सोमवार, 30 अगस्त 2010

ऐसा क्यों होता है?

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
ज़िन्दगी में, कि हम चाहते है जो-कुछ नहीं मिलता
मिलता है जो हम नहीं चाहते
देता है वह जिससे हम चाहते है।

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
कि जब आप प्यार करते है किसी को
तो उस पर चाहे जितना भी विश्वास हो
शक होता है दूसरों की बातों से।

क्या तुमको पता है ऐसा क्यों होता है
कुछ पाने की चाहत में रास्ते सब सही है
पर फिर भी हार जाते है
गम में डूब जाते है।

क्या तुमको पता है जब कुछ अपना खो देते है तो
सांतवना देने वाले पर भी गुस्सा आता है
फिर भी उससे कुछ कह नहीं सकते
अपने दिल का दर्द कम नहीं कर सकते
और तब भी ऊपर वाला शांत बैठा सब कुछ देखता रहता है।


ऐसा क्यों होता है
क्या ये सब धोका है
सब क्या दिल को दुख देने का जरिया है।

ऐसा क्यों होता है
कि जिससे प्यार किया वही आपको
कहता है
तुमने प्यार में देरी कर दी
ऐसा क्यों होता है
कि आप उसे चाहे ज़िन्दगीभर और
वह भूल जाए आपको
अपनी नई ज़िन्दगी में आकर
कामयाबी की पहली झलक पाकर

ऐसा क्यों होता है
कि आगे बढ़ना चाहो भी तो
प्यार की यादें बढ़ने नहीं देती
प्यार रोक देता है हर कदम
प्यार थाम लेता है हाथ
प्यार दबा देता है आगे बढ़ने का फैसला
प्यार ही तोड़ देता है आगे बढ़ने का सपना

ऐसा क्यों होता है?

शनिवार, 7 अगस्त 2010

तेरे साथ

तेरे साथ चलती रही है मेरी यादें हर कही
अब साथी मेरे अलग रास्ते की गुँजाईश ही नहीं

प्यार करके छोड़ दे तुम्हें तन्हा
ऐसा हो सकता नहीं
मिलो तुम चाहे न मिलो
मेरी ऐसी कोई ख़्वाहिश भी नहीं

प्यार करने में अगर देरी की हमने
तो क्या हुआ?
लो अब कह देते है तुम्हें
सुन लो जरा

चलेगी ज़िन्दगी हमारी यू ही
तुम्हें याद करते-करते ही
प्यार मिले, मिले ना सही
तुमसे रिश्ता तोड़ेंगे नहीं।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मेरा चेहरा...........

मेरा चेहरा--
मेरा चेहरा विगड़ गया है
कुछ इस तरहा......
जैसे कोई घायल सड़क पर नीचे पड़ा है,
और उसे चारों ओर से लोगों ने घेर रखा है,
क्योंकि वह कोई चोर या मक्कार होगा,
जिसे झूठ बोलते या चोरी करते हुए रंगे हाखों पकड़ा हो।
उसके चेहरे पर से खून बह रहा है,
और हिसाब ले रहा है एक-एक कतरा झूठ बोलने की-चोरी करने की।
उसकी आँखें दहशत से चारों और देख रही है।
बार-बार माफी भी मांग रही है।
बहते आँसू बयान कर रहे,
"मुझसे गलती हो गई है, सच ये मैं मानता हुँ।"
"पर मजबूर था मैं।"
"मुझे माफ कर दो।"
उसका सर शर्म से झुका है।
वह अपना चेहरा छुपा रहा है।
पर दुनिया को होड़ लगी है उसके चेहरे को
देखने के लिए।
ताकि सबको पता चले वह कौन है।
मेरा चेहरा कुछ इस तरहा बिगड़ा है।

शुक्रवार, 4 जून 2010

सवाल नज़रों का...........

उसने मुझे
बड़े गौर से
एक बार देखा,
उसकी नज़रों में
कई सवाल थे,
मेरी नज़रे भी
सवालों से भरी थी,
उसकी नज़रों के सवालों
को जानना चाहती थी,
पर जवाब किसी के
पास नहीं था,
सवाल ये नज़रो का था।

मंगलवार, 4 मई 2010

मेरे भीतर का इन्सान की दूसरी कड़ी............

मेरे भीतर की लड़की
सपनें बहुत देखती है
कभी-कभी तो सपनों में खो जाती है
कभी-कभी सपनों से ही डर जाती है
मेरे भीतर की लड़की
कल्पना जगत की निवासिनी है।

मेरे भीतर की लड़की
कभी-कभी हालातों को देखकर
निश्चय करती है
"मैं अभी ये करूँगी, वो करूँगी"
"जब तक लक्ष्य पूरा न होगा"
"चैन से नहीं रहूंगी"
लक्ष्य पूरा होने के बाद क्या-क्या होगा
ये सोचते-सोचते कल्पना जगत में
फिर से खो जाती है
निश्चय किया था क्या?निर्णय लिया था क्या?
भूल जाती है।

मेरे भीतर की लड़की
सुख-दुख की साथ जीती है
दुख बीता है जो उसके साथ
सुख में होकर भी नहीं भूलती है
दुख को याद करके वह
सुख में भी दुखी हो जाती है।

मेरे भीतर की लड़की
जितना हँसती है उतना रोती भी है
पर देख नहीं सकती किसी का भी रोना
चाहे वह शत्रु भी क्यों हो ना
मेरे भीतर की लड़की
बस सारी दुनियाँ को हँसते हुए देखना चाहती है।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मेरे भीतर का इन्सान.........

मेरे भीतर का इन्सान
सागर के उन लहरों सी है
जो बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है

टकराती है क्या
बल्कि ढँढती है उस अधुरे इन्सान को
जिससे मिलकर मुझसी अधुरी इन्सान पूरी हो सके

पूरी कर सके
वह सारी अधुरी ख़्वाहिशें जो मैंने और उसने
देखे थे रात-भर अपनी-अपनी आँखों से
अपने-अपने कमरे में

मेरे भीतर का इन्सान
कभी-कभी तो उन्मत्त लहर बनकर
तट को ही नहीं बल्कि वहा खड़ी हर चीज को भीगों देती है
फिर देखने की कोशिश करती है
कि किसका वह सच्चा रूप है जो समाने लायक है
इस मन के सागर में

बार-बार वह यही करती है
ढूँढती है उसे जिसे दे सके प्यार का अंमृत जल
विश्वास और साथ का अथाह संसार
थक जाती है फिर भी वह यही करती है
बार-बार सपनों के साहिल से टकराती है.............

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

एक दिन......

एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है

सूर्योदय से दिन की शुरूआत
सूर्यास्त से दिन का अन्त
बस इतनी सी बात ही सबके सामने रह जाती है
पर ये एक दिन
कैसे बीत जाता है
ये बात अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूं ही बीत जाता है

एक दिन किसी को याद करने में बीतता है
एक दिन किसी के खयाल में बीतता है

एक दिन कोई काम की तलाश में बीतता है
एक दिन भूख को मिटाने में बीतता है

एक दिन सवालों के जवाब ढूंढने में बीतता है
एक दिन उलझनों को सुलझाने में बीतता है

एक दिन बिखरे चीजों को समेटने में बीतता है
एक दिन कुछ चीजों को, खयालों को, सपनों को सवारने में बीतता है
एक दिन सपनों को सच करने की चाह में बीतता है

फिर भी ये एक दिन यूं ही बीत जाता है
और ये बात किसी के सोच में नहीं आता है
एक दिन जो हमारे सामने से बीत जाता है।