शनिवार, 6 जून 2026

BA 2nd sem दोनों और प्रेम पलता है।

मैथिलीशरण गुप्त जी कविता दोनों ओर प्रेम पलता है पर आधारित संपूर्ण अध्ययन सामग्री ।

यह कविता उनके द्वारा लिखित साकेत महाकाव्य से।

एक शब्द वाले लघु प्रश्नोत्तर

प्रश्न : कविता के अनुसार प्रेम कहाँ पलता है?

उत्तर : दोनों ओर

प्रश्न : पतंग के साथ-साथ और कौन जलता है?

उत्तर : दीपक

प्रश्न : दीपक क्या हिलाकर पतंग को मना करता है?

उत्तर : सीस

प्रश्न : दीपक पतंग से किस प्रकार न जलने के लिए कहता है?

उत्तर : वृथा

प्रश्न : पतंग दीपक पर क्या करके ही रहता है?

उत्तर : पड़

प्रश्न : पतंग के दीपक पर गिरने में क्या दिखाई देती है?

उत्तर : विह्वलता

प्रश्न : पतंग प्रणय छोड़कर क्या धारण नहीं करना चाहता?

उत्तर : प्राण

प्रश्न : पतंग के जलकर मरने को कवि ने क्या मानने से इनकार किया है?

उत्तर : असफलता

प्रश्न : पतंग मन मारकर खुद को दीपक के सामने क्या बताता है?

उत्तर : लघु

प्रश्न : पतंग दीपक को अपने से क्या मानता है?

उत्तर : महान

प्रश्न : पतंग के अनुसार क्या भी उसके अपने हाथ में नहीं है?

उत्तर : मरण

प्रश्न : दीपक के जलने में फिर भी किसकी लाली दिखाई देती है?

उत्तर : जीवन

प्रश्न : पतंग के भाग्य की लिपि को कैसा बताया गया है?

उत्तर : काली

प्रश्न : संसार अपने पास कैसी वृत्ति अर्थात् सोच रखता है?

उत्तर : वणिग्वृत्ति

प्रश्न : संसार किसी कार्य का काम न देखकर क्या निरखता है?

उत्तर : परिणाम

प्रश्न : संसार की परिणाम देखने की यह आदत किसे खलती है?

उत्तर : उर्मिला

संदर्भ, प्रसंग और व्याख्या

प्रथम भाग

दोनों ओर प्रेम पलता है... कितनी विह्वलता है!

संदर्भ :

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता दोनों ओर प्रेम पलता है से ली गई हैं। इसके रचयिता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। यह उनके प्रसिद्ध महाकाव्य साकेत के नवम सर्ग से उधृत है।

प्रसंग :

इन पंक्तियों में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला अपनी विरह वेदना के समय दीपक और पतंगे के माध्यम से सच्चे प्रेम की परिभाषा दे रही हैं। उनका मानना है कि सच्चा प्रेम कभी एकतरफा नहीं होता।

व्याख्या :

उर्मिला अपनी सखी से कहती हैं कि हे सखी, सच्चा प्रेम हमेशा दोनों तरफ से होता है, वह दोनों ओर बराबर पलता है। देखो, प्रेम की आग में जहाँ पतंगा जलकर राख हो जाता है, वहीं दीपक भी पूरी रात जलता रहता है। दीपक अपनी लौ रूपी सिर को हिला-हिलाकर पतंगे को समझाता है कि हे भाई, तुम बेकार में मेरे पास आकर क्यों जल रहे हो, दूर रहो। लेकिन पतंगा दीपक की बात नहीं मानता और उसकी चाहत में तड़पता हुआ आकर उस पर गिर ही पड़ता है। पतंगे की इस व्याकुलता को देखकर साफ पता चलता है कि प्रेम दोनों तरफ बराबर है।

द्वितीय भाग

बचकर हाय! पतंग मरे क्या... शरण किसे छलता है?

संदर्भ :

पूर्वानुसार।

प्रसंग :

इन पंक्तियों में उर्मिला पतंगे की मजबूरी और उसके निस्वार्थ समर्पण का वर्णन कर रही हैं कि प्रेमी के लिए प्रेम छोड़ना मौत से बढ़कर है।

व्याख्या :

उर्मिला कहती हैं कि यदि पतंगा दीपक की आग से बच भी जाए, तो क्या वह जी पाएगा। वह तो प्रेम के बिना वैसे ही तड़पकर मर जाएगा। क्या वह अपने सच्चे प्रेम को छोड़कर सिर्फ अपने प्राण बचाने के लिए जीता रहे। उसके लिए तो प्रेम में जल जाना ही एकमात्र रास्ता है, अगर वह जलेगा नहीं तो विरह में वैसे ही रोज मरेगा। इसलिए प्रेम में जलकर मर जाना उसकी असफलता नहीं, बल्कि उसके प्रेम की पूर्णता है। पतंगा मन मारकर दीपक से कहता है कि हे प्रिय, तुम बहुत महान और ऊँचे हो, और मैं बहुत छोटा और तुच्छ हूँ। लेकिन क्या अपने प्रिय के लिए मर जाना भी मेरे हाथ में नहीं है। तुम्हारी शरण में आने वाले को कभी कोई धोखा नहीं मिलता, तुम्हारी शरण तो सबको अपना लेती है।

तृतीय भाग

दीपक के जलने में आली... मुझको ही खलता है।

संदर्भ :

पूर्वानुसार।

प्रसंग :

इन पंक्तियों में उर्मिला दीपक और पतंगे के भाग्य की तुलना करती हैं और संसार की स्वार्थी सोच पर गहरा दुःख व्यक्त करती हैं।

व्याख्या :

उर्मिला कहती हैं कि हे सखी, दीपक और पतंगे दोनों के जलने में एक अंतर है। दीपक जब जलता है, तो वह संसार को प्रकाश देता है, जिससे उसके जीवन की सार्थकता और लाली बनी रहती है। लेकिन बेचारे पतंगे के भाग्य का लेख बहुत काला है, वह जलकर सिर्फ राख होता है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता। इस भाग्य के खेल पर भला किसका वश चल सकता है। उर्मिला आगे कहती हैं कि यह पूरा संसार एक व्यापारी जैसी बुद्धि रखता है। संसार केवल उसी वस्तु या व्यक्ति को पसंद करता है जिससे उसे कोई लाभ या स्वाद मिलता है। लोग किसी की भावना या उसके सच्चे प्रयास को नहीं देखते, वे केवल अंतिम परिणाम को देखते हैं। संसार का यह स्वार्थी व्यवहार मुझे बहुत बुरा लगता है, बहुत खलता है।

विस्तृत सारांश

मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता दोनों ओर प्रेम पलता है उनके प्रसिद्ध महाकाव्य साकेत से ली गई है। इस कविता में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की विरह वेदना को दिखाया गया है, जो अपने पति के वन चले जाने के बाद महल में अकेली रह रही हैं। उर्मिला अपनी सखी से बात करते हुए दीपक और पतंगे के उदाहरण के माध्यम से सच्चे और आदर्श प्रेम के स्वरूप को समझाती हैं।

उर्मिला का मानना है कि सच्चा प्रेम कभी भी एकतरफा नहीं हो सकता, वह हमेशा दोनों ओर बराबर रूप से पलता है। लोग अक्सर सोचते हैं कि केवल पतंगा ही दीपक के प्रेम में जलकर मर जाता है, लेकिन उर्मिला कहती हैं कि दीपक भी तो पतंगे की तरह ही पूरी रात जलकर पिघलता रहता है। दीपक अपनी लौ को हिलाकर पतंगे को अपने पास आने से रोकने का प्रयास करता है, वह नहीं चाहता कि पतंगे को कोई नुकसान पहुँचे। लेकिन पतंगे की व्याकुलता इतनी तीव्र होती है कि वह दीपक की बात सुने बिना उस पर खुद को न्योछावर कर देता है।

उर्मिला पतंगे के माध्यम से एक सच्चे प्रेमी की मनोदशा को प्रकट करती हैं। वे कहती हैं कि यदि पतंगा दीपक की आग से बच भी जाए, तो वह प्रेम के बिना जीवित नहीं रह सकता। अपने प्रेम को छोड़कर केवल सांसारिक प्राणों की रक्षा करना पतंगे के स्वभाव में नहीं है। इसलिए उसका दीपक पर जलकर मर जाना कोई असफलता या हार नहीं है, बल्कि यह उसके प्रेम की सबसे बड़ी सफलता है। पतंगा खुद को दीपक से छोटा मानता है, लेकिन वह अपने प्रिय की शरण में आकर प्राण त्यागने को ही अपने जीवन का परम सौभाग्य समझता है।

कविता के अगले हिस्से में उर्मिला दीपक और पतंगे के भाग्य के अंतर को रेखांकित करती हैं। वे कहती हैं कि दीपक का जलना संसार के काम आता है, वह चारों तरफ उजाला फैलाता है जिससे उसके जीवन का गौरव बना रहता है। इसके विपरीत, पतंगे का भाग्य अंधकारमय है क्योंकि उसके जलने से संसार को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिलता और वह केवल राख बनकर रह जाता है।

अंत में, उर्मिला इस संसार की स्वार्थी और व्यावहारिक सोच पर करारी चोट करती हैं। वे कहती हैं कि यह दुनिया एक व्यापारी की तरह सोचती है। संसार को किसी के निस्वार्थ प्रेम, उसकी आंतरिक भावनाओं या उसके कठिन संघर्ष से कोई सरोकार नहीं होता। दुनिया केवल अंतिम परिणाम को देखती है कि उसे किससे क्या फायदा मिल रहा है। उर्मिला को संसार की यह स्वार्थी भावना बहुत खलता अर्थात् परेशान करती है, क्योंकि उनका खुद का त्याग और प्रेम भी संसार की नजरों से दूर है। यह कविता हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ समर्पण की माँग करता है, जहाँ लाभ-हानि का कोई स्थान नहीं होता।


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