यह सुप्रसिद्ध प्रगतिवादी कवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित अत्यंत मार्मिक और व्यंग्यात्मक कविता "प्रेत का बयान" है।
एक शब्द वाले लघु प्रश्नोत्तर
प्रश्न १. नरक के मालिक कौन हैं?
उत्तर: यमराज।
प्रश्न २. यमराज के सामने कौन काँप रहा था?
उत्तर: प्रेत।
प्रश्न ३. प्रेत का ढाँचा किससे बना हुआ था?
उत्तर: हाड़ों।
प्रश्न ४. प्रेत ने स्वयं को किस देश का नागरिक बताया?
उत्तर: भारत।
प्रश्न ५. प्रेत का जिला कौन सा था?
उत्तर: पूर्णिया।
प्रश्न ६. प्रेत किस सूबे (राज्य) का रहने वाला था?
उत्तर: बिहार।
प्रश्न ७. प्रेत का थाना कौन सा था?
उत्तर: धमदाहा।
प्रश्न ८. प्रेत की बस्ती का क्या नाम था?
उत्तर: रुपउली।
प्रश्न ९. प्रेत किस जाति का था?
उत्तर: कायस्थ।
प्रश्न १०. प्रेत की उम्र कितने वर्ष से कुछ अधिक थी?
उत्तर: पचपन।
प्रश्न ११. प्रेत पेशे से क्या था?
उत्तर: मास्टर।
प्रश्न १२. प्रेत किस स्तर के स्कूल में पढ़ाता था?
उत्तर: प्राइमरी।
प्रश्न १३. प्रेत यमराज को किस नाम का दोबारा जिक्र न करने की चेतावनी देता है?
उत्तर: भूख।
प्रश्न १४. प्रेत के अनुसार उसके प्राण किस बीमारी का हमला न सह पाने के कारण निकले थे?
उत्तर: पेचिश।
प्रश्न १५. प्रेत की दहाड़ सुनकर कौन निरुत्तर रह गए?
उत्तर: नर्केश्वर।
संदर्भ, प्रसंग एवं व्याख्या
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश आधुनिक हिंदी कविता के प्रखर सजग कवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "प्रेत का बयान" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस कविता में कवि ने स्वतंत्र भारत की व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया है। देश की आजादी के बाद भी आम जनता, विशेषकर राष्ट्र के निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक, किस कदर भुखमरी और कंगाली का जीवन जीने को विवश हैं, इसे यमराज और एक मृत प्राइमरी मास्टर के प्रेत के संवाद के माध्यम से दिखाया गया है।
व्याख्या:
कविता की शुरुआत यमराज के तीखे सवाल से होती है। नरक के राजा यमराज एक नए आए प्रेत से कड़कती आवाज में पूछते हैं कि उसकी मृत्यु कैसे हुई। क्या वह अकाल से मरा, किसी महामारी जैसे प्लेग, कालाजार, बुखार या बदहजमी से मरा? यमराज के इस भयानक रूप के सामने वह हड्डियों का मानवीय ढांचा डर से कांपने लगता है। वह अपने पतली उंगलियों वाले हाथ को हिलाते हुए किटकिटाती आवाज में सच बताने का वादा करता है।
प्रेत स्वाभिमान के साथ अपना परिचय देता है कि वह आजाद भारत का एक नागरिक है, जो बिहार के पूर्णिया जिले के धमदाहा थाने के रुपउली गांव का रहने वाला है। वह पचपन वर्ष का एक कायस्थ है और पेशे से प्राथमिक विद्यालय का शिक्षक था।
इसके बाद कविता में एक गहरा मर्म और व्यंग्य आता है। वह प्रेत भूखा मरने के बाद भी अपने स्वाभिमान को नहीं छोड़ता। वह यमराज को चेतावनी देता है कि उसके सामने 'भूख' का नाम भी न लिया जाए। वह इस बात को स्वीकार करने से इनकार कर देता है कि वह भूख से मरा है, क्योंकि एक शिक्षक होने के नाते समाज में उसका जो स्वाभिमान था, वह उसे यह मानने की इजाजत नहीं देता कि आजाद देश में एक शिक्षक तड़प-तड़प कर भूख से मर गया।
अपने भीतर के गुस्से और आवेग को शांत करते हुए वह चालाकी और लाचारी के मिश्रण के साथ कहता है कि उसे कोई दुख या पीड़ा नहीं है। उसके प्राण तो बड़ी सरलता से तब निकल गए जब उसकी कमजोर और भूखी आंतें पेचिश (पेटी की बीमारी) का हमला सहन नहीं कर सकीं। हकीकत यह थी कि लंबे समय तक भूखे रहने के कारण उसकी आंतें इतनी कमजोर हो चुकी थीं कि वे साधारण बीमारी भी झेल नहीं पाईं।
एक भूखे लेकिन अत्यधिक स्वाभिमानी और पढ़े-लिखे शिक्षक प्रेत की इस ओजस्वी दहाड़ को सुनकर नरक के राजा यमराज भी अवाक और निरुत्तर रह जाते हैं। उनके पास इस व्यवस्था की लाचारी का कोई जवाब नहीं बचता।
विस्तृत सारांश
"प्रेत का बयान" कविता स्वतंत्र भारत के कड़वे सच और शासन व्यवस्था की नाकामियों को उघाड़ती एक कालजयी रचना है। कवि नागार्जुन ने इस कविता में फैंटेसी (कल्पना) का सहारा लिया है, जहाँ यमलोक में यमराज और एक मृत भारतीय नागरिक के प्रेत के बीच बातचीत हो रही है।
कविता का मुख्य पात्र एक प्राइमरी स्कूल का मास्टर है, जो जीवन भर देश के भविष्य को संवारने का काम करता रहा, लेकिन बदले में उसे केवल कंगाली और भुखमरी मिली। जब उसकी मृत्यु के बाद उसका प्रेत यमलोक पहुँचता है, तो यमराज उससे उसकी मौत का असली कारण जानना चाहते हैं। यमराज के पास बीमारियों और अकाल की एक पूरी सूची है, लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि आज़ाद भारत में कोई व्यक्ति भूख से भी मर सकता है।
प्रेत का पूरा परिचय देना यह दर्शाता है कि वह कोई अज्ञात व्यक्ति नहीं, बल्कि इस देश की मिट्टी का हिस्सा है। वह गर्व से खुद को "स्वाधीन भारत का नागरिक" कहता है, जो एक बहुत बड़ा कटाक्ष है। वह देश तो आजाद हो गया, लेकिन उस आजादी ने एक शिक्षक को दो वक्त की रोटी तक मुहैय्या नहीं कराई।
इस कविता का सबसे भावुक और वैचारिक मोड़ वह है जहाँ प्रेत अपनी मौत का कारण भूख मानने से साफ मना कर देता है। वह यमराज को डांटते हुए कहता है कि उसके सामने भूख शब्द का इस्तेमाल भी न किया जाए। यहाँ कवि ने मध्यवर्गीय समाज और विशेषकर एक शिक्षक के 'झूठे स्वाभिमान' और 'मजबूरी' को दिखाया है। वह समाज में अपनी इज्जत बचाने के लिए यमराज के सामने भी यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि वह दाने-दाने को तरस कर मरा है।
वह अपनी भूख को छिपाने के लिए पेचिश की बीमारी का बहाना बनाता है। लेकिन पाठक और यमराज दोनों समझ जाते हैं कि यदि पेट में अन्न होता, तो आंतें इतनी कमजोर न होतीं कि पेचिश का हमला न सह पातीं। अंत में, एक भुखमरे शिक्षक का यह भयानक स्वाभिमान देखकर खुद यमराज यानी मौत के देवता भी सन्न रह जाते हैं।
इस प्रकार, यह कविता केवल एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर व्याप्त गरीबी, भुखमरी और बुद्धिजीवियों की दुर्दशा पर एक करारा तमाचा है। यह बताती है कि कागजों पर देश भले ही आजाद और समृद्ध हो गया हो, लेकिन धरातल पर आज भी राष्ट्र निर्माता भूख से दम तोड़ रहे हैं।
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