शनिवार, 4 अप्रैल 2020

माहामारी नहीं नयी शुरूआत


सुन रे मानव

ये वक्त की पुकार है

ये धरती लगा रही

तुझे कब से गुहार है



तू सोचता होगा

ऐसा आज क्या हो गया?

क्यों घर पर तू कैद है,

क्या गुनाह तुझसे हो गया?



तो सुन क्या कहती है

ये धरती...

एक सुन्दर सा खज़ाना दिया था

धरती ने तुझे

एक हरा-भरा जमाना दिया था

धरती ने तुझे

खुद की तरक्की के लिए जो चाहे तू ले ले

धरती से सब दिया, सारे तकलीफ झेले



मगर तू स्वार्थ में अंधा हो

इन्सान की जगह असुर बना

हदे सारी पार कर दी

धरती के लिए नासूर बना





एक वक्त आया ऐसा कि

स्वार्थ में तू बना इतना अंधा

धरती का विनाश ही

बन गया था तेरा धंधा।



ये धरती जो तेरी माँ है,

आखिर कब तक सहती रहती

तू क्या सोचे

वह कभी कुछ तुझे न कहती?



आज बारी आयी है उसकी

जो तू भूल गया था कि

इसमें मनुष्य के अलावा भी रहते हैं

प्राणी और कई

याद दिलाने आयी है उनकी।



पर तू घबरा मत

ये न सोच कि खत्म हो जाएगा

अब तेरा सबकुछ

बल्कि खत्म होगा सिर्फ

तेरा स्वार्थ

तेरा लालच

तेरी ईर्ष्या

तेरा क्रोध



मत भूल कि इसी धरती में

एक बीज को भी टूटना पड़ता है

मिट्टी में मिलना पड़ता है

तभी नया रूप वह धारण कर पाता है



यही धरती आज समझाने आयी है

महामारी नहीं ये नयी शुरूआत है

घर पर बैठ कर अब सोचना जरा गौर से

धरती भी गुज़री है तेरी चाहतो के दौर से



अब कुछ पल ठहर जा

सब होगा ठीक इस बार

अंधेरा मिटेगा

आएगी नयी सुबहा बहार



पर वादा कर

तू न भूलेगा इस सीख को

लेकर चलेगा साथ

धरती के हर प्राणी को



काट मत पेड़ो को

पर काट अपने स्वार्थ को

गंदा न कर नदी को

साफ रख अपने मन को

बंजर ज़मी दिखे तो

लालच न करना

हो सके तो मानवता का मंदिर

उसमें बनाना।


मंगलवार, 31 मार्च 2020

तुम समझे नहीं

हँसते रहे मुझ पर तुम हर बार
जब से जताया मैंने अपना प्यार।
तुम समझे नहीं मेरे दिल की पुकार
दुतकारते रहे तुम मुझे प्यार से बार-बार।

बातें हर रोज हुआ करती थी हममें,
तुम सुनाते थे अपनी परेशानियाँ,
तुम्हारी परेशानियाँ सुन मुझे दुख होता था,
सोचती थी कैसे दूर करु तुम्हारी मुश्किलें,
तुम्हारी हँसी, तुम्हारी खुशी मेरे लिए सब कुछ था,
तुम्हारा दुखी चेहरा मुझे कभी न भाता था।

क्या करके तुम्हें सुख दे सकू,
ये सोचकर कितनी रातें गवाई।
क्या करके तुम्हें पा सकू,
ये सोचकर इबादतों में मंदिर गई।

जब भी कोई और तुम्हारे साथ होती थी,
मैं जलती, परेशान होती, कष्ट पाती थी।
तुम चिढ़ाते थे मुझे ऐसा देखकर,
फिर भी अपनी कुढ़न न दिखाती थी,
क्या पता तुम नाराज़ हो जाओ?

तुम्हें तारीफ पसंद नहीं है अपनी,
न मेरी, न किसी और की,
तुम्हें बनावटीपन नहीं भाता,
तुम कहते थे।
पर तुमने बनावटी दुख और परेशानी,
बयां की मेरे सामने,
गवां बनाया अपनी हर चालाकी का,
मज़ाक बनाया मेरा दुनिया के सामने।
स्वीकार न किया मेरी अस्मिता को कभी,
तुम्हारे बहकावे में मैं बह चली,
और किया वही जो न करना था कभी।

आज तुम सुखी हो,
और मैं तिल-तिल कर मर रही हूँ,
रोज सवेरे उठती हूँ,
ये सोचकर कि नहीं रोऊँगी,
लेकिन जब भी याद आती है,
उन लम्हों की जो बीते थे साथ-साथ,
रोना आता है मुझे,
रोना आता है मुझे,
हँसना भूल गयी हूँ,
तुम समझे नहीं कभी-भी मुझे,
कितना प्यार था इस दिल में तुम्हारे लिए।

रविवार, 21 जुलाई 2019

कुलवन्त सिंह की कविताएँ।




             हिन्दी साहित्य के विकास के बाद से आधुनिक युग में कई कवियों का उद्भव हुआ जिन्होंने आज तक अपनी अभूतपूर्व रचनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। वर्तमान युग में हिन्दी के नये कवियों का जन्म हो रहा है जिनकी कविताओं में पुराने काव्यशास्त्रीय गुणों के साथ-साथ नये कलेवर से साथ दिखते हैं। साथ-ही-साथ आधुनिक युग के समय के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पहलुओं को लेकर कवियों की विचारधारा भी हिन्दी काव्य जगत् को प्रभावित कर रही है। ऐसे ही एक कवि है कवि कुलवन्त सिंह।

            कवि कुलवन्त सिंह भाभा अटोमिक रिसर्च सेन्टर में कार्यरत वैज्ञानिक है। साधारणतः वैज्ञानिकों के प्रति आम लोगों की यह सोच होती है कि वे लोग केवल विज्ञान की दुनियाँ में सिमट कर रह जाते हैं, उनका वास्विक संसार से भी यदि नाता है तो भी उसके सांस्कृतिक पक्ष से दूर ही रहते होंगे। परन्तु यह सत्य नहीं है। वस्तुतः देखा जाए तो वैज्ञानिक ही होते हैं जो वास्तव में संसार के सृजनात्मक पक्ष की ओर अधिक रुचि रखते हैं। सृजन जहाँ होता है वहाँ एक तरफा सृजन नहीं होता बल्कि वहाँ उसका सामुहिक विकास भी होता है। उसी के साथ उसकी संस्कृति भी विकसित होती है जिसका एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है साहित्य। साहित्य समाज की पूरी छवि को अपने में समेट कर हमारे सामने उसके सार रूप में पेश करती है। साहित्य हमारे मानव समाज के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके साथ जो भी जुड़ता है वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समाज के हर पक्ष से जुड़ जाता है। कवि कुलवन्त सिंह जी की रचना में उपरोक्त सभी विशेषताएँ पायी जाती है। उसकी रचनाओं की सुन्दरता ऐसी है कि लगता ही नहीं है कि वे केवल वैज्ञानिक है बल्कि उसकी रचनाशीलता में एक उत्कृष्ट कवि के सारे तत्व मौजूद है।

            इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार है – निकुंज, चिरंतन, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, बाल-गीत इन्द्रधनुष। इनकी कविताओं में नीति सम्बन्धी बातें भी है तो छायावादी कविताओं की विचारधारा भी है। इन्होंने दोहों में भी रचनाएँ लिखी है तो मुक्त छन्द में भी कविताएँ लिखी है। सबसे पहले इनकी निकुंज की बात की जाए तो उनकी सबसे पहली कविता आत्मज्ञान मानव समाज के सामने एक सच्चा आदर्श प्रस्तुत करती है। कविता के बोल कुछ इस प्रकार है –

                        मिटाकर अहंकार

                        करो परोपकार

                        मिथ्या है संसार

                        सत्य है परमार्थ1

            इस कविता में अहंकार को मिटाकर परोपकार की ओर अग्रसर होने की बात कही गयी है। यह संसार मिथ्या है पर परमार्थ सत्य है। वैसे देखा जाए तो उपरोक्त कथन पहले थोड़ा असमंजस में डाल देती है फिर बार-बार पढ़ा जाए तो इसका गूढ़ अर्थ निकलकर यह आता है कि जहाँ अहंकार है वहाँ संसार मिथ्या है पर जहाँ अहंकार मिटाकर परमार्थ की ओर चले तो वही संसार सत्य दिखाई देता है। वस्तुतः कवि यह बताना चाहते हैं कि अहंकार के कारण व्यक्ति प्रायः यह भूल जाता है कि एक दिन प्रकृति के विधि के फेर में पड़कर उसका अहंकार अपने-आप ही टूट जाएगा। फिर इस अहंकार को व्यर्थ में पाल कर रखना क्यों? कवि आगे अपनी कविता में कहते हैं कि हमें अपने अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करना चाहिए। जब व्यक्ति का अज्ञान दूर होगा तब हम अच्छे कर्म कर सकेंगे। नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर सकेंगे। हमारे कर्म ही हमारे समाज की सेवा होगी। तभी कवि जीवन के सेवा के अर्थ मानते हैं। मन के सारे विकार, लोभ तथा स्वार्थ को दूर करके परमात्मा से एक हो जाना ही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। वस्तुतः यह कविता नीतिपरक पढ़ने में लगती है परन्तु इसके गूढ़ अर्थ में मानवतावादी मूल्य छिपा हुआ है। मानवतावादी मूल्यों का होना ही हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा वरदान है जो आज के व्यस्त समय में लोग भूल चुके हैं। कवि उसी बात को लोगों के सामने रख रहे हैं।

            उसी प्रकार उनकी एक ओर कविता है नमन इस कविता की भावना देशप्रेम से भरी हुई है। कवि ने कविता के प्रत्येक छन्द में भारतवर्ष की एक-एक खूबी को उजागर किया है। देश की संस्कृति उसके वैभव तथा वेद-वेदांत की, संतों एवं महापुरूषों की, साहित्यिक समृद्धि की, देवतुल्य नदियों के परम्परा की, रणभूमि में पराक्रम दिखाने वाले वीरों की, भारत को आज़ाद करने के लिए अपना बलिदान देने वाले महान बलिदानियों आदि सभी का गुणगान करती हुई यह कविता एक ही धारा में भारत के सम्पूर्ण स्वर्णिम इतिहास को हमारे सामने लाकर रख देती है। कविता की भाषा जितनी सरल है, भाव उतने ही सुन्दर तथा देशप्रेम की भावना को जन-जन तक सम्प्रेषित करनी की क्षमता रखती है। इस कविता की शब्द-शक्ति उस प्रसिद्ध उक्ति को सिद्ध करती है जिसमें रीतिकालीन आचार्य देव कहते थे कि अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणालीन, अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन।2 वस्तुतः शब्दों के प्रयोग पर ही कविता के भावनाओं तथा सौन्दर्य निर्भर करता है। छन्दों का मिलना जितना जरूरी होता है उतना ही छन्दों के मध्य भाव का बना रहना भी उतना ही महत्व रखता है। अपनी कविता माली में फूलों के जरिए नए हिन्दुस्तान के निर्माण की बात कह रहे हैं। यहाँ बहुरंगी पुष्प का अर्थ विभिन्न प्रकार की प्रतिभा वाले लोग। जब समाज में सभी वर्गों लोगों को  फूल की भांति खिलने तथा सुगंध के रूप में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दिया जाएगा तो जैसे एक बागीचा सुन्दर रंग-बिरंगे फूलों के खिलने से सुन्दर लगता है वैसे ही भारत देश भी सुन्दर और विकसित हो जाएगा। कवि अपनी कविता में माली बनकर वह इस बागीचे को तत्परता से तैयार करना चाहते हैं जहाँ प्रत्येक कुसुम रूपी अधरों पर मुस्कान बिखरी हो, प्रत्येक हृदय में प्रेम, सौहार्द, एकता, उन्नत एवं समृद्ध विचारधारा भरी हो। किसी प्रकार की ईर्ष्या तथा अमंगल की ओर ले जाने वाले विचारधारा कही भी न पनपने पाये। वह एक ऐसे प्रेम के वृक्ष को सींचना चाहते हैं जिसके लिए धरती ही स्वयं माली बन जाए। इसी प्रकार अपनी अगली कविता जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान में उन्होंने भारत देश के वीर जवानों तथा किसानों द्वारा निःस्वार्थ भाव की सेवा को अपनी कविता का विषय बनाकर भारतीय सेना के जवानों तथा किसानों को मान प्रदान किया ही है। साथ ही जय जवान जय किसान के साथ जय विज्ञान को जोड़कर न केवल नए प्रकार का प्रयोग किया बल्कि वैज्ञानिकों के प्रति भी लोगों के मन में सकारात्मक सोच जगे इसका भी प्रयास किया है। भारत देश को आज वास्तव में उपदेश देने वाले योगियों से अधिक कर्म योगियों की आवश्यकता है। जिसका ज़िक्र वे अपनी कविता के अंतिम पंक्तियों में करते हैं। अगली कविता भारत में वर्तमान भारत की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों तथा विषमताओं आदि को कविता में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है –

            फूँकना है यदि देश में प्राण

            बनाना है यदि भारत महान

            जीवन में सबके भरना होगा प्रकाश

            मुट्ठी भर देना होगा सबको आकाश

              X x x x x x x

            महलों की चाह नहीं सबको

            एक छत तो देनी होगी सबको,

            दो वक्त की रोटी खाने को मिल जाये,

            इज़्ज़त से इंसान जी पाये3

            उपरोक्त पंक्तियों में वर्तमान भारत की दशा तथा उसको किस दिशा में ले जाना है इस ओर भी संकेत किया गया है। वर्तमान भारत की दशा और दिशा दोनों की भ्रमात्मक है। एक तरफ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ है जहाँ भारत का संपूर्ण मध्यम वर्गीय परिवार रहता है। परन्तु समाज के अन्य निम्नवर्ग के लोग तथा दरिद्रों की दशा इतनी दयनीय है कि उनके पास रहने के लिए घर नहीं है। विभत्स रूप तो ऐसा है कि बड़े-बड़े शहरों में गगनचुंभी इमारतें है तो वही उसके नीचे, किनारे तथा शहर के किनारे झोपड़ियाँ तथा खप्पर बांधे भी लोग गुज़र-बसर कर रहे हैं। बड़े-बड़े राजनेताओं द्वारा भारत को विश्व की महान शक्ति बना देने की विचारधारा सुनने में जितनी अच्छी लगती है उतनी वास्तविकता में बहुत बुरी और विभत्स लगती है। कुलवन्त सिंह जी वास्तव में वर्तमान भारत की इस छवि को उदासीन लोगों के सामने आइने की तरहा स्पष्ट रूप से दिखा रहे हैं ताकि पाठक समाज को वास्तविकता का बोध हो।

             राष्ट्र, बलिदान, शहीद, अनेकता में एकता, देश के दुश्मन, स्वर्ण जयंती आदि सभी कविताओं में कुलवन्त सिंह जी की राष्ट्रवादी विचारधारा भरी हुई है। वे भारत के इतिहास, उसके स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिए वे अपनी इन कविताओं में देश की महान संस्कृति तथा देश के लिए बलिदान देने वालों को न भुलाकर उनके दिखाए मार्ग पर चलने बात कहते हैं। वास्तव में वर्तमान समय में स्वार्थी राजनैतिज्ञों की वजह से हम केवल सजे-सजाए नेता को याद करते रहे है। परन्तु जो क्रान्तिकारी थे जिन्होंने देश के लिए वास्तव में फाँसी, तोप तथा गोलियों की बौछार को भी हँसते-हँसते झेला है। हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा से शान्त प्रकृति वाली रही है। न तो हम कभी दूसरे देशों में गये उनपर अनाधिकार अपनी सत्ता स्थापित करने। परन्तु सुदूर पश्चिम देश तथा मध्य यूनानी देशों के स्वार्थी तथा नृसंश लुटेरे लोगों ने बार-बार देश पर आक्रमण करके उसके धर्म तथा संस्कृति को नुकसान पहुँचाया। अंत में ब्रिटिश आये जाकर अचानक लोगों में पराधीनता के प्रति स्वाधीनता के भाव जग गये जबकि यह बहुँत पहले होने चाहिए थे। इसके बाद देश ने आजादि के लिए लगातार 1857 से लेकर 1947 तक संघर्ष किया। परन्तु इतना सबकुछ होने के बावजूद आज भारतीय नौजवान तथा सभी अन्य लोग सबकुछ भूल चुके हैं। जिसे कवि कुलवन्त सिंह जी अपनी कविताओं द्वारा याद दिलाना चाहते हैं।

            स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले चुके सेनानियों के परिवार वालों की वर्तमान दशा पर भी उन्होंने कविता लिखी है। कैसी विडम्बना की बात है कि पिता ने जिस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद करने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया वही देश स्वतंत्र होने के बाद उसी स्वतंत्रता सेनानी के आदर्शों को ताक पर रख कर जैसे-तैसे चलने लगा। जिस देश के लोगों ने एक साथ स्वराज के लिए बड़े-बड़े आदर्शों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी वही लोग देश के स्वतंत्र होते ही स्वराज की जगह स्वार्थ के लिए आपस में ही लड़ने लगे। इस बीच वे उन स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार तथा उनके आदर्शों को भूल गए। उन स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की उपेक्षा के कारण उनके परिवार एक प्रकार से बर्बाद ही हो गए। उनके बेटे आज इसी स्वार्थपरता से लड़ रहा है। देश में खराब हुए सिस्टम से लड़ रहा है, भ्रष्टाचार से लड़ रहा है, हार रहा है और अपने देश से प्यार करने की सज़ा उसे उसके अपने ही देश के लोग ही दे रहे हैं –



                                                लड़ता रहा दीवानगी की हद तक,

                                                लोग देख उसे हँसते जब-तब।

                                                साथ देने न आया कोई उसका,

                                                लेकिन वह डटा रहा, जिगर था उसका।

                                                .........

                                                मगर वो अकेला ही था-

                                                हार गया, सब कुछ गंवा कर भी!

                                                इस सिस्टम के आगे उसकी कुछ न चली,

                                                टूट कर बिखर गया, सजा अपनों से मिली।4



            वास्तव में ही इस देश की यह हालत देख कर लगता है कि देश को आज़ाद जिस स्वराज के लिए करवाया गया था वह तो केवल कुछ लोगों के लिए ही पूर्ण हुआ है। केवल नाम के लिए लोग अपने बहुमूल्य मत देकर नेताओं को चुनते हैं पर वह नेता जनता की सेवा के बदले उन्हें लूट कर, उनपर अत्याचार कर, उन्हीं पर ही अपना शासन जमा कर उसी जनता को गुलाम बनाकर रख दिया है। स्वर्ण जयंती अपने देश के वर्तमान दुर्दशा को दर्शाती हुई कविता है। कवि कुलवन्त जी ने अपनी कविताओं द्वारा देश के पराधीन भारत के समय के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान भारत की परिस्थितियों की बहुत सजीवता है उकेरा है।



            इनकी कविताओं में जिस प्रकार देश के प्रति समर्पित राष्ट्रीय भावना भरी है उसी प्रकार समाज के अन्य पहलुओं के प्रति भी वे इतनी ही तत्परता से चिन्तन करते हैं। एक अच्छे कवि की यही पहचान होती है कि वह न केवल अपने देश के प्रति समर्पित हो बल्कि उस देश के समाज के प्रति भी सजग रहे, तथा समाज की दिशा और दशा में किसी भी प्रकार के परिवर्तन लाने वाले प्रत्येक विचारधाराओं के जन्म देने वाले उन सूत्रों से भी जुड़ा रहे। क्योंकि कवि कोई साधारण व्यक्ति नहीं होता बल्कि वह पूरे संसार पर अपनी संवेदनशील तथा गहन विचारधारा एवं चिन्तन से परिवर्तन लाने वाला एक प्रेरक होता है। उसकी रचनाएँ उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी की अन्य मानव निर्मित जन-कल्याण में लगी हुई रचनाएँ होती हैं। वह भी एक निर्माता होता है जो कि अपनी रचनाओं में एक अच्छे समाज का निर्माण करता है, अच्छे संसार का निर्माण करता है। कलम, परिवर्तन, आदर्श, मानव-जीवन, खोना और विसंगतियाँ, प्रेरणा, दिशा और लड़ाई  जैसी कविताएँ सामाजिक मुद्दों से जुड़ी कविताएँ है। इन कविताओं ने कवि ने हर प्रकार के पहलुओं पर पाठकों का ध्यानाकर्षित किया है।

            सबसे पहले कलम कविता की बात करते हैं। कलम में कितनी शक्ति होती है इस बात को कविता में उद्धृत किया गया है। कलम से रचित कोई भी सुन्दर रचना किसी की भी दृष्टि बदल सकती है। समाज को प्रेरित करती है। साहित्य का निर्माण कर कलम ही उसे समाज का दर्पण बना देता है। कलम की ताकत से आज तक कई तख्त-ओ-ताज पलट गए हैं। कलम की धार को पहचानने वाला जब भी कलम अपने हाथों में लेता है तो उसमें शक्ति का संचार हो जाता है। इसी कलम से फिर वह नयी सृष्टि की रचना भी कर लेता है तथा फूल भी खिला देता है। लेकिन वर्तमान समय में यही कलम धारण करने वाला पथभ्रष्ट हो गया है। अब उसकी कलम पैसों के लिए सच को झूठ, झूठ को सच बना देता है। चाहे अखबार हो या कोई साहित्यिक रचना यदि लिखने वाला पथभ्रष्ट है तो उसकी रचना भी वैसी ही होगी जो समाज पर बुरा असर करेगी। सत्य ही है कि आज का लेखक पथभ्रष्ट हो रहा है। जो नहीं हुए हैं वे भी देश की भ्रष्ट-सिस्टम के आगे कुछ नहीं कर पा रहे है। ऐसे में कवि अपनी आशा नहीं छोड़ना चाहता है। वह फिर से नयी दिशा की ओर समाज को मोड़ना चाहता है ताकी नए और सुन्दर समाज की रचना हो। उसी प्रकार परिवर्तन कविता में कवि मूल्यों के बदल जाने की बात को लेकर चिन्तित हैं। परिवर्तन संसार का अटल नियम है। जो भी वस्तु इस संसार में जन्म लेती है समयानुसार उसमें परिवर्तन होता ही है। परन्तु यह परिवर्तन सृजनशील होता है। इस परिवर्तन को कोई रोक नहीं सका है आज तक। इसके महत्व को सभी ऋषियों ने भी स्वीकार किया है। लेकिन कुछ चीज़ों में परिवर्तन नहीं होता जो हमारी अनमोल धरोहर है जैसे धरती, आकाश, सूरज, चांद तारे इत्यादि। इनमें भी परिवर्तन होता है, केवल प्राकृतिक परिवर्तन जो हमारे जीवन तथा पालन-पोषण के लिए जरूरी होता है। उनका परिवर्तन सृष्टि की आवश्यकता के लिए होता है। पर मनुष्य के मूल्यों में परिवर्तन समाज के विकास के लिए यदि हो तो वह परिवर्तन स्वीकार्य हो सकता है। पर आज लोगों के मूल्यों में परिवर्तन केवल स्वार्थ के लिए होने लगा है। जिससे कवि विचलित है। जो मानवतावादी मूल्य थे आज केवल किताबों के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं। इसी पर वे प्रश्न चिह्म लगा रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ।

            इसी प्रकार आदर्श कविता में आदर्श के महत्व तथा आदर्श से ईश्वर को पाने की बात करते हैं। मानव-जीवन में संघर्षों से न घबराते हुए आगे बढ़ने की बात कहते हैं। जैसे जीवन में नैतिक मूल्य जीवन का आधार होते हैं उसी प्रकार संघर्ष भी जीवन का आधार है। क्योंकि संघर्ष से मनुष्य का जीवन निखरता है। जिसमें मूल्य होते हैं वही विश्व में शांति को पा सकता है। जो कर्तव्यनिष्ठ होकर कर्म करता है वह अपने जीवन से अवनति तथा पतन को मिटा देता है। जिसमें जीवन दर्शन है उसमें नैसर्गिक प्रेम जग जाता है तथा सामाजिक मूल्यों द्वारा वह समाज में भाई-चारा फैलाता है। वास्तव में कवि यहाँ यह दर्शा रहे हैं कि जीवन में प्रेम, भाई-चारा, कर्तव्यनिष्ठा तथा मूल्यों का होना बहुत जरूरी है। उसी प्रकार आगे वह कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में ईश्वर बसता है परन्तु हम उसे बाहर ढूँढते है। हमें केवल अपने अंतर्मन में झांक ले तो सबकुछ मिल जाता है। उनका मानना है कि मानव अनुभूति, भावना, कला, प्रेम आदि से ओत-प्रोत है पर सारी भावनाएँ गौण रूप में पड़ी हुई है क्योंकि उसे रोजी-रोटी कमाने की पड़ी है। वास्तव में इनकी यह कविता मानव जीवन के वास्तविक स्वरूप को दर्शाती है। जीवन में मनुष्य को कई प्रकार के संघर्ष करना पड़ता है, उसकी मन की मासूमियत, कोमल भावनाएँ कई बार जीवन के इस संघर्ष में बार-बार आहत होते रहता है। कठिन-से-कठिन परिस्थितियों तथा घटनाओं के कारण वह भी एक प्रकार से प्रायः कठोर सा हो जाता है। वह रोजी-रोटी की तलाश में अपने-आप को खो ही बैठता है। इसीलिए कवि चाहता है कि लोग अपने भीतर बसे ईश्वर को पहचाने तथा सुख पूर्वक जीवन जिए। उनकी आगे की कविता खोना इसी बात की ओर ईशारा करती है कि आज के समय में मनुष्य अपने जीवन से कितने बहुमूल्य चीज़ों को खोता जा रहा है जिसके कारण उसके जीवन से खुशहाली चली गयी है। दुबारा इन चीजों को प्राप्त करना भी हमारा अधिकार है ताकि हम अपने जीवन को फिर से खुलशहाल कर सके। तभी अपनी इस कविता की अंतिम पंक्तियों में वह कहते हैं –

            खुशहाली बिखेरें चारों ओर

            हर पुष्प पल्लवित हो,

            आये नित नयी भोर।5



            कवि कुलवन्त जी की निकुंज में रचित हर कविता में कवि की आशावादी दृष्टिकोण झलकती है। यही तो एक सच्चे मानव की पहचान है। वस्तुतः जीवन में आशा का संचार यदि न हो तो मनुष्य कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता है। उसे आगे बढ़ने के लिए जितना संघर्ष करना पड़ता है, कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, उतना ही आशा वादी होकर भी रहना पड़ता है। आशा की नयी किरण उसे सदा सही रास्ता दिखाती है। तथा साहित्यकार की रचना में यदि आशा हो तो वह पाठकों को भी नया रास्ता दिखाता है। उसके जीवन को आलोकित करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि कवि कुलवन्त जी वर्तमान युग के उन आशावादी तथा मानवीय मूल्यों से भरे कवि है जो कि समाज की आज इस विषम परिस्थिति में भी आशा की किरण दिखाकर उसे उन्नति के पथ की ओर ले जाना चाहते हैं।





संदर्भ ग्रन्थ

1 निकुंज काव्य संग्रह- कुलवंत सिंह, 2010, अहंकार कविता, पृ.सं-16


3. निकुंज, वही, पृ.सं- 22 भारत कविता

4. वही, पृ.सं- 27 देश के दुश्मन कविता

5 वही, पृ,लं –35 खोना कविता

           








बुधवार, 5 जून 2019

भारतीय नवजागरण एवं रविन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास: गोरा उपन्यास के विशेष संदर्भ में।


भारत का स्वाधीनता आन्दोलन सबसे लम्बा तथा सबसे बड़ा आन्दोलन है। इस आन्दोलन में न जाने कितने लोगों ने अपनी जान देकर भारत को आज़ाद कराने में अपना महान योगदान दिया। यह अन्याय होगा यदि हम कुछेक बड़े नेताओं का ही नाम ले तो। बल्कि बड़े-बड़े नेताओं को यह सफलता नहीं मिलती यदि उनकी एक पुकार पर भारत की आम जनता, युवा वर्ग, किसान, स्त्रियों ने यदि भाग न लिया होता तो। कालापानी की अमानुषिक यातनाओं तथा अंग्रेज़ों के लाठियों की बौछार यदि इन लोगों ने न सही होती तो स्वतंत्रता आन्दोलन कोई रंग नहीं ला पाता। फाँसी पर यदि क्रान्तिकारी नहीं होते तो किसी को भी स्वतंत्रता का महत्त्व नहीं समझ में आता। सार रूप में कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन में उन सभी भारतीयों का समान योगदान है जिन्होंने नेताओं का साथ दिया है। इसी प्रकार लेखकों का योगदान भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। फिर चाहे वह किसी भी भाषा के लेखक हो।

            स्वतंत्रता आन्दोलन में बांग्ला उपन्यासों का बहुत बड़ा तथा महान योगदान रहा है। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी द्वारा लिखित आनन्दमठ, कपालकुण्डला, दीनबन्धु मित्र रचित नीलदर्पण, रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखित गोरा, घरे बाइरे उपन्यास आदि इसी श्रेणी में आते हैं। तत्कालीन भारत में जिस प्रकार पूरा देश ब्रिटिशों के अन्याय एवं अत्याचार को सहन कर रहा था। सभी लोग त्रस्त थे। गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता, नारी समस्याओं आदि से जूझ रहा भारतीय समाज ब्रिटिशों द्वारा और अधिक सताएँ जा रहे थे। वही ब्रिटिशों ने अपनी ताकत बढ़ाने की एक नयी योजना बना दी। फूट डालों और राज करो की नीति के साथ-साथ भारत में रहने वाले हिन्दुओं में उनके ही धर्म के कुछ रीति-रिवाज, मान्यताएँ तथा आचार-व्यवहार को सदियों पुराना एवं जर्जर बताना शुरू किया, उसे कई प्रकार के तर्कों द्वारा अवैज्ञानिक करार दे दिया। वैसे भी भारतीय समाज में कुछ ऐसी परम्पराएँ थी जो काफी पुरानी एवं समाजोद्धार के रास्ते आढ़े आ रही थी। फलतः हिन्दू धर्म के प्रति आस्था रखने वाले हिन्दू धर्म का बहिष्कार करने लगे और एक नए धर्म की खोज में लग गए। यह सब कुछ उन्नीसवी से बीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में होने लगा। नारी समस्या, दहेज प्रथा, जातिप्रथा तथा धार्मिक मान्यताओं तथा परम्पराओं को चुनौतियाँ दी जाने लगी। परिणाम स्वरूप समाज-सुधार आन्दोलन होने लगे, लोगों में देशभक्ती की भावना जगाने की कोशिश की जाने लगी, तथा बाकी सभी समस्याओं को भी जड़ से मिटाने की चेष्टा होने लगी और इसमें बंगाली उच्च वर्गीय हिन्दू समाज के लोगों में ही यह बदलाव होने लगा। फिर भी इसका प्रचार-प्रसार खूब हुआ तथा इसे बंगाल के नवजागरण की संज्ञा दी गयी। इसमें सबसे आगे थे बंगाल के राजा राममोहन राय जिन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की। हिन्दू समाज में फैली कुरीतियों के प्रति लोगों के अवगत कराना इसका मुख्य उद्देश्य था। साथ ही साथ ब्रह्म समाज में वेदों और उपनिषदों के अध्ययन पर और एक ईश्वर के सिद्धांत पर जोर दिया गया। ब्रह्म समाज में तीर्थयात्रा, मूर्तिपूजा, कर्मकाण्ड आदि की आलोचना की गयी। इसके अलावा बहु- विवाह, बाल- विवाह, सती प्रथा आदि के वेदों के विरुद्ध एवं त्याज्य माना गया। ब्रह्म समाज में ईसाई धर्म की भी प्रशंसा की गयी, परन्तु इसे किसी भी तरह हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ नहीं माना गया। राजा राम मोहन रॉय ने कोई नया धर्म नहीं चलाया, बल्कि प्राचीन भारतीय वैदिक धर्म को ही मान्यता दी।[1] परन्तु इसमें उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा। क्योंकि वर्षों से जो लोग इसी सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक मान्यताओं को मानते आए है वह अचानक कैसे अवैज्ञानिक हो सकता है किसी के समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु बदलाव फिर भी होने लगे थे। ब्रह्म समाज की स्थापना हो चुकी थी और उससे कई लोग जुड़ चुके थे। वही प्रकाडं पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने बाल विवाह तथा बहुविवाह के खिलाफ आन्दोलन चलाया तो इसे और बल मिला। अंततः अंग्रेजों ने सती प्रथा तथा बहुविवाह आदि कुप्रथाओं पर रोक लगा दी। इन्हीं आन्दोलनों में बांग्ला साहित्यकारों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया तथा अपनी रचनाओं द्वारा बंगाल की आत्मा को जगाने का प्रयास किया। जिसमें श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। गोरा उपन्यास इसी बंगाल के नवजागरण तथा ब्रह्म समाज की स्थापना एवं उसके विरोध में उठते परम्परावादी हिन्दू लोगों की कथा है। अब इसे देश के स्वाधीनता आन्दोलन तथा राष्ट्रीय चेतना से कैसे जोड़ा जाए यह प्रश्न उठता है जो कि स्वाभाविक है। इसके उत्तर में दो-तीन बाते सामने रखी जा सकती है।

1)    पहली बात यह कि यह ब्रिटिश शासनाधीन भारत के समय की कहानी है जिसमें रविन्द्रनाथ जी ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय को उजागर किया है।

2)    दूसरा भारतीय समाज में ब्रिटिशों के आने से पहले ही काफी सारी कुरीतियाँ एवं कुप्रथाएँ फैल चुकी थी जो स्वयं ही भारत की दुश्मन हो गयी थी। एक कमजोर समाज फिर कैसे बाहरी ताकतों का सामना कर सकता है। उसकी आंतरिक ताकत को जगाने हेतु यह उपन्यास सबसे सशक्त है। विनय के चरित्र में यह दिखता है।

3)    नारी समाज की समस्याओं को भी अभिव्यक्त किया है। जिस देश में नारी की कोई स्वतंत्र अस्मिता नहीं  वह देश कैसे स्वाधीन हो सकेगा। जहाँ एक पूरा वर्ग ही घर के चार दिवारी में कैद हो, उसकी कोई इच्छा न हो, सम्मान न हो, मान्यता न हो, शिक्षित न हो वह स्वाधीन नहीं है। सुचरिता एवं ललिता के द्वारा इसे प्रस्तुत किया गया है। वे दोनों शिक्षित है तथा हर चुनौति का वह सामना करती है।

4)    ब्रह्म समाज की स्थापना जिस उद्देश्य से की गयी थी, उससे यही साबित होता है कि भारत को फिर से वैदिक धर्म की शिक्षा दी जा सके जिसके जरिए भारत की महानता की सबसे बड़ी पहचान सभी धर्मों के प्रति श्रद्धा एवं सबको साथ लेकर चलने की कला फिर से पूरी दुनिया के सामने रखी जा सके जो कि इस उपन्यास में दिखता है। गोरा का कट्टर हिन्दू से बदलकर ब्रह्म समाज में जाकर मिलना और अपने आप को पूरे देश का ही मान लेना यह दर्शाता है।



गोरा उपन्यास में रविन्द्रनाथ जी ने ऐसी और कई समस्याओं तथा परिस्थितियों का चित्रण किया है जिससे पाठकों के मन में यह बात उठती है कि जो कुछ भी इस भारतीय समाज में चलता रहा है यदि इसमें ज़रा भी बदलाव नहीं होता तो देश शायद स्वतंत्र होता किन्तु किसी नवीन भारत के निर्माण की कोई उम्मीद न होती।

            गोरा उपन्यास में उद्धृत बातें जिनसे उसकी राष्ट्रीय चेतना झलकती है वह इस प्रकार है। जैसे पहले बिन्दु में कहा गया है कि रविन्द्रनाथ जी ने ब्रिटिशों द्वारा किए जा रहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अन्याय को कुछ इस प्रकार से वर्णन किया है । प्रसंग है ग्रहण के स्नान का।  ग्रहण के स्नान के समय एक स्टीमर-कम्पनी द्वारा जहाज यात्री लेकर त्रिवेणी जा रहा था। उस समय बड़ी संख्या में लोग स्टीमर पर चढ़ रहे थे। परन्तु अत्यधिक भीड़ तथा हड़बड़ी के कारण लोग सही ढंग से न तो जहाज पर चढ़ पा रहे थे न उतर पा रहे थे। गोरा भी उस जहाज में सवार था। लोगों के बैठने का स्थान भी कीचड़ से भर गया था तथा बारिश की बौछारों से लोग भीग रहे थे। गोरा उन लोगों की मदद कर रहा था। ऐसे में स्टीमर के पहले दर्जे के डेक पर एक अंग्रेज तथा एक आधुनिक बंगाली बाबू खड़े थे जो यह तमाशा देख कर बार-बार हंस रहे थे। जब गोरा से सहन नहीं हुआ तो वह तुरंत वहाँ जाकर उन्हें कह उठता है – (धिक् तोमादेर! लज्जा नाई!” इन्गरेजटा कठोर दृष्टिते गोरार आपामस्तक निरीक्खन करिल। बांगालि उत्तर दिल – लज्जा! देशेर एई-समस्त पशुबत् मूढ़ेर जन्नई लज्जा।.....गोरा मुख लाल करिया कहिलॉ – मूढ़ेर चेये बडॉ पशु आछे – जार हृदय नेई।)[2]  इसके बाद बंगाली उससे कहता है कि यह उसकी जगह नहीं है तो गोरा भी प्रत्युत्तर में कहता है कि उसकी जगह यात्रियों के बीच है परन्तु उसे दुबारा वहाँ आने को मजबूर न करे अर्थात् इस प्रकार मजबूर लोगों की मजबूरियों पर हँसकर अपमान करने की चेष्टा न करें। तत्कालीन भारत में ब्रिटिशों ने अपने लिए हर स्थान पर फर्स्ट क्लास की व्यवस्था करवा ली थी तथा भारतीय को वे द्वितीय श्रेणी में ही रखते थे। ये एक प्रकार से अपमान ही हुआ भारतीयों का जिसकी निन्दा स्वयं रविन्द्रनाथ जी करते हैं तथा यही बात वह गोरा के जरिए करवाते हैं। वही दूसरी उदाहरण हम ले सकते हैं जब विनय, सुचरिता तथा गोरा एक दिन सुचरिता के घर बातचीत में लगे हुए थे तब सरकारी नौकरी को लेकर विनय और गोरा के बीच हुए विवाद के बारे में गोरा कह रहा था कि क्यों उसे पसंद नहीं है कि विनय सरकारी नौकरी करे। इसमें भी दरअसल अंग्रेज़ो द्वारा भारतीय समाज में भारतीयों के बीच ऊँच-नीच की भावना को प्रकट किया गया है। गोरा एक डेपुटी के बारे में बताता है कि कैसे उसके अदालत में आने वाले लोग जैल जाने से बरी हो जाते थे तथा उससे जब उसी के अंग्रेज अफ्सर ने डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट ने पूछा था तो उसके बदले में वह जवाब देता है – साहेब, तार एकटि कारण आछे, तूमि जादेर जेले दाओ तारा तोमार पक्षे कूकूर-बिड़ाल-मात्र, आर आमि जादेर जेले दिई तारा जे आमार भाई हये।[3] इतना उदाहरण स्पष्ट है कि तत्कालीन भारतीयों की क्या स्थिति रही थी अंग्रेजों के सामने। साथ ही लोग भी अंग्रेजों के प्रसन्न करने और स्वयं की ही केवल उन्नति होती रहे इसकी होड़ में थे जिसके कारण भारतवर्ष का यह बुरा हाल था।

            अब हम दूसरे बिन्दु पर चर्चा करते है। भारतीय समाज में ब्रिटिशों के आने से पहले ही काफी सारी कुरीतियाँ एवं कुप्रथाएँ फैल चुकी थी जो स्वयं ही भारत की दुश्मन हो गयी थी। एक कमजोर समाज फिर कैसे बाहरी ताकतों का सामना कर सकता है। उसकी आंतरिक ताकत को जगाने हेतु यह उपन्यास सबसे सशक्त है। साथ ही अंधविश्वास तथा नारी अशिक्षा जैसी समस्याएँ भी भारत को भीतर तक कमजोर बनाए हुए थी। रविन्द्रनाथ स्त्री शिक्षा के हमेशा से पक्षधर रहे हैं। तभी विनय द्वारा ही इन सारी बातों को बारम्बार उपन्यास में उजागर करवाया गया है। विनय जब गोरा से मिलने उसके घर आता है तो वह अनायास ही गोरा से कहता है कि नंद नामक एक लड़के की माँ ने किसी ओझा को बुलाकर नन्द की बिमारी ठीक करने के बदले उसकी जान ही ले ली। यह बात दरअसल सुचरिता एवं विनय के बीच हुई थी जिसे विनय गोरा को बता रहा था। दरअसल विनय से यह बात सुचरिता ही कह रही थी कि आपनारा मने करेन घरेर मध्ये आबद्ध करे मेयेदेर राँधते-बाड़ते आर घर निकाते दिलेई तादेर समस्त कर्तव्य हए गेल। एक दिके एमनि करे तादेर बुद्धिशुद्धि समस्त खाटो करे रेखे देबेन, तार परे जखन तारा भूतेर उझा डाके तखनो आपनारा राग करते छारबेन ना। जादेर पक्खे दूटि-एकटि परिबारेर मध्येई समस्त विश्वजगत् तारा कखनोई सम्पूर्ण मानूष हते पारे ना – एवं तारा मानूष ना हलेई पुरूषेर समस्त बड़ो काजके नष्ट करे असम्पूर्ण करे पुरूषके एमन करे भाराक्रान्त करे निजेदेर दुर्गतिर शोध तूलबेई। नन्देर माके आपनारा एमन करे गड़ेछेन...[4]

वासत्व में सुचरिता बिलकुल सही ही कहती है कि पुरूष समाज ने ही हमेशा से नारी को घर की चार दिवारी में सीमित सोच के साथ बन्द करके रखा हुआ है फिर उनसे किसी प्रकार की उन्नत विचारधारा की अपेक्षा करना गलत है वही उनपर अंधविश्वासी होने के आरोप लगाकर उनपर क्रोध करना भी अन्याय से कम नहीं है। वही सुचरिता एवं  ललिता की सोच के जरिए दिखाया गया है कि शिक्षित नारी का समाज में होना कितना आवश्यक है। ललिता की भी विचारधारा यही है कि स्त्रियाँ केवल घर पर रहे तो यह सही नहीं है। यही उपन्यास का तीसरा बिन्दु भी है। नारी शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। विनय हमेशा से ही नारी शिक्षा के पक्ष में बात करता रहा है जबकि गोरा के मन में अभी भी नारी के प्रति रूढ़िवादी विचारधारा बनी हुई है। दरअसल गोरा नारी शिक्षा के विरुद्ध नहीं है परन्तु उसके मन में शिक्षित नारी के प्रति जो भ्रमित भावना है उसके कारण वह नारी की छवि को ही लेकर भ्रमित है। बाद में जब वह सुचरिता को देखता है तो उसकी सारी गलत धारणा बदल जाती है। रविन्द्रनाथ जी ने इसे इस प्रकार से अभिव्यक्त किया है हारानबाबू चलिया गेले सूचरिता एकटा कोन सूगभिर लज्जाए मूख जखन रक्तिम ओ नत करिया बशिया छिल, की करिबे, की बलिबे किछुई भाबिया पाईतेछिल ना, शेई समये गोरा ताहार मूखेर दिके भालो करिया चाहिया लईबार अवकाश पाईयाछिल। गोरा शिक्षित मेयेदेर मध्ये जे उद्धत्य, जे प्रगल्भता कल्पना करिया राखियाछिल, सूचरितार मूखश्रिते ताहार आभासमात्र कोथाये! ताहार मूखे बुद्धिर एकटा उज्ज्वलता निःसंदेह प्रकाश पाईतेछिल, किन्तु नम्रता अ लज्जार द्वारा ताहा की सून्दर कोमल हईया आज देखा दियाछे!”[5] सुचरिता के मुख की लज्जा एवं कोमलता ने गोरा के मन में पढ़ि-लिखी स्त्रियों की छवि को ही बदलकर रख दिया। रविन्द्रनाथ जी भी जानते थे कि भारतीय समाज में नारी की क्या स्थिति रही है। तभी उनके उपन्यासों के नारी पात्रों में समाज की इन बिना सिर-पैर की रीति-रिवाज़ों के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है जो कि व्यक्ति स्वतंत्रता के लिए बाधा उत्पन्न करता हो। तभी वे बंगाल नवजागरण के पक्षधर रहे है। इस उपन्यास में उन्होंने दिखाया है कि किस प्रकार परेशबाबू की स्त्री बरदासुन्दरी अपनी तीनों बेटियों को शिक्षित करने तथा उनके द्वारा किए गए प्रत्येक कार्यों को सराहती रहती है। विनय जब उनके घर में आता है तो वह एक-एक करके अपनी सभी बेटियों का गुणगान करती है। बरदासुन्दरी का बेटा था जो कि नौ साल की उम्र में गुज़र जाता है। उसे इस बात का हमेशा ही दुख रहता है। वह जब भी किसी लड़के को देखती है तो अपने बेटे को याद करती है। परन्तु अब उसकी बेटियाँ ही है जिनको लेकर वह गौरव करती है। उनकी बेटी लावण्य को स्कूल में पुरस्कार वितरण में लेफ्टेनेन्ट गवर्नर तथा उनकी स्त्री के सत्कार के लिए उसे ही चुना जाता है तथा गवर्नर की स्त्री लावण्य को बहुत प्रोत्साहन करती है इसकी चर्चा विनय से करना नहीं भूलती। लावण्य को जिस सिलाई के लिए पुरस्कार मिलता है वह सिलाई भी विनय को दिखाती है। इतना ही नहीं बरदासुन्दरी अपनी बेटियों को गवर्नर के जन्म दिन में होने वाले कृषिप्रदर्शनी के दिन जब गवर्नर अपनी स्त्री के साथ रहेंगे तो उनको प्रसन्न करने के लिए एक अंग्रेज़ी काव्य नाकट करने के लिए भी प्रशिक्षित करती है। परेशबाबू भी अपनी सभी बेटियों को इन सभी चिज़ों में बहुत प्रोत्साहित करते है। यहाँ तक कि अंत में ललिता जब विनय से विवाह कर लेती है तब भी अपनी बेटियों का साथ देते हैं तथा सुचरिता का भी साथ देते हैं जब वह हारानबाबू से विवाह के लिए असहमति दिखाती है तो। इन सभी प्रसंगों से यह ज्ञात होता है कि रविन्द्रनाथ ठाकुर स्त्री की स्वतंत्रता को लेकर कितने गम्भीर थे। वस्तुतः उनके लिए भारती की स्वतंत्रता का मतलब ही यही था कि व्यक्ति अपनी संकीर्ण भावनाओं से निकल कर जब तक आगे नहीं आएगा तब तक न तो उसका समाज में आदर होगा, न समाज का ही उद्धार होगा। अतः जो समाज ऐसी संकीर्णताओं से जकड़ा हुआ हो वह कभी भी बाहरी ताकतों का मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिए रविन्द्रनाथ ठाकुर राष्ट्रीय चेतना तथा उसकी स्वतंत्रता के लिए मानते थे कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हो और उसमें नारी सबसे महत्त्वपूर्ण अंग थी।

            अंतिम बिन्दु है कि ब्रह्म समाज की स्थापना जिस उद्देश्य से की गयी थी, उससे यही साबित होता है कि भारत को फिर से वैदिक धर्म की शिक्षा दी जा सके जिसके जरिए भारत की महानता की सबसे बड़ी पहचान सभी धर्मों के प्रति श्रद्धा एवं सबको साथ लेकर चलने की कला फिर से पूरी दुनिया के सामने रखी जा सके। इस उपन्यास के अंत में गोरा द्वारा यह दिखाया गया है। गोरा जो कि शुरुआत में ब्रह्म समाज की ओर उन्मुख था, फिर किसी अंग्रेज द्वारा हिन्दु समाज की बुराई करने पर वह कट्टर रूप से हिन्दु आचार-व्यवहार का पालन करना शुरू कर देता है। अपने हिन्दु होने पर वह गौरव महसूस करता है तथा अपनी माँ के हाथ का भोजन भी इसलिए त्याग देता है क्योंकि उसकी माँ अभी भी अपनी ईसाई धर्म को मानने वाली नौकरानी लछमिया को रखे हुए है। परन्तु जब गोरा के पिता के मृत्यु के बाद उसे अपनी माँ से उसके वास्तविक आइरिश माता-पिता के बारे में पता चलता है तब उसकी सारी कट्टरवादिता चली जाती है। वास्तव में रविन्द्रनाथ जी यह दिखाना चाहती है कि कैसे आनन्दमयी ने ब्राह्मण होते हुए भी गदर के समय बिना कुछ सोचे समझे एक आइरिश दम्पति के नन्हे से शिशु को गोद लेकर अपने पुत्र समान बड़े जतन से पालन-पोषण करके अपने विश्व मातृ स्वरूप की पहचान करायी है उसी से गोरा के मन की संकीर्णता दूर होती है। साथ ही उसके पिता भी तो हमेशा उसे यही समझाते रहे है कि हिन्दु होना कोई सहज कार्य नहीं है, बाकि सभी धर्मों को आसानी से अपनाया जा सकता है परन्तु हिन्दु होना बहुत कठिन है। क्योंकि वास्तविक हिन्दुत्व क्या है यह किसी के समझ से परे है। अतः अंत में गोरा को रविन्द्रनाथ उसी रास्ते पर ले जाते हैं जिसमें गोरा जाना चाहता था। गोरा के मन में शुरू से ही अपने राष्ट्र के प्रति असिम श्रद्धा एवं प्रेम भरा हुआ था परन्तु वह स्वयं कई सारे विचारों में उलझा हुआ होने के कारण स्वयं ही भ्रमित था। उसका मन किसी प्रकार भी खुला या उदार नहीं हो पा रहा था। परन्तु अपनी वास्तविकता को जानने के बाद उसमें परिवर्तन होता है जिसे वह स्वयं परेशबाबू के सामने कुछ इस प्रकार स्वीकार करता है – आमार कथा कि आपनि ठिक बूझते पारछेन? आमि जा दिनरात्री हते चाच्छिलुम अथच हते पारछिलुम ना, आज आमि ताई हएछि। आमि आज भारतबर्षीय। आमार मध्ये हिन्दु, मुसलमान, खृस्टान कोनो समाजेर कोनो बिरोध नेई। आज एई भारतबर्षेर सकलेर जातेई आमार जात, सकलेर अन्नई आमार अन्न। देखुन, आमि बांलार अनेक जेलाय भ्रमण करेछि, खुब नीचू पल्लीतेअ आतिथ्य नियेछि – आमि केबल शहरेर सभाय बक्तृता करेछि ता मने करबेन ना – किन्तु कोनोमतेई सकल लोकेर पाशे गिये बसते पारि नि – एतदिन आमि आमार संगे संगेई एकटा अदृश्य व्यवधान निये घूरेछि – किछुतेई शेटाके पेरोते पारि नि। सेजन्य आमार मनेर भितरे खूब एकटा शून्यता छिल। एई शून्यताके नाना उपाय केबलई अस्वीकार करते चेष्टा करेछि –एई शून्यतार ऊपरे नानाप्रकार कारूकार्य दिये ताकेई आरो विशेषरूप सुन्दर करे तूलते चेष्टा करेछि! केनना, भारतबर्षके आमि जे प्राणेर चेये भालोबाशि – आमि ताके जे अंशटिते देखते पेतुम से अंशेर कोथाअ जे आमि किछुमात्र अभिजोगेर अवकाश एकेबारे सह्य करते पारतुम ना। आज सेई-समस्त कारुकार्य बानाबार वृथा चेष्टा थेके निष्कृति पेये आमि बेचे गेछि परेशबाबू!”[6] गोरा के मन में जो शून्यता थी उससे वह मुक्त हो गया है तभी वह पूरे भारतवर्ष को अपना सका है। यही बात वह परेशबाबू  कहना चाहता है। यह शून्यता उसके मन में अति कट्टर हिन्दुवादी भावना के कारण थी। यही कारण है जिसने भारतवर्ष के लाखों नौजवानो तथा वयस्कों को घेर रखा था। इसी कारण भारत कई वर्षों तक बाहरी ताकतों का गुलाम बना रहा था। जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता के कारण ही भारत में जब-जब आक्रमण हुए तब-तब वह कही-न-कही हारा है। जिसे राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रविन्द्रनाथ जैसे लोग समझ चुके थे। वे यह समझ चुके थे कि जब तक इन सब चिज़ों से भारत मुक्त नहीं होगा तब तक उसकी उन्नति होना सम्भव नहीं है।

            अंत में यही बात स्पष्ट हो जाती है कि रविन्द्रनाथ ठाकुर जी अपने उपन्यास में जिन बातों को दर्शा रहे हैं उससे यही साबित करना चाहते थे कि जब तक भारत अपनी इस संकीर्णता से मुक्त नहीं होगा, धार्मिक कट्टरता, जातिवाद की कट्टरता, वर्ण व्यवस्था की कट्टरता, ऊँच-नीच के भेद-भाव तथा नारी समाज को घर की चार दिवारी में बन्द रखने की कट्टरता से मुक्त नहीं होगा तब तक भारत का स्वतंत्र होना मुश्किल होगा। भारतीय समाज की इन्हीं कमजोरियों से मुक्ति होने पर ही जाकर भारत का स्वतंत्रता संग्राम सफल हुआ है यह सभी को ज्ञात है। बड़े पैमाने पर जब सभी वर्गों के लोगों ने एक साथ इस आन्दोलन में हिस्सा लिया तभी जाकर भारत की राष्ट्रीय एकता सामने आयी जिसके आगे ब्रिटिश सरकार को हार माननी पड़ी। रविन्द्रनाथ ठाकुर यह बात समझ चुके थे कि भारत की स्वतंत्रता के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह इन सभी कमजोरियों से बाहर निकले, वरना भारत तो आज़ाद शायद हो जाता परन्तु भारत पिछड़ा-का-पिछड़ा ही रह जाता जिसे अंग्रेज हमेशा उस समय के भारतीयों को कहा करते थे। वैसे भी जब कोई बात या सिद्धान्त मानव जाति के विकास के आड़े आता है तो वह बात पिछड़ापन का ही एहसास दिलाता है। रविन्द्रनाथ जी उस समय न केवल भारत की स्वतंत्रता की बात सोच रहे थे बल्कि नवीन भारत के निर्माण के भी सपने बुन रहे थे। इसी कारण उन्होंने गोरा उपन्यास में राजा राममोहन राय के सिद्धान्त का समर्थन किया तथा इस बात को गोरा के जरिए दिखाया की पूरा भारतवर्ष जिस व्यक्ति के मन में हो वही राष्ट्र निर्माण के लिए सबसे उपयोगी सिद्ध हो सकता है तथा वही स्वाधीन भारत का सच्चा अधिकारी होता है। अंत में कहा जा सकता है कि गोरा उपन्यास में सच्चे अर्थों में भारत की स्वतंत्रता आन्दोलन की चेतना मिलती है।

           







[1] http://www.vivacepanorama.com/brahmo-samaj/
[2] रविन्द्रनाथ ठाकुर, उपन्यास समग्र, द्वितीय खण्ड, प्रकाशक—साहित्यम, द्वितीय संस्करण, 2012, पृ,सं --36
[3] वही पृ.सं – 96।
[4] वही पृ.सं –92।
[5] वही, पृ,सं – 95।
[6] वही, पृ,सं –335।

बुधवार, 15 मई 2019

तुलसीदास की दोहावली में मानवीय मूल्य।



गोस्वामी तुलसीदास भक्तिकाल के उन महान कवियों में से एक हैं जिन्होंने जन-मानस के मन में भक्ति की अलख जगाकर समाज को एक नई दिशा प्रदान की। उनकी समन्वयवादी रचना, उत्तम विचार तथा भक्ति की तल्लीनता ने न केवल उस समय के लोगों को भक्ति मार्ग की ओर आकृष्ट किया बल्कि आज भी उनके द्वारा लिखित रचनाओं को जो कोई भी पढ़ता है तो वह स्वयं ही भक्ति से परिपूर्ण संसार में अपने-आप ही चला जाता है। एक कवि के लिए इससे बड़ी सफलता की बात और क्या होगी यदि उसकी रचना पढ़कर पाठक की लोकोत्तर चेतना जाग उठे और वह दिखाई देने वाले संसार में रहते हुए भी भक्ति भावना से समृद्ध रचना के द्वारा वह ईश्वर के समीप होने का आनन्द पा सके।
मानव मूल्य का अर्थ क्या है?
सृष्टि के प्रारम्भ से ही मनुष्य को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि मनुष्य को मिलजुल कर रहने एवं एकतृत रहने की प्रयोजनियता का अनुभव हुई । मनुष्य तथा प्राणी जीवन काल की सीमाबद्धता, अनिश्चयता एवं प्रकृति की अप्रतिरूद्ध क्षमता के सामने मनुष्य की शक्ति की तुच्छता के ज्ञान से मनुष्य के मन में भय तथा संभ्रम का उदय हुआ। प्रकृति के इस अदम्य शक्ति के सामने मनुष्य का आत्म समर्पण करने के सिवा और कोई उपाय नहीं था। मनुष्य की यह धारणा हुई कि अदम्य शक्ति का नियंत्रणकर्ता ही इस संसार का सृष्टिकर्ता है। अतः मनुष्य ने सृष्टिकर्ता को तुष्ट करने के लिए उनके आगे आत्मसमर्पण किया। इस आत्मसमर्पण की भावना को भक्ति कहते है । साथ-ही-साथ मनुष्य ने यह भी देखा कि एक सुश्रृंखल एवं नियमानुवर्तित समाज के बिना मानव के कल्याण तथा प्राकृतित विपर्यय से भी अपने-आप की रक्षा करना कठिन है। इस प्रकार धीरे-धीरे सामाजिक जीवन की सृष्टि हुई। सामाजिक जीवन में जीना और दूसरों को जीने देना, इस सिद्धान्त को  ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत तथा सामुहिक उन्नति के गुण को ही मानव-मूल्य कहा जाता है। इसमें प्रथम मूल्य है अपनापन। अपनेपन के बिना सहनशीलता नहीं जन्म लेती है। परन्तु यही सबसे बड़ी विषय-वस्तु है। सबसे अधिक आश्चर्य की बात है कि आज के समय में लोग जानते समझते हुए भी अनदेखा कर देते हैं परन्तु यह सत्य है कि हम अपनो की किसी भी बात का बुरा नहीं मानते, अपनो की बातों को अच्छी तरह समझते भी है तथा अपनो द्वारा दिए गए परामर्श को भी अपना लेते हैं। लेकिन घर की सीमा या परिधि लांगने के बाद यह कुछ तक ही सीमित रह जाती है। दूसरों के मामले में यही अपनेपन का भाव नहीं रहता है। परन्तु जब समाज के सभी व्यक्तियों में यह अपनेपन की भावना घर के बाहर के लोगों के लिए भी रहेगी तभी सहनशीलता का गुण भी जन्मेगा और उस सहनशीलता से एक सुन्दर समाज की रचना हो सकेगी। सहनशीलता के बिना व्यक्ति समाज में अन्य व्यक्तियों का सुझाव या समाधान को जान नहीं पाता एवं सठिक सिद्धान्त ले नहीं पाता है, और इसके लिए दूसरा जरूरी मूल्य है सहनशीलता। यदि व्यक्ति समाज के अन्य व्यक्तियों को अपना नहीं समझते हैं तो दूसरों के बात को सठिक मूल्य नहीं दे पाते हैं तथा प्रयोजनानुसार इन बातों का सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार अपनेपन से सहनशीलता जन्मती है तथा उससे सामुहिक विचारधारा उत्पन्न होती है।
हर सिद्धान्त के पीछे एक ही बात होनी चाहिए ‘जीने और जीने देना’। जब व्यक्ति जीने और जीने देने का सिद्धान्त को अपना लेगा तब हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार जीवन को विकसित कर सकेगा। हमारे प्राचीन ऋषियों ने भी इसी अपनेपन की भावना को एक बहुत सुन्दर उक्ति प्रदान की है, वह है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक नारा नहीं है बल्कि इसका वास्तविक तात्पर्य है कि समग्र संसार को यदि अपना समझा जाय तो एक अपनापन जगेगा, एक भातृभाव का जन्म होगा और उसी से, जैसे हम अपने सगे की सहायता करते हैं, उसी प्रकार हम दूसरों की भी सहायता कर सकते हैं उन परिस्थितियों में जब जरूरत होगी। क्योंकि मानव जीवन ऐसा है जिसमें कभी-न-कभी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो सकती है, अनेक समस्याएँ आती है जिसके बारे में हम पहले से कुछ नहीं कह सकते हैं। परन्तु ये सिद्धान्त तभी सठिक होगा जब व्यक्ति के मन में दूसरे के प्रति अपनेपन की भावना रहेगी। अतः मानव मूल्य में अपनापन ही सबसे जरूरी बात है जिससे मनुष्य के मन में सहानुभूति, दया, माया, ममता, संवेदनशीलता का जन्म होता है। वही जब मानव-मूल्य किसी व्यक्ति के मन में जग जाता है तो फिर वह किसी भी परिस्थिति में अपना संयम खोय बिना भी न्याय कर पाता है।
भक्ति और मानव मूल्य का सम्बन्ध।
भक्ति तथा मानव-मूल्य दोनों एक-दूसरे के परिपूरक है। जिसमें मानव-मूल्य नहीं है वह भक्ति मार्ग पर भी नहीं जा सकता। जिसने भक्ति का रास्ता चुना है वह अपने आप ही महा-मानव की भूमिका में आ जाता है तथा इनमें सारे मानव-मूल्य अपने-आप ही विकसित हो जाता है। क्योंकि भक्तिमार्गी व्यक्ति हरेक प्राणी में सृष्टिकर्ता की शक्ति को अनुभव करने लगता है। अतः प्रत्येक प्राणी ही भक्ति मार्ग के लिए एक ही बिरादरी का हो जाता है। भक्ति तथा मानव-मूल्य की परिपूरकता को समझने के लिए रत्नाकर दस्यू का ऋषि वाल्मीकि में रूपायन एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। रत्नाकर जब तक दस्यू तब तक उसमें न मानव-मूल्य था न ही भक्ति भावना थी। परन्तु जब रत्नाकर ने नारद मुनि के उपदेश से भक्तिमार्ग में चलना शुरू किया तब मानव-मूल्य उनमें अपने आप ही विकसित हो गया। कालान्तर में वही प्रसिद्ध दस्यू रत्नाकर महाऋषि वाल्मीकि के रूप में प्रसिद्ध हुए।
तो यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि भक्ति मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति मानवता के रास्ते पर स्वतः ही चलने लगता है।
मानव-मूल्य की आवश्यकता।
मानव-मूल्य की सबसे बड़ी आवश्यकता समाज तथा देश के लिए होती है। जिस समाज के लोगों में मानव-मूल्य होता है वह समाज सही रास्ते पर चलता है तथा उस देश का भी विकास होता है। जहाँ मानव-मूल्य नहीं होता वहाँ विकास नहीं केवल विनाश होता है।

तुलसीदास जी की रचना दोहावली में मानव-मूल्य।
गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य में श्रीराम सबसे मुख्य विषय है। तुलसीदास जी भक्तिकाल के राम भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनका समग्र साहित्य श्रीराम की भक्ति को समर्पित है। ये श्रीराम न केवल दशरथ पुत्र राम है बल्कि समस्त संसार का सृजन करने वाले राम है। अतः उनकी दोहावली में अंतर्निहित मानवीय मूल्य को जानने के लिए श्रीराम को जानना समझना बहुत आवश्यक है। श्रीराम को सदा से ही भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। वे दशरथ पुत्र थे, अयोध्या के राजा थे, पूरे संसार को कष्ट पहुँचाने वाले रावण का नाश करने वाले, देवी सीता की रक्षा करने वाले तथा दुखियों के दुखों के दूर करने वाले श्रीराम की महिमा का गुणगान तुलसीदास की रचना में भरपूर हुआ है। श्रीराम के व्यक्तित्व की ओर ध्यान दे तो निम्नलिखित बातें सामने आती है।
. श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है।
. श्रीराम पितृभक्त थे, यही कारण हैं कि अपने पिता के वचनों का पालन करने के लिए वे 14 वर्ष का वनवास काटने चले गए थे।
. श्रीराम चाहते तो वे वनवास नहीं जा सकते थे, क्योंकि उनपर किसी प्रकार का दबाव नहीं था, परन्तु उन्होंने अपने पिता के सम्मान की रक्षा हेतु वन जाना स्वीकार किया। जब उनके भाई भरत उन्हें लेने चित्रकुट आए तब वे इस बहाने से वापस लौट सकते थे परन्तु अपने पिता के वचनों की मर्यादा का पालन करते हुए उन्होंने वनवास को ही चुना।
. श्रीराम को वनवास भेजने वाली माता कैकयी थी परन्तु श्रीराम स्वभाव से इतने कोमल तथा दयालु थे कि उन्होंने माता कैकयी को क्षमा कर दिया था। केवल इतना ही नहीं, उनके मन में माता कैकयी के प्रति गहरी श्रद्धा तथा प्रेम भरा हुआ था।
. श्रीराम स्वभाव से प्रेमी थे, देवी सीता को अपने साथ वन में ले जाना उनके पति धर्म का ही एक उत्कृष्ट उदाहरण है। क्योंकि जिस प्रकार पति की सेवा तथा दायित्व पत्नी का धर्म है उसी प्रकार पत्नी के प्रति दायित्व पति का भी है। श्रीराम देवी सीता को महल में अकेले छोड़ नहीं सकते थे, वही देवी सीता भी राम के साथ वन में जाने के लिए तैयार थी।
. देवी सीता को वनवास देने के बावजूद भी श्रीराम ने एक पत्नी धर्म का पालन किया जो कि उस समय एक बहुत बड़ी बात थी। राम के समकालीन अन्य राजाओं ने अनेक विवाह किए थे परन्तु श्रीराम ने अपने भाईयों तथा समाज के सामने सबसे सर्वोत्तम उदाहरण रखा।
. श्रीराम जब वन में थे तो उन्हें ऐसे भी कई राजाओं का समर्थन मिला जो सहर्ष अपनी राजगद्दी उन्हें सौंप देना चाहते थे। जैसे कि निषाद राज तथा सुग्रीव। परन्तु श्रीराम ने अपने पिता के वचनों का पालन करते हुए 14 वर्ष वन में ही कांटे। किसी भी राज्य में या गांव तक में भी प्रवेश नहीं किया। अपनी मर्यादा में रहकर वन में अपने सामर्थ्य से जीते रहे।
. श्रीराम के पास जितनी शक्ति थी उससे वे किसी भी राज्य को जीत सकते थे एवं उनके राजा बन सकते थे। परन्तु उन्होंने अपना संयम नहीं खोया। उन्होंने वन में राक्षसों का वध करके वन में रहने वाले ऋषिमुनियों की रक्षा की। श्रीराम ने बाली, रावण जैसे दुराचारियों का वध एक राजा की हैसियत से किया क्योंकि उस समय उनके लिए जंगल में रहने वाली प्रजा ही उनके अपने थे। परन्तु फिर भी अपनी मर्यादा का पालन करना उन्होंने नहीं छोड़ा। बाली का वध करके बाली के पुत्र अंगद को उसका राज्य सौंप दिया, सुग्रीव के साथ न्याय किया तथा रावण का वध करके उन्होंने लंका पर अधिकार नहीं किया बल्कि रावण के भाई विभिषण को राज्य सौंप दिया।
. श्रीराम के मन में ऊँच-नीच की भावना भी नहीं थी। तभी उन्होंने शबरी के झूटे बेर खाकर समाज में जाति-भेद से परे एक अलग समाज के होने का आदर्श प्रस्तुत किया।
यहाँ हम देख सकते हैं कि इतनी विपरीत परिस्थिति तथा उत्तेजनात्मक परिवेश में भी राम ने अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी। अपने पिता के वचनों का पालन करते हुए वनवास को संयम के साथ पालन करते रहे। यह तो थी लौकिक राम की विशेषताएँ परन्तु तुलसीदास के श्रीराम न केवल लौकिक है बल्कि अलौकिक भी है। यह वह श्रीराम है जो समस्त सृष्टि के सृजनकर्ता है। दुखियों के दुख दूर करने वाले, सांसारिक प्राणी को जन्म-जन्मान्तर के चक्रव्यू से मुक्ति देकर मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। इस प्रकार न जाने कितनी ऐसी विशेषताएँ हैं जिन्हें गोस्वामी तुलसीदास ने अपने सम्पूर्ण रचनाओं में स्थापित किया है। राम के आदर्शों को लोगों के सामने स्थापित करने का मूल कारण भी यही था कि समाज में राम के चरित्र के समान आम लोग भी उनके जैसे अच्छी बातों का अनुसरण करें। इतना ही नहीं बल्कि राम के आदर्शों का अनुसरण के साथ-साथ राम की भक्ति पर भी ध्यान देते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी सभी रचनाओं में श्रीराम के आदर्शों तथा उनकी मर्यादा को भली भांति उजागर किया है। तथा जैसे कि हम पहले कह चुके हैं कि मानव-मूल्य का अर्थ अपनापन है तथा उससे जनित भक्ति भी मानव-मूल्य है। अतः तुलसीदास रचित भक्तिकाव्य को मानव-मूल्य का काव्य कहा जा सकता है। दूसरी बात यहा कहना जरूरी है कि भक्तिकाल में जितने भी कवि हुए है वे सभी मानव-मूल्य से भरे हुए महा-मानव थे। यही कारण है कि उन्होंने पूरे समाज में अपनी भक्ति द्वारा मानव-मूल्य को स्थापित करने के लिए अपनी रचनाओं द्वारा सफल प्रयास किया है।
तुलसीदास की दोहावली में राम नाम का जाप तथा उनका स्मरण करना प्रमुख है। अपने प्रथम दोहे से ही वह राम नाम के जप की महिमा  के बारे में बताते हुए कहते हैं कि भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता तथा भाई लक्षमण के साथ चित्रकूट में सदा निवास करते हैं। उनका नाम जो भी जाप करता है भगराम राम उसकी हर इच्छा पूरी कर देते हैं, उसे उसकी इच्छानुसार फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार अपने एक और दोहे हैं भी राम नाम के जप की अनिवार्यता को दर्शाते हुए कहते हैं कि --
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु।।1
इस दोहे में तुलसीदास लोगों को यह संदेश दे रहे हैं कि यदि अपने कई जन्मों की बिगड़ी हुई को सुधारना चाहते हो तो कुसमाज को त्यागकर राम नाम को जपना शुरू कर दो। विशुद्ध भक्तिमत के अनुसार तो इसमें राम की शरण में जाने के लिए कहा गया है। यहाँ पर मानव-मूल्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जिस प्रकार श्रीराम ने मानवीय मूल्यों का पालन किया है, मर्यादा का पालन किया है उसी प्रकार लोगों को भी श्रीराम के आदर्शों का पालन करना चाहिए। राम नाम का जाप करने का अर्थ ही यही है कि राम के आदर्शों पर चलो। जैसे राम ने कुसमाज को सदा अपने से दूर रखा उसी प्रकार हमें भी अपने-आप को कुसमाज से दूर रखना चाहिए तथा भक्तिमार्ग की ओर चलना चाहिए। दूसरी बात कुसमाज का अर्थ क्या है आज के युग में लोग भली-भांति जानते हैं।
उसी प्रकार तुलसीदास जी का एक और दोहा ले लिया जाए जिसमें उन्होंने एक बहुत ही सुन्दर संदेश दिया है। लोगों को किसी भी महत्वपूर्ण कार्य करते समय यदि प्रसन्नता का भाव ना हो तो उस कार्य का कोई फल नहीं मिलता है। यथा
रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरू पायँ।
तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ।।2
इस दोहे में तुलसीदास जी जो संदेश देना चाहते हैं वह बहुत स्पष्ट है कि यदि धर्मयुद्ध हो तब शत्रु का सामना करते समय, किसी को दान देते समय या फिर गुरू के चरणों में प्रणाम करते समय यदि प्रसन्नता नहीं होती है तो फिर उस काम को करने का कोई मतलब नहीं है। प्रसन्नता कैसे आती है। जब हम किसी को अपना समझते हैं तो उसके लिए कुछ करते हैं तो प्रसन्नता का भाव आता है। यही तो मानव-मूल्य है। किसी भिखारी को दान देने से पहले यदि उस भिखारी को अपना समझा जाय तो उसे कुछ देते समय अपने-आप प्रसन्नता जागेगी। उसी प्रकार गुरू जो कि हमें अपना समझकर ज्ञान प्रदान करते हैं यदि उनके प्रति हमारे मन में अपनेपन की भावना रहेगी तभी उनके चरणों को स्पर्श करते हुए प्रसन्नता आएगी। अपनेपन की भावना से ही प्रसन्नता का भाव जन्म लेता है। परन्तु यदि कोई प्रसन्नता को भाव बिना ये कर्म करता है तो उसमें मानव-मूल्य नहीं है।
तुलसीदास जी इसी प्रकार राम राज्य की महिमा की वर्णन करते हुए कहते हैं।
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि।
राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि।।3
अर्थात् राम के राज्य में रहने वाले सभी लोग अपने धर्म का पालन करते हैं। किसी के मन में किसी के प्रति क्रोध, द्वेष, दुख आदि जैसी भावनाएँ नहीं है। सबको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। इसके पीछे एक विराट अर्थ छिपा हुआ है। जो लोग अपने कर्म पर ध्यान देते हैं तथा उसे ही सही रखकर जीने की सोचते हैं उसे अन्य किसी से बैर करने की जरूरत नहीं पड़ती है। वर्तमान समय में यह बात भारतीय समाज के सभी वर्गों तथा धर्मों के लोगों को जानना समझना बहुत जरूरी है। वैसे भी सबसे बड़ा धर्म है मानवता। और मानवता तभी पनपती है जहाँ हर कोई एक-दूसरे के साथ बिना किसी झगड़े, द्वेष तथा क्रोध, के रह पाते हैं। वहाँ मानव समुदाय का विकास होता है। वहाँ मानवता का विकास होता है।
मानव मूल्य की यदि बात की जाय तो उसमें सबसे बड़ा शत्रु होता है अभिमान। अभिमान या अहंकार किसी भी व्यक्ति के मन में पनपने से उसे समस्त अच्छे गुणों का सर्वनाश होने लगता है। तब व्यक्ति न केवल अपने परिजनों के लिए बल्कि समाज के लिए भी हानीकारक हो जाता है। यह अहंकार ही है जो किसी भी मनुष्य को, जाति को, समाज को, देश को बर्बाद कर सकती है। जैसे की रावण, कंस, जरासंध, दूर्योधन आदि का अंत हुआ था। ऐसे ही पूरे संसार में अनेक ऐसे उदाहरण मिलेंगे जिसमें अहंकार के कारण कई साम्राज्य बने और बिगड़े। तुलसीदास जी अहंकार के विरुद्ध अपनी दोहावली में कुछ ऐसे लिखते हैं –
हम हमार आचार बड़ भूरि भूरि धरि सीस।
हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोस कृमि कीस।।4
अर्थात् जिस व्यक्ति में इस बात का अभिमान होता है कि हम बड़े है, हमारा आचार बड़ा है ऐसा अभिमान हमारे सिर पर इतना बोझ बन जाता है और हम तब मूर्ख तोते, रेशम के कीड़े और बंदर की भाँति स्वयं को बंधनों में बंधकर पराधीन हो जाते हैं। वस्तुतः अभिमान वश व्यक्ति हमेशा यही सोचता कि वह सबसे आजाद है उसके ऊपर कोई नहीं है, केवल वही एक मात्र है जो सबसे ऊपर और श्रेष्ठ है। परन्तु वह अपने अभिमान के अधीन होता है तथा लोगों के नज़रों में भी गिर चुका होता है। इसलिए प्राचीन काल से ही लोगों को अहंकार से दूर रहने की शिक्षा दी जाती रही है।
तुलसीदास जी के अनेक दोहों में उन्होंने इसी प्रकार राम नाम की महिमा तथा राम के प्रति अपने अगाध प्रेम को उजागर किया है। वे यह भी कहते हैं कि जिनके हृदय में श्रीराम का यशोगान सुनकर श्रीराम के प्रति प्रेम नहीं जगता तथा हृदय द्रवित नहीं होता वह हृदय वज्र की तरह कठोर है। तुलसीदास जी के लिए श्रीराम ही अंतिम गति है। यह सारी बाते इसी ओर इशारा करती है कि जिस व्यक्ति ने अपने सम्पूर्ण जीवन में मानव-मूल्य को धारण करके अपना जीवन जिया ऐसे व्यक्ति के प्रति मन में प्रेम और श्रद्धा होना भी एक प्रकार का मानव-मूल्य ही है। तुलसीदास जी ने इसी प्रकार रामभक्तों के बारे में परिचय दिया है जो कि मानव-मूल्य का एक और सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है –
हित सो हित रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ।
उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ।।5
तुलसीदास जी रामभक्त के लक्षण बता रहे हैं कि रामभक्त को कैसा होना चाहिए। रामभक्त को सहृदय तथा क्षमावान होना चाहिए। श्रीराम से उसका प्रेम होना चाहिए। मित्र से मैत्री तथा शत्रुओं को क्षमा करने की क्षमता होनी चाहिए। वह किसी के साथ पक्षपात् न करे था सबसे साथ प्रेम तथा सरल व्यवहार करे। यहाँ प्रेम, क्षमा, मैत्री, दया आदि गुण मानव मूल्य है। इन्हीं गुणों के रहने से व्यक्ति में मानव-मूल्य बना रहता है जिसकी तुलसीदास जी अपने इस दोहे में वर्णना कर रहे हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसीदास जी के प्रत्येक रचना में मानव-मूल्य का भण्डार भरा पड़ा है। उनकी सबसे उत्कृष्ट रचना रामचरित मानस में जिस प्रकार आदर्श मनुष्य के गुण की व्याख्या हुई है उसी प्रकार उनकी दोहावली में भी वही भावना भरी पड़ी हुई है फिर भले ही वह भक्ति एवं नीति वाले दोहे ही क्यों न हो। वस्तुतः मानव-मूल्य के लिए भक्ति एवं नीति दोनों की आवश्यकता है। जो मनुष्य है वह भक्ति भी करता है तथा जीवन जीने के लिए नीति का प्रयोग भी करता है। अतः ये दोनों ही मानव-मूल्य के अभिन्न अंग कहे जा सकते हैं।

संदर्भ ग्रंथ
1 तुलसी दोहावली – संपादन –राघव ‘रघु’, प्रभात प्रकाशन, 2012, पृ,सं –23।
2 वही पृ,सं –25।
3 वही पृ,सं –40।
4 वही पृ,सं –48।   
5 वही पृ,सं –31