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मंगलवार, 12 सितंबर 2023

भारतीय काव्यशास्त्र -- काव्य का अर्थ एवं परिचय Part-2

 काव्य की परिभाषा या लक्षण  
    परिभाषा में मूल शब्द भाषा है। मानव मुख के द्वारा निकली उच्चरित ध्वनि संकेत जिसका एक निश्चित अर्थ होता है और जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार और मनोभाव प्रकट करता है उसे भाषा कहते है। 'परि' का अर्थ होता है चारो ओर से या पूरी तरह से। 'परिभाषा' का अर्थ है कि जिस कथन से किसी विषय या वस्तु का पूरा-पूरा परिचय मिल जाए और जिस कथन से उस विषय की अधिकांश विशेषता नज़र आए उस कथन को परिभाषा कहते है।

    जिसके द्वारा किसी वस्तु को पहचाना जा सके उसे 'लक्षक' कहते है। यानी जिन क्रियाओं द्वारा किसी वस्तु अथवा विषय या तथ्य को पहचानते है उस क्रिया को 'लक्षण' कहते है।

    काव्य में कुछ अंतर्गुण है जो दूसरे प्रकारों की साहित्यिक विधाओं में नहीं होती है। काव्य में अलग प्रकार के लक्षण होते है जिस कारण काव्य की अलग पहचान होती है। जैसे काव्य में शब्द छन्द बद्ध तरीके से जुड़े होते है। सभी युगों के और सभी देशों के मनुष्य ने काव्य को समझने की चेष्ठा की और अपनी-अपनी परिभाषाएँ दी। काव्य के लक्षण देश और समाज और समय के आधार पर तय होते है। समय बदलने पर वस्तु का स्वरूप भी बदलता है। काव्य एक विश्व व्यापी वस्तु है। अतः विश्वभर के विद्वानों एवं आचार्यों ने इसकी परिभाषा एवं लक्षण बताने की चेष्ठा की।
पहला है संस्कृत के आचार्यों द्वारा दिए गए लक्षण या परिभाषाएँ :-  संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है। इस भाषा में बहुत से ग्रंथों की रचना की गई है। काव्य के बारे में भी इस भाषा में विचार किए गए है जो कि पूरे संसार के लिए मूल्यवान है। हमारे आचार्यों द्वारा दि गयी एक परिभाषा या लक्षण--

                कवेरिदं कर्म भावो वा काव्यम् । -- मेदिनी कोश

कव्यः + इदं। यह कवियों के द्वारा जो कार्य किया गया है उन कार्यों को हम काव्य कहते है। अर्थात् कवि कर्म काव्य है। कवियों के द्वारा की गयी रचना काव्य है। इस परिभाषा में रचना शब्द का क्या अर्थ है? कवि का काम जो कि रचनात्मक है उसे रचना या कर्म कहते है। वह रचना जिसमें भावना, संवेदना, सौन्दर्य-दृष्टि और कल्पना शक्ति का प्रयोग होता है उसे काव्य रचना कहते है।
गद्यात्मक रचना में सौन्दर्य-दृष्टि नहीं होती है।(Note)
                काव्यं लोकोत्तर निपुणं कवि-कर्म। -- काव्य प्रकाशः मम्मट, प्रथमोल्लास पृ.सं72
विस्तार 

लोकोत्तर :- संसार से अलग, संसारिक ज्ञान से भिन्न। लोकोत्तर अवस्था वह अवस्था है जिसमें संसार का विस्मरण हो जाता है और जो भी हमारी कल्पना होती वह संसारिक नहीं होती है। हमें संसार का ज्ञान नहीं रहता है। कविता हमारी चेतना को लोकोत्तर चेतना से जोड़ती है। कविता हमें लोकोत्तर अनुभूति कराती है। जो कविता हमें लोकोत्तर चेतना से जोड़ती है उसे हम काव्य कहते है।

 लोकोत्तर निपुणं :- इसका अर्थ है जिस कवि कर्म में हमारी चेतना को लोकोत्तर चेतना से जोड़ने की क्षमता हो उसे हम लोकोत्तर निपुणं कहते है। कवि दक्ष होते है इसलिए वे हमारे चेतना को लोकोत्तर में पहुँचा देते है और उसी दक्षता को हम लोकोत्तर निपुणं कहते है। जो कर्म हमारे भीतर की भावना, सौन्दर्य अंतर-दृष्टि को जगा दे उसे लोकोत्तर निपुणं कहते है।

    काव्य कवि के द्वारा निर्मित वह रचना है जिसमें कवि अपने अनुभव, सौन्दर्य से बाह्य चेतना से हमें लोकोत्तर चेतना में पहुँचा देती है। लोकोत्तर चेतना बाहरी और आन्तरिक चेतना और सूक्षम अनुभव से जुड़ी होती है।

                अपारे काव्य-संसारे कविरेव प्रजापतिः।

    अर्थात् कवि रूपी असीम संसार में कवि ही ब्रह्मा होता है। रचनाकार होता है कवि। कवि के लिए संसार का कोई भी विषय काव्य का विषय हो सकता है। कवि किसी भी वस्तु को कोई भी रूप प्रदान कर सकता है। "जहाँ न जाय रवि, वहाँ जाय कवि।" कवि के संसार की कोई सीमा नहीं है।

                कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः।

    अर्थात् कवि मनीषी है, ज्ञानी है। मनीषा वह शक्ति है जो किसी वस्तु के मूल रूप को देख सकती है। मनीषा आंतरिक चेतना, आंतरिक ज्ञान है। अर्थात् कवि के पास आंतरिक चेतना और ज्ञान है। कवि के पास मन की आत्मा की आँखे है जिससे वह किसी वस्तु के बाहरी और आंतरिक स्वरूप को भी देख सकता है। कवि परिभू होता है। परिभू शब्द का अर्थ है जिसकी अनुभूति का क्षेत्र असीम हो वह संसार के किसी भी वस्तु को अपने अनुभव के क्षेत्र में ला सकता है। कवि की परीधी में पूरा संसार सिमट जाता है। कवि स्वयंभू है अर्थात् कवि स्वयं को कही भी प्रकट कर सकता है बिना किसी शक्ति के अर्थात् स्वयं प्रकट होना। जो अपने अनुभव किसी दूसरे पर निर्भर रहकर नहीं प्रकट करता है। कवि अपने अनुभव के लिए स्वयं ही कारण है। वैदिक साहित्य में कवि को द्रष्टा और ऋषि भी कहा गया है एवं एक माना गया है।

                सहितस्य भावः साहित्यम्। -- आचार्य विश्वनाथ साहित्य दर्पण

    सहित की भावना से पूर्ण, चेतना, विचार और अनुभव से युक्त रचना ही साहित्य अथवा काव्य है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार हित से पूर्ण चेतना, विचार और अनुभव ही साहित्य है। काव्य से मनुष्य की चेतना और मन विशाल रूप धारण कर सकती है। काव्य से मनुष्य के मन की संकीर्णता दूर हो जाती है। काव्य से मनुष्य का कल्याण होता है। अर्थात् उपरोक्त श्लोक का अर्थ है जो रचना कल्याण के भाव से पूर्ण हो वह काव्य है।

                शब्दार्थों सहितं काव्यम्

    आचार्य विश्वनाथ के अनुसार जो रचना सुन्दर शब्द एवं सुन्दर शब्द के अर्थ के साथ हो वह काव्य है। इसलिए शब्द को काव्य का शरीर और अर्थ का आत्मा कहा गया है। आचार्य विश्वनाथ कहते है कि काव्य के लिए सुन्दर शब्द, अलंकार, रस, भावना, कला और अर्थ इन सभी तत्वों की आवश्यकता होती है।

               वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। -- आचार्य विश्वनाथ साहित्य दर्पण

    अर्थात् रसात्मक कथन ही काव्य है। रसात्मक कथन का अर्थ होता है कि हम किसी दूसरे के सुख-दुख की अनुभूति स्वयं में कर सके और प्रत्येक वस्तु में सजीवता देख सके और वही अनुभूति और सजीवता का वर्णन कर सके, यही रसात्मक कथन कहलाता है। 

            जैसे (1) शुष्कं काष्ठं तिष्ठति अग्रे।

                   (2) अग्रे विलपति शुष्कं काष्ठम्।

    वैसा कथन जिसमें रचनाकार की संवेदना, सौन्दर्य भाव बोलता है उसे रसात्मक कथन ही काव्य है। यहाँ पर आचार्य विश्वनाथ ने रस को काव्य का प्रमुख लक्षण बताया है। उनके अनुसार रस काव्य की आत्मा  है।

               काव्यं गाह्यमलंकारात् सौन्दर्यमलंकार। -- वामनः

    आचार्य वामन के अनुसार काव्य अलंकार के कारण ग्रहण करने योग्य होता है क्योंकि अलंकार सुन्दर होते है। जिस शब्द से कथन में चमत्कार उत्पन्न हो वह अलंकार है। अलंकार से युक्त सौन्दर्य वाला कथन ही काव्य है।

               तद्दोषौं शब्दार्थो सगुणावमलंकृती पुनः क्वापि। -- मम्मट

    दोष, शब्द, अर्थ, गुण और अलंकार से युक्त रचना काव्य है।

               निर्दोषा लक्षणवती सरीतिर्गुणो भूषिता

               सालंकार रसानेका वृर्त्ति काव्यनाम भाक्। -- जयदेव

    जो रचना निर्दोष हो, रचना में काव्य के लक्षण हो, रीति से विभूषित हो, अलंकार से युक्त हो, रसो से भरी पड़ी हो एवं जिसमें वृत्ति हो ऐसे गुणों वाली रचना को काव्य कहते है।

                रमणीयार्थ प्रतिपादकः काव्यम्। -- मम्मट

    जिस कथन में सौन्दर्य और अलंकार हो उसे काव्य कहते है।

शनिवार, 26 अगस्त 2023

भारतीय काव्य शास्त्र-- काव्य का अर्थ एवं परिचय Part -1

 काव्य को कविता और पद्य दोनों कहा जाता है। भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि में काव्य का अर्थ 'साहित्य' है। काव्य के दो भाग है। 
काव्य -- पहला भाग है पद्यात्मक जिसमें काव्य, महाकाव्य, खण्डकाव्य, प्रबन्ध काव्य, कविता आते हैं।
             दूसरा भाग है गद्यात्मक जिसमें निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी आदि आते हैं।
Note-- प्राचीन काल में जो भी शास्त्र लिखे जाते थे या लिखे गये हैं वे सब पद्यात्मक रूप में ही लिखे गये थे। वर्तमान समय में गद्यात्मक शैली में लिखा जाता है।

काव्य का उद्देश्य :- भारतीय आचार्यों की दृष्टि में काव्य का उद्देश्य है आनंद। किसी भी भाषा में जितने शब्द है उन सबके अलग-अलग अर्थ होते हैं। आनंद का भी एक अर्थ है परन्तु वह भी एक नाम के रूप में। वह है सुख। 'सु' का सुगम तथा 'ख' गमन या गति करना। अर्थात् सुगम से गति करना। प्रत्येक व्यक्ति का मन कुछ चाहता है। यदि व्यक्ति के मन के अनुकूल सुगमता से कुछ मिलता जाय तो वह सुख होता है। उल्लास सुख से मिलता है। हर्ष मन से निकलता है। प्रसन्नता मुख से निकलती है। यह सभी तथ्य हमारी बाहरी इन्द्रियाँ है। आत्मा की अनुभूति को आनंद कहते हैं। आत्मा का सम्बन्ध बाहरी दुनियाँ से नहीं  होता है। आनंद अंदर-ही-अंदर महसूस किया जाता है। जो व्यक्त न किया जा सके परन्तु अंदर-ही-अंदर अनुभव की जा सके, वह आनंद कहलाता है। आनंद की प्राप्ति तीन रूपों में होती है। दृश्य(देखने का विषय), श्रव्य(सुनने का विषय), मिश्रित(पठ्य, दृश्य, श्रव्य का विषय)।

काव्य के रूप  :- भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य के तीन रूप है। दृश्य काव्य, श्रव्य काव्य तथा मिश्रित काव्य। इन्हीं तीनों रूपों से आनंद की प्राप्ति होती है।

    काव्य को गद्य और पद्य के सम्मुख रखने से समझा जा सकता है। दोनों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द से है अथवा शब्द समूह या वाक्य से है। परन्तु दोनों में शब्द की रचना और व्यवस्था अलग-अलग प्रकार से है। (कर्ता-कर्म-क्रिया) शब्दों का जो संयोजन होता है उसे रूपात्मक भाषा कहते है। व्याकरण के अनुसार वाक्य में जो शब्दों का जो गठन होता है उसे व्याकरण के अनुसार रूपात्मक भाषा कहते है। Formal Language or the formal structure of language यदि कर्ता, कर्म, क्रिया या अन्य अपने निश्चित स्थान पर न हो तो उसे विरूपात्मक भाषा कहते हैं। काव्य में कविता की भाषा विरूपात्मक होती है। यही गद्य और पद्य का पहला अंतर है।                            जैसे 

    वह आता

    दो टूक कलेजे को करता

    पछताता पथ पर आता

इसमें वाक्य संगठन के सिद्धांतो का पालन नहीं हुआ है। यदि सिद्धांत के अनुसार लिखा जाता तो कुछ इस प्रकार लिखा जाता -- वह कलेजे को दो टूक करता हुआ तथा पछताता हुआ पथ पर आता है।                                               अर्थात् कविता में यदि वाक्य संगठन के निर्धारित मानदण्ड तोड़ने के बावजूद भी अगर अर्थ स्पष्ट हो और अंतर न पड़े अर्थ में तो वह पद्यात्मक भाषा कहलाती है और वही काव्य कहलाता है। काव्य को समझने के लिए गद्य का समझना आवश्यक है। गद्य का जो स्वरूप है उस स्वरूप से ठीक उलटा काव्य होता है। पद्य की भाषा में वाक्य के निर्माण की पद्धति व्याकरण के अनुसार नहीं होती है। कविता में भाव तत्व प्रधान होता है। भावना की स्थिति में व्यवस्था का ध्यान नहीं रहता। कवि इस कारण कविता के रूप में अपनी भावना प्रकट करता है। भावना का आवेग जब मनुष्य पर चढ़ता है तब वह व्यवस्था का ध्यान नहीं रखता, क्रम का ध्यान नहीं रखता, वह हर पल यही चेष्टा करता है कि कैसे वह अपनी भावनाओं को प्रकट कर सके। गद्य और पद्य में भाषा की जो व्यवस्था है विशेषतः वाक्य का उसमें अंतर है। गद्य में वर्णन होता है और पद्य में चित्रण। किसी वस्तु अथवा विषय का स्थूल पद्धति में परिचय देना वर्णन कहलाता है। जहाँ एक-एक वस्तु या विषय का परिचय न देकर चित्र प्रस्तुत किया जाता है। चित्रण में जहाँ कुछ ही शब्दों में सारी बाते भीतर की हो चाहे बाहर की हो चित्र रूप में परिचय कराया जाता है। जहाँ किसी वस्तु की आंतरिक और बाह्य प्रकृति को कुछ ही शब्दों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है वह चित्रण कहलाता है।                                                                                                                                                         गद्य में वाष्पीकरण और पद्य में संघनन की क्रिया होती है। वाष्पीकरण और संघनन दोनों वैज्ञानिक शब्द है। गद्य में शब्दों का वाष्पीकरण हो जाता है और पद्य में शब्द एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। 

        निसि दिन बरसत नैन हमारे,

        सदा रहत पावस रितु हम पे,

        जब ते स्याम सिधारे।

गद्य में यद्यपि शब्द अलग-अलग होते है और अर्थ भी प्रकट करते है परन्तु चित्र उत्पन्न नहीं कर पाते है। काव्य में शब्दों के योजनाओं की सुन्दरता के फलस्वरूप किसी वस्तु का चित्र उत्पन्न कर देते हैं।

पद्य में भावों और विचारों का उत्कृष्ट केन्द्रण होता है। परीधि से भीतर की और आने को केन्द्रण कहते है।  केन्द्र से बाहर की ओर जाने को विकेन्द्रण कहते है। अर्थात् पद्य में भावों और विचारों का उत्तम ढंग से केन्द्रण होताहै।

जैसे--

        अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।

        आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।