसे 'बाबूसाहिबी की बीमारी' कहा है और चेतावनी दी है कि यदि समय रहते युवाओं ने शारीरिक श्रम का आदर करना नहीं सीखा, तो यह सामाजिक बीमारी लाइलाज हो जाएगी।

निबंध के उत्तरार्ध में लेखक युवाओं को दृढ़ता और धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि जब व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार किसी मार्ग को चुन लेता है, तो उसे उस पर आने वाली प्रारंभिक बाधाओं से घबराकर उसे बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। युवावस्था में मन बहुत चंचल होता है, जिसके कारण थोड़े से कष्ट या असफलता मिलते ही युवक हताश हो जाते हैं और दूसरा काम ढूंढने लगते हैं। लेखक समझाते हैं कि जैसे गुलाब के पौधे को चाहने वाले को उसके कांटों का सामना करना ही पड़ता है, वैसे ही हर अच्छे व्यवसाय में संघर्ष होता है। बार-बार रास्ता बदलने से केवल समय और ऊर्जा नष्ट होती है। इसके अतिरिक्त, लेखक ने उन लोगों की कड़ी आलोचना की है जो अपनी वर्तमान नौकरी या धंधे को तुच्छ बताते हैं और अपनी योग्यता की झूठी डींगें हांकते हैं कि यदि वे इस क्षेत्र में न होते तो बहुत बड़े पद पर होते। ऐसी बातें व्यक्ति के भीतर की हीनभावना और अहंकार को दर्शाती हैं।

इस निबंध का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी वास्तविक योग्यता और आंतरिक अभिरुचि को पहचानकर सही आजीविका चुनने के लिए प्रेरित करना है। लेखक का मुख्य संदेश यह है कि समाज में कोई भी वैध कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। वास्तविक गरिमा काम के प्रकार में नहीं, बल्कि उसे करने की हमारी निष्ठा में होती है। निबंध के माध्यम से लेखक युवाओं को बाबूसाहिबी की संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकालकर शारीरिक श्रम का सम्मान करने, झूठी आत्म-प्रशंसा का त्याग करने और अपने चुने हुए कार्य को ईश्वर की सेवा तथा अपना परम कर्तव्य मानकर पूरे मनोयोग से पूर्ण करने का संदेश देते हैं। जब व्यक्ति अपने कर्म में दत्तचित्त हो जाता है, तो सफलता उसके कदम अवश्य चूमती है।


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