गुरुवार, 7 जून 2018

दधीचि प्रथम सर्ग व्याख्या



दधीचि
प्रथम सर्ग

क्षेत्र-भेद से एक बीज के फल विभिन्न होते हैं
छू धरती को बने सलिल के मधुर-लवण सोते हैं।
एक  डाल पर लगे फलों में कब समता होती है?
उसी सूर्य की एक किरण हँसती अपरा रोती है।

व्यख्या:-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री गंगा सहाय प्रेमी द्वारा रचित दधीचि खण्ड काव्य से ली गयी है। इन पंक्तियों में कवि संसार में व्याप्त विभिन्नता की बात करते हैं। संसार में ऐसी बहुत सी वस्तुएँ है जो कई बार एक ही तत्त्व या एक ही पदार्थ से निर्मित होती है लेकिन फिर में उसमें कितनी असमानताएँ होती है। लेखक इस बात को स्पष्ट करने के लिए हमें कई सारे उदाहरण देते हैं।
            वह कहते हैं कि क्षेत्र के भेद के कारण एक ही बीज से उत्पन्न फल में भी विभिन्नता होती है। उनके स्वाद में विभिन्नता होती है। जैसे की आम यह फल पूरे भारत में पाया जाता है। परन्तु अलग-अलग स्थानों में होने के कारण उसके स्वाद में अंतर होता है। कभी ज्यादा मीठा तो कभी खट्टा। उसी प्रकार समुद्र का खारा पानी जब धरती को छू जाता है तो उसका लवण हमारे भोजन में स्वाद ले आता है। परन्तु इसका मतलब ये नहीं कि समुद्र के जल से हम अपने भोजन को ज्यादा स्वादिष्ट बना पाएंगे। वह प्रश्न के रूप में बताते हैं कि एक ही डाल में लगे फलों में भी समानता नहीं होती है।(यह मनुष्यों के लिए भी उतना ही अर्थ पूर्ण है क्योंकि एक ही परिवार के लोगों में भी कितनी भिन्नता होती है।) वह आगे कहते हैं कि सूर्य की हर किरण समान रूप से धरती पर पड़ती है लेकिन वही एक किरण हँसती है तो दूसरी रोती है। कहने का तात्त्पर्य यह है कि संसार में सब कुछ ईश्वर ने निर्मित किया है। एक ही से सब निर्मित हुए है लेकिन हम सबमें विविधताएँ हैं।

कश्यप ऋषि ज्ञानी विज्ञानी यमी संयमी त्यागी
अपरिग्रही विप्र विद्या के सर्वाधिक अनुरागी।
गणना थी सप्तर्षि मध्य,ऋषिमुनि गुणगण गाते थे,
उनके आगे आदर से रवि शशि उडु झुक जाते थे।


व्याख्या:- इन पंक्तियों में कवि कश्यप ऋषि के बारे में बता रहे है। जो कि देव एवं असुर दोनों के पिता थे। ऋषि कश्यप ब्रह्मा के मानस पुत्र थे एवं उनकी गणना सप्तर्षि में होती थी अर्थात् सात महान् ऋषियों में होती थी। वे बहुत ज्ञानी थे। ज्ञान-विज्ञान के प्रख्यात व्याख्याता थे। वे यम-नियम का पालन करने वाले, संयमी एवं त्यागी व्यक्ति थे। अर्थात् वे बहुत मेहनती स्वभाव के व्यक्ति थे, वे अनुशासन प्रिय थे, स्वयं को सदैव संयमित रखते थे तथा त्याग करने की महान गुण उनमें था। उनके इन्हीं गुणों के कारण पूरा संसार यहाँ तक कि सूर्य-चन्द्र-तारे भी उनके सामने झुक जाते थे। पूरा संसार उनका आदर करता था।


उन कश्यप की सन्तानों में धरती-नभ का अन्तर
एक सभी को सुखद, दूसरी दुख देने को तत्पर।
पिता एक थे, माताओं के कारण पुत्र निराले,
कलाकार ने अलग-अलग साँचों में जैसे ढाले।

व्यख्या:- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कश्यप मुनि की संतानों के बारे में बात कर रहे हैं। कश्यप मुनि की दो पत्नियाँ थी। एक अदिति तथा दूसरी दनायु( दिति)। इन दोनों के पुत्र क्रमशः देव एवं दैत्य कहलाये। दोनों एक ही पिता की संताने थी परन्तु दोनों में धरती आकाश का अंतर था। दोनों के संस्कार एक दम अलग। एक यदि लोगों को सुख प्रदान करते थे तो दूसरा दुख देता था। दोनों एक ही पिता की संताने थी परन्तु अपनी-अपनी माताओं के कारण अलग-अलग स्वभाव के थे। ऐसे लगता था जैसे किसी कलाकार ने इन सबको अलग-अलग साँचें में ढालकर बनाया हो।


कश्यप ऋषि की जाया अदिति सतोगुण संभरिता थी,
दयामयी थी, प्रेमपूर्ण थी,पति-सेवा-निरता थी।
ममतामयी, सपन्तीजन को भगिनी-तुल्य समझती,
रोती थी अन्यों के दुख में,उनके सुख में हँसती।


व्याख्या :- कवि आगे कहते है कि कश्यप ऋषि की पहली पत्नी अदिति एक बहुत ही असाधारण स्त्री थी। वे समस्त सतोगुण अर्थात् सारे अच्छे गुणों से भरी हुई थी। दया, माया, ममता, प्रेम आदि से परिपूर्ण थी। दिन रात पति सेवा में निरता रहती थी(लगी रहती थी)। वह बहुत ही ममतामयी थी। अपनी सौतन अर्थात् कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी दनायु को अपनी बहन समान मानती थी। वह इतनी संवेदनशील थी कि वह दूसरों के दुख में रोती थी और दूसरों की खुशी में खुश होती थी। दनायु से उनका बहुत अधिक स्नेह था। वह दनायु के दुख में दुखी होती थी तो दनायु के सुख में ही अपना सुख समझती थी।


पति-सेवा, सन्तति की देखभाल ही नित्य नियम था,
शब्दों में माधुर्य समाया, वाणी में संयम था।
सद्गुण सिखलाती तनयों को, ऐसी कथा सुनाती,
हो उदात्तता का प्रकाश ज्यों स्वर्णिम उषा प्रभाती।


व्यख्या :- कवि आगे देवी अदिति की नित्य कार्यों के बारे में बता रहे हैं। देवी अदिति का नित्य कर्म यही थी कि सुबह से शाम तक वह पति की सेवा तथा अपने सन्तानों की देखभाल किया करती है। यही उनके रोज का काम था। वे निष्ठा के साथ प्रतिदिन यही किया करती थी। उनकी वाणी बहुत ही मधुर एवं संयमित थी। सुन्दर एवं मधुर(मन को भा जाने वाले शब्दों) शब्दों से वे अपने बच्चों को अच्छे गुण सिखाया करती थी। अपने बच्चों को अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाया करती थी। उनके चरित्र में ऐसी उदात्तता थी जैसे सुबह उगते हुए सूर्य का स्वर्णिम किरणों से भरा हुआ प्रभात हो। अर्थात् वे अपने उदारता (विशाल मन) के जरिए सबका मन मोह लेती थी। अपने यह सारे अच्छे गुण वे अपने संतानों में भी भर रही थी।








अविनय से रोकती, टोकती यदि अकर्म वे करते,
इसी भाँति उनके स्वभाव में प्रतिदिन रत्न निखरते।
भ्रातृ-प्रेम में पगे, लगे अंकुश सबके ऊपर थे,
नित्य चरण धरते यथार्थ की अति कठोर भू पर थे।


व्याख्या:- कवि आगे कहते हैं कि देव माता अदिति अपनी संतानों को किसी से भी अविनय करने से रोकती थी। अर्थात् किसी से भी विनम्रता के बदले गुस्से या अपमान या विरक्ति से बाद करने से रोकती थी। क्योंकि विनम्रता से ही सबका हृदय जीता जा सकता है। यदि उनकी संतान कोई बुरा काम करने लगती तो भी उन्हें रोकती थी। देव माता अदिति अपनी संतानों को हर पग पर सही मार्ग दर्शन दिया करती थी। इसी प्रकार प्रतिदिन उनके स्वभाव रतन की भाँति निखरते जा रहे थे। सभी भाईयों में आपसे में बहुत प्रेम था तथा सभी पर अंकुश लगे हुए थे। नित्य वे चरण धरते थे यथार्थ की जो अति कठोर हुआ करता था। वे यद्यपि देव पुत्र थे परन्तु उन्हें अहंकार के आकाश में नहीं बल्कि विनम्रता की धरती पर रहने की सीख दी जाती थी।



अदिति-पुत्र आदित्य कहाये, सबको सदा सुहाये,
माता की शिक्षा ने उनमें गुणगण नित्य बढ़ाये।
सभी परस्पर बंधे प्रेम से, माँ के आज्ञाकारी,
सज्जन-जन को सुखकारी थे मित्रों के दुखहारी।


व्याख्या:- देव माता अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा जाने लगा। ये नाम सबको सुहाने लगे। माता की शिक्षा के कारण उनमें हर प्रकार के अच्छे गुणों का निर्माण होने लगा। सभी परस्पर प्रेम से बंधे थे। वे अपनी माता के आज्ञाकारी पुत्र थे। माता उन्हें जो सिखाती वे ध्यान से सीखते थे तथा कभी भी किसी भी बात की अवज्ञा नहीं करते थे। वे इतने विनम्र तथा अच्छे स्वभाव के थे कि सज्जनों को वे सुख प्रदान करते थे तथा अपने मित्रों के दुखों को भी हर लेते थे।( देवताओं के इन्हीं गुणों के कारण ही उन्हें प्रत्येक प्रकार की शक्तियाँ मिली थी।)



जो चाहते पिता कश्यप आदित्य वही करते थे,
जननी तथा जनक का मानस प्रमोद से भरते थे।
सौतेले भाइयों पर सदा उनकी प्रीति निराली,
उनके कल्याण की कामना सदा हृदय में पाली।



ब्याख्या:- आदित्य अर्थात् देवी अदिति के पुत्र जितने मातृ भक्त थे उतने ही पिता को भी सम्मान करते थे। जो भी पिता कश्यप कहते आदित्य वही किया करते थे। माता और पिता दोनों को ही अपने कर्मों से सदा आनन्द प्रदान करते थे तथा उनके मन को हर प्रकार के प्रमोद से भर देते थे।(माता-पिता सदा ही बच्चों के कल्याण की कामना करते हैं तथा बच्चों की खुशी में ही अपनी खुशी समझते  हैं।) आदित्य अपने सौतेले भाइयों (दिति के पुत्र) को भी बहुत प्रेम करते थे। उनके लिए भी सदा कल्याण की कामना अपने हृदय में रखते थे।
अदिति-पुत्र द्वादश, जिनमें थे सबसे ज्येष्ठ-विधाता,
अंश, अंशु या अंशुमान भी कहा इन्हें ही जाता।
थे अर्यमा द्वितीय पुत्र जो यम भी कहलाते थे,
इन्द्र तीसरे शतक्रतु शक्रादि नाम पाते थे।




व्याख्या:- देवी अदिति के 12 पुत्र थे, जिनमें से सबसे बड़े पुत्र का नाम था विधाता। उन्हें अंशु या अंशुमान भी कहा जाता था। दूसरे पुत्र का नाम था अर्यमा जिन्हें यम नाम से भी जाना जाता है। तीसरे पुत्र का नाम इन्द्र जिन्हें शतक्रतु तथा शक्रादि नाम दिया गया।


चौथे विष्णु उरुक्रम भी जिनको सब जन कहते थे,
त्वष्टा पुत्र पाँचवें कला-साधनारत रहते थे।
धाता छठे, सातवें पूषा, भग आठवें कहाये,
नवम मित्र थे, दशम वरुण पर्जन्य गये जो गाये।




व्याख्या:- उनके चौथे पुत्र का नाम विष्णु था जिन्हें सभी उरुक्रम के नाम से पुकारते थे।(वास्तव में देवी माता अदिति को विष्णु के वामन अवतार की माता के रूप में भी जाना जाता है।) त्वष्टा उनकी पाँचवे पुत्र थे जो कि कला में सदैव साधना करते रहते थे। धाता छठे पुत्र, सातवें पूषा(पूष्य), भग आठवे पुत्र थे। मित्र नौवीं संतान, दसवीं वरुण थे जो कि बादल बनकर पूरे संसार में वर्षा करते थे।


विवस्वान् ग्यारहवें सुत थे तो मार्तण्ड कहाते,
सविता थे बारहवें सबसे छोटे अधिक सुहाते।
इनमें इन्द्र परम तेजस्वी पराक्रमी बलशाली,
जिसने तप से देवों के राजा की पदवी पा ली।


व्याख्या:- विवस्वान् अदिति के ग्यारहवें पुत्र थे जिन्हें लोग मार्तण्ड भी कहते थे। सविता सबसे छोटे पुत्र थे और सबके प्रिय थे। इन सभी आदित्यों में इन्द्र सबसे तेजस्वी, पराक्रमी, और बलशाली थे। उन्होंने अपने तपस्या से देवताओं के राजा का पद प्राप्त कर लिया था।









भाषा के आचार्य इन्द्र सब वेदों के ज्ञाता थे,
यज्ञ प्रचारक, तत्व विचारक, जनजन के त्राता थे।
देवों के अतिरिक्त मानवों ने महत्व स्वीकारा,
क्योंकि इन्द्र ने धरती पर था शोभन स्वर्ग उतारा।


व्याख्या:- इन्द्र सभी भाषाओं के आचार्य माने जाते है। प्राचीन काल से संस्कृत को ही सभी भाषा की जननी माना जाता रहा है। इन्द्र भाषा के विद्वान थे तथा वे सब वेदों ( अथर्व वेद, ऋग वेद, साम वेद, यजुर्वेद) के ज्ञाता थे। अर्थात् इन्द्र को सारे वेदों को अच्छी तरहा से जानते थे। वे यज्ञ-हवन आदि के प्रचारक थे। तत्व विचारक थे अर्थात् संसार में प्रत्येक वस्तु किन-किन तत्वों से निर्मित हुई है, कितने प्रकार के तत्वों से पूरा वायुमण्डल बना है। धरती, आकाश, अग्नी,वायु, जल आदि का निर्माण कब और कैसे हुआ इन सब पर विचार करना, चिन्तन, मनन करना उनका काम था। इसके साथ ही वे सभी जनों के रक्षक भी थे। क्या देवता क्या मनुष्य सबकी वे रक्षा करते थे। इसीलिए देवताओं के अतिरिक्त मनुष्य ने भी उनके महत्त्व को स्वीकार कर लिया था। इन्द्र ने अपने कर्मों तथा गुणों से धरती पर स्वर्ग की स्थापना कर दी थी।





वेद पाठ के साथ-साथ सर्वत्र यज्ञ होते थे,
इसीलिए सब लोग परम-सुख से सदैव सोते थे।
यज्ञ-धूम से बनता था पर्जन्य प्रजा हितकारी,
जिसकी यथा-समय वर्षा से धरा धान्य-निधि सारी।


व्याख्या:- इन्द्र के कारण चारों और पृथ्वी पर स्वर्ग का वातावरण बन गया था। सभी वेद पाठ किया करते थे तथा विभिन्न कारणों से यज्ञ होते रहते थे। इसी कारण सभी लोग परम-सुख का अनुभव करते थे तथा चैन की नींद भी सो पाते थे। वेदों का अनुसरण कर वे सभी सुख-शान्ति का जीवन जीते थे। यज्ञ के धूवें से बादल बनता था जिससे समय-समय पर वर्षा होती थी तथा धरती को धन-धान्य से भर देती थी। समय पर वर्षा होने से नदियों तथा जलाशय भरे रहते थे जिससे न तो मनुष्यों को न ही जानवरों को पानी की कमि महसूस होती थी। प्रजा के हित के लिए नित्य ही यज्ञ होते रहते थे।


हँसती आती उषा, सूर्य दिनभर सोना बरसाता,
संध्या श्रम हरती, रजनी का तम प्यार से सुलाता।
चन्दा की चाँदनी सुधा एवं चाँदी बरसाती,
पत्रपत्र पर ओस सबेरे मोती बन इतराती।



व्याख्या:- यज्ञ-हवन के कारण चारों और सुखमय वातावरण बन गया था। सुबह सूर्य उदय होता और उषा हँसती हुई आती थी अर्थात् दिन की शुरूआत बहुत प्रसन्नता से शुरू होती थी। सूर्य देव दिन पर आकाश में चमकते और धरती पर जैसे सोना बरस रहा होता था। लोग तथा अन्य प्राणी भोजन के लिए दिनभर मेहनत करते। जब शाम हो जाती तो उनकी थकान संध्या हर लेती थी। अर्थात् डूबता हुआ सूरज, घर वापस जाते पक्षी, धीरे-धीरे चलता पवन इन सबकी थकान को दूर कर देती तथा रात का अंधेरा इन्हें प्यार से सुला देता था। रात को जब-जब चाँद निकलता तो उसकी चाँदनी से जैसे अमृत बरस रहा होता है। सुबह हरियाली में अनोखी सुन्दरता छा जाती जब हर एक पत्ते पर ओस की बून्दे मोती की तरह बिखरे पड़े रहते और अपनी सुन्दरता पर इठलाते रहते। कवि ने यहाँ पर प्रकृति का सुन्दर मनोरम चित्रण किया है।



भवन-भवन धनधान्य-तनय से पूर्ण चूर्ण दुविधा थी,
मनचाहा सुकर्म करने की सभी कहीं सुविधा थी।
खाते गाते सुख पाते भव-जल-निधि तर जाते थे,
जन-जन में बन्धु के, मित्र के प्रेम-पूर्ण नाते थे।


व्याख्या:- कवि कहते हैं कि चारों ओर सुख का संचार हो रहा था। हर घर धन से धान्य(अन्न) तथा बाल-बच्चों से भरा पूरा था। कही पर भी किसी भी टकराव या परिवार के अलग-थलग होने का कोई कारण नहीं था। सभी को अपने मन-पसंद काम करने की सुविधा थी। सभी के मन में सुख विराजमान था। वे पेट भर भोजन कर सकते थे, प्रभु के गुण गाते थे तथा उसी के द्वारा भव सागर को पार कर ईश्वर में लीन हो जाते थे। प्रत्येक लोगों के मन में एक-दूसरे के प्रति बन्धु भाव(दूसरे को अपना भाई समझना) था और अपने मित्रों से प्रेम का नाता था। यह सत्य युग था जिसमें सभी एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे, सबके साथ प्रेम से रहते थे, किसी प्रकार का दुख या अशान्ति नहीं था समाज में तथा सभी ईश्वर में आस्था रखते थे और वेदों का अनुसरण कर अन्त में भव-सागर को पार कर जाते थे।



पूजी जाती थीं सर्वत्र नारियाँ सच्चे मन से,
नारि-द्रोह को देख देवता जाते निकल भवन से।
पतिव्रता नारियाँ, पुरूष सब पत्नीव्रत धारी थे,
घर-घर में था स्वर्ग, नारि-नर पावन हितकारी थे।



व्याख्या:- कवि आगे कहते हैं कि वह ऐसा युग था जब सभी जगह पर स्त्रियों का वास्तव में सम्मान होता था। उन्हें पूजा जाता था सच्चे मन से। कोई छल या कपट नहीं होता था। यदि कही पर स्त्री के प्रति किसी भी प्रकार का अन्याय दिखायी देता था तो देवता तुरन्त वहाँ से चले जाते थे। अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती थी, उनका सम्मान होता था वही पर देवता रहते थे। नारी भी उस समय बहुत गुणशाली थी। पतिव्रता, ममता, परिश्रमी, ज्ञानी हुआ करती थी। अपने पति से जैसे स्त्री प्रेम एवं श्रद्धा करती थी उसी प्रकार सभी पुरुष भी पत्नीव्रता थे अर्थात् अपनी स्त्री के अलावा उनके लिए सभी स्त्रियाँ माता या बहन के समान होती थी। घर-घर में स्वर्ग का सा माहोल था तथा सभी नारी नर पवित्र धर्म का पालन करते थे एक-दूसरे के हित के बारे में सोचा करते थे।




प्रतिवेशी पुष्प का कंटकों ने होना स्वीकारा,
निष्कंटक साम्राज्य पुष्प का रहा न कभी सहारा।
संग उषा के संध्या, दिन की निशा सहचरी बनती,
प्रकाश के सब ओर तमस की वितानिका सी तनती।



व्याख्या:- कवि आगे प्रकृति का मानवीकरण कर देते हैं। वे कहते हैं कि काटों ने फूलों का पड़ोसी होना स्वीकार कर दिया। इस कारण पहले जहाँ बिना काटों के फूल खिला करते थे उनका संसार अलग था अब वही कांटों के साथ फूल उगने लगे। उसी प्रकार प्रकृति में और भी परिवर्तन हुए। जैसे सुबह के साथ शाम तथा दिन के साथ रात ने अपना सहचर्य बना लिया अर्थात् दोस्ती कर ली। उसी प्रकार प्रकाश के चारों ओर अंधकार विस्तार सा फैलाव होने लगा। अर्थात् जहाँ प्रकाश होता था उसके आस-पास अंधकार भी मौजूद रहता था। यह कवि के द्वारा सत्य युग में आ रहे परिवर्तन तथा सुख के साथ दुख के आगमन का सूचक था।




कश्यप ऋषि का हृदय न केवल पुष्पों की फुलवारी,
चुभने वाल शूल भी उन्हें कष्टप्रद थे भारी।
देख चरित्र अदिति-पुत्रों के अतिशय सुख पाते थे,
दनायु के तनयों को लख पीड़ा से भर जाते थे।



व्याख्या:- कवि इस परिवर्तन का संकेत प्रकृति के द्वारा दिया था। अब वे उसका मूल संबंध कश्यप ऋषि के परिवार के साथ बता कर उसे समझा रहे है। कश्यप ऋषि का हृदय न केवल फूलों की फुलवारी से भरा था बल्कि पैरों में चुभने वाले काटों जो कष्ट पहुँचाते है उससे भी भारी हो गया था। अर्थात् वे जब-जब अदिति के पुत्रों के देखते तो उन्हें सुख मिलता था परन्तु दनायु के पुत्रों को देखते तो उन्हें बहुत पीड़ा होती थी। अदिति के पुत्र जहाँ सबको सुख-शान्ति प्रदान करने वाले, ज्ञानी, दयालु, धरती पर स्वर्ग की स्थापना करने वाले थे वही दनायु के पुत्र उसके विपरीत थे। माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सुख यही होता है जब उनकी संतान अच्छे कर्म कर तथा दूसरों को सुख प्रदान करें। इससे सभी उन्हें(संतान) को अपना समझ सकेंगे। इसके विपरीत दनायु पुत्रों के कर्म से कश्यप ऋषि को दुख होता रहता था।


कश्यप ऋषि की अपरा जाया दनायु तमनिरता थी,
आश्रम में रहकर भी रौरव भावों से भरिता थी।
पति को सुखकर कर्म कौन सा, उसने नहीं विचारा,
उसे बहाती रही द्वेष एवं विरोध की धारा।


व्याख्या:- कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी दनायु अंधकार में भरी हुई थी, अंधकारमयी विचारधाराओं में निरत रहती थी। ऋषि आश्रम के पवित्र वातावरण् में रहकर भी नरक के भावों से भरी हुई थी। पति को क्या अच्छा लगता है, किस काम से उन्हें सुख मिलेगा इस बात का विचार दनायु को कभी नहीं आता था। वह सदा द्वेष और विरोध की धारा में बहती रहती थी। अर्थात् जैसी अदिति थी दनायु उसके बिलकुल उलटे स्वभाव की थी। पति के प्रति असंवेदनशील थी। मन में अच्छे विचार तथा भावनाएँ नहीं थे बल्कि द्वेष और ईष्या की भावना भरी हुई थी।



तनयों को दनायु ने अतिशय अविनय की शिक्षा दी,
मानो सन्यासी को मद की, आमिष की भिक्षा दी।
अदिति अधिक प्रिय थी कश्यप को, इससे दनायु रुष्टा,
शनैः-शनैः रुष्टता कर गई उसको अतिशत दुष्टा।


व्याख्या :- दनायु ने अदिति के समान अपने पुत्रों को शिक्षा न देकर उन्हें अविनय की शिक्षा दी। उन्हें दूसरों से प्रेम करना, विनम्रता से पेश आना, अच्छा व्यवहार करना आदि न सिखाकर दूसरों पर अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करना, मार-पीट से भी काम चलाना, अहंकार की भाषा बोलना आदि की शिक्षा दी। क्योंकि दनायु को अच्छा व्यक्तित्व कमजोरी लगता था तथा वह अपने पुत्रों को शक्तिशाली बनाने के लिए अनुचित मार्ग पर चलने के लिए भी प्रेरित करती रहती थी। यह कर्म उसका ऐसा था कि किसी संन्यासी ने भिक्षा मांगी हो और उसे कंद-मूल-फल के बदले मदिरा तथा मांस की भिक्षा दी गयी हो। कश्यप ऋषि को अदिति अधिक प्रिय थी क्योंकि अदिति के कर्म तथा आचार-व्यहार-विचार अच्छे थे। इस बात से दनायु रुष्ट थी। धीरे-धीरे दनायु की यह रुष्टता बढ़ती गयी तथा वह और भी अधिक दुष्ट हो गयी अर्थात् बुरे कर्मों में लीन होती गयी।



जो कुछ करते तनय अदिति के, वह उलटा सिखलाती,
इस प्रकार अपने ही घर में बैर-बीज बिखराती।
शान्त, तपस्वी कश्यप सब कुछ देख-देख चुप रहते,
चिन्ता की ज्वाला से निशिदिन मन ही मन थे दहते।


व्याख्या:- अदिति पुत्र जिनते समझदार थे, जैसा अपनी माता की आज्ञा का पालन करते तथा अच्छे व्यवहार से सबका मन मोह लेते थे, दनायु उतना ही उलटा उन्हें सिखाती थी। अर्थात् दनायु पुत्र उतने ही दुष्ट, उद्दण्ड तथा झगड़ा करने लगते थे। इसी प्रकार घर में भाई-भाई में ही बैर(शत्रुता) के बीज बोती जा रही थी। (जिसका परिणाम आगे चलकर देवासुर संग्राम हुआ।) कश्यप ऋषि तपस्वी व्यक्ति थे। शान्त रहकर यह सब देखते और चुप रह जाते थे। वे मन-ही-मन चिन्ता की आग में जलते रहते थे कि आगे क्या होगा। भाई-भाई में इस प्रकार का झगड़ा, घर का कलह आगे चलकर क्या रंग लाएगा।



अदिति और कश्यप जितना ही संयम दिखलाते थे,
दनायु एवं उसके सुत त्यों धृष्ट हुए जाते थे।
दनायु के सुत वीर, वृत्र थे, बल एवं विक्षुर थे,
माता के इंगित पर कुछ भी करने को तत्पर थे।
व्याख्या:- कवि आगे कहते हैं कि अदिति एवं कश्यप जितना ही दनायु तथा उसके पुत्रों से संयम का बर्ताव दिखाते थे दनायु के पुत्र उतना ही अधिक अभद्रता दिखाते थे। दनायु के पुत्र वीर, वृत्र, बल तथा विक्षुर अत्यंत शक्तिशाली एवं उद्दण्ड थे। अपनी माता के एक इशारे पर वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे। कश्यप ऋषि तथा देवी अदिति उनकी उद्दण्डता के कारण आश्रम का वातावरण् दूषित न हो तथा आश्रम में किसी भी प्रकार का झगड़ा ना हो इसलिए संयम से काम लिया करते थे। परन्तु इसका फल उलटा ही जाता था।


अदिति सुतों को नहीं उन्होंने कभी स्वभ्राता माना,
जब भी जाना, उन्हें विरोधी और शत्रु ही जाना।
कश्यप ने जब-जब समझाया भ्रातृ-प्रेम सिखलाया,
तब-तब दनायु ने सारे घर को शीश पर उठाया।


व्याख्या:- कवि कहते हैं कि दनायु के पुत्रों ने कभी भी अपनी सौतेली माता अदिति के पुत्रों को अपना सगा-भाई नहीं माना। यद्यपि वे सभी अलग-अलग माताओं के पुत्र थे लेकिन थे तो एक ही पिता की संतान। फिर भी उनमें जमीन-आसमान का फर्क था तथा इसी कारण दनायु पुत्रों ने कभी भी अदिति के पुत्रों को अपना भाई नहीं समझा। जब भी उन्हें देखा या जाना तो अपना विरोधी तथा शत्रु ही समझा। कश्यप ऋषि जब-जब दनायु पुत्रों से बात करते उन्हें समझाते तो उन्हें भ्रातृ-प्रेम सिखाया करते थे। लेकिन दनायु जो सदैव ही बुरे भावों से भरी हुई रहती थी, अदिति तथा उसके पुत्रों का अहित चाहती थी, इस बात को लेकर पुरा घर सर पर चढ़ा लेती थी कि कश्यप ऋषि केवल उसके ही पुत्रों को क्यों समझाते हैं।



कहा कि तुम मेरे पुत्रों को कायरता सिखलाते,
और सौत के तनयों को शीश पर सदैव बिठाते।
मेरे भी सुत तनय आपके हैं, क्या कभी विचारा?,
उनको सदैव पुचकारा, इनको सदैव फटकारा।


व्याख्या:- दनायु जब भी सुनती कि कश्यप ऋषि उसके पुत्रों को कुछ समझा रहे हैं तो वह तुरंत उनका विरोध करना शुरू कर देती। पूरे घर को सिर पर चढ़ा लेती। वह तब ऋषिवर से कहने लगती कि तुम मेरे पुत्रों को जब देखों कायरता सिखाते हो। दनायु को भ्रातृ-प्रेम, सदाचार आदि व्यवहार कायरता ही प्रतीत होते थे इसलिए वह अपने पुत्रों को यह सब न सिखाकर उलटा ही सिखाती थी। वह ऋषि से कहने लगती कि तुम मेरी सौतन के बेटों को हमेशा अपने सर पर बिठाते हो, उनका ही पक्ष लेते हो। मेरे बेटे तो आपके भी बेटे है लेकिन कभी उनके बारे में आपने नहीं सोचा। सदा ही अदिति के पुत्रों को आप प्यार करते हैं और मेरे बेटे को फटकारते रहते  हैं। यह सब अन्याय है।

अदिति-पुत्र देवों का राजा बना, देख प्रमुदित हो,
कभी न सोचा-स्थान प्राप्त मम तनयों को समुचित हो।
बना इन्द्र देवेन्द्र, बन्धुओं को उसने पद बाँटे,
मम तनयों से ऐसे बचा कि इन सबमें हों काँटे।
व्याख्या:- दनायु ऋषि कश्यप को ताने मारते हुए कहने लगती है कि अदिति का पुत्र देवताओं का राजा बन गया और आप उसे देख कर अत्यंत प्रसन्न हो गये। लेकिन कभी ये नहीं सोचा कि मेरे पुत्रों को भी कोई उचित एवं अच्छा स्थान प्राप्त हो। दनायु भी चाहती थी कि उसके पुत्र में से कोई राजा बन जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह आगे कहती है कि इन्द्र ने राजा बनते ही अपने भाईयों को कई अच्छे-अच्छे पद एवं कार्यभार संभालने के लिए दिये। लेकिन पद बाँटते समय उसने मेरे पुत्रों का ध्यान नहीं आया, वह उनसे ऐसे बचा-बचा कर अपने भाईयों को देवताओं का पद बाँट रहा था जैसे मेरे बेटों में काँटे लगे हो। दनायु इस बात से भी रुष्ट थी कि उसके पुत्रों को कभी कोई अच्छा स्थान नहीं मिला।


ऐसा कुछ भी किया न, मेरे सुत भी कुछ बन जाते,
यह मत करो, करो मत वह ही उन्हें रहे सिखलाते।
प्रतिभा कुंठित हो, विकास इनका न कभी हो पाये,
अदिति पुत्र फूलें, मेरे सुत रहें सदा मुरझाये।

व्याख्या:- दनायु आगे कहती है कि आपने (अपने पति ऋषि कश्यप से) कभी ऐसा कुछ नहीं किया कि मेरे पुत्रों का कोई हित हो। ऐसा कोई काम नहीं नहीं किया जिससे कि मेरे पुत्र भी कुछ बन जाते। बल्कि उन्हें आप यह मत करो, वह मत करो ही सिखाते रह गये। उनकी प्रतिभा केवल आपके कारण दबी रह गयी। वे असफलताओं के कारण निराशा में घिरे रह गए। वे कभी भी विकसित नहीं हो पाये। अदिति के पुत्र सदैव फलते-फूलते रहे और मेरे पुत्र सदा के लिए मुरझा गए।( वस्तुतः अदिति पुत्रों और दनायु पुत्रों में बहुत अंतर था। अदिति पुत्र जितने शांत, गंभीर, ज्ञानी, संयमी, विनम्र थे, दनायु पुत्र उनके बिलकुल विपरीत स्वभाव के थे। यही कारण है कि उन्हें सृष्टि के ऐसे किसी भी काम के लिए अयोग्य घोषित किया गया था जो सृष्टि के लिए उपयोगी थे। क्योंकि गलत व्यक्ति को यही महत्त्वपूर्ण काम अथवा किसी अच्छे पद की जिम्मेदारी दी जाए तो वह उसे बर्बाद कर देता है। ऋषि कश्यप इस बात को समझते थे लेकिन दनायु यह नहीं समझती थी।)


मैं अभिसन्धि समझती हूँ, इतनी न ज्ञानरहिता हूँ,
नहीं अचेतन, सावधान एवं संज्ञा-सहिता हूँ।
मेरे पुत्र अदिति-पुत्रों के पथ में कभी न आवें,
छीनें उनका राज्य न, उनसे भी आगे बढ़ जावें।


व्याख्या:- दनायु कहती है कि मैं अभिसन्धि (चालबाजी) को अच्छी तरह से समझ चुकी हूँ। इतनी भी अज्ञानी नहीं हूँ। मैं चेतनाशून्य नहीं हूँ बल्कि सावधान हूँ एवं होश में हूँ। मेरे पुत्र अदिति के पुत्रों के रास्तें में कभी न आ सके, न कभी भी उनका राज्य छीन सके उसमें राज कर सके। न कभी मेरे पुत्र जीवन में आगे बढ़ सके इसीलिए यह चालबाजी की गयी है। यह बात में अच्छी तरहा से जानती हूँ।


इतनी तुच्छ नहीं हूँ मैं जो ऐसी शिक्षा दूँगी,
कर्तव्य-च्युत तुम, मैं कर्तव्य का सुमार्ग गहूँगी।
मुझको या मेरे पुत्रों को देवों से न प्रयोजन,
अदिति-सुतों से हम सब दूर रहेंगे शत-शत योजन।
व्याख्या:- दनायु आगे कहती है कि मैं इतनी तुच्छ नहीं हूँ, इतनी बुरी नहीं हूँ कि अपने पुत्रों को ऐसी शिक्षा दूँगी कि वे देवताओं का राज्य छीन ले या देवताओं को दबाकर आगे बढ़ जाये। तुम(ऋषि कश्यप को संबोधित करते हुए) भले की कर्तव्य-च्युत( कर्तव्य से विमुख होना) हो। मेरे पुत्रों के प्रति भी जो तुम्हारा जो कर्तव्य था उसे भले ही न पूरा किया हो लेकिन मैं अपने कर्तव्य का पालन करूँगी। कर्तव्य के सुमार्ग पर चलते हुए अपने पुत्रों को लेकर यहाँ से दूर चली जाऊँगी। मुझको और मेरे पुत्रों को तुम्हारे पुत्रों से कोई प्रयोजन नहीं है, कोई मतलब नहीं है। मैं और मेरे सभी पुत्र अदिति और उसके पुत्रों से बहुत दूर हजारो कोस दूर चले जाएंगे। दूर जाकर कही रहेंगे।


नहीं मानव का नृप इन्द्र, तथापि परम पूजित है,
यश का छन्द इन्द्र के उनके मानस में कूजित है।
मानव उसे नृपति से भी सम्मान अधिक देते हैं,
स्वर्ग-प्रदाता एकमात्र वह, मान सहज लेते हैं।


व्याख्या:-  दनायु ऋषि कश्यप से इन्द्र के बारे में कहती है कि इन्द्र तो मानवों का राजा नहीं है। लेकिन मानवों में वह परम पूजित है। सभी उसकी पूजा करते है उसको बहुत मान-सम्मान देते है। इन्द्र के यश का गान मानवों के मन-मस्तिष्क में सदैव ही गूंजता रहता है। मानव जाति उसे अपने राजा से भी अधिक सम्मान देते है। वह सहज ही मान लेते हैं कि इन्द्र ही उन्हें स्वर्ग में स्थान दिला देगा। इसीलिए सदैव उसकी पूजा-अर्चना की जाती है उसको प्रसन्न किया जाता है।

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

गुरुमंत्र



एकनाथ का चरित्र-चित्रण

एकनाथ बहुत ही बुद्धिमान और मेहनती लड़का था। वह देवगढ़ के दीवान पण्डित जनार्दन पन्त को अपना गुरु मानता था। वह अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के लिए सारी मोह-माया त्याग कर आधी रात को ही घर से निकल जाता है। उसे रास्ते में आने वाले भयानक खतरों की कोई परवाह नहीं होती है। वह केवल अपने सुनहरे भविष्य के बारे में सोचकर आगे बढ़ जाता है।
जब एकनाथ सारे कष्ट तथा रास्तों की कठिनाईयों को झेल कर देवगढ़ पहुँचता है और अपने गुरु को देखता है तो उसकी सारी थकावट दूर हो जाती है। उसे अपने गुरु पर पूरा विश्वास था। एकनाथ की गुरु-भक्ति असीम है। तभी वह देवगढ़ पहुँचने के बाद पूरी श्रुद्धा और लगन से अपने गुरु की सेवा में लग जाता है। एकनाथ में धीरज भी बहुत था। वह देवगढ़ में तीन वर्ष तक लगातार एक मन से अपने गुरु की सेवा में लगा रहता है। उसे गुरुमंत्र पाने की इच्छा तो है फिर भी वह अपने गुरु के घर का हर काम यह समझकर करता है कि गुरुदेव उसकी परीक्षा ले रहे हैं। वह धैर्य से अपने काम में लगा रहता है।
एकनाथ में गुरुभक्ति के अलावा, साहस, चतुरता एवं बल भी बहुत होता है। जब देवगढ़ पर अचानक एक दिन शत्रुओं का हमला हो जाता है तो वह गुरु जी की साधना भंग न होने पाये इसका उपाय करते हुए स्वयं ही गुरु जी के युद्ध वाले वस्त्र पहनकर और तलवार लेकर शत्रुओं से लड़ने चला जाता है। वह युद्ध जीत कर वापस आता है। परन्तु यह बात वह किसी से नहीं कहता है क्योंकि उसमें बिलकुल भी अहंकार नहीं है। सबको लगता है कि पण्डित जनार्दन पन्त ने ही देवगढ़ की रक्षा की है। परन्तु पण्डित जी जब यह बात जान जाते है तो तब भी एकनाथ यह कह देता है कि यह सब कुछ उसके गुरु के ही कारण हुआ है।
एकनाथ के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद जब उसे दीवान की पदवी देने की इच्छा प्रकट करते हैं तो एकनाथ रो पड़ता है और दीवान की पदवी ठुकरा देता है। उसमें दीवान की पदवी का लालच बिलकुल नहीं होता है। इस बात से उसके गुरु जी बहुत प्रसन्न होते हैं। परन्तु फिर भी एक परीक्षा बाकी रह जाती है जो पण्डित जनार्दन पन्त लेना चाहते थे। वासत्व में गुरु जी उसकी एकाग्रता की परीक्षा लेना चाहते थे। यदि एकनाथ इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तो तभी वे उसे गुरुमंत्र दे सकते थे। एकनाथ को उस परीक्षा के बारे में कुछ नहीं पता होता है। फिर भी वह धीरज के साथ वहाँ गुरु की हर आज्ञा का पालन करने में लगा रहता है। अंत में वह परीक्षा का समय भी आ जाता है। नए साल की शुरुआत में वह एकनाथ से पिछले पूरे साल का हिसाब-किताब तैयार करने को कहते हैं। एकनाथ इस काम के लिए तैयार हो जाता है। गुरु जी उसकी परीक्षा लेने हेतु उससे कहते हैं कि केवल एक दिन और एक रात का ही समय है। परन्तु एकनाथ बिना डरे इस काम को करने के लिए तैयार होता है और गुरु जी को भरोसा देता है कि वह ये काम कर लेगा। ये एकनाथ का आत्मविश्वास था। एकनाथ अपनी पूरी एकाग्रता से इस काम में लग जाता है और उसे समय का बिलकुल भी पता नहीं चलता। जब हिसाब-किताब में एक पैसे का फ़र्क पड़ता है तो एकनाथ उस फ़र्क को ढूँढने में इतना मगन हो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि कब रात हो जाती है और उसके सामने बत्ती भी जलायी जाती है। उसके गुरु जी जब उसे मगन होकर हिसाब ठीक करते हुए देखते हैं तो उसके सामने जाकर खड़े भी हो जाते हैं। एकनाथ को इसका भी पता नहीं चलता। वह जब एक पैसे का फ़र्क निकाल कर पूरा हिसाब तैयार करता है तब वह जान पाता है कि उसके गुरु उसके सामने खड़े है।
पण्डित जनार्दन पन्त उसकी एकाग्रता देखकर उसे अंत में गुरुमंत्र देने को तैयार हो जाते है और उसे यह उपदेश देते हैं कि ईश्वर की साधना में भी उसे ऐसी ही एकाग्रता दिखानी होगी और जिस प्रकार एक पैसे के भूल को भी उसने ढूँढ कर ठीक कर दिया उसी प्रकार उसे ईश्वर की साधना में भी छोटी-छोटी भूलों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

प्रभात वर्णन कविता का सार.................



            प्रभात वर्णन में हरिऔध जी ने प्रकृति के सबसे सुन्दर क्षण प्रभात की सुन्दरता एवं उसके मनोहरी दृश्यों का चित्रण किया है। प्रकृति में प्रभात में होने वाले हर प्रकार के हलचलों को कवि ने अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से चित्रित किया है। कवि ने प्रभात की सुन्दरता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रकृति का मानवीकरण किया है जिसके कारण यह कविता और अधिक सुन्दर एवं सरस बन गयी है।
          कवि कहते हैं प्रकृति रूपी वधू ने असित(काला) वस्त्र बदल कर सित(सफेद) वस्त्र पहना। अर्थात् रात की कालिमा दूर हो गयी और सुबह की रोशनी चारों और फैलने लगी। कवि आगे कहते हैं कि प्रकृति रूपी वधू ने अपने शरीर से तारकावलि(तारे, नक्षत्र समूह) का गहना उतार दिया। उसका यह नया स्वरूप, नया रंग पूरे नीले आसमान पर छा गया। अर्थात् रात में आकाश काला होता है तो उसमें तारे चमकने लगते है बिलकुल गहनों के जैसे दिखते हैं। परन्तु सुबह होते ही सूरज की रोशनी चारों और फैलने लगती है तो तारे छिप जाते हैं। सुबह होते ही चारों तरफ दिशाओं में राग छाने लगा अर्थात् चिड़ियों का चहचहाना, आदि चारों दिशा को रागमय कर देती है। राग प्रेम का दूसरा नाम भी है। सुबह होते ही चारों दिशाओं में प्रेम भी छाने लगा। निशा(रात) रूपी स्त्री ने अपना वदन(शरीर) छुपा लिया।
          कवि आगे कहते हैं कि उषा सुन्दरी अर्थात् दिन रूपी सुन्दरी आरंजित( हर प्रकार के रंगों से पूरी तरहा रंगी हुई) होकर सुख मनाने लगी।(सुहागिन स्त्रियाँ हमेशा रंगीन कपड़े पहनती है, कवि ने प्रकृति को, विशेष कर उषा सुन्दरी को सुहागिन के रूप में दर्शाने की कोशिश की है।) प्रकृति में प्रभात होते ही तरहा-तरहा के रंग दिखने लगे थे, उससे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे उषा सुन्दरी के कपड़े रंगीन हो गए हो। कवि कहते हैं कि जिस प्रकार तम्बू टांगा हुआ और तना हुआ रहता है, उसी प्रकार उषा सुन्दरी ने अपने होंठों में लाल रंग मयी आभा को ताना है। अर्थात् सुबह आकाश में चारो तरफ सूरज की लालिमा छायी हुई रहती है। नियति(भाग्य विधाता) के हाथों से चन्द्र की छवि छीनकर उसे छुपा दिया है और धरती पर से उज्जवल काली चादर उठ गयी है। अर्थात् रात को चन्द्र आकाश में चमकता है जिसके कारण धरती पर अंधेरे में सब कुछ चान्दी रंग में चमकता हुआ नज़र आता है। रात की कालिमा और चांदी का रंग एक सा हो जाता है। लगता है जैसे किसी ने धरती पर उजले काले रंग की चादर बिछा दी हो। जो सुबह के होते ही अपने आप गायब हो जाती है।
          कवि आगे कहते है कि प्रकृति में सुबह होते ही हृदय अपने-आप सरस(रस से भर जाना) हो जाता है। ओस की बून्दे भीगे हुए हृदय को और भी सरस बना देती है। फूलों, पत्तियों, फलों इत्यादि में ओस की बून्दे छा जाने के कारण सब कुछ अधिक रस मयी बन जाता है। उषा सुन्दरी ने ऐसे में और अधिक प्रसन्न होकर आसमान के निचले हिस्से से मोती बरसाने लगती है।(अर्थात् dew)। फिर खुले कंठ(गला) से मन खोल कर, मधुर(कमनीय) आवाज़ में बीन बजाने लगती है। अर्थात् सुबह होते ही चारों तरफ प्रकृति अलग-अलग रूपों में सुबह होने का एहसास कराती है। जैसे झरनों की आवाज़, पंछियों की चहचहाट आदि। कवि कहते हैं कि पंछियों ने भी उमंग भरे मधुर स्वर में चहचहाते हुए अपनी मधुर रागिनी सुनाई।
          ठण्डी-ठण्डी हवा बहने लगी और उनके छूने से कलियाँ विकसित होने लगी। पेड़ों का दल खुश हुआ तो लताएँ भी खुश होकर झूमने लगी। जलाशयों में कमल खिल उठे एवं नदियाँ भी ठण्डी हवा के छूने से झूम उठी, उनकी लहरें और अधिक खुशी से उछल-उछल कर बहने लगी। कवि कहते हैं कि जहाँ आकाश और धरती जुड़ती हुई नजर आती है, वहाँ तक का सारा वातावरण सुगंधित हो चुका है। अर्थात् सुबह होते ही चारों और फूल खिलने लगते हैं और ठण्डी हवा उनकी खुशबू को अपने में समेट कर चारों तरफ फैला देती है। भवरों का झुण्ड इस खुशबू से मंत्र-मुग्ध होकर इधर-उधर उड़ने लगते हैं।
          प्रभात होते ही सूरज का उदय होता है। वह बिलकुल बाल-रवि अर्थात् छोटा-सा सूरज लगता है जैसे की बच्चा हो। उसके उदय होते ही चारों तरफ सोने जैसी चमक के साथ किरणें फूट पड़ी। अंधकार से भरे आकाश में किरणें परम प्रकाशमय(रोशनी से भरी) बनकर टूट पड़ी। अर्थात् आकाश में अंधकार का नामो-निशान नहीं रहा। रात का अंधेरा पूरी तरहा से मिट गया। पूरा संसार सूरज की किरणों से जगमगा उठा है और धरती में कान्ति(glow) फैलने लगी। ऐसा लगने लगा जैसे किसी अलौकिक ज्योति पुंज अर्थात् किरणों का गुच्छों की सुन्दर मनोहर-सी थैली खुल गयी हो।
          कवि आगे कहते हैं कि सूर्योदय के साथ उसकी किरणें ऊँचे-ऊँचे पर्वतों एवं पहाड़ों में पड़ने लगी। जिस कारण ऐसा लग रहा था जैसे पर्वतो की चोटियों ने कोई मुकुट पहन लिया हो। जिसमें हजारों मणियाँ चमक रही हो। सूरज की सोने की किरणों का रंग पहाड़ो से गिरने वाले झरनों में मिल जाने पर ऐसा लग रहा था जैसे झरनों से पानी नहीं सोना बह रहा हो। सूरज की स्वर्णिम किरणों की चमक से मिलकर फूलों का गुच्छे आकर्षित लगने लगे। लताएँ और बेलियाँ भी सूरज के किरणें रूपी हाथ को छूकर चमक उठी। अर्थात् सूरज की किरणें रूपी हाथ अर्थात् प्रकाश पाकर सारी लताएँ चमक उठी।
          सूरज के उदय होते ही उसकी किरणें जब नदियों और जलाशयों में पड़ने पर कैसा मनोरम दृश्य होता है कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार से किया है। कवि कहते हैं कि सूरज की स्वर्णिम किरणों के तारों(तार) से जैसे कोई अतिसुन्दर चादर बुनी गयी हो, और उस चादर को सारे जलाशय के ऊपर बिछा कर रख दिया गया हो। इस कारण सारी नदियाँ और जलाशय बहुत आकर्षित लग रही है। ऐसा लग रहा है कि जैसे नदियाँ उमंगों से भर गयी है। अपने हृदय की उमंग को दिखाने के लिए उनकी लहरे उछल-उछल कर सूरज के प्रतिबिंब(परछाई) को लेकर खेल रही हैं।(सूरज की किरणें जब जलाशय में पड़ती है तो पानी चमकने लगता है तो ऐसा ही प्रतीत होता है जैसे वे सूरज की परछाई को लेकर खेल रही हैं।)
          नुकीले-नुकीले घास पर ओस की बूंदे पड़ी हैं। उनमें जब सूरज की रोशनी पड़ती है तो ऐसा लगता है कि जैसे नुकीले घास पर किसी ने हीरों के कण(बहुत छोटे-छोटे टुकड़े) फैला दिये हो। उनकी हरित रंग की आभा(glow) उन ओस की बुन्दों से मिलकर और भी अधिक मनोरम दिखने लगते है। दूब पर थोड़ी बड़ी-बड़ी ओस की बूंदे पड़ी हुई है। जब उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है तो वे ओस की बूंदे मोतियों की माला जैसी लगती है जिसे दूब(दुर्बा एक प्रकार का छोटे आकार का तिनका पूजा में काम आने वाला) ने पहन कर रखा हो। और उससे वह और भी अधिक रमणीय लग रही है। सूरज की रोशनी इसी प्रकार बालू(sand) के टीले पर पड़ने लगती है तो वह भी आकर्षित लगने लगता है। बालू का एक-एक कण चांदी के कण के समान चमकने लगता है।
          जिस जगत को रात के अंधकार ने काला बना दिया था, वही जगत सूरज के उगने के बाद रंग-बिरंगा हो गया। कही हरियाली छाने लगी अर्थात् पेड़ो, पत्तों और लताओं के रंग, तो कही लाल रंग(लाल रंग के फूल या लाल-नारंगी रंग के सूरज का रंग) की आभा छाने लगी। जैसे-जैसे सूरज ऊपर और उठने लगा तो उसकी लालिमा धीरे-धीरे पीले रंग में बदलने लगा और आगे चलकर वह उज्जवल सफेद रंग में बदलने लगा। साथ ही साथ यह भी कह सकते हैं कि धरती पर भी तरहा-तरहा की चीज़े है जिनके रंग पीले या सफेद रंग के होते है जो सूरज के प्रकाश में चमकने लगे।
          इसी प्रकार सूर्योदय के होते ही लोग जाग गए, धरती जाग उठी। रात की जड़ता एवं आलसता भाग उठी। सब अपने-अपने कामों में लग गए। चिड़ियों का दाना चुगना, भंवरों का फूलों पर मधु के लिए मण्डराना, लोगों का सूर्य को जल चढ़ाना इत्यादि। ऐसा लगा जैसे कर्म का कोई स्रोत बहने लगा हो। प्रकृति ने अपनी नींद पूरी तरहा से त्याग दी हो। कवि आगे कहते हैं कि तमोगुण अर्थात् रात के समय की आलसता, जड़ता, आसुरी प्रवृत्तियाँ, भोग-विलास आदि हार गयी और सुबह की पवित्रता चारों और छा गयी। चकवी(मादा बतख) बड़े चावों से चकवे(नर बतख) के पास आ गयी।
          अंत में कवि कहते है कि सूर्योदय के होते ही ऐसा लगा जैसे दिन रूपी सुन्दरी ने सोने का मुकुट धारण किया हो एवं सूर्य की किरणों का पाकर सारे फूल खिल चुके हैं। प्रकृति ने ओस की बूंदे रूपी मोतियों की माला तथा खिले हुए फूलों का हार पहन लिया हो। उससे उसका शरीर अत्यंत आकर्षित और कमनीय लग रहा हैं। दिन रूपी सुन्दरी को देखकर प्रभात हँसते हुए अपने दोनों हाथों में खिला हुआ कमल लेकर आता है।

बुधवार, 28 जून 2017

स्त्री विमर्श बनाम स्त्री विमर्श




            वर्तमान समय में स्त्री की समाज में क्या भूमिका है, क्या स्थान है, क्या महत्त्व है इन सब चीज़ों की अलग से न तो बताने की जरूरत है न ही दिखाने की जरूरत है। वर्तमान युग में स्त्रियों ने समाज में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। इसीलिए स्त्री विमर्श, नारी संघर्ष आदि शब्दों की मेरे नजरिए में कोई आवश्यकता नहीं रही है। आज स्त्री जो संघर्ष कर रही हैं वह इसलिए नहीं की वह घर के चार दिवारी के अंदर बैठी है या उसे किसी भी प्रकार का अधिकार प्राप्त नहीं है। बल्कि वर्तमान युग में स्त्री को भी सब प्रकार के अधिकार तथा पद प्राप्त हो चुके है। ये युग वैश्विकरण का युग है जहाँ स्त्री पूरे विश्व में चाहे वह किसी भी समाज से हो, किसी भी प्रांत से हो अपनी छवि विश्व के सामने स्पष्ट कर चुकी है। अतः आज आवश्यकता है आज की स्त्री एवं आज के समाज के बीच यदि किसी प्रकार के मतभेद, टकराव, संघर्ष या सामंजस्य की बात हो तो उसकी चर्चा की जाए।
            वर्तमान समय में जहाँ नारी को शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, परिवार तथा समाज में स्वतंत्रता, व्यवसाय जगत हो या देश को चलाने लायक दायित्व, आदि सब कुछ मिल चुका है। वही समाज में नारी के प्रति सोच में बदलाव भी देखे जा रहें है। रूढ़ीवादी विचार में भी काफी परिवर्तन आया है। लेकिन अभी भी उतना परिवर्तन नहीं आया है कि हम कह सके कि नारी समाज में पूरी तरहा से सशक्त हो चुकी है। क्योंकि समाज में जितनी तेजी से वैश्विकरण हो रहा है उतनी तेजी से नारी समाज के प्रति अपराध के नये-नये तरीके भी निकल रहे हैं। या यू कह लीजिए कि नारी के विरुद्ध आपराधिक सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया है बल्कि संशोधित रूप में वह सामने आया है। साथ-ही-साथ यह भी देखा जाता है कि नारी जहाँ-जहाँ अपना स्थान बनाती जा रही है वहाँ-वहाँ कुछ पुरूष या स्त्री ही उसकी शत्रु बनकर उसके सामने खड़ी है। आज विडम्बना की बात यह है कि नारी भी पुरूषों के समान आपराधिक मामले में दोषी पायी जाने लगी है। पुरूषों के जिन-जिन प्रवृत्तियों को स्त्रियाँ पसन्द नहीं करती थी या जिन-जिन आदतों से वह चिढ़ती थी वही सारी बातें स्त्रियों ने भी स्वयं अपना लिये है। पुरुष-स्त्री की एकसमानता की बात करते करते आज स्त्रियाँ भी पुरुष के सारे गुण-अवगुण अपनाने लगी है। फिर किस बात के लिए हम रोज-रोज यह आवाज उठाते हैं कि नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। अपनी श्रेष्ठता को ही जब कमजोरी समझकर कुछ स्त्रियों ने इसे सम्पूर्णतः ठुकरा दिया है। हाँ इस बात से भी हम विमुख नहीं हो सकते कि स्त्रियों के साथ आज भी अन्याय हो रहा है। लेकिन इस अन्याय को रोकने के लिए समाज की सोच के साथ-साथ स्त्रियों की सोच को भी बदलना जरूरी है तभी समाज को एक अच्छी दिशा मिलेगी। हमारे समाज के लिए सबसे अधिक आवश्यक है कि पुरुष-स्त्री को समान अधिकार से अधिक समान रूप से स्वस्थ विचारधारा, युक्ति-बुद्धि एवं अवसर दिए जाए। उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि दोनों ही एक-दूसरे के जीवन की पूर्ति तथा समाज के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक हैं। दोनों में ही एक-दूसरे के प्रति पारस्पारिक सम्मान की भावना रहनी चाहिए तब ही स्त्री-पुरुष को भिन्न रूप से न देखकर एक नागरिक रूप में देखा जाने लगेगा तथा वह समाज के लिए सबसे उपयुक्त होगा। अंत में यह कहा जा सकता है कि सृष्टि कर्ता ने इस संसार में मनुष्य के अलावा जितने प्राणियों को जन्म दिया है सबने अपनी क्षमता के अनुसार अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इसी प्रकार पुरूष प्रधान समाज बनाम स्त्री का भी संघर्ष जारी रहेगा। साथ-ही-साथ नारी को यह भी समझना आवश्यक है संघर्ष के दौरान हमारा नैतिक पतन न हो, धर्य के साथ आगे बढ़ना होगा,अन्यथा हमारा संघर्ष ही कमजोर और पथभ्रष्ट हो जाएगा।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

पिल्ज माईन्ड योर लेंग्वेज




 
1
बंगलुरू के व्यस्त जीवन और गाड़ियों के शोर-शराबे के बीच कमरे में बैठी नयना सुमित का इन्तज़ार कर रही थी। आज शुक्रवार है और शनिवार और रविवार की छुट्टियों का प्लान बना रही थी। सुमित के आने पर वह अपना प्लान बताएगी। बहुत दिन हुआ परिवार कही बाहर घुमने नहीं निकला। बच्चों की भी गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही है।
सुमित आज घर देर से आया। नयना चाय तैयार करती है। शावर लेने के बाद सुमित सीधे सोफे पर आकर लेट जाता है। नयना उसे चाय और स्नेक्स देती है और धीरे-धीरे मन में दो दिन की छुट्टी का कैसे मज़ा लिया जाए, क्या-क्या किया जाए, सुमित को बताने के लिए मन-ही-मन कोशिश करती है।
सुमित?
हूँ!
मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।
क्या बात? बोलो...
कल और परसों दो दिन की छुट्टी है। मैं सोच रही थी कि बहुत दिन हुए हम सब कही बाहर नहीं गए। बच्चों की छुट्टियाँ चल रही है। चलो न कही हो आए?
कैसे होगा? अचानक तुमने ये प्लान बना लिया। मुझसे पुछा तो होता।
क्यों क्या प्रॉब्लम है? कल क्यों नहीं जा सकते?
कल नहीं होगा। कल मेरे बॉस के यहाँ पार्टी है। हमें बुलाया है।
कल पार्टी है। हम दोनों को जाना है। पर बच्चे, उन्हें साथ लेकर जा सकते है?
Don’t worry. It’s a family party. हम बच्चों को साथ में ले चलेंगे।
नयना थोड़ी आश्वस्थ होती है। लेकिन उसे उतना अच्छा नहीं लगता क्योंकि पार्टियों में जा-जाकर वह थक चुकी है। एक वक्त था जब सुमित के साथ वह बहुत सारा समय बिता पाती थी। उसकी नयी-नयी शादी हुई थी और सुमित हर सप्ताहान्त उसे कही-न-कही बाहर घुमाने ले जाता था। समय अपनी गति से चलता गया और धीरे-धीरे दोनों के पास एक-दूसरे के लिए समय की कमी होने लगी। बच्चों को होने के बाद नयना उनके पालन-पोषण में व्यस्त हो गयी और सुमित भी अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने में जुट गया। नयना ने कभी इसकी शिकायत नहीं की। सुमित भी कभी नयना से किसी चीज की शिकायत नहीं करता। पर काम-काज के टेनशन में चिढ़-चिढ़ा जरूर हो गया था। जब-जब कभी परिस्थिति बिगड़ती तो नयना स्थिति को सम्भाल लेती थी।
            2
पार्टी में जाने के लिए सभी तैयार हो रहे थे। तभी सुमित को उसके किसी ऑफिस के कलीग का फोन आता है। सुमित उससे काफी देर तक बात करता है। बात-बात में वह बहुत उत्तेजित हो जाता है। फोन रखकर वह पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगता है। वह थोड़ा परेशान है और इसी परेशानी में उसके मुँह से निकलता है गा........चू..या!! नयना यह सुन लेती है। वह बच्चों को कमरे से बाहर भेज देती है और सुमित के पास आकर उसका कोट ठीक करने लगती है।
            तुम भी ना। तुमसे कितनी बार कहा है कि इस तरहा की गन्दी गालियाँ मुँह से मत निकाला करो। बच्चे सुनेंगे तो क्या सोचेंगे तुम्हारे बारे में। हम रोज उन्हें सिखाते है कि कभी-भी किसी को गन्दी गाली नहीं देनी चाहिए। और तुम हो कि। मुझे मालूम है कि तुम परेशान हो पर इसका मतलब ये नहीं कि तुम ऐसी गन्दी गालियाँ निकालो। इससे तुम्हारी परेशानी तो हल नहीं होगी। सुमित गुस्से से Please मुझे लेक्चर मत दो। मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। अगर तुम लोग तैयार हो चुके हो तो पार्टी के लिए चले?

पार्टी में बहुत से मेहमान के बीच सुमित, बच्चों और नयना को लेकर अपने बॉस से मिलवाने ले जाता है। नयना सुमित के बॉस से कई बार मिल चुकी थी। नयना को सुमित के बॉस से चिढ़ मचती थी। जब पहली बार सुमित शादी के बाद अपने बॉस और बाकी स्टाफ से मिलाने ले गया था तो उसके बॉस ने उसे (लौं) कहकर सम्बोधित किया था जो कि नयना को बिलकुल पसन्द नहीं आया था। वह आश्चर्यचकित हो गयी थी कि इतने पढ़े-लिखे व्यक्ति जो कम्पनी में भी अच्छी पोस्ट पर हो वह कितनी भद्दी भाषा का इस्तेमाल करता है। लेकिन उसके आश्चर्य की सीमा तब नहीं रही जब सुमित के मुखश्री से भी इसी प्रकार की गंदे शब्दों की गंगा बहते वह देखती। आम तौर पर बॉस और सुमित ऐसे ही बात किया करते थे जिससे नयना को चिढ़ थी। पार्टि में देर तक बातचीत, शोर-शराबा हो हल्ला मचता रहा। आखिरकार देर रात वे लोग घर आए। बच्चों को सुला चुकने के बाद नयना कमरे में आती है तो सुमित को अकेला मोबाइल लेकर हंसते हुए पाती है। नयना समझ जाती है कि आज फिर कोई मेसेज आया होगा। आमतौर पर वह सुमित का मोबाइल कभी-कभार ही देखती या इस्तेमाल करती वह भी जब उसे लम्बे समय के लिए अपनी माँ से बात करनी हो। सुमित उसे अपना मोबाइल दे देता था।
सुमित मोबाइल में मेसेज पढ़कर चुपचाप सो जाता है। उसने पार्टी में शराब भी पी थी इसलिए उसे जल्दी नींद आ जाती है। लेकिन नयना को नींद नहीं आती है। वह बेठे-बेठे सुमित का मोबाइल लेती है और उसमें व्हाट्सअप पर आए मेसेज पढ़ने लगती है। नयना के होश उड़ जाते है जब उसे उसमें अश्लील विडियो तथा गन्दें चुटकुलों की भरमार मिलती है। नयना उन चुटकुलों को और नहीं पढ़ पाती और सुमित पर उसे बहुत गुस्सा आता है। अगले दिन सुबह वह उठती है। रविवार का दिन था सो बाकी सभी देर से उठते है। नयना सुबह का नाश्ता तैयार कर चुकी थी पर बीती रात से वह परेशान थी। उसकी परेशानी की वजह ये थी कि सुमित का मोबाइल अक्सर बच्चे लेकर खेलने लगते है। वे बड़े हो रहे है और उन्हें मोबाइल की हर तरह की जानकारी है। क्या पता बच्चों ने भी ये सारे मेसेजेस पढ़ लिए होंगे। बच्चे इस तरहा की बातें जल्दी ही सीख लेते है।
घर के सभी लोग जब उठे तो नयना सबको नाश्ता देने लगी। सुमित की ओर वह गुस्से से देख रही थी। सुमित समझ नहीं पाता है कि नयना आज अजीब व्यवहार क्यों कर रही है। बच्चे नाश्ता खाने के बाद बाहर खेलने चले जाते है। सुमित नयना के अजीब व्यवहार का राज़ जानने के लिए उसके पास जाता है।
नयना?
हूँ?
क्या हुआ है तुम्हें? तुम इस तरहा अजीब से पेश क्यों आ रही हो?
क्यों मैंने क्या किया, मैं तो बिलकुल ठीक हूँ। तुम बताओं तुम्हें क्या हुआ है?
मुझे क्या होगा। मैं तो बिलकुल ठीक हूँ और फ्रेश फील कर रहा हूँ।
ऐ चलो न आज.....(नयना की कमर पर हाथ रखते हुए)
नयना उसे हटा देती है और सुमित की ओर गुस्से से अधिक दया भाव से देखती है।
सुमित?
हूँ....बोलो डार्लिंग?
कल मैंने तुम्हारा मोबाइल देख रही थी। कैसे-कैसे गंदे मेसेजेस और विडियोज आते हैं तुम्हें।
तो इसमें क्या हुआ। Its only for fun baby.
तुम्हें ये सारे गंदे जोक्स फनी लगते हैं? बिवी बस पैसों से ताल्लुक रखती है, पति को बेवजह परेशान करती है, ......पति से छुपाके दूसरे मर्दों से रिश्ता बनाती है,...अपने बच्चों....(गुस्से से)।
ओह! Come on baby, Naynaa…ये सब सिर्फ जोक्स है, सिर्फ हंसने हसाने के लिए। तुम इन सब को लेकर कुछ ज्यादा ही सोच रही हूँ।
मैं ज्यादा नहीं बल्कि सही सोच रही हूँ। इस तरहा के बेमाने जोक्स हंसने-हंसाने के लिए जरूर होंगे लेकिन यही आजकल लड़ाई-झगड़े की वजह बन चुकी है। जिन लोगों के साथ ऐसा सचमुच का भी होता होगा उनकी मानसिक दशा क्या होगी पता नहीं। दूसरों की ज़िन्दगी की तकलीफों को जोक्स की तरहा इस्तेमाल करना छी......शराब पीने से सारे गम दूर हो जाते है...पढ़ाई-लिखाई से कुछ हासिल नहीं होता.....ये सारे जोक्स।। सबसे बुरी बात यह है कि पत्नी हो या औरत सबको पैसों का लालची और मर्दों के पीछे भागने वाली बता-बता कर जोक्स के जरिए भी मजाक उढ़ाना।
अगर बच्चे इन सारे जोक्स को पढ़ेंगे तो क्या सिखेंगे। कुछ अच्छा तो जरूर नहीं सिखेंगे। तुम कभी इन सब चीजों के बारे में सोचते भी हो।
हलो। क्या सुबह-सुबह मूड खराब कर रही हो। लेक्चरर हो तो क्या घर में भी लेक्चर दोगी। और ये सारे जोक्स मैं सिर्फ पढ़ता हूँ। इनका वास्तविक ज़िन्दगी से लेना-देना नहीं है।
देख रही हूँ। कितना इस बात को फोलो कर रहे हो। हः
यार तुम भी ना। क्या चाहती हो तुम, बताओगी मुझे?
बस इस तरहा के जोक्स और अश्लील विडियोज तुम्हारे मोबाइल से हटा दो। ताकी बच्चे ये सब न देख पाए।
तुम भी क्या जब तब भाषण देती रहती हो। हटो मुझे अभी काम करने दो।

नयना गुस्से में तमतमाते हुए कमरे से निकल गयी और अपने-आप को घर के काम में व्यस्त करने लगी।

5
कुछ दिन बाद नयना को बच्चों के स्कूल से फोन आता है। टीचर बहुत अधिक क्रोध में थी और नयना और सुमित दोनों को आने के लिए कहती है। नयना को समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या हो गया कि दोनों को ही बुलाया गया हो।
नयना सुमित को फोन करके सब कुछ कहती है और अगले दिन बच्चों के स्कूल दोनों जाते हैं।
टीचर और प्रिंसिपल दोनों वहाँ पर मौजूद थे।

टीचर:  आइए! आइए! कैसे है दोनों आप?
नयना: जी नमस्ते। क्या बात है, आपने हम दोनों को बुलाया, कल आप कुछ डिस्टर्ब लग रही थी?
टीचर: देखिए मुझे आप दोनों से ही बात करनी है। आप दोनों अपने बच्चों को कैसी शिक्षा देते हैं?
नयना ये कैसी बात कर रही है आप। हम अपने बच्चों को बहुत अच्छी शिक्षा देते हैं।
टीचर तभी तो आपका बेटा गन्दी गालियाँ देता है।
सुमित What the f…? मेरा बेटा ऐसा कर ही नहीं सकता। जरूर आपसे कोई गलतफहमी हुई है।
टीचर Please mind your language. यदि आप दो-दो लेडिज के सामने इस तरहा से बातें करते हैं तो आप कैसे कह सकते है कि आपका बेटा इस तरहा से बात नहीं करता।
सुमित देखिए आप लोग तो कुछ कहिए मत ही कहिए...........


नयना इन सब बातों के बीच में अपना आपा पूरी तरहा से खो चुकी थी। उसे लग रहा था जैसे किसी ने उसके शरीर से खाल उतार दी हो। जिन बच्चों को वह रात-दिन खुद पढ़ाती थी, नसिहते देती रहती थी, जिनके साथ समय बिताया करती थी। उन पर उसके गुणों को अपनाने की बजाए पिता के मुँह से सुनी दो-चार बार की गालियों का इतना असर कर गया था। उसे सुमित पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह गुस्से में वहाँ से उठी और चुपचाप बच्चों की तरफ मुड़ी और अपने बेटे को एक जोर दार तमाचा जड़ दिया। बच्चा बहुत जोर से रोने लगा और ये सब देखकर सुमित तथा टीचर और प्रिंसिपल सभी ने बहस छोड़ दी। नयना क्रोधित नेत्रों से सुमित की तरफ देख रही थी। फिर वह बिना कुछ बोले दोनों बच्चों को साथ में लेकर चली गयी। सुमित यह सब देखकर शर्मिंदा होता है। उसे लगता है जैसे नयना ने बेटे को नहीं बल्कि उसे तमाचा मारा है। लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था। सुमित के सामने सारे तथ्य थे जिससे यह स्पष्ट था कि उसके बच्चों ने जाने-अनजाने में गाली देना सीख लिया है और इसमें उसकी ही भूमिका थी। सुमित अब किसी पर भी गुस्सा ज़ाहिर नहीं कर सकता था।

                                                                       
                                                                                   
                                                                    
                                   

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

रमानाथ का चरित्र चित्रण

रमानाथ उपन्यास का नायक है। उपन्यास के पुरूष-पात्रों में उसका प्रमुख स्थान है। उपन्यास की सभी घटनाओं का वह केन्द्र-बिन्दु है। उसके चरित्र के कारण ही उपन्यास का कथानक विकसित होता चलता है। रमानाथ दयानाथ का पुत्र है। दयानाथ पचास रुपये मासिक पर कचहरी में नौकर थे। पिता की आय कम होने के कारण रमानाथ को कॉलिज छोड़ना पड़ा। पिता ने उससे साफ कह दिया कि मैं तुम्हारी डिग्री के लिए सबको भूखा और नंगा नहीं रख सकता, पढ़ना चाहते हो तो अपने पुरूषार्थ से पढ़ो। किन्तु रमानाथ में इतनी प्रेरणा एवं लगन नहीं थी कि वह ऐसा कर सके। बल्कि वह बिलकुल इसके विपरित था। वह सारा दिन शतरंज खेलता, सैर-सपाटे करता और माँ और छोटे भाइयों पर रोब जमाता। दोस्तों की बदौलत उसके सारे शौक पूरे होते थे। किसी का चेस्टर, किसी का जूता, किसी की घड़ी आदि लेकर अपने शौक पूरे करता। रमानाथ के इसी व्यवहार के कारण ही उसके पिता उसका विवाह कर देना अधर्म समझते थे क्योंकि जो व्यक्ति अपने प्रति लापरवाह हो वह भला अपनी पत्नी की जिम्मेदारी कैसे पूरा करेगा। लेकिन रमानाथ की माता जागेश्वरी के दबाव के कारण दयानाथ को जालपा वाला रिश्ता मान लेना पड़ा। रमानाथ में एक बात सबसे बुरी थी कि वह बहुत ही दिखावा करता था। जब उसका विवाह तय हुआ तो उसने ठान ली कि उसकी बारात ऐसी धूम-धाम से निकले कि गाँव भर के लोग देखते रह जाए और शोच मच जाए। उसे ठाट-बाठ से रहने का शौक था और विवाह के बाद भी उसकी आदतें वैसी-की-वैसी ही रही। उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण विवाह में अत्यधिक खर्च हो गया और उसके पिता पर लोगों के पैसों का उधार हो गया। रमानाथ चाहता तो अपने पिता के कन्धे पर से उधार का बोझ हलका कर सकता था लेकिन उलटे उसने अपने पिता को ही दोषी ठहरा दिया। रमानाथ के चरित्र का अन्य विशेषताएँ इस प्रकार है।
1 कायर और झूठा अभिमान -- झूठा अभिमान रमानाथ  के चरित्र की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण उसके विवाह में शान-शौकत के लिए अंधाधुंध खर्च किया जाता है, जिससे सर्राफ के रुपये चुकाए नहीं जा सके। रमानाथ ने कभी भी जालपा के सामने अपने वास्तविक आर्थिक परिस्थिति के बारे में खुलकर नहीं बताया। बल्कि वह जालपा को हर बात में खूब बढ़ा-चढ़ाकर बोला करता था कि उसके पिता की जमीन्दारी है, बैंकों में पैसा रखा है। लेकिन जब विवाह के बाद जालपा के सारे गहने चोरी हो गये जो कि रमानाथ ने सर्राफ के उधार चुकाने हेतु की थी, तब भी रमानाथ को अकल नहीं आयी कि वह जालपा से सच कह डाले। जब जालपा से उसे प्रताड़ना मिलती है तो वह नौकरी की तलाश करता है। शतरंज की बदौलत उसका कई अच्छे-अच्छे व्यक्तियों से संपर्क था लेकिन संकोच के कारण किसी से भी अपनी वास्विक स्थिति प्रकट नहीं कह सकता था। जानता था कि ऐसा करना उसके हित में नहीं है। नौकरी लग जाने पर भी उसकी आदतें नहीं सुधरी बल्कि वह और अधिक ऐश्वर्य पर ध्यान देने लगा। इसी कारण उसके रुपये नहीं बचते थे। झूठे अभिमान के अलावा उसकी कायरता ने भी उसे पतन की ओर ढकेला था। दफ्तर के पैसों के गबन के बाद वह प्रयाग छोड़कर भाग जाना उसकी कायरता का पहला उदाहरण है। कलकत्ता में जब वह पुलिस के हत्थे चढ़कर झूठी गवाही देने पर मजबूर होता है तो जालपा उसे बार-बार समझाती है लेकिन उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सच कह कर अपना अपराध स्वीकार कर ले। बार-बार उसके सामने मौका मिलने पर भी वह अपना झूठा अभिमान और कायरता को नहीं छोडता है।

2 झूठ बोलने की आदत एवं रिश्तों की कदर ना करना -- रमानाथ के चरित्र की दूसरी विशेषता थी कि वह झूठ बहुत बोलता था और अपने नैतिक रिश्तों की भी कदर नहीं करता था। वह हर बार झूठी बात कहकर काम चलाने का आदि हो गया था। वह अपने माता-पिता से तो झूठ बोलता ही था, रतन जो उसकी पत्नी जालपा की अच्छी सहेली थी उससे भी झूठ बोलता रहा। उसके रुपयों को अपने उधार रुपये चुकाने के काम में लाता है और उसे झूठ कहकर टालता रहता है। जब उसे नौकरी मिलती है तो जालपा को वह कहता है कि तीस रुपये मासिक वेतन मिलेगा लेकिन अपने माता-पिता से वह बीस रुपये वेतन ही कहता है। रमानाथ अपने से हर बात पर झूठ बोलता है। लेकिन उपन्यास में जोहरा नामक पात्र का रमानाथ के जीवन में प्रवेश होता है तो वह उससे झूठ नहीं बोल पाता है। जोहरा के सामने उसका झूठ,कपट सब धरा-का-धरा रह जाता है। रतन, वकील साहब, देवीदीन, जग्गो आदि निश्छल पात्रों के साथ भी वह कपट एवं छल का व्यवहार करता है। पुलिस के झूठे प्रलोभनों में आकर वह किसी के साथ भी विश्वासघात करने से नहीं कतराता है।

3 हृदय की सरलता -- रमानाथ एक साधारण मनुष्य है जिसमें सारी दुर्बलताएँ भरी हुई है। रमानाथ के चरित्र में तब परिवर्तन आता है जब रमानाथ पुलिस के शिकंजे में होता है और जालपा जब उसे समझाती है कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है। बल्कि पुलिस अपना उल्लु सीधा करने के लिए रमानाथ को केवल इस्तेमाल कर रही है। रमानाथ अपनी दुर्बलताओं के कारण ही हमेशा से सबसे छल करता रहा है लेकिन उसने किसी का बुरा नहीं सोचा था। रमानाथ जानता था कि यदि उसने अदालत में पुलिस के कहने पर झूठी गवाही दी तो कई सारे निर्दोष लोगों की जिन्दगी बर्बाद हो जाएगी। वह हृदय से चाहता था कि ऐसा कुछ ना हो लेकिन उसकी कारयता के कारण ही वह सत्य का साथ नहीं दे पा रहा था। अंत में जब उसे यह बात समझ में आती है कि सत्य का साथ देना ही सही है तो वह अदालत में अपने सारी गलतियाँ स्वीकार करता है और डकैती के इलजाम में पकड़े गए सारे कैदियों को बचा लेता है। इसके अलावा वह जालपा से सच्चा प्यार भी करता था। देवीदीन तथा जग्गों के प्रति भी उसके मन में लगाव था तभी वह उनके तानों तथा बातों से प्रभावित हो जाता था।

अंत में प्रेमचन्द रमानाथ के चरित्र के जरिए यही बताना चाहते है कि मध्यमवर्गीय परिवारों में इस प्रकार की दुर्बलताएँ होती है लेकिन यदि उनका सही ढंग से संशोधन किया जाए तो समाज में फिर कभी भी ऐसी बुरी और उलझी हुई परिस्थितियाँ खड़ी नहीं होंगी।