संदर्भ प्रसंग व्याख्या
प्रथम अंश:
"ओ रे प्रेत -" से लेकर "प्रेत ने जवाब दिया -" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश प्रगतिवादी चेतना के प्रखर कवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कविता "प्रेत का बयान" से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में यमलोक का दृश्य है, जहाँ यमराज नरक में आए एक नए प्रेत से कड़े शब्दों में उसकी मृत्यु का कारण पूछ रहे हैं और भय के मारे उस प्रेत की शारीरिक स्थिति का चित्रण किया गया है।
व्याख्या:
नरक के स्वामी यमराज नए आए हुए प्रेत को डांटते हुए और कड़क आवाज में आदेश देते हैं कि वह बिना किसी डर या झूठ के सच-सच बताए कि उसकी मृत्यु कैसे हुई। यमराज के पास मौतों के कारणों की एक लंबी सूची है, इसलिए वे पूछते हैं कि क्या उसकी मौत भोजन न मिलने यानी भूख से हुई, या देश में पड़े किसी अकाल के कारण हुई? क्या वह कालाजार जैसे खतरनाक बुखार का शिकार हुआ या फिर पेचिश, बदहजमी, प्लेग जैसी किसी महामारी के कारण उसके प्राण निकले?
यमराज की इस भयानक और कड़कती हुई आवाज को सुनकर वह प्रेत बुरी तरह काँप उठता है। वह प्रेत और कुछ नहीं, बल्कि केवल हड्डियों का एक मानवीय ढांचा मात्र रह गया है, जिसके शरीर पर मांस का नामोनिशान नहीं है। जब वह डर से काँपता है, तो उसकी सूखी हड्डियों से 'खड़-खड़' और 'हड़-हड़' की आवाजें आने लगती हैं। वह प्रेत अपने लंबे और सूख कर चमचे जैसी आकृति की हो चुकी उँगलियों वाले हाथ को हिलाता है और अत्यंत कमजोर, सूखी तथा किटकिटाती आवाज में यमराज के प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करता है।
द्वितीय अंश:
"महाराज ! सच - सच कहूँगा" से लेकर "हमारे समक्ष फिर कभी भूख का !!" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश प्रगतिवादी चेतना के प्रखर कवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कविता "प्रेत का बयान" से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में प्रेत यमराज के सामने अपना प्रामाणिक परिचय देता है और एक पढ़े-लिखे नागरिक के आत्मसम्मान को प्रदर्शित करते हुए यमराज को भूख का नाम न लेने की चेतावनी देता है।
व्याख्या:
प्रेत यमराज को संबोधित करते हुए अत्यंत ईमानदारी से कहता है कि हे महाराज, मैं आपके सामने पूरी तरह सच कहूँगा और किसी भी झूठ का सहारा नहीं लूँगा। वह बड़े स्वाभिमान से बताता है कि वह किसी पराधीन देश का नहीं, बल्कि स्वतंत्र और संप्रभु भारत देश का नागरिक है। वह अपना भौगोलिक परिचय देते हुए कहता है कि बिहार राज्य के सीमांत पर स्थित पूर्णिया उसका जिला है, धमदाहा उसका थाना है और रुपउली उसकी जन्मभूमि या बस्ती है। वह जाति से कायस्थ है और उसकी उम्र पचपन वर्ष से कुछ अधिक थी। समाज में उसका पद और सम्मान बहुत ऊँचा था क्योंकि वह पेशे से एक प्राथमिक विद्यालय का शिक्षक (मास्टर) था।
अपना यह गरिमापूर्ण परिचय देने के बाद प्रेत अचानक उग्र हो जाता है। वह यमराज से कहता है कि जहाँ तक 'भूख' या 'क्षुधा' नाम की किसी बीमारी या समस्या का सवाल है, मुझे ऐसी किसी व्याधि के बारे में कुछ भी पता नहीं है। वह यमराज को बहुत कड़े शब्दों में सावधान करते हुए चेतावनी देता है कि हे महाराज, दोबारा मेरे सामने भूलकर भी इस 'भूख' शब्द का नाम मत लीजिएगा। यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि एक शिक्षक भूखा मर जाने के बाद भी समाज में अपनी प्रतिष्ठा और गरिमा को बनाए रखने के लिए यमलोक में भी अपनी कंगाली स्वीकार नहीं करना चाहता।
तृतीय अंश:
"निकल गया भाप आवेग का" से लेकर "महामहिम नर्केश्वर |" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश प्रगतिवादी चेतना के प्रखर कवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कविता "प्रेत का बयान" से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंतिम अंश में प्रेत के शांत होने, अपनी मौत का तकनीकी कारण बताने और उसकी बातें सुनकर यमराज के निरुत्तर हो जाने का बहुत ही तीखा वर्णन किया गया है।
व्याख्या:
भूख शब्द सुनते ही प्रेत के भीतर जो गुस्से और आक्रोश का उफान आया था, वह चेतावनी देने के बाद शांत हो जाता है। उसका मानसिक आवेग भाप बनकर उड़ जाता है। इसके बाद वह अत्यंत शांत, गंभीर और सुन्न कर देने वाली आवाज में यमराज से कहता है कि महाराज, जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत मृत्यु का संबंध है, आप ध्यान से सुनिए। मुझे मरते समय कोई कष्ट नहीं हुआ, कोई दर्द नहीं हुआ और न ही मन में कोई दुविधा थी। मेरे प्राण बहुत ही आसानी और सरलता से निकल गए थे। असल बात बस इतनी थी कि मेरी आंतें पेचिश की बीमारी का हमला सहन नहीं कर सकीं।
कवि यहाँ गहरा व्यंग्य करते हैं कि वास्तव में वह मास्टर भूख से ही मरा था, क्योंकि लंबे समय तक भोजन न मिलने के कारण उसकी आंतें अंदर से बिल्कुल सड़ और सूख चुकी थीं। उन कमजोर आंतों में इतनी शक्ति ही नहीं बची थी कि वे पेचिश जैसी साधारण बीमारी का भी मुकाबला कर पातीं। आजाद भारत के एक प्राथमिक विद्यालय के इस भूखे, लेकिन अत्यंत स्वाभिमानी और सुशिक्षित शिक्षक की इस गर्जना और तार्किक सच्चाई को सुनकर नरक के राजा यमराज भी दंग रह जाते हैं। शासन व्यवस्था की इस विभीषिका के सामने मौत के देवता के पास भी कहने को कोई शब्द नहीं बचता और वे पूरी तरह निरुत्तर हो जाते हैं।
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