यह सुप्रसिद्ध साठोत्तरी कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित अत्यंत सशक्त, प्रगतिशील और यथार्थवादी कविता "मोचीराम" है।
एक शब्द वाले लघु प्रश्नोत्तर
प्रश्न १. मोचीराम की आँखें कहाँ से उठी थीं?
उत्तर: राँपी।
प्रश्न २. मोचीराम की निगाह में हर आदमी क्या है?
उत्तर: जूता।
प्रश्न ३. मोचीराम के सामने आदमी किस काम के लिए खड़ा है?
उत्तर: मरम्मत।
प्रश्न ४. पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच कौन है?
उत्तर: आदमी।
प्रश्न ५. मोचीराम चकतियों की जगह क्या टाँकने की बात करता है?
उत्तर: आँखें।
प्रश्न ६. बनिये या बिसाती के चेहरे पर कैसा रोब है?
उत्तर: हिटलर।
प्रश्न ७. बनिया जूतों को चमकाकर क्या बनाने को कहता है?
उत्तर: ऐना।
प्रश्न ८. पैसे देते समय कौन साफ मुकर जाता है?
उत्तर: बनिया।
प्रश्न ६. पेशे पर चोट पड़ने से जूतों में क्या दबी रह जाती है?
उत्तर: कील।
प्रश्न १०. जिंदा रहने के पीछे क्या होना जरूरी है?
उत्तर: तर्क।
प्रश्न ११. हर आदमी अपने पेशे से छूटकर किसका हिस्सा बन जाता है?
उत्तर: भीड़।
प्रश्न १२. वसंत ऋतु दिन को किसकी तरह तान देती है?
उत्तर: ताँत।
प्रश्न १३. पेड़ों के लाल पत्तों को कवि ने क्या कहा है?
उत्तर: सुखतल्ले।
प्रश्न १४. जो जिंदगी को किताब से नापता है, वह मोची को क्या कह सकता है?
उत्तर: शायर।
प्रश्न १५. मोचीराम के अनुसार सबको कौन जलाती है?
उत्तर: आग।
प्रश्न १६. जो अक्षरों के आगे अंधे हैं, वे किससे डरते हैं?
उत्तर: पेट।
प्रश्न १७. इन्कार से भरी हुई चीख और समझदार चुप दोनों किसके निर्माण में फर्ज अदा करते हैं?
उत्तर: भविष्य।
संदर्भ, प्रसंग एवं व्याख्या
प्रथम अंश:
"राँपी से उठी हुई आँखों ने" से लेकर "मरम्मत के लिये खड़ा है" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंश में मोचीराम अपनी राँपी से आँखें उठाकर लेखक को देखता है और अपने पेशे के प्रति अपना नजरिया तथा जीवन दर्शन प्रकट करता है।
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि जब वे मोचीराम के पास गए, तो चमड़ा काटने वाले अपने औजार यानी राँपी को चलाते हुए मोचीराम ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं। उसने क्षण भर के लिए लेखक को बहुत ध्यान से परखा और टटोला। उसके बाद जब उसे लेखक के प्रति विश्वास हो गया, तो वह सहज और मुस्कुराते हुए स्वर में बोला कि बाबूजी, मैं आपसे बिल्कुल सच कहता हूँ कि मेरी नजर में न तो कोई अमीर या बड़ा आदमी है और न ही कोई गरीब या छोटा आदमी है। आर्थिक और सामाजिक असमानता से परे, मेरे लिए मेरे सामने खड़ा हर एक इंसान केवल एक जोड़ी जूता है, जो अपनी कमियों को सुधरवाने या मरम्मत करवाने के लिए लाचार होकर मेरे सामने खड़ा है। मोचीराम इंसान को उसके पद से नहीं, बल्कि उसकी जरूरत और आर्थिक स्थिति से देखता है।
द्वितीय अंश:
"और असल बात तो यह है" से लेकर "हथौड़े की तरह सहता है" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंश में मोचीराम जूतों के माध्यम से मनुष्य की सामाजिक और मानसिक स्थिति का गहरा विश्लेषण करता है।
व्याख्या:
मोचीराम बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि आज के समय की कड़वी सच्चाई यह है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह समाज में किसी भी ऊंचे पद पर हो या कहीं भी रहता हो, वह अपनी आर्थिक हैसियत यानी जूते की नाप से बाहर नहीं है। हर व्यक्ति अपनी औकात के अनुसार ही जीवन जी रहा है। इसके बावजूद, मोचीराम कहता है कि मुझे काम करते समय हमेशा इस बात का अहसास रहता है कि मेरे इन पेशेवर हाथों और इन फटे हुए जूतों के बीच में एक जीवित और संवेदनशील इंसान छुपा हुआ है। जब मैं जूते पर टाँके लगाता हूँ, तो वे टाँके केवल चमड़े पर नहीं, बल्कि उस गरीब इंसान की आत्मा पर पड़ते हैं। जूते के छेद से बाहर झांकती हुई पैर की उँगली पर जब समाज की हिकारत भरी नजरों की चोट लगती है, तो वह इंसान उस दर्द को अपनी छाती पर हथौड़े की मार की तरह चुपचाप सहन करता है।
तृतीय अंश:
"यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं" से लेकर "बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंश में मोचीराम एक अत्यंत गरीब और अभावग्रस्त ग्राहक के फटे हुए जूते और उसकी दयनीय स्थिति का सजीव चित्रण करता है।
व्याख्या:
मोचीराम कहता है कि उसकी दुकान पर हर रोज अलग-अलग प्रकार के जूते मरम्मत के लिए आते हैं और वे जूते अपने मालिक की वास्तविक स्थिति और स्वभाव को साफ-साफ बयां कर देते हैं। हर जूते का अपना एक रूप और घिसने का एक अलग तरीका होता है। उदाहरण के लिए, एक ऐसा जूता आता है जो पूरी तरह से फट चुका है और उस पर जगह-जगह चमड़े के टुकड़े यानी चकतियाँ लगी हुई हैं। वह जूता कम और फटे कपड़ों की थैली ज्यादा लगता है। इस जूते को पहनने वाला व्यक्ति बहुत गरीब है, जिसके चेहरे पर चेचक के दाग हैं। वह इतना लाचार है कि उसके चेहरे पर फैली हँसी भी एक अजीब सी लाचारी और उम्मीद को दर्शाती है, ठीक उसी तरह जैसे टेलीफोन के खंभे में कोई कटी हुई पतंग फंस जाती है और हवा में फड़फड़ाती रहती है। मोचीराम का मन करता है कि वह उस गरीब से कह दे कि इस कबाड़ हो चुके जूते पर पैसे क्यों बर्बाद कर रहे हो, लेकिन गरीबी देखकर उसकी आवाज काँप जाती है। मोचीराम को महसूस होता है कि उसके भीतर की अंतरात्मा कह रही है कि तुम अपनी ही जाति यानी अपने ही जैसे एक गरीब भाई का अपमान कर रहे हो। इसलिए मोचीराम उस समय जूते पर चमड़े के टुकड़े नहीं, बल्कि संवेदना की आँखें टाँकता है और मानवता के नाते अपने काम को पूरा करता है।
चतुर्थ अंश:
"एक जूता और है जिससे पैर को" से लेकर "और अँगुली में गड़ती है" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंश में मोचीराम समाज के एक घमंडी, लालची और शोषक अमीर वर्ग के ग्राहक का चरित्र चित्रण करता है जो मेहनत की कद्र नहीं करता।
व्याख्या:
मोचीराम एक दूसरे प्रकार के जूते का वर्णन करता है जिसे पहनकर एक रईस आदमी सुबह की सैर पर निकलता है। वह व्यक्ति न तो बुद्धिमान है और न ही समय का पाबंद है। उसकी आँखों में केवल लालच भरा है और कलाई पर महंगी घड़ी बंधी है। उसे वास्तव में कहीं जरूरी काम से जाना नहीं है, फिर भी वह दिखावे के लिए चेहरे पर बहुत व्यस्तता और हड़बड़ी का नाटक करता है। वह स्वभाव से कोई लालची व्यापारी या छोटा दुकानदार लगता है, लेकिन उसका घमंड ऐसा है जैसे वह तानाशाह हिटलर का सगा रिश्तेदार हो। वह दुकान पर आते ही मोचीराम पर हुक्म चलाने लगता है कि इसे यहाँ से बाँधो, वहाँ से काटो, यहाँ कील ठोको, इसे रगड़कर ऐसा चमका दो कि यह ऐने की तरह चमकने लगे। वह गर्मी का बहाना बनाकर रुमाल से हवा करता है और मौसम को कोसता है। वह सड़क पर आने-जाने वाली महिलाओं को बंदर की तरह गंदी नजरों से घूरता है। वह मोचीराम से घंटे भर कड़ी मेहनत करवाता है, लेकिन जब पैसे देने का समय आता है, तो वह साफ मुकर जाता है और मोची को डांटते हुए कहता है कि तुम शरीफ लोगों को लूटते हो। अंत में वह कुछ सिक्के फेंककर आगे बढ़ जाता है और अचानक कीचड़ से बचकर फुटपाथ पर चढ़ जाता है। मोचीराम कहता है कि जब इस तरह अमीर लोग हमारे आत्मसम्मान और पेशे पर चोट करते हैं, तो हमारे भीतर भी गुस्सा दबा रह जाता है, जो समय आने पर जूते की छिपी हुई कील की तरह उभरता है और उस शोषक अमीर की उँगली में चुभकर उसे दर्द देता है।
पंचम अंश:
"मगर इसका मतलब यह नहीं है" से लेकर "कोई जंगल है जो आदमी पर पेड़ से वार करता है" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंश में मोचीराम जीवन के संघर्ष, श्रम की प्रतिष्ठा और वसंत ऋतु के आगमन पर काम के दौरान मन में उठने वाली व्याकुलता का वर्णन करता है।
व्याख्या:
मोचीराम कहता है कि अमीरों के बुरे व्यवहार के बाद भी मुझे अपने काम को लेकर कोई गलतफहमी नहीं है। मैं हमेशा याद रखता हूँ कि इस चमड़े के काम और मेरे पेशे के बीच एक जीवित मनुष्य का अस्तित्व है जो सारा दर्द सहता है। मोचीराम एक बहुत बड़ी दार्शनिक बात कहता है कि यदि मनुष्य के पास जिंदा रहने के पीछे कोई सही तर्क, ईमानदारी और आदर्श नहीं है, तो सम्मानजनक तरीके से मेहनत करने में और गलत रास्तों जैसे धर्म के नाम पर पाखंड फैलाकर रामनामी चादर बेचने या वेश्यावृत्ति की दलाली करके पैसे कमाने में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। ईमानदारी की कमाई ही मनुष्य को भीड से अलग बनाती है, वरना बिना आदर्श के हर आदमी भीड़ का एक हिस्सा मात्र है। आगे वह प्रकृति के प्रभाव की बात करता है कि जब सुंदर वसंत ऋतु आती है, तो धूप तेज होने लगती है और पेड़ों पर लाल-लाल नए पत्ते ऐसे लगते हैं मानो मोची ने धूप में सूखने के लिए जूतों के सुखतल्ले लटका दिए हों। उस सुंदर माहौल में मोचीराम का मन भी काम से हटने लगता है। राँपी को हाथ में संभालना मुश्किल हो जाता है। नजरें कहीं और होती हैं और हाथ कहीं और चलता है। मन किसी चिढ़े हुए बच्चे की तरह काम करने से मना करता है। ऐसा लगता है कि इस कृत्रिम और सभ्य समाज के पीछे कोई आदिम और हिंसक प्रवृत्ति छिपी है जो मनुष्य की चेतना पर अचानक प्रहार करती है।
षष्ठ अंश:
"और यह चौकने की नहीं" से लेकर "अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं" तक।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश समकालीन हिंदी कविता के प्रखर कवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता "मोचीराम" से उद्धृत है।
प्रसंग:
इस अंतिम अंश में मोचीराम उन किताबी विचारकों पर चोट करता है जो श्रम को सिर्फ एक जाति समझते हैं और वह सामाजिक न्याय के लिए चुप रहने तथा चीखने दोनों के महत्व को प्रतिपादित करता है।
व्याख्या:
मोचीराम कहता है कि प्रकृति और समाज का यह अंतर्विरोध चौंकने की नहीं, बल्कि गहराई से सोचने की बात है। जो लोग जीवन की वास्तविकताओं को जमीन पर जीने के बजाय केवल किताबों के पन्नों से नापते हैं और जो संकट के समय अपने अनुभवों को भूलकर कायर बन जाते हैं, वे लोग मेरी बातें सुनकर बहुत आसानी से कह देते हैं कि तुम मोची नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े कवि या शायर हो। मोचीराम कहता है कि ऐसे लोग वास्तव में एक बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार हैं। वे सोचते हैं कि काम या पेशा ही किसी की जाति तय करता है और भाषा या कविता लिखने पर केवल समाज के ऊंचे वर्ग या विशेष जाति का ही अधिकार है।
लेकिन असलियत यह है कि आग जब लगती है तो वह सबको समान रूप से जलाती है और भूख तथा कड़वी सच्चाई भी समाज के हर गरीब व्यक्ति के जीवन से होकर गुजरती है। समाज में कुछ लोग ऐसे भाग्यशाली हैं जिन्हें अपनी बात कहने के लिए शब्द मिल गए हैं और वे कविता लिख लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ ऐसे शोषित और अनपढ़ लोग हैं जो अक्षरों के आगे बिल्कुल अंधे हैं। वे समाज के हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं क्योंकि वे अपने पेट की भूख और कंगाली से डरते हैं। अंत में मोचीराम बहुत गहरी बात कहता है कि अन्याय के खिलाफ उठाई गई एक इंकार से भरी हुई तेज चीख और बहुत सोच-समझकर साधी गई एक गहरी चुप्पी, इन दोनों का अर्थ और महत्व बिल्कुल एक समान है। आने वाले समय और भविष्य को बदलने में, समाज को बेहतर बनाने में यह 'चुप' और यह 'चीख' अपनी-अपनी जगह पर पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं। क्रांति केवल चिल्लाने से नहीं, बल्कि शोषितों की गहरी समझदारी से भी जन्म लेती है।
विस्तृत और सरल सारांश
"मोचीराम" कविता स्वतंत्र भारत के आम आदमी, श्रमिक वर्ग के संघर्ष और सामाजिक यथार्थ को बयां करने वाली एक बेहद सरल और मर्मस्पर्शी रचना है। इस कविता का मुख्य पात्र मोचीराम है, जो सड़क के किनारे बैठकर जूते सिलने का काम करता है, लेकिन उसकी सोच और उसका जीवन दर्शन किसी बड़े दार्शनिक से कम नहीं है। वह केवल चमड़ा ही नहीं सिलता, बल्कि समाज के बदलते चेहरों और इंसानी फितरत को भी बहुत गहराई से समझता है।
कविता को निम्नलिखित सरल बिंदुओं के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:
पहला बिंदु यह है कि मोचीराम की नजर में जाति, धर्म या अमीरी-गरीबी का कोई महत्व नहीं है। उसके पास जब कोई व्यक्ति आता है, तो वह उसे किसी वीआईपी या ऊंचे पद वाले व्यक्ति के रूप में नहीं देखता। उसके लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है जो अपनी कमियों को ठीक कराने आया है। वह मनुष्य के जूतों की हालत देखकर ही उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अंदाजा लगा लेता है।
दूसरा बिंदु समाज के दो अलग-अलग वर्गों का अंतर है। कविता में मोचीराम दो तरह के ग्राहकों का उदाहरण देता है। पहला ग्राहक अत्यंत गरीब है, जिसका जूता पूरी तरह फट चुका है और उस पर अनगिनत चकतियाँ लगी हुई हैं। वह गरीब आदमी लाचार है, फिर भी उसके चेहरे पर एक उम्मीद की मुस्कान है। मोचीराम उसके प्रति गहरी सहानुभूति रखता है और उसे अपनी ही जाति यानी शोषित वर्ग का हिस्सा मानता है। दूसरा ग्राहक एक घमंडी अमीर व्यापारी है, जिसके पास पैसा और घड़ी तो है, लेकिन तमीज नहीं है। वह मोचीराम से बहुत ज्यादा काम करवाता है, रौब झाड़ता है, तंग करता है और पैसे देते समय कंजूसी दिखाकर मोची पर ही चिल्लाने लगता है। मोचीराम कहता है कि ऐसे अमीरों के शोषण के कारण ही मजदूरों के भीतर गुस्सा पनपता है, जो बाद में क्रांति की कील बनकर शोषकों को ही चुभता है।
तीसरा बिंदु श्रम की गरिमा और ईमानदारी का है। मोचीराम का मानना है कि जीवन जीने के लिए इंसान के पास सही तर्क और ईमानदारी होनी चाहिए। मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाना सबसे श्रेष्ठ काम है। अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी छोड़ दे, तो धर्म के नाम पर पाखंड करने में या कोई भी गलत धंधा करने में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। मेहनत ही इंसान को समाज में असली पहचान देती है।
चौथा और अंतिम बिंदु व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का है। मोचीराम उन लोगों को करारा जवाब देता है जो उसकी बुद्धिमान बातें सुनकर उसे मोची के बजाय शायर कहने लगते हैं। वह कहता है कि ज्ञान और भाषा पर किसी एक जाति का अधिकार नहीं है। भूख और गरीबी की मार सबको बराबर पड़ती है। समाज में जो लोग पढ़-लिख गए हैं, वे शब्दों के माध्यम से अपना विरोध जताते हैं। लेकिन जो गरीब और अनपढ़ हैं, वे पेट की आग के डर से भले ही चुप रहते हैं, पर उनकी वह समझदार चुप्पी भी अन्याय के खिलाफ एक तरह का विरोध ही है। अंत में कविता यह संदेश देती है कि समाज को बदलने और एक बेहतर भविष्य का निर्माण करने में शोषितों का सामूहिक प्रयास, चाहे वह चीख के रूप में हो या गहरी चुप्पी के रूप में, अपना फर्ज जरूर पूरा करता है। यह कविता श्रम का सम्मान करने और शोषित वर्ग के आत्मसम्मान को जगाने का एक बेहतरीन उदाहरण है।
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