जब तुम मिले
मुझसे
ज़िन्दगी के इस मोड़ पर
मैंने दिल को एक बार नहीं
हज़ार बार रोका
जब तुम बातें करने लगे
मुझसे
तरंगों के गुम हो जाने पर
मैंने ख़यालों, तरानों को भी
अनसुना सा किया
कानों में उँगलियाँ भी फेर ली
पर दिल की धड़कन सुनाई देती रही
जब तुम्हारी नज़रें
मुझसे
बार-बार टकराती रही
चाहा की फेर लू नज़रे तुम पर से
पर तुम ही हर कही नज़र आने लगे
जब तुम मिले
जब तुमने कुछ नहीं कहा था
मुझसे
मगर मैं सुनती रही वही बातें
खुद से
तुमने तो बार-बार समझाया था मुझे
पर मैं समझकर भी नहीं समझी
बार-बार यही सोचती रही
कि
तुम मुझे क्यों मिले
जब तुम मिले।
मंगलवार, 17 अप्रैल 2012
मंगलवार, 3 अप्रैल 2012
घनी आबादी के बीच एक औरत
घनी आबादी के बीच एक औरत
चलती रहती है अपनी आँखे फाड़-फाड़
खोजती है शिकार
किशोर लड़कियों के
ताकि सूना सके
अपनी अपूरित वासना और
मर्दों से मिले दूतकार को
जब भी कोई आती है उसके दायरे में
बिना मर्द के विषय की बात-चीत नहीं होती
जब तक वह अपनी मनमानी न करे
उसके सम्मान की जीत नहीं होती।
चलती रहती है अपनी आँखे फाड़-फाड़
खोजती है शिकार
किशोर लड़कियों के
ताकि सूना सके
अपनी अपूरित वासना और
मर्दों से मिले दूतकार को
जब भी कोई आती है उसके दायरे में
बिना मर्द के विषय की बात-चीत नहीं होती
जब तक वह अपनी मनमानी न करे
उसके सम्मान की जीत नहीं होती।
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
फैसला................
फ़ैसला
1
“आज इतने दिन हो गए है, सुमन के बाबा क्या तुम्हें उसकी याद नहीं आती?”
“याद तो आती है, पर क्या करू गुस्से में घर से निकाल दिया और अब उससे बात करते भी डर लगता है, पता नहीं वापस आएगा भी या नहीं?”
“देखिए! बेटा है वह आपका, आपकी बात ज़रूर मानेगा। एक बार कोशिश तो कीजिए।”
“देखो प्रताप की माँ मुझे तुम जोर न दिया करो। अगर उसे अपने माँ-बाप की कद्र है तो वह ज़रूर वापस लौटेगा और नहीं तो नहीं। लेकिन मेरा फैसला अटल है।”
“क्या हो गया है मेरे घर को? हे भगवान, एक तरफ बाप-बेटे लड़-झगड़कर अलग हो गए है और मैं अपने बच्चों से मिल नहीं पा रही। दोनों बाप-बेटे नहीं समझते कि मेरे लिए ये लोग कितने अनमोल है। दोनों की ज़िद के चलते मेरा घर उजड़ गया है।”
(गुस्से से)“मैंने नहीं कहा था प्रताप को कि वह शहर जाकर नौकरी के साथ-साथ उस लड़की से भी शादी कर ले। उसने अपनी ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला लिया और हमसे सलाह –मश्विरा करना भी उचित नहीं समझा। एक बार इन्डीपेन्डन्सी क्या दे दी वह अपनी हद को ही भूल गया। माँ-बाप के साथ ऐसा कोई करता है क्या?”
“तुम भी तो जिद्दी हो उसकी तरह। अगर उसने लड़की पसन्द की है तो ठीक ही की होगी। इतना भरोसा नहीं तुम्हें उसपर। आखिर उन्हें ही तो जीवन भर साथ रहना है। हमारा-तुम्हारा क्या है, आज है कल नहीं। पर वे तो जीते रहेंगे ना। क्यों दोनों को स्वीकार नहीं किया तुमने। घर से निकाल दिया उसे। सुमन भी इसी गम में चली गयी घर से। कहती है बाबा जब तक भैया को वापस नहीं बुलाते तब तक मैं भी न आऊंगी। भला ये भी कोई बात हुई। मेरी किसी को चिन्ता नहीं। मैं अभागन न बाप को ही समझा पाती हुँ न बच्चों के पास जा पाती हुँ। मुझे किस बात की सज़ा मिल रही है।”
“प्रमिला तुम शान्त रहो। अधिक उत्तेजित न हो। तुम्हारा बल्डप्रैशर हाई हो जाएगा। पिछले महिने ही तुम्हारी तबियत खराब हुई थी। चिन्ता मत करो मैं जल्द ही दोनों को वापस लाने का उपाय करता हुँ।”
“हे भगवान! क्या-क्या दिन देखने पड़ रहे है।”
2
प्रताप और सविता एक ही दफ्तर में काम करते है। दोनों ही अलग-अलग शहर से। प्रताप लखनऊ का रहने वाला है और सविता हिमाचल से है। प्रताप को आज लगभग चार बरस हो चुके है अपने परिवार से अलग हुए। प्रताप को आज भी वह दिन याद है जब वह घर से निकला था तो बाबा ने उससे कहा था कि “देखो बेटा! तुम अब बढ़े शहर जा रहे हो। वहाँ जाकर तुम ज़िन्दगी के अलग-अलग रंग-रूप देखोगे। बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जो तुम्हारी सोच से परे हो सकता है और अच्छे-बूरे रूप देखने को मिलेंगे। अभी तुम बढ़े हो गए हो, अब तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं है। अपने पैरो पर तुम खुद खड़े हो चुके हो, अच्छी नौकरी है तुम्हारी, मन लगाकर काम करना और अपनी मर्जी से ज़िन्दगी को जीना। अब बात-बात पर मुझसे बच्चों की तरह पूछना छोड़ दो और खुद से फैसले लेने की काबलियत बनाओ। तुम्हारे साथ हमारा आशिर्वाद है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।” प्रताप इन्हीं बातों को याद करके आश्चर्य में पड़ा है कि आखिर जब बाबा ने खुद अपने सारे फैसले लेने का हक दिया ही है तो फिर सविता के मामले में वह क्यों नहीं मान जाते है। कितना कुछ तो मैंने यहाँ आने के बाद किया लेकिन बाबा ने एक बार भी तो नहीं टोका। फिर आज वे हमें अपने आप से दूर क्यों किए हुए है?
प्रताप को याद आता है वह पल जब उसने पहली बार ऑफ़िस जॉयन किया था। सविता जिसे देखते ही प्रताप मुग्ध हो गया था। सविता बहुत खूबसूरत तो नहीं थी पर उसकी बातें किसी के भी दिल में जगह बनाने के लिए काफी थी। सविता का बाते, उसके काम, उसके कार्यशैली ने प्रताप को मोह लिया था। प्रताप सविता का असिसटेन्ट था, दस-दस घण्टे साथ काम करना पड़ता था। जब दो लोग साथ काम करते है तो एक-दूसरे की खूबियों और कमियों को अच्छी तरह जान लेते है। उससे भी अच्छी बात तब होती है जब सबकुछ जानने के बाद भी लोग एक-दूसरे को दोस्त या प्यार के रूप में स्वीकार करते है। सविता और प्रताप ऑफ़िस में एक अच्छे कॉलीग की तरह ही नहीं पेश आते थे बल्कि निजि ज़िन्दगी में भी अच्छे दोस्त ही बन गए थे। प्रताप मन-ही-मन सविता को चाहता था। प्रताप को वह पल याद आता है जब वह अपनी मन की बात सविता के जन्म दिन पर उसे खास अपनी तरफ से दि गयी छोटी सी दावत में उससे कहता है। सविता प्रताप की मन की बात अस्वीकार नहीं कर पाती है, क्योंकि सविता को प्रताप में सबसे अच्छी बात यही लगती है कि प्रताप सच में ही उससे प्यार करता था जो उस उसकी हर काम में या बातों में नज़र आती थी। और जब-जब सविता ने प्रताप को अपनी ज़रूरत के समय चाहा उसे सदा पाया भी। सविता को और क्या चाहिए था, जब कोई आपसे सच्चा प्यार करता हो और सदा आपके ज़रूरत में आपके पास हो तो किसी और चीज़ की क्या ज़रूरत है।
प्रताप को तमाम सारी बातें याद आती है। प्रताप अपनी मन की सारी बातें किसी अपने से कहना चाहता था। मगर इसी सोच में था कि किससे कहे ताकि उसके प्यार को एक सुन्दर अनजाम तक वह पहुँचा सके। आज तक उसने अपनी हर बात अपने बाबा से ही कही है। प्रताप बाबा से इस बारे में बात करना चाहता है लेकिन बाबा क्या सोचेंगे, शायद नहीं मानेंगे या मान भी सकते है। प्रताप इसी दुविधा में पड़ा है कि वह किससे कहे। “माँ से कहता हुँ। हाँ माँ यदि बाबा को मना ले तो सविता को अपनी जीवन संगीनी बनाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। हाँ ये हो सकता है।” प्रताप माँ को बताने की सोचता है तभी खयाल आता है कि माँ सविता के बारे में सुनने से उसे देखना जरूर चाहेंगी। “सविता को माँ से कैसे मिलवाऊ?”। “पर माँ से मिलाना भी तो ज़रूरी है, उनसे मंजूरी मिलेगी तभी तो बाबा को वह मना सकेंगी, लेकिन सविता के बारे में सुनकर माँ के खयाल बदल भी तो सकते है शायद उन्हें नौकरी करने वाली पसन्द न आए?”तभी प्रताप को सुमन याद आती है। छोटी बहन ही सही लेकिन मेरे हर राज़ को वह जानती है और माँ-बाबा से यथा सम्भव छुपा सकती है, “यस! सुमन को बताता हुँ, वही कुछ उपाय कर सकती है।” प्रताप सुमन को फोन करके अपने फ्लैट बुला लेता है। सुमन दिल्ली में वर्कींग व्हीमेन हॉस्टल में रहती थी और एक बी.पी.ओ में काम कर रही थी जो कि प्रताप के यहाँ से लगभग पचास की.मी दूर था।
सुमन के आते ही प्रताप उसे लेकर एक रेस्टरा में चल देता है। दोनों भाई-बहन में बाते होती है। सुमन को प्रताप और सविता के बारे में सारी बातें समझ में आ जाती है।
“भईया सविता मुझे अच्छी लगी। मॉर्डन है, सोफिस्टिकेटेड है और तुमसे प्यार भी करती है। तुम्हें उसी से शादी करनी चाहिए।”
“लेकिन माँ-बाबा का क्या? वे लोग सविता को एक्सेप्ट करेंगे? मुझे तो इसी बात की चिन्ता है। Oh God! What should I do?”
“तुम माँ-बाबा की चिन्ता मत करो। मैं उन्हें वक्त आने पर समझा लूंगी। पहले तुम सविता से शादी का फैसला फाइनल करलो।”
“हाँ,मैंने फैसला कर लिया है। मैं सविता से ही शादी करूंगा। उसके अलावा मैं और किसी का नहीं हो सकता।”
“Chill भईया। अब तुम सविता से पूछों वह क्या चाहती है। अगर उसका भी मन यही कहता है तो तुम दोनों जल्द-से-जल्द शादी करलो।”
“मैं कल सविता डेट पर ले जा रहा हुँ। उसे कल प्रपोज़ कर दूंगा। ये देखों मैंने उसके लिए रिंग खरीदी है।”
“वाव! Diamond ring! भईया आप तो बहुत ही रोमांटिक हो।”
“हट पागल।”
“ओके ब्रो। मैं अब चलती हुँ। आज रात मेरी शिफ्ट है। मुझे अभी देर हो रही है। मैं इतवार के दिन घर जा रही हुँ। तुम चिन्ता मत करना मैं बाबा से और माँ से बात कर लूंगी।”
“मैं तुम्हें हॉस्टल तक छोड़ देता हुँ। चलो।”
3
“माँ, बाबा। कहा है आप लोग? मैं कब से पुकार रही हुँ।”
“अरे सुमन! तु आ गयी बिट्टो। मेरी लाडली बेटी।” ( सुमन को बाबा अपने गले लगाते है और दोनों एक-दूसरे को स्नेह दृष्टि से देखते है।)
“कैसी है मेरी बच्ची। कितनी दुबली हो गयी हो तुम। हॉस्टल वाले मेरी लाडो को कुछ खिलाते-पिलाते नहीं है क्या?”
“ओफ ओ! बाबा मैं बिलकुल ठीक हुँ। इनफैक्ट आप बहुत कमजोर हो गए हो। Where is Mom?”
“तेरी माँ पड़ोस गयी है। आज शर्मा जी के यहाँ संगीत है शाम को। तेरी माँ वही गयी है मेहन्दी लगवाने।”
“तो क्या रिमझिम की शादी हो रही है?”
“हाँ बहुत ही अच्छा लड़का मिला है उसे। फॉरन में रहता है। अच्छी नौकरी है और लड़के वालों को रिमझिम पसन्द आ गयी।”
“वाव! देट्स ग्रेट।”
“अब लगता है तेरी भी जल्द से शादी कर देनी चाहिए। ताकि प्रताप के लिए भी लड़की ढूँढना शुरू करे तेरी माँ। जब से रिमझिम की शादी की खबर सुनी है वह भी दिन रात यही सपने देख रही है कि कब तुझे विदा करे।”
“बाबा! मैं आप सबको छोड़ कर कही जाने वाली नहीं हुँ।”
“अरे सुमन तु आ गयी बिटियाँ।”
“माँ! कैसी हो। वाव तुम्हारे हाथ में लगी महन्दी कितनी अच्छी लग रही है।”
“भगवान करे तेरे हाथों में जल्दी से महन्दी लग जाए तो प्रताप का भी लगन करवाऊँ।”
“मेरी बात छोड़ो माँ, मैं दादो के बारे में बहुत जरूरी बात करने आयी हुँ।”
“क्या बात करनी है।”
“पहले चलो तो कमरे में।”
4.
“सुनिए जी। सुमन प्रताप के बारे में कुछ कहना चाहती है।”
“क्या कहना चाहती है?”
“बाबा, भईया शादी करना चाहते है।”
“तो?”
“भईया ने लड़की भी पसन्द करली है।”
“क्या प्रताप ने लड़की पसन्द करली? और हमसे कहा तक नहीं।”
“देखिए नाराज़ मत होईए। एक बार लड़की देख लेते हैं क्या पता पसन्द आ जाए।”
“प्रताप को लड़कियों के बारे में क्या मालूम। बच्चा है अभी।”
“अगर बच्चा है तो फिर उसकी शादी करने की क्या ज़रूरत है।”
“देखो सुमन की माँ मुझसे फालतू बहस मत करो।”
“देखिए आखिर शादी के बाद प्रताप को ही तो अपनी पत्नी के साथ ज़िन्दगी भर साथ रहना है।”
“प्रताप के लिए सही लड़की कौन हो सकती है यह मैं जानता हुँ।”
“पर प्रताप उससे प्यार करता है।”
“जानता हुँ। लेकिन प्यार कर लेना ही सबकुछ नहीं होता। ज़िम्मेदारी नाम की भी कोई चीज होती है।”
“देखिए बहू आएगी तो ज़िम्मेदारी अपने-आप ही उठा सकेगी।”
“मैं कुछ नहीं जानता। अगर तुम तीनों ने मिलकर फैसला ले लिया है तो फिर रहने दो। मेरी इजाजत की क्या ज़रूरत है।”
“बाबा। Please मान जाईए ना।”
“सुमन!”
5.
टेबल पर लाल और सफेद गुलाब(सविता के पसन्द के) का गुलदस्ता, कुछ जलती मोबत्तियाँ और हाथ में हीरे की अंगूठी लिए प्रताप बेसब्री से सविता का इंतज़ार करता है। जैसे ही सविता आती है प्रताप उसे गले लगाकर स्वागत करता है। फिर हाथ पकड़कर उसे बिठाता है। सविता थोड़ी हैरान है क्योंकि आज से पहले प्रताप ने कभी ऐसी डेट नहीं अरेंज की। उसपर भी सविता प्रताप से नाराज़ थी क्योंकि प्रताप ने उससे कई दिन बात नहीं की थी(सविता को पता नहीं था कि प्रताप किस कश्मकश में था)। सविता की नाराज़गी से प्रताप और भी ज्यादा परेशान हो गया था। सोच रहा था कि क्या करके वह सविता के मनाए।
“प्रताप! तुम ठीक तो हो ना?”
“हाँ मेम बिलकुल ठीक हुँ।”
“मेम?”
“सविता!”
“क्या बात है साफ-साफ कहोगे या मैं जाऊ?”
“कुछ नहीं बस तुमसे कुछ बात कहनी है।”
“कहो क्या कहना है तुम्हें।”
“सविता आज तुम्हे जो मैंने सोम्स एण्ड सन्स की जो फाइल भेजी उसे तुमने ध्यान से पड़ा तो?”
“तुम मुझे डेट पर ऑफ़िस की फ़ाइलें पढ़वाने लाये हो।”
“नहीं सविता। एक्चुएली तुमसे बहुत ज़रूरी बात कहनी है।”
“तो कहो न।”
“सविता मैं जब यहाँ आया था तो तुम्हारा असिसटेंट था।”
“तो तुम तो अब भी मेरे जूनियर ही हो।”
“सविता मुझे फिर से प्रमोशन चाहिए।”
“तुम पागल हो गए हो क्या? डेट पर तुम अपनी गर्ल फ़्रेण्ड के साथ आए हो, किसी कम्पनी के सिनियर सुपरवाइज़र के साथ ऑफ़िश्यिल मीटिंग पर नहीं। ”
“सविता मेरी बात समझने की कोशिश करो।”
“क्या समझु?”
“सविता क्या तुम मेरी ज़िन्दगी भर के लिए सुपरवाइज़र और मैं तुम्हारा एसिसटेंट बनकर इस लाईफ़ में जी सकता हुँ।”
“क्या?”
“आइ मीन। चौबिस घण्टे, सात दिन, पता नहीं कितने साल लेकिन जब तक हम दोनों जीते है तब तक के लिए क क क्या त त तुम मेरी गर्ल फ़्रेण्ड के बजाए लीगल अम अम वाईफ़ और सुपरवाइज़र बनना चाहोगी। मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारी डाट खाने को त त तैयार हुँ। पील्ज़।”
(हंसकर)“प्रताप तुम पागल हो गए हो क्या, इतनी सी बात को इतने घुमा-फिराकर कहने की क्या ज़रूरत थी। तुम सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो।”
“तुम्हारे गुस्से से वाकिफ़ हुँ। इतने वक्त से साथ काम जो कर रहे हैं। तुम मुझपर नाराज़ थी।”
“ओह प्रताप! ओफ़कोर्स मैं तुमसे ही शादी करूंगी। मुझे भी अच्छा लगेगा अगर मेरी डाट कोई ज़िन्दगी भर खाने को तैयार है तो।”
प्रताप सविता को अंगूठी पहनाता है और फिर बाकी सारी बातें भी होती है। प्रताप की दुविधा सुनकर सविता उसे सीविल मेरिज की सलाह देती है। प्रताप को यह सलाह उचित मालूम होती है। तीस दिन बाद कोर्ट में सविता और प्रताप सीविल मेरिज के लिए आते हैं। गवाह के बतौर प्रताप सुमन और अपने सबसे अच्छे दोस्त निखिल को बुला लेता है और सविता अपनी दो सहेलियों के साथ आती है।
प्रताप के घर उसी दिन ये खबर पहुँच जाती है। प्रमिला मन-ही-मन एक द्वन्द्व में फंसी होती है। एक तरफ बेटे की शादी से खुश भी है और नयी बहू को देखने का उत्साह भी। साथ ही दुखी भी इसलिए की अपने बेटे की शादी में वह जो कुछ करना चाहती थी पारिवारिक झमेले और इस हड़बड़ी की शादी में नहीं हो पाता है। उधर प्रताप के पिता को यह रिश्ता किसलिए मंजूर नहीं था यह भी समझ में नहीं आता है। घर का माहौल इसी विषय से गर्म-गर्म सा हो जाता है। प्रमिला इसी द्वन्द्व में रहकर अपनी बहू के स्वागत की तैयारियाँ में लगी रहती है कि तभी प्रताप और सविता अपने दोस्तों के साथ घर में प्रवेश करते हैं। प्रमिला खुशी-खुशी हाथ में आरती की थाली लेते हुए आगे बढ़ती है। प्रताप के पिता अपने कमरे से यह दृश्य देख रहे होते है।
1
“आज इतने दिन हो गए है, सुमन के बाबा क्या तुम्हें उसकी याद नहीं आती?”
“याद तो आती है, पर क्या करू गुस्से में घर से निकाल दिया और अब उससे बात करते भी डर लगता है, पता नहीं वापस आएगा भी या नहीं?”
“देखिए! बेटा है वह आपका, आपकी बात ज़रूर मानेगा। एक बार कोशिश तो कीजिए।”
“देखो प्रताप की माँ मुझे तुम जोर न दिया करो। अगर उसे अपने माँ-बाप की कद्र है तो वह ज़रूर वापस लौटेगा और नहीं तो नहीं। लेकिन मेरा फैसला अटल है।”
“क्या हो गया है मेरे घर को? हे भगवान, एक तरफ बाप-बेटे लड़-झगड़कर अलग हो गए है और मैं अपने बच्चों से मिल नहीं पा रही। दोनों बाप-बेटे नहीं समझते कि मेरे लिए ये लोग कितने अनमोल है। दोनों की ज़िद के चलते मेरा घर उजड़ गया है।”
(गुस्से से)“मैंने नहीं कहा था प्रताप को कि वह शहर जाकर नौकरी के साथ-साथ उस लड़की से भी शादी कर ले। उसने अपनी ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला लिया और हमसे सलाह –मश्विरा करना भी उचित नहीं समझा। एक बार इन्डीपेन्डन्सी क्या दे दी वह अपनी हद को ही भूल गया। माँ-बाप के साथ ऐसा कोई करता है क्या?”
“तुम भी तो जिद्दी हो उसकी तरह। अगर उसने लड़की पसन्द की है तो ठीक ही की होगी। इतना भरोसा नहीं तुम्हें उसपर। आखिर उन्हें ही तो जीवन भर साथ रहना है। हमारा-तुम्हारा क्या है, आज है कल नहीं। पर वे तो जीते रहेंगे ना। क्यों दोनों को स्वीकार नहीं किया तुमने। घर से निकाल दिया उसे। सुमन भी इसी गम में चली गयी घर से। कहती है बाबा जब तक भैया को वापस नहीं बुलाते तब तक मैं भी न आऊंगी। भला ये भी कोई बात हुई। मेरी किसी को चिन्ता नहीं। मैं अभागन न बाप को ही समझा पाती हुँ न बच्चों के पास जा पाती हुँ। मुझे किस बात की सज़ा मिल रही है।”
“प्रमिला तुम शान्त रहो। अधिक उत्तेजित न हो। तुम्हारा बल्डप्रैशर हाई हो जाएगा। पिछले महिने ही तुम्हारी तबियत खराब हुई थी। चिन्ता मत करो मैं जल्द ही दोनों को वापस लाने का उपाय करता हुँ।”
“हे भगवान! क्या-क्या दिन देखने पड़ रहे है।”
2
प्रताप और सविता एक ही दफ्तर में काम करते है। दोनों ही अलग-अलग शहर से। प्रताप लखनऊ का रहने वाला है और सविता हिमाचल से है। प्रताप को आज लगभग चार बरस हो चुके है अपने परिवार से अलग हुए। प्रताप को आज भी वह दिन याद है जब वह घर से निकला था तो बाबा ने उससे कहा था कि “देखो बेटा! तुम अब बढ़े शहर जा रहे हो। वहाँ जाकर तुम ज़िन्दगी के अलग-अलग रंग-रूप देखोगे। बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जो तुम्हारी सोच से परे हो सकता है और अच्छे-बूरे रूप देखने को मिलेंगे। अभी तुम बढ़े हो गए हो, अब तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं है। अपने पैरो पर तुम खुद खड़े हो चुके हो, अच्छी नौकरी है तुम्हारी, मन लगाकर काम करना और अपनी मर्जी से ज़िन्दगी को जीना। अब बात-बात पर मुझसे बच्चों की तरह पूछना छोड़ दो और खुद से फैसले लेने की काबलियत बनाओ। तुम्हारे साथ हमारा आशिर्वाद है। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।” प्रताप इन्हीं बातों को याद करके आश्चर्य में पड़ा है कि आखिर जब बाबा ने खुद अपने सारे फैसले लेने का हक दिया ही है तो फिर सविता के मामले में वह क्यों नहीं मान जाते है। कितना कुछ तो मैंने यहाँ आने के बाद किया लेकिन बाबा ने एक बार भी तो नहीं टोका। फिर आज वे हमें अपने आप से दूर क्यों किए हुए है?
प्रताप को याद आता है वह पल जब उसने पहली बार ऑफ़िस जॉयन किया था। सविता जिसे देखते ही प्रताप मुग्ध हो गया था। सविता बहुत खूबसूरत तो नहीं थी पर उसकी बातें किसी के भी दिल में जगह बनाने के लिए काफी थी। सविता का बाते, उसके काम, उसके कार्यशैली ने प्रताप को मोह लिया था। प्रताप सविता का असिसटेन्ट था, दस-दस घण्टे साथ काम करना पड़ता था। जब दो लोग साथ काम करते है तो एक-दूसरे की खूबियों और कमियों को अच्छी तरह जान लेते है। उससे भी अच्छी बात तब होती है जब सबकुछ जानने के बाद भी लोग एक-दूसरे को दोस्त या प्यार के रूप में स्वीकार करते है। सविता और प्रताप ऑफ़िस में एक अच्छे कॉलीग की तरह ही नहीं पेश आते थे बल्कि निजि ज़िन्दगी में भी अच्छे दोस्त ही बन गए थे। प्रताप मन-ही-मन सविता को चाहता था। प्रताप को वह पल याद आता है जब वह अपनी मन की बात सविता के जन्म दिन पर उसे खास अपनी तरफ से दि गयी छोटी सी दावत में उससे कहता है। सविता प्रताप की मन की बात अस्वीकार नहीं कर पाती है, क्योंकि सविता को प्रताप में सबसे अच्छी बात यही लगती है कि प्रताप सच में ही उससे प्यार करता था जो उस उसकी हर काम में या बातों में नज़र आती थी। और जब-जब सविता ने प्रताप को अपनी ज़रूरत के समय चाहा उसे सदा पाया भी। सविता को और क्या चाहिए था, जब कोई आपसे सच्चा प्यार करता हो और सदा आपके ज़रूरत में आपके पास हो तो किसी और चीज़ की क्या ज़रूरत है।
प्रताप को तमाम सारी बातें याद आती है। प्रताप अपनी मन की सारी बातें किसी अपने से कहना चाहता था। मगर इसी सोच में था कि किससे कहे ताकि उसके प्यार को एक सुन्दर अनजाम तक वह पहुँचा सके। आज तक उसने अपनी हर बात अपने बाबा से ही कही है। प्रताप बाबा से इस बारे में बात करना चाहता है लेकिन बाबा क्या सोचेंगे, शायद नहीं मानेंगे या मान भी सकते है। प्रताप इसी दुविधा में पड़ा है कि वह किससे कहे। “माँ से कहता हुँ। हाँ माँ यदि बाबा को मना ले तो सविता को अपनी जीवन संगीनी बनाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। हाँ ये हो सकता है।” प्रताप माँ को बताने की सोचता है तभी खयाल आता है कि माँ सविता के बारे में सुनने से उसे देखना जरूर चाहेंगी। “सविता को माँ से कैसे मिलवाऊ?”। “पर माँ से मिलाना भी तो ज़रूरी है, उनसे मंजूरी मिलेगी तभी तो बाबा को वह मना सकेंगी, लेकिन सविता के बारे में सुनकर माँ के खयाल बदल भी तो सकते है शायद उन्हें नौकरी करने वाली पसन्द न आए?”तभी प्रताप को सुमन याद आती है। छोटी बहन ही सही लेकिन मेरे हर राज़ को वह जानती है और माँ-बाबा से यथा सम्भव छुपा सकती है, “यस! सुमन को बताता हुँ, वही कुछ उपाय कर सकती है।” प्रताप सुमन को फोन करके अपने फ्लैट बुला लेता है। सुमन दिल्ली में वर्कींग व्हीमेन हॉस्टल में रहती थी और एक बी.पी.ओ में काम कर रही थी जो कि प्रताप के यहाँ से लगभग पचास की.मी दूर था।
सुमन के आते ही प्रताप उसे लेकर एक रेस्टरा में चल देता है। दोनों भाई-बहन में बाते होती है। सुमन को प्रताप और सविता के बारे में सारी बातें समझ में आ जाती है।
“भईया सविता मुझे अच्छी लगी। मॉर्डन है, सोफिस्टिकेटेड है और तुमसे प्यार भी करती है। तुम्हें उसी से शादी करनी चाहिए।”
“लेकिन माँ-बाबा का क्या? वे लोग सविता को एक्सेप्ट करेंगे? मुझे तो इसी बात की चिन्ता है। Oh God! What should I do?”
“तुम माँ-बाबा की चिन्ता मत करो। मैं उन्हें वक्त आने पर समझा लूंगी। पहले तुम सविता से शादी का फैसला फाइनल करलो।”
“हाँ,मैंने फैसला कर लिया है। मैं सविता से ही शादी करूंगा। उसके अलावा मैं और किसी का नहीं हो सकता।”
“Chill भईया। अब तुम सविता से पूछों वह क्या चाहती है। अगर उसका भी मन यही कहता है तो तुम दोनों जल्द-से-जल्द शादी करलो।”
“मैं कल सविता डेट पर ले जा रहा हुँ। उसे कल प्रपोज़ कर दूंगा। ये देखों मैंने उसके लिए रिंग खरीदी है।”
“वाव! Diamond ring! भईया आप तो बहुत ही रोमांटिक हो।”
“हट पागल।”
“ओके ब्रो। मैं अब चलती हुँ। आज रात मेरी शिफ्ट है। मुझे अभी देर हो रही है। मैं इतवार के दिन घर जा रही हुँ। तुम चिन्ता मत करना मैं बाबा से और माँ से बात कर लूंगी।”
“मैं तुम्हें हॉस्टल तक छोड़ देता हुँ। चलो।”
3
“माँ, बाबा। कहा है आप लोग? मैं कब से पुकार रही हुँ।”
“अरे सुमन! तु आ गयी बिट्टो। मेरी लाडली बेटी।” ( सुमन को बाबा अपने गले लगाते है और दोनों एक-दूसरे को स्नेह दृष्टि से देखते है।)
“कैसी है मेरी बच्ची। कितनी दुबली हो गयी हो तुम। हॉस्टल वाले मेरी लाडो को कुछ खिलाते-पिलाते नहीं है क्या?”
“ओफ ओ! बाबा मैं बिलकुल ठीक हुँ। इनफैक्ट आप बहुत कमजोर हो गए हो। Where is Mom?”
“तेरी माँ पड़ोस गयी है। आज शर्मा जी के यहाँ संगीत है शाम को। तेरी माँ वही गयी है मेहन्दी लगवाने।”
“तो क्या रिमझिम की शादी हो रही है?”
“हाँ बहुत ही अच्छा लड़का मिला है उसे। फॉरन में रहता है। अच्छी नौकरी है और लड़के वालों को रिमझिम पसन्द आ गयी।”
“वाव! देट्स ग्रेट।”
“अब लगता है तेरी भी जल्द से शादी कर देनी चाहिए। ताकि प्रताप के लिए भी लड़की ढूँढना शुरू करे तेरी माँ। जब से रिमझिम की शादी की खबर सुनी है वह भी दिन रात यही सपने देख रही है कि कब तुझे विदा करे।”
“बाबा! मैं आप सबको छोड़ कर कही जाने वाली नहीं हुँ।”
“अरे सुमन तु आ गयी बिटियाँ।”
“माँ! कैसी हो। वाव तुम्हारे हाथ में लगी महन्दी कितनी अच्छी लग रही है।”
“भगवान करे तेरे हाथों में जल्दी से महन्दी लग जाए तो प्रताप का भी लगन करवाऊँ।”
“मेरी बात छोड़ो माँ, मैं दादो के बारे में बहुत जरूरी बात करने आयी हुँ।”
“क्या बात करनी है।”
“पहले चलो तो कमरे में।”
4.
“सुनिए जी। सुमन प्रताप के बारे में कुछ कहना चाहती है।”
“क्या कहना चाहती है?”
“बाबा, भईया शादी करना चाहते है।”
“तो?”
“भईया ने लड़की भी पसन्द करली है।”
“क्या प्रताप ने लड़की पसन्द करली? और हमसे कहा तक नहीं।”
“देखिए नाराज़ मत होईए। एक बार लड़की देख लेते हैं क्या पता पसन्द आ जाए।”
“प्रताप को लड़कियों के बारे में क्या मालूम। बच्चा है अभी।”
“अगर बच्चा है तो फिर उसकी शादी करने की क्या ज़रूरत है।”
“देखो सुमन की माँ मुझसे फालतू बहस मत करो।”
“देखिए आखिर शादी के बाद प्रताप को ही तो अपनी पत्नी के साथ ज़िन्दगी भर साथ रहना है।”
“प्रताप के लिए सही लड़की कौन हो सकती है यह मैं जानता हुँ।”
“पर प्रताप उससे प्यार करता है।”
“जानता हुँ। लेकिन प्यार कर लेना ही सबकुछ नहीं होता। ज़िम्मेदारी नाम की भी कोई चीज होती है।”
“देखिए बहू आएगी तो ज़िम्मेदारी अपने-आप ही उठा सकेगी।”
“मैं कुछ नहीं जानता। अगर तुम तीनों ने मिलकर फैसला ले लिया है तो फिर रहने दो। मेरी इजाजत की क्या ज़रूरत है।”
“बाबा। Please मान जाईए ना।”
“सुमन!”
5.
टेबल पर लाल और सफेद गुलाब(सविता के पसन्द के) का गुलदस्ता, कुछ जलती मोबत्तियाँ और हाथ में हीरे की अंगूठी लिए प्रताप बेसब्री से सविता का इंतज़ार करता है। जैसे ही सविता आती है प्रताप उसे गले लगाकर स्वागत करता है। फिर हाथ पकड़कर उसे बिठाता है। सविता थोड़ी हैरान है क्योंकि आज से पहले प्रताप ने कभी ऐसी डेट नहीं अरेंज की। उसपर भी सविता प्रताप से नाराज़ थी क्योंकि प्रताप ने उससे कई दिन बात नहीं की थी(सविता को पता नहीं था कि प्रताप किस कश्मकश में था)। सविता की नाराज़गी से प्रताप और भी ज्यादा परेशान हो गया था। सोच रहा था कि क्या करके वह सविता के मनाए।
“प्रताप! तुम ठीक तो हो ना?”
“हाँ मेम बिलकुल ठीक हुँ।”
“मेम?”
“सविता!”
“क्या बात है साफ-साफ कहोगे या मैं जाऊ?”
“कुछ नहीं बस तुमसे कुछ बात कहनी है।”
“कहो क्या कहना है तुम्हें।”
“सविता आज तुम्हे जो मैंने सोम्स एण्ड सन्स की जो फाइल भेजी उसे तुमने ध्यान से पड़ा तो?”
“तुम मुझे डेट पर ऑफ़िस की फ़ाइलें पढ़वाने लाये हो।”
“नहीं सविता। एक्चुएली तुमसे बहुत ज़रूरी बात कहनी है।”
“तो कहो न।”
“सविता मैं जब यहाँ आया था तो तुम्हारा असिसटेंट था।”
“तो तुम तो अब भी मेरे जूनियर ही हो।”
“सविता मुझे फिर से प्रमोशन चाहिए।”
“तुम पागल हो गए हो क्या? डेट पर तुम अपनी गर्ल फ़्रेण्ड के साथ आए हो, किसी कम्पनी के सिनियर सुपरवाइज़र के साथ ऑफ़िश्यिल मीटिंग पर नहीं। ”
“सविता मेरी बात समझने की कोशिश करो।”
“क्या समझु?”
“सविता क्या तुम मेरी ज़िन्दगी भर के लिए सुपरवाइज़र और मैं तुम्हारा एसिसटेंट बनकर इस लाईफ़ में जी सकता हुँ।”
“क्या?”
“आइ मीन। चौबिस घण्टे, सात दिन, पता नहीं कितने साल लेकिन जब तक हम दोनों जीते है तब तक के लिए क क क्या त त तुम मेरी गर्ल फ़्रेण्ड के बजाए लीगल अम अम वाईफ़ और सुपरवाइज़र बनना चाहोगी। मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारी डाट खाने को त त तैयार हुँ। पील्ज़।”
(हंसकर)“प्रताप तुम पागल हो गए हो क्या, इतनी सी बात को इतने घुमा-फिराकर कहने की क्या ज़रूरत थी। तुम सीधे-सीधे नहीं कह सकते कि तुम मुझसे शादी करना चाहते हो।”
“तुम्हारे गुस्से से वाकिफ़ हुँ। इतने वक्त से साथ काम जो कर रहे हैं। तुम मुझपर नाराज़ थी।”
“ओह प्रताप! ओफ़कोर्स मैं तुमसे ही शादी करूंगी। मुझे भी अच्छा लगेगा अगर मेरी डाट कोई ज़िन्दगी भर खाने को तैयार है तो।”
प्रताप सविता को अंगूठी पहनाता है और फिर बाकी सारी बातें भी होती है। प्रताप की दुविधा सुनकर सविता उसे सीविल मेरिज की सलाह देती है। प्रताप को यह सलाह उचित मालूम होती है। तीस दिन बाद कोर्ट में सविता और प्रताप सीविल मेरिज के लिए आते हैं। गवाह के बतौर प्रताप सुमन और अपने सबसे अच्छे दोस्त निखिल को बुला लेता है और सविता अपनी दो सहेलियों के साथ आती है।
प्रताप के घर उसी दिन ये खबर पहुँच जाती है। प्रमिला मन-ही-मन एक द्वन्द्व में फंसी होती है। एक तरफ बेटे की शादी से खुश भी है और नयी बहू को देखने का उत्साह भी। साथ ही दुखी भी इसलिए की अपने बेटे की शादी में वह जो कुछ करना चाहती थी पारिवारिक झमेले और इस हड़बड़ी की शादी में नहीं हो पाता है। उधर प्रताप के पिता को यह रिश्ता किसलिए मंजूर नहीं था यह भी समझ में नहीं आता है। घर का माहौल इसी विषय से गर्म-गर्म सा हो जाता है। प्रमिला इसी द्वन्द्व में रहकर अपनी बहू के स्वागत की तैयारियाँ में लगी रहती है कि तभी प्रताप और सविता अपने दोस्तों के साथ घर में प्रवेश करते हैं। प्रमिला खुशी-खुशी हाथ में आरती की थाली लेते हुए आगे बढ़ती है। प्रताप के पिता अपने कमरे से यह दृश्य देख रहे होते है।
मंगलवार, 15 नवंबर 2011
ज़िन्दगी........
खामोश नज़रों से ज़िन्दगी को देखा
ज़िन्दगी खामोशी से बीतती गयी
खामोशी का एहसास विराने में हुआ तो
खयाल आया क्यों बीत रही है खामोशी में ज़िन्दगी
महफिल का शोर ज़िन्दगी में लाके देखा
शोर मचता गया, मचता गया
दिल की आवाज़ भी न सुनायी दी तो
खयाल आया क्यों महफिल में गयी ज़िन्दगी
मन करता गया वही जो चाहा उसने
ज़िन्दगी चलती रही मन की राहों पर
मन चंचल हुआ, राह में मुश्किले हुई तो
खयाल आया क्यों मन के जंजाल में फंसी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी चलती जाती है अपने ही अंदाज़ में
ज़िन्दगी को जीने वाला जीता है अपने अंदाज़ में
ज़िन्दगी नहीं गुलाम किसी की, है मालिक वह
ज़िन्दगी प्यार, ज़िन्दगी सच्चाई,ज़िन्दगी तो बस है ज़िन्दगी।
ज़िन्दगी खामोशी से बीतती गयी
खामोशी का एहसास विराने में हुआ तो
खयाल आया क्यों बीत रही है खामोशी में ज़िन्दगी
महफिल का शोर ज़िन्दगी में लाके देखा
शोर मचता गया, मचता गया
दिल की आवाज़ भी न सुनायी दी तो
खयाल आया क्यों महफिल में गयी ज़िन्दगी
मन करता गया वही जो चाहा उसने
ज़िन्दगी चलती रही मन की राहों पर
मन चंचल हुआ, राह में मुश्किले हुई तो
खयाल आया क्यों मन के जंजाल में फंसी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी चलती जाती है अपने ही अंदाज़ में
ज़िन्दगी को जीने वाला जीता है अपने अंदाज़ में
ज़िन्दगी नहीं गुलाम किसी की, है मालिक वह
ज़िन्दगी प्यार, ज़िन्दगी सच्चाई,ज़िन्दगी तो बस है ज़िन्दगी।
सोमवार, 18 जुलाई 2011
बुल बुला.............
बुल बुला
शरत काल के रविवार की एक दोपहर टी.वी में अलग-अलग चैनेलों में पुरानी फिल्म, नाच-गाने के या मनोरंजन के सस्ते एपिसोड के रिविज़न, कही इन पर चर्चाएं और समाचार चैनेलों में एक-या-दो समाचार बुलेटिन के भाषांतर करके रिपिटेशन तथा हरेक मिनट के बाद दो-ढाइ मिनट के कॉमर्शियल ब्रेक से तंग आकर मिनाक्षी टीवी बन्द करके सोफे में लेट गयी थी। पास में एक डायरी पड़ी थी। कुछ ही दिन पहले पापा ने उसके पच्चीसवे जन्मदिन में उसे एक सुन्दर डायरी दी थी। वैसे तो पापा जन्मदिन में उसे आर्शिवाद के अलावा कोई उपहार देने की रुचि नहीं रखते। पर मिनाक्षी को कविता लिखने का बहुत शौक था और वह जब भी कोई कविता सोचती तो तुरंत ही किसी खाली कॉपी या पन्ने पर लिख डालती थी। संयोग से पापा ने उसकी लिखी दो-एक कविताएँ पढ़ ली और उन्हें काफी पसंद भी आयी। इसीलिए उन्होंने उसके पच्चीसवे जन्मदिन पर सुन्हरी जिल्द वाली एक डायरी लाकर उसे दी और कहा कि यदि तुम लिखने में रुचि रखती हो तो अपनी रचनाएँ व्यवस्थित रूप में लिखकर संजोकर रखो। क्या पता भविष्य में ये तुम्हारे ही किसी काम आ जाए। उसने कुछ कविता डायरी में उतार ली थी। वह डायरी के पन्ने पलटने लगी और किसी खयाल में खो गयी।
उस समय वह कॉलेज में पढ़ती थी। वे लोग अरुणाचल के सियांग जिले में रहते थे। उसके पिता वही एक स्कूल में अध्यापक थे। मिनाक्षी के दिन की शुरुआत पूजा के लिए फूल चुनने से होती थी। वह रोज फूल चुनती और पूजा घर में रखकर खुद तैयार होकर कॉलेज चली जाती थी। जिस रास्ते से होकर वह रोज़ गुज़रती वह एक पहाड़ी रास्ता था जिसके एक तरफ खाई नुमा था तो दूसरी तरफ ऊँचे ढलान जैसी जगह। उस जगह को किसी कारणवश फौजी की एक छावनी बिठायी गयी थी। रास्ते के बिलकुल नज़दीक एक बंकर और एक कैनटीन था। कैनटीन ऐसा बनाया गया था कि रास्ते से आने-जाने वाले लोगों को कैनटीन में बैठे लोग देख सकें लेकिन रास्ते के लोग आसानी से न देख सकते थे। मिनाक्षी का रोज़ यही से आना-जाना होता था क्योंकि ये रास्ता उसकी कॉलेज को सीधा जाता और शॉर्टकट था। कुछ अन्य स्थानीय लोग भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे। मिनाक्षी प्रतिदिन जब भी जाती तो उसे प्रायः आभास होता था कि कोई उसे बड़े गौर से देखता है। यहाँ तक कि जब वह आँखों से ओझल सी होने लगती तो उसका पीछा भी कोई करता है। मिनाक्षी इस घटना को अब-तक हज़म कर चुकी थी क्योंकि ये अब रोज़ की बात थी। उसे लगता था कि एक दिन रुककर वह उन आँखों की खबर ले, लेकिन कॉलेज जाना उसके ज्यादा ज़रूरी था। इसके अलावा उसके पास समय नहीं था। पर मिनाक्षी जानती थी एक-न-एक दिन वह इसका पता लगा ही लेगी। संयोग वश ऐसा प्रसंग आ पड़ा। एक शाम बहुत ही जोरो की बारिश और तुफान ने सियांग में कोहराम- सा मचा दिया था। रास्तों में जगह-जगह भू-स्खलन और पेड़ गिरने से आवा जाही पर तो असर पड़ा ही मिनाक्षी के कॉलेज जाने में भी मुश्किलें आ पड़ी। जिस रास्ते से वह रोज आना जाना करती थी उस रास्ते पर एक बड़ा-सा पेड़ आधा उखड़ कर झुक गया था और एक बिजली के खम्बे से लटक गया । फौजीयों ने जैसे-तैसे रास्तें को खाली किया, ताकि उनकी और बाकी लोगों की आवा-जाही बन्द न हो। लेकिन कुदरत जब कुछ ठानती है तो करके ही छोड़ती है। अब तक स्थिति सामान्य थी लेकिन सोमवार की शाम को फिर से तूफान और बारिश हुई। इस बार भू-स्खलन नहीं हुए न पेड़ गिरे, लेकिन फिर भी कही-कही कुछ ऐसी घटना हुई। जो पेड़ उस रास्ते में बिजली के खम्बे पर लटका था वह गिर गया। जहाँ से वह गिरा वहाँ एक गड्डा हो गया। अब उसमें पानी भरा हुआ था जिसमें बिजली के खुले तार के एक हिस्सा टूट कर गिर गया जा गिरा।
आज मिनाक्षी के इम्तेहान का रिज़ल्ट आना था। वह वही देखने जा रही थी। संयोग वश वही आँखें फिर से मिनाक्षी की तरफ मुड़ गयी और इस बार मिनाक्षी ने उसे देख लिया। ये आँखे बहुत नज़दीक थी और मोहनी इतनी कि मिनाक्षी भी खो गयी। पर पैर आगे बढ़ रहे थे। जैसे-तैसे मिनाक्षी ने संकोच से आँखें फेर ली लेकिन फेरते ही गड्डे के पानी में उसका पैर पड़ गया। एक चीख निकली और मिनाक्षी वही बेहोश हो जाती है। फिर क्या हुआ कुछ उसे पता नहीं।
मिनाक्षी को जब होश आता है तो वह अपने-आपको आर्मी होस्पिटल में पाती है। आँखें खोलते ही वह उन्हीं आँखों से मिलती है जो प्रतिदिन उसका पीछा करती थी। ये आँखें अब पूरी सूरत लिए हुए थी। एक आर्मी डॉक्टर की। नाम मेजर डॉ सुबोध मुखर्जी की थी। सुबोध रोज़ाना ही सुबह की शिफ्ट खत्म करके रास्ते के किनारे बने वेट-कैनटीन में साफ-सफाई और खाने-पीने की चीज़ों की गुणवत्ता की जांच करने आता था। यह उसकी ड्यूटी का एक हिस्सा था। वही रोज़ मिनाक्षी को देखा करता था। मिनाक्षी ने भी उसे कई बार देखा लेकिन ऊँचे ढलान के कारण ज्यादा स्पष्ट नहीं देख सकती थी।
“अब कैसा लग रहा है?”
“बहुत सर दर्द और अजीब सा लग रहा है।”
“हाँ! बहुत जोर का झटका लगा था तुम्हें और फिर तुम बेहोश हो गयी थी।”
“मैं कितनी देर से यहाँ हुँ?”
“ज्यादा नहीं आधे घण्टे से। मैंने तुम्हें दवा इन्जेक्ट करके दी थी उसके बाद तुम थोड़े देर ही होश में आ गयी।”
मिनाक्षी उठने की कोशिश करती है तो सुबोध उसे उठने नहीं देता है। वह उसके कन्धे पर अचानक ही हाथ रख देता है। मिनाक्षी एहसास होता है कि जैसे फिर से कोई बिजली उसके शरीर में चली गयी है। संयोग भी ऐसा कि कमरा खाली था। वहाँ जो पास में नर्स थी वह कही चली जाती है। मिनाक्षी के मन में कुछ सवाल उठ रहे होते है लेकिन वह संकोच में होती है। लेकिन कमरा खाली देख वह थोड़ी हिम्मत बांध सुबोध से पूछ बैठती है –आपसे एक सवाल पूछू, आप नाराज़ तो नहीं होंगे?
“नहीं।”
“आप ही है न जो रोज़ मुझे देखते रहते हैं और मेरा पीछा करते है?”
मेजर सुबोध अब स्वयं थोड़ा लज्जित अनुभव करता है। लेकिन भावनाएँ प्रबल हो तो मनुष्य से बहुत कुछ करवा ही लेता है। फिर इस सवाल का जवाब देना कौनसा मुश्किल था। वह जवाब देता है – जी हाँ।
“क्यों?”
“क्योंकि आप मुझे अच्छी लगती हैं। आपको देखते ही मैं अपने-आपको रोक नहीं सकता था।”
मिनाक्षी को जवाब सुनकर अब लज्जा महसूस हुई कि उसने ये सवाल क्यों पूछा। मिनाक्षी अब न तो सुबोध से आँखें मिला पा रही थी न ही उसे वहाँ ठहरना मंजूर हो रहा था। वह वहाँ से घर जाने के लिए कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में वह नर्स किसी दूसरे फौजी अफ्सर के साथ वहाँ आ पहुँचती है। ये अफ्सर छावनी का सबसे बड़ा अधिकारी था। उसने आते ही मेजर डॉ सुबोध से सवाल किया।
अफ्सर – मेजर! अब ये लड़की कैसी है।
मेजर सुबोध – बिलकुल ठीक है सर।
अफ्सर – वैसे कौन है ये लड़की, इसने कुछ बताया है अपने बारे मे?
मेजर सुबोध – नहीं सर। अभी ही बस होश में आयी है।
अफ्सर – क्या हुआ था इसे। मुझे बताया गया है कि इसे बिजली का झटका लगा था और आप इसे कैम्पस के अंदर ले आए है।
मेजर सुबोध – जी ये सच। ये लड़की हमारे कैन्टीन के सामने से गुजरने वाले रास्ते से जा रही थी। वहाँ एक गड्डे है जिसमें एक पेड़ और बिजली के नंगे तार गिरे हुए है। ये लड़की वही फंस गयी थी। अगर सामने मैं और कुछ जवानों ने नहीं देखा होता और इसकी चीख नहीं सुनी होती तो ये लड़की नहीं बचती सर। इसीलिए सर इसे बचाने के लिए मैंने ही इसे कैम्पस में लाने का हुक्म दिया। वैसे आपको रिपोर्ट करने के लिए मैंने अर्दली को भेजा था।
अफ्सर – इट्स ओके डॉक्टर। आपने इस लड़की की जान बचाकर बहुत अच्छा किया। गुड जॉब।
अफ्सर अब मिनाक्षी की तरह मुड़कर उससे सवाल पूछता है— कैसा लग रहा है बेटी? तुम कहा रहती हो और तुम्हारे पापा का नाम क्या है और वे क्या करते है? तुम्हारा नाम क्या है?
मिनाक्षी – जी मेरा नाम मिनाक्षी गांगुली है। मेरे पिताजी का नाम श्री सत्यजीत गांगुली है। वे यहाँ सियांग हाई स्कूल में मेथ्स के टीचर है। मैं यहाँ पास के शाइनी कॉलनी में रहती हुँ।
अफ्सर – तुम इस रास्ते से कहा जा रही थी, क्या तुम्हें पता नहीं कि यहाँ पर रास्ता कल रात से बन्द है?
मिनाक्षी – जी में डी-पी आर्ट्स एण्ड कॉमर्स कॉलेज में पढ़ती हुँ। मेरा रिज़ल्ट आज आउट हुआ है। मैं वही देखने जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि यहाँ रास्ता बन्द है।
अफ्सर – हूं। ठीक है। तुम घर जाना चाहती हो?
मिनाक्षी – जी।
अफ्सर – ठीक! जवान सूनो। इसे इसके घर तक छोड़ आओ। डॉक्टर आपने इसे दवाई दे दी है?
मेजर सुबोध – जी मैने प्रेस्किपशन लिख दिया है। (मिनाक्षी की तरफ मुड़कर) – आप ये दवाई वक्त पर ले लीजिएगा। और थोड़ा रेस्ट कीजिए क्योंकि आप बहुत कमज़ोर हैं।
मिनाक्षी घर पहुँचती है तो घर के लोग रिज़ल्ट जानने की उत्सुकता लिए बैठे थे। लेकिन सब कुछ जानने के बाद माँ मिनाक्षी को आराम करने कमरे में भेज देती है। उसके पापा जवान से पुछते है कि क्या हुआ। जवान उन्हें सब बता देता है। ईश्वर का धन्यवाद कर गांगुली साहब जवान को वापस भेज देते है। बाद में उन्हें फोन से मिनाक्षी का रिज़ल्ट पता चलता है कि वह अच्छे नम्बरो से पास हो चुकी है। मिनाक्षी हफ्ते भर के लिए कॉलेज जा नहीं पाती है। रास्ता भी बन्द था और वह खुद में भी कमज़ोर थी। लेकिन सबसे ज्यादा जिस बात ने उसे परेशान कर रखा था वह ये कि उसे क्या हुआ है। जब से मेजर सुबोध से वह मिली और उसकी बात सुनी उसे एक पल भी चैन नहीं मिला। शायद उसे भी मेजर सुबोध अच्छा लगने लगा था लेकिन ये बात वह कैसे उसे बताती, कैसे ये बात किसी से कहती। दोस्तों से बोलती तो वे लोग इस बात को गोसिप की तरह पूरे कॉलेज में फैला देते। उपाय से पहले ही बदनामी हाथ आ जाती। मिनाक्षी अपने माँ-पापा से सारी बातें शेयर करती थी। वह अपने माँ-पापा से भी ये बात कहना चाहती थी लेकिन संकोच ज्यादा हो रहा था। उससे भी ज्यादा मेजर सुबोध को भी कहना हो तो कैसे कह सकती थी। फौजी छावनी के भीतर जाने की मनाही थी और फौजीयों को भी सिविलियन्स से मिलना-जुलना मना था। किसी विशेष परिस्थिति में या आपात स्थिति में ही किसी सिविलियन्स की मदद या भेंट हो जाती थी वह अलग बात थी।
हफ्ते भर बाद मिनाक्षी स्वस्थ भी हो गयी और उस तरफ रास्ता भी खुला। मिनाक्षी आज फिर उसी रास्ते से कॉलेज जा रही थी। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग थी। वैसे तो ढलान के उस तरह छावनी में आम दिनों की तरह हलचल थी लेकिन आज कुछ ज्यादा थी। सबसे अजीब बात ये थी कि आज मेजर सुबोध वहाँ नहीं था। मिनाक्षी कुछ सोचते-सोचते कॉलेज चली गयी। जब वह फिर वही से लौटने लगी तो उसने देखा कि फौजी गाड़ियों की कतार है। शायद यहाँ से छावनी उठने वाली है। सभी अपने सामान और दूसरी चीज़ें गाड़ियों में लाद रहे है और गाड़ियाँ एक-एक कर रवाना हो गयी। एक छोटी जीप भी वहाँ से रवाना होती है जिसमें कुछ अफ्सरों के साथ मेजर सुबोध भी बैठा है। मिनाक्षी को देख सहज ही सुबोध की आँखें मिलती है और मुस्कुराती है। मिनाक्षी भी मुस्कुराती है। ये आखरी भेंट थी दोनों की। मिनाक्षी वही रास्तें पर खड़ी रही और सजल नेत्रों से मुस्कुराती रही और मेजर सुबोध उसे हाथ हिलाते हुए विदा लेता है और आँखों से ओझल हो जाता है।
धीरे-धीरे वह घर पहुँची। उस समय उसके मन में क्या चल रहा था आज इतना स्पष्ट रूप में उसे याद नहीं। पर इतना याद है कि वह बड़े मानसिक असमंजस में थी, शायद इसके बाद भी कुछ दिनों तक जो काल के प्रभाव से धीरे-धीरे फीका होता गया पर मिटा नहीं।
शरत काल के रविवार की एक दोपहर टी.वी में अलग-अलग चैनेलों में पुरानी फिल्म, नाच-गाने के या मनोरंजन के सस्ते एपिसोड के रिविज़न, कही इन पर चर्चाएं और समाचार चैनेलों में एक-या-दो समाचार बुलेटिन के भाषांतर करके रिपिटेशन तथा हरेक मिनट के बाद दो-ढाइ मिनट के कॉमर्शियल ब्रेक से तंग आकर मिनाक्षी टीवी बन्द करके सोफे में लेट गयी थी। पास में एक डायरी पड़ी थी। कुछ ही दिन पहले पापा ने उसके पच्चीसवे जन्मदिन में उसे एक सुन्दर डायरी दी थी। वैसे तो पापा जन्मदिन में उसे आर्शिवाद के अलावा कोई उपहार देने की रुचि नहीं रखते। पर मिनाक्षी को कविता लिखने का बहुत शौक था और वह जब भी कोई कविता सोचती तो तुरंत ही किसी खाली कॉपी या पन्ने पर लिख डालती थी। संयोग से पापा ने उसकी लिखी दो-एक कविताएँ पढ़ ली और उन्हें काफी पसंद भी आयी। इसीलिए उन्होंने उसके पच्चीसवे जन्मदिन पर सुन्हरी जिल्द वाली एक डायरी लाकर उसे दी और कहा कि यदि तुम लिखने में रुचि रखती हो तो अपनी रचनाएँ व्यवस्थित रूप में लिखकर संजोकर रखो। क्या पता भविष्य में ये तुम्हारे ही किसी काम आ जाए। उसने कुछ कविता डायरी में उतार ली थी। वह डायरी के पन्ने पलटने लगी और किसी खयाल में खो गयी।
उस समय वह कॉलेज में पढ़ती थी। वे लोग अरुणाचल के सियांग जिले में रहते थे। उसके पिता वही एक स्कूल में अध्यापक थे। मिनाक्षी के दिन की शुरुआत पूजा के लिए फूल चुनने से होती थी। वह रोज फूल चुनती और पूजा घर में रखकर खुद तैयार होकर कॉलेज चली जाती थी। जिस रास्ते से होकर वह रोज़ गुज़रती वह एक पहाड़ी रास्ता था जिसके एक तरफ खाई नुमा था तो दूसरी तरफ ऊँचे ढलान जैसी जगह। उस जगह को किसी कारणवश फौजी की एक छावनी बिठायी गयी थी। रास्ते के बिलकुल नज़दीक एक बंकर और एक कैनटीन था। कैनटीन ऐसा बनाया गया था कि रास्ते से आने-जाने वाले लोगों को कैनटीन में बैठे लोग देख सकें लेकिन रास्ते के लोग आसानी से न देख सकते थे। मिनाक्षी का रोज़ यही से आना-जाना होता था क्योंकि ये रास्ता उसकी कॉलेज को सीधा जाता और शॉर्टकट था। कुछ अन्य स्थानीय लोग भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे। मिनाक्षी प्रतिदिन जब भी जाती तो उसे प्रायः आभास होता था कि कोई उसे बड़े गौर से देखता है। यहाँ तक कि जब वह आँखों से ओझल सी होने लगती तो उसका पीछा भी कोई करता है। मिनाक्षी इस घटना को अब-तक हज़म कर चुकी थी क्योंकि ये अब रोज़ की बात थी। उसे लगता था कि एक दिन रुककर वह उन आँखों की खबर ले, लेकिन कॉलेज जाना उसके ज्यादा ज़रूरी था। इसके अलावा उसके पास समय नहीं था। पर मिनाक्षी जानती थी एक-न-एक दिन वह इसका पता लगा ही लेगी। संयोग वश ऐसा प्रसंग आ पड़ा। एक शाम बहुत ही जोरो की बारिश और तुफान ने सियांग में कोहराम- सा मचा दिया था। रास्तों में जगह-जगह भू-स्खलन और पेड़ गिरने से आवा जाही पर तो असर पड़ा ही मिनाक्षी के कॉलेज जाने में भी मुश्किलें आ पड़ी। जिस रास्ते से वह रोज आना जाना करती थी उस रास्ते पर एक बड़ा-सा पेड़ आधा उखड़ कर झुक गया था और एक बिजली के खम्बे से लटक गया । फौजीयों ने जैसे-तैसे रास्तें को खाली किया, ताकि उनकी और बाकी लोगों की आवा-जाही बन्द न हो। लेकिन कुदरत जब कुछ ठानती है तो करके ही छोड़ती है। अब तक स्थिति सामान्य थी लेकिन सोमवार की शाम को फिर से तूफान और बारिश हुई। इस बार भू-स्खलन नहीं हुए न पेड़ गिरे, लेकिन फिर भी कही-कही कुछ ऐसी घटना हुई। जो पेड़ उस रास्ते में बिजली के खम्बे पर लटका था वह गिर गया। जहाँ से वह गिरा वहाँ एक गड्डा हो गया। अब उसमें पानी भरा हुआ था जिसमें बिजली के खुले तार के एक हिस्सा टूट कर गिर गया जा गिरा।
आज मिनाक्षी के इम्तेहान का रिज़ल्ट आना था। वह वही देखने जा रही थी। संयोग वश वही आँखें फिर से मिनाक्षी की तरफ मुड़ गयी और इस बार मिनाक्षी ने उसे देख लिया। ये आँखे बहुत नज़दीक थी और मोहनी इतनी कि मिनाक्षी भी खो गयी। पर पैर आगे बढ़ रहे थे। जैसे-तैसे मिनाक्षी ने संकोच से आँखें फेर ली लेकिन फेरते ही गड्डे के पानी में उसका पैर पड़ गया। एक चीख निकली और मिनाक्षी वही बेहोश हो जाती है। फिर क्या हुआ कुछ उसे पता नहीं।
मिनाक्षी को जब होश आता है तो वह अपने-आपको आर्मी होस्पिटल में पाती है। आँखें खोलते ही वह उन्हीं आँखों से मिलती है जो प्रतिदिन उसका पीछा करती थी। ये आँखें अब पूरी सूरत लिए हुए थी। एक आर्मी डॉक्टर की। नाम मेजर डॉ सुबोध मुखर्जी की थी। सुबोध रोज़ाना ही सुबह की शिफ्ट खत्म करके रास्ते के किनारे बने वेट-कैनटीन में साफ-सफाई और खाने-पीने की चीज़ों की गुणवत्ता की जांच करने आता था। यह उसकी ड्यूटी का एक हिस्सा था। वही रोज़ मिनाक्षी को देखा करता था। मिनाक्षी ने भी उसे कई बार देखा लेकिन ऊँचे ढलान के कारण ज्यादा स्पष्ट नहीं देख सकती थी।
“अब कैसा लग रहा है?”
“बहुत सर दर्द और अजीब सा लग रहा है।”
“हाँ! बहुत जोर का झटका लगा था तुम्हें और फिर तुम बेहोश हो गयी थी।”
“मैं कितनी देर से यहाँ हुँ?”
“ज्यादा नहीं आधे घण्टे से। मैंने तुम्हें दवा इन्जेक्ट करके दी थी उसके बाद तुम थोड़े देर ही होश में आ गयी।”
मिनाक्षी उठने की कोशिश करती है तो सुबोध उसे उठने नहीं देता है। वह उसके कन्धे पर अचानक ही हाथ रख देता है। मिनाक्षी एहसास होता है कि जैसे फिर से कोई बिजली उसके शरीर में चली गयी है। संयोग भी ऐसा कि कमरा खाली था। वहाँ जो पास में नर्स थी वह कही चली जाती है। मिनाक्षी के मन में कुछ सवाल उठ रहे होते है लेकिन वह संकोच में होती है। लेकिन कमरा खाली देख वह थोड़ी हिम्मत बांध सुबोध से पूछ बैठती है –आपसे एक सवाल पूछू, आप नाराज़ तो नहीं होंगे?
“नहीं।”
“आप ही है न जो रोज़ मुझे देखते रहते हैं और मेरा पीछा करते है?”
मेजर सुबोध अब स्वयं थोड़ा लज्जित अनुभव करता है। लेकिन भावनाएँ प्रबल हो तो मनुष्य से बहुत कुछ करवा ही लेता है। फिर इस सवाल का जवाब देना कौनसा मुश्किल था। वह जवाब देता है – जी हाँ।
“क्यों?”
“क्योंकि आप मुझे अच्छी लगती हैं। आपको देखते ही मैं अपने-आपको रोक नहीं सकता था।”
मिनाक्षी को जवाब सुनकर अब लज्जा महसूस हुई कि उसने ये सवाल क्यों पूछा। मिनाक्षी अब न तो सुबोध से आँखें मिला पा रही थी न ही उसे वहाँ ठहरना मंजूर हो रहा था। वह वहाँ से घर जाने के लिए कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में वह नर्स किसी दूसरे फौजी अफ्सर के साथ वहाँ आ पहुँचती है। ये अफ्सर छावनी का सबसे बड़ा अधिकारी था। उसने आते ही मेजर डॉ सुबोध से सवाल किया।
अफ्सर – मेजर! अब ये लड़की कैसी है।
मेजर सुबोध – बिलकुल ठीक है सर।
अफ्सर – वैसे कौन है ये लड़की, इसने कुछ बताया है अपने बारे मे?
मेजर सुबोध – नहीं सर। अभी ही बस होश में आयी है।
अफ्सर – क्या हुआ था इसे। मुझे बताया गया है कि इसे बिजली का झटका लगा था और आप इसे कैम्पस के अंदर ले आए है।
मेजर सुबोध – जी ये सच। ये लड़की हमारे कैन्टीन के सामने से गुजरने वाले रास्ते से जा रही थी। वहाँ एक गड्डे है जिसमें एक पेड़ और बिजली के नंगे तार गिरे हुए है। ये लड़की वही फंस गयी थी। अगर सामने मैं और कुछ जवानों ने नहीं देखा होता और इसकी चीख नहीं सुनी होती तो ये लड़की नहीं बचती सर। इसीलिए सर इसे बचाने के लिए मैंने ही इसे कैम्पस में लाने का हुक्म दिया। वैसे आपको रिपोर्ट करने के लिए मैंने अर्दली को भेजा था।
अफ्सर – इट्स ओके डॉक्टर। आपने इस लड़की की जान बचाकर बहुत अच्छा किया। गुड जॉब।
अफ्सर अब मिनाक्षी की तरह मुड़कर उससे सवाल पूछता है— कैसा लग रहा है बेटी? तुम कहा रहती हो और तुम्हारे पापा का नाम क्या है और वे क्या करते है? तुम्हारा नाम क्या है?
मिनाक्षी – जी मेरा नाम मिनाक्षी गांगुली है। मेरे पिताजी का नाम श्री सत्यजीत गांगुली है। वे यहाँ सियांग हाई स्कूल में मेथ्स के टीचर है। मैं यहाँ पास के शाइनी कॉलनी में रहती हुँ।
अफ्सर – तुम इस रास्ते से कहा जा रही थी, क्या तुम्हें पता नहीं कि यहाँ पर रास्ता कल रात से बन्द है?
मिनाक्षी – जी में डी-पी आर्ट्स एण्ड कॉमर्स कॉलेज में पढ़ती हुँ। मेरा रिज़ल्ट आज आउट हुआ है। मैं वही देखने जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि यहाँ रास्ता बन्द है।
अफ्सर – हूं। ठीक है। तुम घर जाना चाहती हो?
मिनाक्षी – जी।
अफ्सर – ठीक! जवान सूनो। इसे इसके घर तक छोड़ आओ। डॉक्टर आपने इसे दवाई दे दी है?
मेजर सुबोध – जी मैने प्रेस्किपशन लिख दिया है। (मिनाक्षी की तरफ मुड़कर) – आप ये दवाई वक्त पर ले लीजिएगा। और थोड़ा रेस्ट कीजिए क्योंकि आप बहुत कमज़ोर हैं।
मिनाक्षी घर पहुँचती है तो घर के लोग रिज़ल्ट जानने की उत्सुकता लिए बैठे थे। लेकिन सब कुछ जानने के बाद माँ मिनाक्षी को आराम करने कमरे में भेज देती है। उसके पापा जवान से पुछते है कि क्या हुआ। जवान उन्हें सब बता देता है। ईश्वर का धन्यवाद कर गांगुली साहब जवान को वापस भेज देते है। बाद में उन्हें फोन से मिनाक्षी का रिज़ल्ट पता चलता है कि वह अच्छे नम्बरो से पास हो चुकी है। मिनाक्षी हफ्ते भर के लिए कॉलेज जा नहीं पाती है। रास्ता भी बन्द था और वह खुद में भी कमज़ोर थी। लेकिन सबसे ज्यादा जिस बात ने उसे परेशान कर रखा था वह ये कि उसे क्या हुआ है। जब से मेजर सुबोध से वह मिली और उसकी बात सुनी उसे एक पल भी चैन नहीं मिला। शायद उसे भी मेजर सुबोध अच्छा लगने लगा था लेकिन ये बात वह कैसे उसे बताती, कैसे ये बात किसी से कहती। दोस्तों से बोलती तो वे लोग इस बात को गोसिप की तरह पूरे कॉलेज में फैला देते। उपाय से पहले ही बदनामी हाथ आ जाती। मिनाक्षी अपने माँ-पापा से सारी बातें शेयर करती थी। वह अपने माँ-पापा से भी ये बात कहना चाहती थी लेकिन संकोच ज्यादा हो रहा था। उससे भी ज्यादा मेजर सुबोध को भी कहना हो तो कैसे कह सकती थी। फौजी छावनी के भीतर जाने की मनाही थी और फौजीयों को भी सिविलियन्स से मिलना-जुलना मना था। किसी विशेष परिस्थिति में या आपात स्थिति में ही किसी सिविलियन्स की मदद या भेंट हो जाती थी वह अलग बात थी।
हफ्ते भर बाद मिनाक्षी स्वस्थ भी हो गयी और उस तरफ रास्ता भी खुला। मिनाक्षी आज फिर उसी रास्ते से कॉलेज जा रही थी। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग थी। वैसे तो ढलान के उस तरह छावनी में आम दिनों की तरह हलचल थी लेकिन आज कुछ ज्यादा थी। सबसे अजीब बात ये थी कि आज मेजर सुबोध वहाँ नहीं था। मिनाक्षी कुछ सोचते-सोचते कॉलेज चली गयी। जब वह फिर वही से लौटने लगी तो उसने देखा कि फौजी गाड़ियों की कतार है। शायद यहाँ से छावनी उठने वाली है। सभी अपने सामान और दूसरी चीज़ें गाड़ियों में लाद रहे है और गाड़ियाँ एक-एक कर रवाना हो गयी। एक छोटी जीप भी वहाँ से रवाना होती है जिसमें कुछ अफ्सरों के साथ मेजर सुबोध भी बैठा है। मिनाक्षी को देख सहज ही सुबोध की आँखें मिलती है और मुस्कुराती है। मिनाक्षी भी मुस्कुराती है। ये आखरी भेंट थी दोनों की। मिनाक्षी वही रास्तें पर खड़ी रही और सजल नेत्रों से मुस्कुराती रही और मेजर सुबोध उसे हाथ हिलाते हुए विदा लेता है और आँखों से ओझल हो जाता है।
धीरे-धीरे वह घर पहुँची। उस समय उसके मन में क्या चल रहा था आज इतना स्पष्ट रूप में उसे याद नहीं। पर इतना याद है कि वह बड़े मानसिक असमंजस में थी, शायद इसके बाद भी कुछ दिनों तक जो काल के प्रभाव से धीरे-धीरे फीका होता गया पर मिटा नहीं।
शनिवार, 9 अप्रैल 2011
भ्रष्ट नेता और अफ्सर शाहो के नाम..............
मुझे अपनी बुराईयों की
इतनी आदत हो चुकी है
कि
एक भी छोड़ दू तो
जीना दुश्वार सा हो जाता है
भ्रष्टाचारी, ढोंगी जैसे नाम
अगर मेरे नाम से न जुड़े
तो
नाम ही बेकार सा लगता है।
प्रपंच, षड़्यंत्र और केवल राजनीति
थोड़ी सी बेकार कोशिशें
भ्रष्टाचार के खिलाफ
आम आदमी के आशाओं पर पानी फेरना
पत्रकारों के लिए बेकार बयानबाजी
यही है आज मेरी छवि
मै नेता हुँ
हाँ हाँ जनाब मैं नेता हुँ
और ये सब मैं न करू
तो नेतागिरि करना ही बकवास सा लगता है।
रिश्वत न लू अगर
बेईमानी न करू
अपनी ताकत का मनमाना इस्तेमाल न करू
तो
आई.ए.एस होने पर मुझे धिक्कार है
पढ़ाई-लिखाई इसीलिए तो की थी मैंने
विद्या पायी थी तो इसी के लिए
माँ-बाप ने इसीलिए दिया था आशीर्वाद मुझे
कि जा बेटा अफ्सरशाही कर अपनी तरह की
लूट जनता को
नहीं तो तू हमारा बेटा मेरा
हम भ्रष्टाचार और आतंकवाद
से लड़ने में सक्षम हो गए है
कथन है बस नाम के
बड़ी हस्तियों के
तभी तो भ्रष्टाचारी को जेल
आतंकी को फाँसी देने में
हो रही है देरी
पता नहीं कब मौका मिलेगा मुझे
कि मैं देश को ही खा जाऊँ
वरना
मेरे जन प्रतिनिधि होने पर ही धिक्कार है, धिक्कार है
इतनी आदत हो चुकी है
कि
एक भी छोड़ दू तो
जीना दुश्वार सा हो जाता है
भ्रष्टाचारी, ढोंगी जैसे नाम
अगर मेरे नाम से न जुड़े
तो
नाम ही बेकार सा लगता है।
प्रपंच, षड़्यंत्र और केवल राजनीति
थोड़ी सी बेकार कोशिशें
भ्रष्टाचार के खिलाफ
आम आदमी के आशाओं पर पानी फेरना
पत्रकारों के लिए बेकार बयानबाजी
यही है आज मेरी छवि
मै नेता हुँ
हाँ हाँ जनाब मैं नेता हुँ
और ये सब मैं न करू
तो नेतागिरि करना ही बकवास सा लगता है।
रिश्वत न लू अगर
बेईमानी न करू
अपनी ताकत का मनमाना इस्तेमाल न करू
तो
आई.ए.एस होने पर मुझे धिक्कार है
पढ़ाई-लिखाई इसीलिए तो की थी मैंने
विद्या पायी थी तो इसी के लिए
माँ-बाप ने इसीलिए दिया था आशीर्वाद मुझे
कि जा बेटा अफ्सरशाही कर अपनी तरह की
लूट जनता को
नहीं तो तू हमारा बेटा मेरा
हम भ्रष्टाचार और आतंकवाद
से लड़ने में सक्षम हो गए है
कथन है बस नाम के
बड़ी हस्तियों के
तभी तो भ्रष्टाचारी को जेल
आतंकी को फाँसी देने में
हो रही है देरी
पता नहीं कब मौका मिलेगा मुझे
कि मैं देश को ही खा जाऊँ
वरना
मेरे जन प्रतिनिधि होने पर ही धिक्कार है, धिक्कार है
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है.........
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है
कभी जंगल, कभी बस्तीयाँ,
कभी रोशनी के खम्बे, कभी सड़क पर चलती गाड़ियाँ।
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
जहाँ भी देखों
खिलौने सजे हैं
छोटे-छोटे घरोंदों में
ज़िन्दगी खेल रही है
बड़ी शिद्दत से सजा के रक्खी है
खुशियों ने अपनी महरबानियाँ
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कही बादल के गुच्छे से बनकर जा रही है
कही झाड़ियों में चिड़ियों का दल गा रहा है
कही कोई ज़िन्दगी ढो रहा है
कही सड़क को पटरी से अलग करती बेड़ियाँ
बड़ी फुर्सत में ज़िन्दगी नज़रानों से फ़िज़ा को भर रही है ।
रेल से सफ़र करते हुए
बोगियों की खिड़कियों से झांकते हुए देखा
तो लगा
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कभी जंगल, कभी बस्तीयाँ,
कभी रोशनी के खम्बे, कभी सड़क पर चलती गाड़ियाँ।
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
जहाँ भी देखों
खिलौने सजे हैं
छोटे-छोटे घरोंदों में
ज़िन्दगी खेल रही है
बड़ी शिद्दत से सजा के रक्खी है
खुशियों ने अपनी महरबानियाँ
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कही बादल के गुच्छे से बनकर जा रही है
कही झाड़ियों में चिड़ियों का दल गा रहा है
कही कोई ज़िन्दगी ढो रहा है
कही सड़क को पटरी से अलग करती बेड़ियाँ
बड़ी फुर्सत में ज़िन्दगी नज़रानों से फ़िज़ा को भर रही है ।
रेल से सफ़र करते हुए
बोगियों की खिड़कियों से झांकते हुए देखा
तो लगा
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
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