बुल बुला
शरत काल के रविवार की एक दोपहर टी.वी में अलग-अलग चैनेलों में पुरानी फिल्म, नाच-गाने के या मनोरंजन के सस्ते एपिसोड के रिविज़न, कही इन पर चर्चाएं और समाचार चैनेलों में एक-या-दो समाचार बुलेटिन के भाषांतर करके रिपिटेशन तथा हरेक मिनट के बाद दो-ढाइ मिनट के कॉमर्शियल ब्रेक से तंग आकर मिनाक्षी टीवी बन्द करके सोफे में लेट गयी थी। पास में एक डायरी पड़ी थी। कुछ ही दिन पहले पापा ने उसके पच्चीसवे जन्मदिन में उसे एक सुन्दर डायरी दी थी। वैसे तो पापा जन्मदिन में उसे आर्शिवाद के अलावा कोई उपहार देने की रुचि नहीं रखते। पर मिनाक्षी को कविता लिखने का बहुत शौक था और वह जब भी कोई कविता सोचती तो तुरंत ही किसी खाली कॉपी या पन्ने पर लिख डालती थी। संयोग से पापा ने उसकी लिखी दो-एक कविताएँ पढ़ ली और उन्हें काफी पसंद भी आयी। इसीलिए उन्होंने उसके पच्चीसवे जन्मदिन पर सुन्हरी जिल्द वाली एक डायरी लाकर उसे दी और कहा कि यदि तुम लिखने में रुचि रखती हो तो अपनी रचनाएँ व्यवस्थित रूप में लिखकर संजोकर रखो। क्या पता भविष्य में ये तुम्हारे ही किसी काम आ जाए। उसने कुछ कविता डायरी में उतार ली थी। वह डायरी के पन्ने पलटने लगी और किसी खयाल में खो गयी।
उस समय वह कॉलेज में पढ़ती थी। वे लोग अरुणाचल के सियांग जिले में रहते थे। उसके पिता वही एक स्कूल में अध्यापक थे। मिनाक्षी के दिन की शुरुआत पूजा के लिए फूल चुनने से होती थी। वह रोज फूल चुनती और पूजा घर में रखकर खुद तैयार होकर कॉलेज चली जाती थी। जिस रास्ते से होकर वह रोज़ गुज़रती वह एक पहाड़ी रास्ता था जिसके एक तरफ खाई नुमा था तो दूसरी तरफ ऊँचे ढलान जैसी जगह। उस जगह को किसी कारणवश फौजी की एक छावनी बिठायी गयी थी। रास्ते के बिलकुल नज़दीक एक बंकर और एक कैनटीन था। कैनटीन ऐसा बनाया गया था कि रास्ते से आने-जाने वाले लोगों को कैनटीन में बैठे लोग देख सकें लेकिन रास्ते के लोग आसानी से न देख सकते थे। मिनाक्षी का रोज़ यही से आना-जाना होता था क्योंकि ये रास्ता उसकी कॉलेज को सीधा जाता और शॉर्टकट था। कुछ अन्य स्थानीय लोग भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे। मिनाक्षी प्रतिदिन जब भी जाती तो उसे प्रायः आभास होता था कि कोई उसे बड़े गौर से देखता है। यहाँ तक कि जब वह आँखों से ओझल सी होने लगती तो उसका पीछा भी कोई करता है। मिनाक्षी इस घटना को अब-तक हज़म कर चुकी थी क्योंकि ये अब रोज़ की बात थी। उसे लगता था कि एक दिन रुककर वह उन आँखों की खबर ले, लेकिन कॉलेज जाना उसके ज्यादा ज़रूरी था। इसके अलावा उसके पास समय नहीं था। पर मिनाक्षी जानती थी एक-न-एक दिन वह इसका पता लगा ही लेगी। संयोग वश ऐसा प्रसंग आ पड़ा। एक शाम बहुत ही जोरो की बारिश और तुफान ने सियांग में कोहराम- सा मचा दिया था। रास्तों में जगह-जगह भू-स्खलन और पेड़ गिरने से आवा जाही पर तो असर पड़ा ही मिनाक्षी के कॉलेज जाने में भी मुश्किलें आ पड़ी। जिस रास्ते से वह रोज आना जाना करती थी उस रास्ते पर एक बड़ा-सा पेड़ आधा उखड़ कर झुक गया था और एक बिजली के खम्बे से लटक गया । फौजीयों ने जैसे-तैसे रास्तें को खाली किया, ताकि उनकी और बाकी लोगों की आवा-जाही बन्द न हो। लेकिन कुदरत जब कुछ ठानती है तो करके ही छोड़ती है। अब तक स्थिति सामान्य थी लेकिन सोमवार की शाम को फिर से तूफान और बारिश हुई। इस बार भू-स्खलन नहीं हुए न पेड़ गिरे, लेकिन फिर भी कही-कही कुछ ऐसी घटना हुई। जो पेड़ उस रास्ते में बिजली के खम्बे पर लटका था वह गिर गया। जहाँ से वह गिरा वहाँ एक गड्डा हो गया। अब उसमें पानी भरा हुआ था जिसमें बिजली के खुले तार के एक हिस्सा टूट कर गिर गया जा गिरा।
आज मिनाक्षी के इम्तेहान का रिज़ल्ट आना था। वह वही देखने जा रही थी। संयोग वश वही आँखें फिर से मिनाक्षी की तरफ मुड़ गयी और इस बार मिनाक्षी ने उसे देख लिया। ये आँखे बहुत नज़दीक थी और मोहनी इतनी कि मिनाक्षी भी खो गयी। पर पैर आगे बढ़ रहे थे। जैसे-तैसे मिनाक्षी ने संकोच से आँखें फेर ली लेकिन फेरते ही गड्डे के पानी में उसका पैर पड़ गया। एक चीख निकली और मिनाक्षी वही बेहोश हो जाती है। फिर क्या हुआ कुछ उसे पता नहीं।
मिनाक्षी को जब होश आता है तो वह अपने-आपको आर्मी होस्पिटल में पाती है। आँखें खोलते ही वह उन्हीं आँखों से मिलती है जो प्रतिदिन उसका पीछा करती थी। ये आँखें अब पूरी सूरत लिए हुए थी। एक आर्मी डॉक्टर की। नाम मेजर डॉ सुबोध मुखर्जी की थी। सुबोध रोज़ाना ही सुबह की शिफ्ट खत्म करके रास्ते के किनारे बने वेट-कैनटीन में साफ-सफाई और खाने-पीने की चीज़ों की गुणवत्ता की जांच करने आता था। यह उसकी ड्यूटी का एक हिस्सा था। वही रोज़ मिनाक्षी को देखा करता था। मिनाक्षी ने भी उसे कई बार देखा लेकिन ऊँचे ढलान के कारण ज्यादा स्पष्ट नहीं देख सकती थी।
“अब कैसा लग रहा है?”
“बहुत सर दर्द और अजीब सा लग रहा है।”
“हाँ! बहुत जोर का झटका लगा था तुम्हें और फिर तुम बेहोश हो गयी थी।”
“मैं कितनी देर से यहाँ हुँ?”
“ज्यादा नहीं आधे घण्टे से। मैंने तुम्हें दवा इन्जेक्ट करके दी थी उसके बाद तुम थोड़े देर ही होश में आ गयी।”
मिनाक्षी उठने की कोशिश करती है तो सुबोध उसे उठने नहीं देता है। वह उसके कन्धे पर अचानक ही हाथ रख देता है। मिनाक्षी एहसास होता है कि जैसे फिर से कोई बिजली उसके शरीर में चली गयी है। संयोग भी ऐसा कि कमरा खाली था। वहाँ जो पास में नर्स थी वह कही चली जाती है। मिनाक्षी के मन में कुछ सवाल उठ रहे होते है लेकिन वह संकोच में होती है। लेकिन कमरा खाली देख वह थोड़ी हिम्मत बांध सुबोध से पूछ बैठती है –आपसे एक सवाल पूछू, आप नाराज़ तो नहीं होंगे?
“नहीं।”
“आप ही है न जो रोज़ मुझे देखते रहते हैं और मेरा पीछा करते है?”
मेजर सुबोध अब स्वयं थोड़ा लज्जित अनुभव करता है। लेकिन भावनाएँ प्रबल हो तो मनुष्य से बहुत कुछ करवा ही लेता है। फिर इस सवाल का जवाब देना कौनसा मुश्किल था। वह जवाब देता है – जी हाँ।
“क्यों?”
“क्योंकि आप मुझे अच्छी लगती हैं। आपको देखते ही मैं अपने-आपको रोक नहीं सकता था।”
मिनाक्षी को जवाब सुनकर अब लज्जा महसूस हुई कि उसने ये सवाल क्यों पूछा। मिनाक्षी अब न तो सुबोध से आँखें मिला पा रही थी न ही उसे वहाँ ठहरना मंजूर हो रहा था। वह वहाँ से घर जाने के लिए कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में वह नर्स किसी दूसरे फौजी अफ्सर के साथ वहाँ आ पहुँचती है। ये अफ्सर छावनी का सबसे बड़ा अधिकारी था। उसने आते ही मेजर डॉ सुबोध से सवाल किया।
अफ्सर – मेजर! अब ये लड़की कैसी है।
मेजर सुबोध – बिलकुल ठीक है सर।
अफ्सर – वैसे कौन है ये लड़की, इसने कुछ बताया है अपने बारे मे?
मेजर सुबोध – नहीं सर। अभी ही बस होश में आयी है।
अफ्सर – क्या हुआ था इसे। मुझे बताया गया है कि इसे बिजली का झटका लगा था और आप इसे कैम्पस के अंदर ले आए है।
मेजर सुबोध – जी ये सच। ये लड़की हमारे कैन्टीन के सामने से गुजरने वाले रास्ते से जा रही थी। वहाँ एक गड्डे है जिसमें एक पेड़ और बिजली के नंगे तार गिरे हुए है। ये लड़की वही फंस गयी थी। अगर सामने मैं और कुछ जवानों ने नहीं देखा होता और इसकी चीख नहीं सुनी होती तो ये लड़की नहीं बचती सर। इसीलिए सर इसे बचाने के लिए मैंने ही इसे कैम्पस में लाने का हुक्म दिया। वैसे आपको रिपोर्ट करने के लिए मैंने अर्दली को भेजा था।
अफ्सर – इट्स ओके डॉक्टर। आपने इस लड़की की जान बचाकर बहुत अच्छा किया। गुड जॉब।
अफ्सर अब मिनाक्षी की तरह मुड़कर उससे सवाल पूछता है— कैसा लग रहा है बेटी? तुम कहा रहती हो और तुम्हारे पापा का नाम क्या है और वे क्या करते है? तुम्हारा नाम क्या है?
मिनाक्षी – जी मेरा नाम मिनाक्षी गांगुली है। मेरे पिताजी का नाम श्री सत्यजीत गांगुली है। वे यहाँ सियांग हाई स्कूल में मेथ्स के टीचर है। मैं यहाँ पास के शाइनी कॉलनी में रहती हुँ।
अफ्सर – तुम इस रास्ते से कहा जा रही थी, क्या तुम्हें पता नहीं कि यहाँ पर रास्ता कल रात से बन्द है?
मिनाक्षी – जी में डी-पी आर्ट्स एण्ड कॉमर्स कॉलेज में पढ़ती हुँ। मेरा रिज़ल्ट आज आउट हुआ है। मैं वही देखने जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि यहाँ रास्ता बन्द है।
अफ्सर – हूं। ठीक है। तुम घर जाना चाहती हो?
मिनाक्षी – जी।
अफ्सर – ठीक! जवान सूनो। इसे इसके घर तक छोड़ आओ। डॉक्टर आपने इसे दवाई दे दी है?
मेजर सुबोध – जी मैने प्रेस्किपशन लिख दिया है। (मिनाक्षी की तरफ मुड़कर) – आप ये दवाई वक्त पर ले लीजिएगा। और थोड़ा रेस्ट कीजिए क्योंकि आप बहुत कमज़ोर हैं।
मिनाक्षी घर पहुँचती है तो घर के लोग रिज़ल्ट जानने की उत्सुकता लिए बैठे थे। लेकिन सब कुछ जानने के बाद माँ मिनाक्षी को आराम करने कमरे में भेज देती है। उसके पापा जवान से पुछते है कि क्या हुआ। जवान उन्हें सब बता देता है। ईश्वर का धन्यवाद कर गांगुली साहब जवान को वापस भेज देते है। बाद में उन्हें फोन से मिनाक्षी का रिज़ल्ट पता चलता है कि वह अच्छे नम्बरो से पास हो चुकी है। मिनाक्षी हफ्ते भर के लिए कॉलेज जा नहीं पाती है। रास्ता भी बन्द था और वह खुद में भी कमज़ोर थी। लेकिन सबसे ज्यादा जिस बात ने उसे परेशान कर रखा था वह ये कि उसे क्या हुआ है। जब से मेजर सुबोध से वह मिली और उसकी बात सुनी उसे एक पल भी चैन नहीं मिला। शायद उसे भी मेजर सुबोध अच्छा लगने लगा था लेकिन ये बात वह कैसे उसे बताती, कैसे ये बात किसी से कहती। दोस्तों से बोलती तो वे लोग इस बात को गोसिप की तरह पूरे कॉलेज में फैला देते। उपाय से पहले ही बदनामी हाथ आ जाती। मिनाक्षी अपने माँ-पापा से सारी बातें शेयर करती थी। वह अपने माँ-पापा से भी ये बात कहना चाहती थी लेकिन संकोच ज्यादा हो रहा था। उससे भी ज्यादा मेजर सुबोध को भी कहना हो तो कैसे कह सकती थी। फौजी छावनी के भीतर जाने की मनाही थी और फौजीयों को भी सिविलियन्स से मिलना-जुलना मना था। किसी विशेष परिस्थिति में या आपात स्थिति में ही किसी सिविलियन्स की मदद या भेंट हो जाती थी वह अलग बात थी।
हफ्ते भर बाद मिनाक्षी स्वस्थ भी हो गयी और उस तरफ रास्ता भी खुला। मिनाक्षी आज फिर उसी रास्ते से कॉलेज जा रही थी। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग थी। वैसे तो ढलान के उस तरह छावनी में आम दिनों की तरह हलचल थी लेकिन आज कुछ ज्यादा थी। सबसे अजीब बात ये थी कि आज मेजर सुबोध वहाँ नहीं था। मिनाक्षी कुछ सोचते-सोचते कॉलेज चली गयी। जब वह फिर वही से लौटने लगी तो उसने देखा कि फौजी गाड़ियों की कतार है। शायद यहाँ से छावनी उठने वाली है। सभी अपने सामान और दूसरी चीज़ें गाड़ियों में लाद रहे है और गाड़ियाँ एक-एक कर रवाना हो गयी। एक छोटी जीप भी वहाँ से रवाना होती है जिसमें कुछ अफ्सरों के साथ मेजर सुबोध भी बैठा है। मिनाक्षी को देख सहज ही सुबोध की आँखें मिलती है और मुस्कुराती है। मिनाक्षी भी मुस्कुराती है। ये आखरी भेंट थी दोनों की। मिनाक्षी वही रास्तें पर खड़ी रही और सजल नेत्रों से मुस्कुराती रही और मेजर सुबोध उसे हाथ हिलाते हुए विदा लेता है और आँखों से ओझल हो जाता है।
धीरे-धीरे वह घर पहुँची। उस समय उसके मन में क्या चल रहा था आज इतना स्पष्ट रूप में उसे याद नहीं। पर इतना याद है कि वह बड़े मानसिक असमंजस में थी, शायद इसके बाद भी कुछ दिनों तक जो काल के प्रभाव से धीरे-धीरे फीका होता गया पर मिटा नहीं।
सोमवार, 18 जुलाई 2011
शनिवार, 9 अप्रैल 2011
भ्रष्ट नेता और अफ्सर शाहो के नाम..............
मुझे अपनी बुराईयों की
इतनी आदत हो चुकी है
कि
एक भी छोड़ दू तो
जीना दुश्वार सा हो जाता है
भ्रष्टाचारी, ढोंगी जैसे नाम
अगर मेरे नाम से न जुड़े
तो
नाम ही बेकार सा लगता है।
प्रपंच, षड़्यंत्र और केवल राजनीति
थोड़ी सी बेकार कोशिशें
भ्रष्टाचार के खिलाफ
आम आदमी के आशाओं पर पानी फेरना
पत्रकारों के लिए बेकार बयानबाजी
यही है आज मेरी छवि
मै नेता हुँ
हाँ हाँ जनाब मैं नेता हुँ
और ये सब मैं न करू
तो नेतागिरि करना ही बकवास सा लगता है।
रिश्वत न लू अगर
बेईमानी न करू
अपनी ताकत का मनमाना इस्तेमाल न करू
तो
आई.ए.एस होने पर मुझे धिक्कार है
पढ़ाई-लिखाई इसीलिए तो की थी मैंने
विद्या पायी थी तो इसी के लिए
माँ-बाप ने इसीलिए दिया था आशीर्वाद मुझे
कि जा बेटा अफ्सरशाही कर अपनी तरह की
लूट जनता को
नहीं तो तू हमारा बेटा मेरा
हम भ्रष्टाचार और आतंकवाद
से लड़ने में सक्षम हो गए है
कथन है बस नाम के
बड़ी हस्तियों के
तभी तो भ्रष्टाचारी को जेल
आतंकी को फाँसी देने में
हो रही है देरी
पता नहीं कब मौका मिलेगा मुझे
कि मैं देश को ही खा जाऊँ
वरना
मेरे जन प्रतिनिधि होने पर ही धिक्कार है, धिक्कार है
इतनी आदत हो चुकी है
कि
एक भी छोड़ दू तो
जीना दुश्वार सा हो जाता है
भ्रष्टाचारी, ढोंगी जैसे नाम
अगर मेरे नाम से न जुड़े
तो
नाम ही बेकार सा लगता है।
प्रपंच, षड़्यंत्र और केवल राजनीति
थोड़ी सी बेकार कोशिशें
भ्रष्टाचार के खिलाफ
आम आदमी के आशाओं पर पानी फेरना
पत्रकारों के लिए बेकार बयानबाजी
यही है आज मेरी छवि
मै नेता हुँ
हाँ हाँ जनाब मैं नेता हुँ
और ये सब मैं न करू
तो नेतागिरि करना ही बकवास सा लगता है।
रिश्वत न लू अगर
बेईमानी न करू
अपनी ताकत का मनमाना इस्तेमाल न करू
तो
आई.ए.एस होने पर मुझे धिक्कार है
पढ़ाई-लिखाई इसीलिए तो की थी मैंने
विद्या पायी थी तो इसी के लिए
माँ-बाप ने इसीलिए दिया था आशीर्वाद मुझे
कि जा बेटा अफ्सरशाही कर अपनी तरह की
लूट जनता को
नहीं तो तू हमारा बेटा मेरा
हम भ्रष्टाचार और आतंकवाद
से लड़ने में सक्षम हो गए है
कथन है बस नाम के
बड़ी हस्तियों के
तभी तो भ्रष्टाचारी को जेल
आतंकी को फाँसी देने में
हो रही है देरी
पता नहीं कब मौका मिलेगा मुझे
कि मैं देश को ही खा जाऊँ
वरना
मेरे जन प्रतिनिधि होने पर ही धिक्कार है, धिक्कार है
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है.........
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है
कभी जंगल, कभी बस्तीयाँ,
कभी रोशनी के खम्बे, कभी सड़क पर चलती गाड़ियाँ।
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
जहाँ भी देखों
खिलौने सजे हैं
छोटे-छोटे घरोंदों में
ज़िन्दगी खेल रही है
बड़ी शिद्दत से सजा के रक्खी है
खुशियों ने अपनी महरबानियाँ
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कही बादल के गुच्छे से बनकर जा रही है
कही झाड़ियों में चिड़ियों का दल गा रहा है
कही कोई ज़िन्दगी ढो रहा है
कही सड़क को पटरी से अलग करती बेड़ियाँ
बड़ी फुर्सत में ज़िन्दगी नज़रानों से फ़िज़ा को भर रही है ।
रेल से सफ़र करते हुए
बोगियों की खिड़कियों से झांकते हुए देखा
तो लगा
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कभी जंगल, कभी बस्तीयाँ,
कभी रोशनी के खम्बे, कभी सड़क पर चलती गाड़ियाँ।
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
जहाँ भी देखों
खिलौने सजे हैं
छोटे-छोटे घरोंदों में
ज़िन्दगी खेल रही है
बड़ी शिद्दत से सजा के रक्खी है
खुशियों ने अपनी महरबानियाँ
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
कही बादल के गुच्छे से बनकर जा रही है
कही झाड़ियों में चिड़ियों का दल गा रहा है
कही कोई ज़िन्दगी ढो रहा है
कही सड़क को पटरी से अलग करती बेड़ियाँ
बड़ी फुर्सत में ज़िन्दगी नज़रानों से फ़िज़ा को भर रही है ।
रेल से सफ़र करते हुए
बोगियों की खिड़कियों से झांकते हुए देखा
तो लगा
बड़ी खूबसूरती से ज़िन्दगी बदलती जा रही है।
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
मेरे बाग के फूल..................
मेरे बाग के फूल
डाली से टूट भी जाए तो
मुरझाते नहीं है।
पँखुड़ी-पंखुड़ी अलग हो जाए
तो भी
खुशबू ही विखेरते हैं।
डाली से टूट भी जाए तो
मुरझाते नहीं है।
पँखुड़ी-पंखुड़ी अलग हो जाए
तो भी
खुशबू ही विखेरते हैं।
बुधवार, 17 नवंबर 2010
फासले दिल के बहुत हो गए................
फासले दिल के बहुत हो गए है
अब तन्हा-तन्हा रास्ता तय करना है
यादों के जंगल से निकलकर
नया सपनों का शहर देखना है
क्या होगा जो तुम नहीं हमसफ़र तो
थे हम कहा तुम्हारे ही साथ
है थोड़ा मुश्किल काम मगर
अकेले करके होगा सख़्त अपना ही हाथ
जीना भी सीख लेंगे अकेले
पर कभी नहीं पुकारेंगे तुम्हें
जो हमपर नहीं भरोसा था
तुमसे तो दूर रहने की उम्मीद करेंगे।
अब तन्हा-तन्हा रास्ता तय करना है
यादों के जंगल से निकलकर
नया सपनों का शहर देखना है
क्या होगा जो तुम नहीं हमसफ़र तो
थे हम कहा तुम्हारे ही साथ
है थोड़ा मुश्किल काम मगर
अकेले करके होगा सख़्त अपना ही हाथ
जीना भी सीख लेंगे अकेले
पर कभी नहीं पुकारेंगे तुम्हें
जो हमपर नहीं भरोसा था
तुमसे तो दूर रहने की उम्मीद करेंगे।
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
रंग जिन्दगी के...........
कैसे-कैसे रंग ज़िन्दगी के
आँखों में उतरते जाते है
कुछ रंग आखों को चमकाते है
कुछ तिरछे कर देते है
कुछ जुगनुओं की तरह
इधर-उधर पलकों को नचाते
कुछ विस्मय में डाल देते है
कुछ काजल धो देते है
तो कुछ सिर्फ थोड़ा गिला करते है
ज़िन्दगी के ये रंग आँखों में सदा रहते है
जब नहीं रहते तो अँधेरा कर देते है
मन में समाकर वो फिर सपना बनकर आँखों को जगाते रहते है
कैसे-कैसे करके ये रंग ज़िन्दगी के
आँखों में उतरते जाते है।
आँखों में उतरते जाते है
कुछ रंग आखों को चमकाते है
कुछ तिरछे कर देते है
कुछ जुगनुओं की तरह
इधर-उधर पलकों को नचाते
कुछ विस्मय में डाल देते है
कुछ काजल धो देते है
तो कुछ सिर्फ थोड़ा गिला करते है
ज़िन्दगी के ये रंग आँखों में सदा रहते है
जब नहीं रहते तो अँधेरा कर देते है
मन में समाकर वो फिर सपना बनकर आँखों को जगाते रहते है
कैसे-कैसे करके ये रंग ज़िन्दगी के
आँखों में उतरते जाते है।
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
प्रतिभा राय की स्त्री चेतना।
प्रतिभा राय की स्त्री चेतना द्रौपदी के सन्दर्भ में ।
‘द्रौपदी’ प्रतिभा राय जी की औपन्यासिक कृति है। इस उपन्यास में लेखिका प्रतिभा राय जी ने महाभारत की नायिका द्रौपदी को आधुनिक संदर्भ में देखा है। इसकी मूल कथा वस्तु महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत तथा उड़िया महाभारत है।
जब भी कोई रचनाकार किसी पौराणिक कथा को या पुराण को अपनी रचना के लिए चुनता है तो उसके सामने दोहरी समस्या आ जाती है। ये दोहरी समस्या है स्थापित सत्य की सुरक्षा तथा नयी चेतना की अभिव्यक्ति। इन दोनों बातों का ध्यान रखना रचनाकार के लिए आवश्यक होता है। परन्तु कभी-कभी अतिशय क्रान्तिकारी चेतना के चलते स्थापित सत्य को विध्वंस कर दिया जाता है। ‘द्रौपदी’ उपन्यास इसी प्रकार की रचना है जिसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी सम्बन्धी समस्त पारम्पारिक स्थापित सत्य को विध्वंस करते हुए नए आधुनिक दृष्टिकोण को स्थापित किया है। इसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के सम्बन्ध में जो पाँच पति वरण करने के कारण जो लोगों के मन में उसके प्रति घृणा भावना तथा उसके लिए जो उपहास्पाद भाव है उसे मिटाते हुए उसके सतीत्व एवं महानता को नए आयाम देते हुए स्थापित किया है।
द्रौपदी महाभारत ही नहीं, भारतीय जीवन तथा संस्कृति का एक अत्यन्त विलक्षण और महत्त्वपूर्ण चरित्र है – परन्तु साहित्य ने अब तक उसे प्रायः छुआ नहीं था।........कृष्ण समर्पित तथा पांच पांडवों को ब्याही द्रौपदी का जीवन अनेक दिशाओं में विभक्त है, फिर भी उसका व्यक्तित्व बंटता नहीं, टूटता नहीं, वह एक ऐसी इकाई के रूप में निरन्तर जीती है जो तत्कालीन घटनाचक्र को अनेक विशिष्ट आयाम देने में समर्थ है।1 (भूमिका) प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में द्रौपदी के जरिए नारी मन की वास्तविक पीड़ा, सुख-दुख और व्यक्तिगत अन्तर्सम्बन्धों की जटिलता आदि को गहराई से प्रस्तुत की है। इस उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने स्वयं द्रौपदी के दृष्टि से महाभारत के पहले से चले आ रहे कौरव-पाण्डव के युद्ध तथा द्रौपदी के प्रति सभी के द्वारा किए गए अन्याय को, महाभारत के बाद पंच पाण्डवों तथा द्रौपदी के महाप्रस्थान तक की सम्पूर्ण कथा को दर्शाया है। प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए अपनी स्त्री- चेतना को प्रस्तुत किया है।
प्रतिभा राय की स्त्री-चेतना द्रौपदी के संदर्भ में जो है उसको समझने के लिए हमें यह जान लेना आवश्यक है कि यह उपन्यास उन्होंने क्यों लिखा? वास्तव में प्रतिभा राय जी ने यह उपन्यास इसलिए लिखा था क्योंकि उनके किसी परिचित महिला की बहन जिसका नाम कृष्णा था जो अपने दुष्चरित शराबी पति के अत्याचार से पीड़ित हो अलग रह रही थी। उसने अपने आत्मीय जनों के कहने पर पुनर्विवाह किया। दूसरे विवाह के बाद वह सुखी थी। पर विडम्बना यह हुई कि उससे सहानुभूति रखने वालों ने ही कृष्णा के दुबारा विवाह करने के बाद कहते थे कि- वाह नाम ही जब कृष्णा है, दूसरा पति कर ही तो सुखी हो सकी। अरे, कभी कृष्णा ने पाँच पति वरण किये, फिर भी सन्तुष्ट न हो कर्ण एवं कृष्ण के प्रति अनुरक्त हुई।2 (पृ.सं. 262) इस बात पर प्रतिभा राय जी को दुख हुआ कि किस तरह लोग बिना मूल बात को जाने अपनी संस्कृति को अज्ञानवश निंदित करते रहते है। उनका इस बात पर कहना था कि – द्वापर की असामान्य विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण नारी कृष्णा के प्रति ऐसी विचार-शून्य बात मेरे दुख की जड़ में थी। यह किसी का व्यक्तिगत मत हो सकता है। पर हम कृष्णा को कितना जानते है? कितना ज्ञान है हमें महाभारत के महत्त्व और उस महान संस्कृति का? मूल संस्कृत या उसका भाषांतर, या सरला दास रचित उड़िया महाभारत को कितनों ने भली-भांति पढ़ा है? अंधे हाथी देखने बैठे हैं, उस तरह महाभारत की महान आख्यायिका खुद पढ़े बिना सुनी-सुनाई बात पर हम अपनी संस्कृति पर छींटाकशी कर बैठते हैं।3 (पृ.सं. 263)
सच ही है कि अँधों की तरह हम अपनी संस्कृति के सत्य को ही बिना जाने कुछ न कुछ कहते रहते है। इस उपन्यास को लिखते समय प्रतिभा राय जी ने यह बात ध्यान में रखा कि हमें हमारी संस्कृति, परम्परा तथा इस महाभारत के मूल बातों तथा रहस्यों को उजागर किया जाए जिससे की यह सिद्ध हो सके कि द्रौपदी सचमूच में ही महा सती स्त्री थी कुछ और नहीं। जो कुछ उसके जीवन में हुआ विशेषकर उसके विवाह के समय उससे वह कम आहत नहीं हुई थी। बल्कि अपने जीवन में घटे इस अस्वभाविक घटना ने उसे स्तभ्ध कर दिया था। वह भी उस काल में जब किसी स्त्री के लिए एक ही पति का विधान था। जहाँ स्त्री को अपने पति, चाहे जैसा भी हो, उसके अलावा किसी अन्य का ध्यान भी मन में लाना पाप है। वह काल जिसमें स्वयं नारी ने ही इस विधान को रचा और इसकी गरीमा बनाए रखने के लिए अपने प्राण की भी परवा न की हो। ऐसे काल में एक नारी को किसी स्वयंवर में जीत कर ले जाने के बाद उसे अपनी माँ के सामने एक उत्तम दुर्लभ वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना तथा माँ के द्वारा उसे सभी भाईयों में बराबर-बराबर हिस्से बांट लेना उस नारी के प्रति अमानवीय एवं लज्जास्पद व्यवहार था।यह व्यवहार भी किसने किया स्वयं युधिष्ठिर ने जो उस समय द्रौपदी के पति के सबसे बड़े भाई थे। स्वयं युधिष्ठिर जिसे पूरा संसार धर्मराज के नाम से अभिहित करता है क्या उनका द्रौपदी को इस प्रकार से अपनी माँ के सामने सम्बोधित करना उचित था। यह तो सबसे बड़े दुख की बात है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही स्वयं द्रौपदी के रूप लावण्य के देख कर उसे उचित सम्मान न देते हुए केवल वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर रहा है जो कि एक अन्याय है। जिस नारी के साथ यह अन्याय हुआ वह और कोई नहीं द्रौपदी थी जो यज्ञ से उत्पन्न हुई थी एक अत्यन्त तेजस्विनी नारी थी। जिसकी सुन्दरता की कोई परिभाषा नहीं थी। जो इतनी विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण, शीलवती नारी थी। जिसके साथ सबसे प्रथम अन्याय पाण्डवों ने किया था। यह अन्याय पाण्डवों द्वारा अनजाने में हुआ या विधी का यह विधान था इस पर कोई भी विचार नहीं किया जा सकता। परन्तु इसमें आहत द्रौपदी ही हुई ।फिर भी इतिहास के इस विशेष सत्य को जाने बगेर या जानकर भी अनजाने बनकर आज भी समाज द्रौपदी के प्रति विचार-शून्य बातें करता है। उसे तरह-तरह से अपमानित किया जाता है। उसके पाँच-पाण्डवों के साथ हुए विवाह को हास्यास्पद तरीके से देखा-दिखाया जाता है और उन सबके जीवन पर व्यंग्य किया जाता है। प्रतिभा राय जी ने इन्हीं बातों का ध्यान रखकर द्रौपदी उपन्यास की रचना की है।
प्रतिभा राय जी की स्त्री चेतना कितनी प्रबल और स्वस्थ है यह इस बात से पता चलता है कि उन्होंने स्वयं को द्रौपदी की भांति भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया और स्वयं को पूरी तरह से द्रौपदी के स्थान पर ला खड़ा किया। उन्होंने द्रौपदी को अपने में आत्मसात कर द्रौपदी के सम्पूर्ण जीवन के घटना चक्र तथा उसकी मानसिक पीड़ा, दुख-सुख आदि का वर्णन किया।
उपन्यास के प्रारम्भ में ही प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के मन की व्यथा को प्रस्तुत किया। पाण्डवों के महाप्रस्थान के समय जब सभी हिमालय के रास्ते स्वर्ग जा रहे थे तब अचानक द्रौपदी का पाव फिसल जाता है और वह गिर जाती है। तब भीम उसकी सहायता के लिए आगे आता है पर युधिष्ठिर उसे द्रौपदी की सहायता करने से मना कर देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि --- कितना झूठ है यह पति-पत्नी का सम्बन्ध!स्नेह, प्रेम,त्याग और उत्सर्ग! अपने कर्म अगर आदमी स्वयं भोगता है, तो पिर युधिष्ठिर के धर्म की रक्षा के लिए पाँच पतियों के चरणों में अर्पित होकर सारी दुनिया का उपहास, व्यंग-विद्रुप और निंदा-अपवाद ढोती क्यों फिरी?4 (पृ.सं.8) यह प्रश्न द्रौपदी का नहीं बल्कि आज तक पति के कारण दुख भोगती आयी उस प्रत्येक नारी का है जिसमें पति ने कुछ कर्म किया पर लांछन पत्नी पर लगा। द्रौपदी पाँच पाण्डवों की पत्नी थी। पाँचों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे, अपने जुआ खेलने की आदत में तो वह अपना राज्य गंवा बैठे, परन्तु क्या अधिकार था युधिष्ठिर को द्रौपदी को जुए में दाव पर लगाने का। पत्नी कोई राज्य या सम्पत्ति तो नहीं जिसे जैसे चाहे कोई इस्तेमाल करे। परन्तु यही बात यह पुरूष समाज नहीं समझ सका, न ही युधिष्ठिर और कर बैठता है अपनी पत्नी का अपमान। द्रौपदी को कौरव सभा में अपमानित किया दोनों ने ही। वास्तव में देखा जाए तो युधिष्ठिर ने कभी भी द्रौपदी को स्त्री के रूप में नहीं देखा, देखा तो सिर्फ वस्तु के रूप में। विवाह के प्रथम रात्री में वह द्रौपदी से कहते हैं पुरूष की प्रकृति से तुम परिचित नहीं। अपने प्रिय पदार्थ पर किसी अन्य का अधिकार वह सह नहीं सकता। तुम तो वैसे ही पाँचों की प्रियतमा हो। हम में से कोई तुम्हें पल भर भी अपने निकट से अंतर करना नहीं चाहेगा। किसी को ज़रा-सी भी उपेक्षा सहन नहीं होगी। तब अवस्था क्या होगी? ( पृ.सं. 52)5 । यह बात युधिष्ठिर ने द्रौपदी से तब कही जब द्रौपदी ने सबके कहने पर पँच-पति वरण कर युधिष्ठिर से विवाह किया और उससे कहा कि वह उनकी बात मानेगी और सब कुछ ठीक होगा क्योंकि बाकि सभी भाई जो उसके पति होंगे वह सब युधिष्ठिर के आज्ञा का पालन करेंगे। यब युधिष्ठिर अपने भाईयों का स्वभाव जानते थे और द्रौपदी की दुविधा को भी समझते थे तो उन्होंने ऐसा किया ही क्यों, क्यों उन्होंने द्रौपदी को इस प्रकार के अस्वभाविक रिश्ते में जकड़ा। फिर भी युधिष्ठिर की तुच्छ सोच को देखो वह तब भी द्रौपदी को पदार्थ या वस्तु ही बता रहे है। जबकि द्रौपदी एक मनुष्य है जीवित हाड़-मांस की जिसमें चेतना है, भावना है। वह कोई वस्तु कैसे हो सकती है। प्रतिभा राय जी ने न केवल द्रौपदी के इस दुख को ही उजागर किया है बल्कि द्रौपदी को संसार की पंच सती नारी में स्थान देने पर द्रौपदी के मन से निकले दुख और व्यंग्य को भी उजागर किया है। यह इसलिए क्योंकि भले ही वह पंच सतियों में से एक है पर फिर भी संसार उसका उपहास करता न की आदर। इसी कारण वह यह कहते हुए दुखी हो जाती है कि—कहते है मेरा नाम पंच सती में गिना जाएगा। उसे देख कलियुग के नर-नारी विद्रुप कर हँसेंगे। कहेंगे पंचपति वरण कर द्रौपदी अगर सती हो सकी, तो फिर एक पतिव्रतपालन की क्या आवश्यकता? बहुपति वरण कर वे कलियुग में सती क्यों नहीं होंगी? यौन विकारग्रस्त कलियुग के उच्छृंखल नर-नारियों के बीच द्रौपदी होगी व्यंग्य-परिहास का उपादान। पांच पतियों की पत्नी द्रौपदी को सतीत्व के लिए तिल-तिल जलना पड़ा होगा, इसे ये लोग भला कैसे समझेंगे? तब तो हस्तिनापुर की नायिका द्रौपदी एक निंदित आत्मा, कलंक भरी कहानी की नायिका बन जायेगी।6 (पृ.सं. 8) यह बात सच भी हुई। कलयुग में आज द्रौपदी उपहास की पात्र बन गयी है।
पर प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में एक प्रसंग में यह भी दिखाया कि जब द्रौपदी विवाह के पश्चात् प्रथम बार अपने गार्हस्थ जीवन का प्रारम्भ करती है तब उस कृष्ण-युधिष्ठिर की बात से ज्ञात होता है कि बहुपति वरण करना स्त्री के लिए लज्जा जनक बात है तो उसके अंदर से यज्ञ-अनल में संभूत याज्ञसेनी विद्रोह कर उठती है और सोचने लगती है कि देवलोक के विधान अनुसार एक पुरूष अनेक स्त्रियाँ ग्रहण कर सकता है पर स्त्री एक से अधिक पति वरण करने पर पापिनी कहलाएगी। साथी ही सबसे आश्यर्च की बात है कि यही बात जब उसके द्वारा तथा उसे परिवार द्वारा कही जा रही थी तब सभी ने इस बात को नहीं माना। जो युधिष्ठिर आज द्रौपदी के पाँच पति वरण करने को लेकर उसे पापिनी समझ रहा है तब स्वयं द्रौपदी के इस विवाह से इन्कार करने पर देवलोक एवं गन्धर्व लोक के उदाहरण देकर यह विवाह कर रहा था। तब उसने यह क्यों नहीं सोचा कि वह तो स्वयं ही एक स्त्री को एक पाप करने के लिए विवश कर रहा है। स्वयं एक धर्मात्मा होते हुए भी एक स्त्री से अधर्म करवा रहा है। द्रौपदी यह बात समझ गयी थी कि इस पुरूष प्रधान समाज के द्वारा बनाया गया नियम है तभी वह स्त्री-पुरूष में पाप-पूण्य का भेद इस प्रकार से करते है। जब चाहे अपनी सुविधा के अनुसार एवं अपने सुख के लिए पाप और पुण्य का निश्चित विधान बना डाला और स्त्रियों को तुच्छ वस्तु के समान मान कर उसका जैसे चाहे प्रयोग करते रहे। इस पुरूष प्रधान समाज ने स्त्री को कभी मनुष्य का दर्जा नहीं दिया। इस प्रसंग पर प्रतिभा राय जी के विचार द्रौपदी के जरिए इस प्रकार आते है—वास्तव में पंचपति वरण समग्र नारी जाति के लिए एक आहवान था। एक साथ अनेक पुरूष वरण कर भी किसी नारी के चरित्र की शुद्धता अमलिन रह सकती है, मानो यह प्रमाण करने का स्वर्ण अवसर है।7 (पृ.सं. 66) सत्य ही है कि द्रौपदी का चरित्र शुद्ध था। फिर यह कोई साधारण बात नहीं थी किसी स्त्री के लिए कि वह एक साथ बहुपति वरण कर वैवाहिक जीवन को निभा सके। द्रौपदी के चरित्र की शुद्धता इस बात से भी सिद्ध होती है कि कभी भी पंच-पाण्डवों में से किसी ने भी स्वयं द्रौपदी पर किसी भी प्रकार से संदेह नहीं किया न ही उसके किसी बात की अवहेलना की हो। सभी ने द्रौपदी को प्रेम ही किया है। वास्तव में एक स्त्री जब एक पुरूष के साथ रहती है तो स्वाभाविक रूप से उसके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध जोड़ती है। फिर वह चाहे पिता हो, भाई हो या पति। सबके साथ उसकी भावनाएं जुड़ी होती है तथा वह अपने हर रूप में पुरूष को संस्कारित ही करती है। पंच-पाण्डवों के बीच रहकर द्रौपदी ने पंच-पाण्डवों के लिए केन्द्रीय शक्ती के रूप में रही तभी पाण्डव महाभारत का युद्ध जीत पाए थे। केवल ईश्वर के साथ होने से ही नहीं बल्कि ये द्रौपदी का सतीत्व ही था कि पाँचों भाई सौ कौरवों पर विजय प्राप्त कर सके।
प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए ही अपनी स्त्री चेतना को व्यक्त नहीं किया है बल्कि उन्होंने स्त्रियों के बारे में भी लिखा जिन्हें परिस्थिति के आगे इतना विवश होना पड़ा कि अंत में एक स्त्री को अपने प्राण तक त्यागने पड़े और फिर अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह शिखंडी के रूप में दुबारा जन्मी। धीवर कन्या मत्स्यगंधा तथा काशिराज की तीन कन्याओं अम्बा, अम्बिका तथा अम्बालिका की कथा को उजागर करते हुए यह स्पष्ट दर्शाया कि किस प्रकार महापुरूष के भी स्वार्थ तथा काम पिपासा के कारण उन स्त्रियों को लोकनिंदा तथा परिहास सहना पड़ा। राजकुमारी अम्बा को भीष्म के कारण प्राण त्यागने पड़े थे क्योंकि उन्होंने उसे अपने भाई विचित्रविर्य के लिए अपहृत किया था परन्तु बाद में उसके निवेदन पर छोड़ दिया था। तत्पश्चात् जब राजा शाल्व ने उसे अस्वीकार किया तो वह भीष्म के पास शरण मांगने गयी थी तो भीष्म ने भी अपनी प्रतिज्ञा के चलते उसे ठुकरा दिया था। जिस कारण उसे अपने प्राण त्यागने पड़े। इसी प्रकार मत्स्यगंधा के साथ मुनि पराशर ने बलात् उसे नौका में ग्रहण किया पर बाद में उसे सत्यवती में रूपांतरित कर दिया जो आगे जाकर कुरूवंश के राजा शांतनु की पत्नी बनी। परन्तु यह बात तब तक लोक में फैल चुकी थी जिस कारण वह जीवन भर लोक निन्दा सहती रही। इस बात को पाठक वर्ग के सामने लाने के पीछे प्रतिभा राय जी का उद्देश्य यह है कि आखिर पूरा संसार पुरूष के द्वारा स्त्री पर किए गए अत्याचारों या कुकर्मों के लिए स्त्री को क्यों कोसता है या उसे सहानुभूति की आढ़ में ताने क्यों देता है। क्या नारी कोमल है शक्तीहिन है इसलिए?
प्रतिभा राय जी नारी की शक्तीशालिनी एव धर्यशालिनी रूप के बारे में अपने विचार अपने उपन्यास के एक दुसरे प्रमुख पात्र ऋषि व्यास के द्वारा उपन्यास में प्रस्तुत करते हुए कहती है – नारी तो सर्वसहा धरित्री है। उनकी जैसी सहनशीलता पुरूष में कहाँ? अतः नारी के प्रति दोष-रोष सहज है। पुरूष के प्रति ऐसा दोष-रोष करने से पृथ्वी भर पर हिंसा री हिंसा चलती रहेगी। शायद तभी पुरूष की निंदा करने का साहस कोई नहीं करता।8 (पृ.सं. 67) पाप-पुण्य का विचार द्रौपदी के मन में हमेशा से उठता रहा है। वह जब भी अपने वंश की अन्य स्त्रियों राज माता सत्यवती, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, कुंती तथा माद्री के बारे में सोचती है तो उनके जीवन में घटित घटनाओं से वह आहत होती है। सबके जीवन में अस्वभाविक घटनाएं पुरूषों के द्वारा घटित हुई है। मुनि पराशर ने मत्स्यगंधा के रूप पर मोहित होकर उसका नौका में बलात्कार किया फिर अपनी तपस्या के बल से उसे सत्यवती में परिवर्तित भी कर दिया। इसके बाद वह कुरूवंश में राजा शांतनु की पत्नी बनी। जो भी हो उनके साथ अन्याय हुआ जिसके दायी मुनि पराशर है पर उनको इस बात के लिए कोई दोषी नहीं ठहराता। शायद इसलिए कि वो अपने तपोबल से प्रतिवाद करने वाले को श्राप दे देते या कुछ कर देते। इसलिए निन्दा का पात्र चुना समाज ने सत्यवती को। अम्बा के साथ हुए अन्याय को सभी जानते है जिसमें प्रथम दोष भीष्म का है, दूसरा राजा शाल्व का जो कि उस पर बिना सोचे-समझे अविश्वास कर बैठते है। उसे अस्वीकार करते है। अम्बिका और अम्बालिका को भी अपने पति के बाद पर पुरूष से सम्बन्ध बनाना पड़ता है क्योंकि उनके वंश को उत्तरअधिकारी चाहिए नहीं तो सही गति न होगी। समाज नियोग को स्वीकृति देता है कहकर सत्यवती और अन्यों ने समझाया उन्हें। फिर भी देखों समाज की ही कारस्तानी, सबको ही अपने जीवन में उपहास निन्दा का पात्र बनना पड़ा। कुंती एवं माद्री तक न बची। फिर भी समाज इसी को आधार बनाकर पाप-पुण्य का विचार स्त्री के पक्ष में कुछ और पुरूष के पक्ष में कुछ देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि पाप-पुण्य का विचार नारी-पुरूष के लिए समान होता तो सामाजिक अत्याचार में नारी जाति उत्पीड़ित नहीं होती।9(पृ.सं.69) देखा जाए तो सच ही है यह। प्राचीन काल की अनेक गाथाओं में हम देखते है कि किसी ऋषि की तपस्या भंग करने पर अप्सरा को बानरी बनने तक का श्राप मिला है वही किसी मुनि ने एक पवित्र कुमारी का शील हरण किया तो उन्हें किसी प्रकार का श्राप विधाता ने नहीं दिया। पति की बात न मानने पर या उसे न पहचानने पर उसे पत्थर बनने का श्राप दिया परन्तु पति ने ही जब उसे समाज के झुटे आक्षेपों को सुनकर अपनी पत्नी पर विश्वास न करके उसे वनवास दिया तो उस पति को किसी ने दण्ड नहीं दिया। सब वास्तव में पुरूष के जानवरों वाली प्रवृत्ति के कारण ही है। जिसमें पुरूष कभी अपनी गलती नहीं मानता और न ही कभी यह समाज मानता है।
इस बात से स्पष्ट सिद्ध होता है कि वास्तव में पुरूषों में इतनी सहनशीलता नहीं है। जबकि नारी में है तभी तो वह समाज के इतने कठोर नियमों का पालन कर सकती है। इससे ज्ञात होता है कि नारी पुरूष के मुकाबले अधिक महान एवं शशक्त है। परन्तु यह भी कोई बात नहीं हुई कि नारी में सहनशीलता है तो समाज उसकी सहनशीलता की बार-बार परीक्षा लेता रहे और उसकी सहनशीलता का परिहास करे। नारी के सहनशीलता की एक सीमा है। यदि यह सीमा पार हो गयी तो नारी अपना कोमल रूप छोड़कर प्रचण्ड रूप धर सकती है। क्या समाज इस बात को समझ नहीं पाता। आज भी नारी ही पर अत्याचार हो रहे है। आधुनिकिकरण के चलते समाज में जो बदलाव आए है उसके चलते नारी की स्थिति में परिवर्तन अवश्य आए है परन्तु फिर भी कही-न-कही किसी-न-किसी रूप में नारी के साथ अन्याय होता ही रहता है जो हम देखते भी है तो अनदेखा कर लेते है।
प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी एवं अम्बा, मत्स्यगंधा आदि नारियों का प्रसंग उठाकर तथा उनके जीवन में हुए अस्वाभाविक घटना, उनके कष्ट, उनके साथ हुए अन्याय को तथा इन समस्थ प्रसंगों के साथ उठाए गए प्रश्नों को समाज के सामने इसलिए रखा है ताकि समाज एक बार तो आँखें खोलकर देखे कि उसने नारी के प्रति क्या-क्या अन्याय किया है और किस-किस रूप में किया है। परम्परा, संस्कृति के नाम पर बनाए गए नियमों में नारी का जीवन ही आहुति के रूप में चढ़ाया जा रहा है यह समाज एक बार देखे और समझे। आधुनिकिकरण ने भी नारी को ही विवश किया है अपने स्वरूप एवं स्वभाव को बदलने के लिए। फिर द्रौपदी के जीवन में जो कुछ भी हुआ उसके लिए द्रौपदी ही दोषी क्यों? पाँच-पति वरण करना कोई सम्मान का कार्य नहीं परन्तु अपनी माता समान सांस के आदेश का पालन करने के लिए अपना जीवन द्रौपदी ने स्वाहा कर दिया। फिर भी द्रौपदी को ही दोषी माना जाता है। परन्तु एक बार समाज यह भी तो सोचकर देखे कि जो कुछ द्रौपदी ने किया क्या वह उचित नहीं था? नहीं था तो समाज ने उसे विवश क्यों किया? विवश किया समाज ने फिर स्वयं अपनी भूल न मानते हुए उसे ही दोषी माना। प्रतिभा राय जी इन सब प्रश्नों का उत्तर समाज से चाहती है। फिर द्रौपदी पर जो यह आरोप लगाया जाता है कि पाँच पति होने के बाद भी द्रौपदी कृष्ण के प्रति अनुरक्त थी तो इस बात को प्रतिभा राय जी ने कृष्ण-द्रौपदी के बीच के सखा भाव तथा देहातीत प्रेम को दर्शाते हुए यह सिद्ध किया है कि द्रौपदी कृष्ण की परम् भक्त थी। दोनों के बीच ईश्वरीय प्रेम था जिसे समाज किसी अन्य दृ्ष्टि से देख रहा था। एक नारी का अपने जीवन में हुए इस प्रकार के घटनाक्रम के कारण जो उस पर बीती है क्या उसमें उचित नहीं कि वह ईश्वर की शरण ले तथा ईश्वर से प्रेम करने पर क्या पाप किया उसने।
इस प्रकार प्रतिभा राय जी के इस उपन्यास में हम पाते है कि नारी के प्रति जो समाज ने अन्याय किया है उससे वह कितनी आहत हुई है। अपनी संस्कृति, परम्परा तथा महाभारत की कथा के हर मूल बातों को और प्रसंगों को बिना जाने हम आज भी द्रौपदी का अपमान करने लगते है। जो कि न केवल उसका अपमान है बल्कि नारी जाति का अपमान करते है। क्योंकि आज तक द्रौपदी के जैसे ही कई घटनाएं हुई होंगी समाज में, कई अम्बाओं ने अपने प्राण त्यागे होंगे, कई मत्स्यगंधा को बलात् अपनाया गया होगा फिर भी उन्हीं को ही हम दोष देते रहते है। प्रतिभा राय जी का यह उपन्यास नारी चेतना को दर्शाने वाला एक सशक्त उपन्यास है। जिसमें समस्त नारी जाति को आहवान किया जा रहा है कि वह अपने प्रति हो रहे तरह-तरह प्रकार के अत्याचारों के प्रति अपनी आवाज उठाए और इस पुरूष प्रधान समाज को अपने उपर कोई भी आरोप लगाने का मौका न दे। यदि ऐसा हो भी तो आरोप के विरूद्ध, आरोप लगाने वाले के विरूद्ध संघर्ष करे।
‘द्रौपदी’ प्रतिभा राय जी की औपन्यासिक कृति है। इस उपन्यास में लेखिका प्रतिभा राय जी ने महाभारत की नायिका द्रौपदी को आधुनिक संदर्भ में देखा है। इसकी मूल कथा वस्तु महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत तथा उड़िया महाभारत है।
जब भी कोई रचनाकार किसी पौराणिक कथा को या पुराण को अपनी रचना के लिए चुनता है तो उसके सामने दोहरी समस्या आ जाती है। ये दोहरी समस्या है स्थापित सत्य की सुरक्षा तथा नयी चेतना की अभिव्यक्ति। इन दोनों बातों का ध्यान रखना रचनाकार के लिए आवश्यक होता है। परन्तु कभी-कभी अतिशय क्रान्तिकारी चेतना के चलते स्थापित सत्य को विध्वंस कर दिया जाता है। ‘द्रौपदी’ उपन्यास इसी प्रकार की रचना है जिसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी सम्बन्धी समस्त पारम्पारिक स्थापित सत्य को विध्वंस करते हुए नए आधुनिक दृष्टिकोण को स्थापित किया है। इसमें प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के सम्बन्ध में जो पाँच पति वरण करने के कारण जो लोगों के मन में उसके प्रति घृणा भावना तथा उसके लिए जो उपहास्पाद भाव है उसे मिटाते हुए उसके सतीत्व एवं महानता को नए आयाम देते हुए स्थापित किया है।
द्रौपदी महाभारत ही नहीं, भारतीय जीवन तथा संस्कृति का एक अत्यन्त विलक्षण और महत्त्वपूर्ण चरित्र है – परन्तु साहित्य ने अब तक उसे प्रायः छुआ नहीं था।........कृष्ण समर्पित तथा पांच पांडवों को ब्याही द्रौपदी का जीवन अनेक दिशाओं में विभक्त है, फिर भी उसका व्यक्तित्व बंटता नहीं, टूटता नहीं, वह एक ऐसी इकाई के रूप में निरन्तर जीती है जो तत्कालीन घटनाचक्र को अनेक विशिष्ट आयाम देने में समर्थ है।1 (भूमिका) प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में द्रौपदी के जरिए नारी मन की वास्तविक पीड़ा, सुख-दुख और व्यक्तिगत अन्तर्सम्बन्धों की जटिलता आदि को गहराई से प्रस्तुत की है। इस उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने स्वयं द्रौपदी के दृष्टि से महाभारत के पहले से चले आ रहे कौरव-पाण्डव के युद्ध तथा द्रौपदी के प्रति सभी के द्वारा किए गए अन्याय को, महाभारत के बाद पंच पाण्डवों तथा द्रौपदी के महाप्रस्थान तक की सम्पूर्ण कथा को दर्शाया है। प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए अपनी स्त्री- चेतना को प्रस्तुत किया है।
प्रतिभा राय की स्त्री-चेतना द्रौपदी के संदर्भ में जो है उसको समझने के लिए हमें यह जान लेना आवश्यक है कि यह उपन्यास उन्होंने क्यों लिखा? वास्तव में प्रतिभा राय जी ने यह उपन्यास इसलिए लिखा था क्योंकि उनके किसी परिचित महिला की बहन जिसका नाम कृष्णा था जो अपने दुष्चरित शराबी पति के अत्याचार से पीड़ित हो अलग रह रही थी। उसने अपने आत्मीय जनों के कहने पर पुनर्विवाह किया। दूसरे विवाह के बाद वह सुखी थी। पर विडम्बना यह हुई कि उससे सहानुभूति रखने वालों ने ही कृष्णा के दुबारा विवाह करने के बाद कहते थे कि- वाह नाम ही जब कृष्णा है, दूसरा पति कर ही तो सुखी हो सकी। अरे, कभी कृष्णा ने पाँच पति वरण किये, फिर भी सन्तुष्ट न हो कर्ण एवं कृष्ण के प्रति अनुरक्त हुई।2 (पृ.सं. 262) इस बात पर प्रतिभा राय जी को दुख हुआ कि किस तरह लोग बिना मूल बात को जाने अपनी संस्कृति को अज्ञानवश निंदित करते रहते है। उनका इस बात पर कहना था कि – द्वापर की असामान्य विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण नारी कृष्णा के प्रति ऐसी विचार-शून्य बात मेरे दुख की जड़ में थी। यह किसी का व्यक्तिगत मत हो सकता है। पर हम कृष्णा को कितना जानते है? कितना ज्ञान है हमें महाभारत के महत्त्व और उस महान संस्कृति का? मूल संस्कृत या उसका भाषांतर, या सरला दास रचित उड़िया महाभारत को कितनों ने भली-भांति पढ़ा है? अंधे हाथी देखने बैठे हैं, उस तरह महाभारत की महान आख्यायिका खुद पढ़े बिना सुनी-सुनाई बात पर हम अपनी संस्कृति पर छींटाकशी कर बैठते हैं।3 (पृ.सं. 263)
सच ही है कि अँधों की तरह हम अपनी संस्कृति के सत्य को ही बिना जाने कुछ न कुछ कहते रहते है। इस उपन्यास को लिखते समय प्रतिभा राय जी ने यह बात ध्यान में रखा कि हमें हमारी संस्कृति, परम्परा तथा इस महाभारत के मूल बातों तथा रहस्यों को उजागर किया जाए जिससे की यह सिद्ध हो सके कि द्रौपदी सचमूच में ही महा सती स्त्री थी कुछ और नहीं। जो कुछ उसके जीवन में हुआ विशेषकर उसके विवाह के समय उससे वह कम आहत नहीं हुई थी। बल्कि अपने जीवन में घटे इस अस्वभाविक घटना ने उसे स्तभ्ध कर दिया था। वह भी उस काल में जब किसी स्त्री के लिए एक ही पति का विधान था। जहाँ स्त्री को अपने पति, चाहे जैसा भी हो, उसके अलावा किसी अन्य का ध्यान भी मन में लाना पाप है। वह काल जिसमें स्वयं नारी ने ही इस विधान को रचा और इसकी गरीमा बनाए रखने के लिए अपने प्राण की भी परवा न की हो। ऐसे काल में एक नारी को किसी स्वयंवर में जीत कर ले जाने के बाद उसे अपनी माँ के सामने एक उत्तम दुर्लभ वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना तथा माँ के द्वारा उसे सभी भाईयों में बराबर-बराबर हिस्से बांट लेना उस नारी के प्रति अमानवीय एवं लज्जास्पद व्यवहार था।यह व्यवहार भी किसने किया स्वयं युधिष्ठिर ने जो उस समय द्रौपदी के पति के सबसे बड़े भाई थे। स्वयं युधिष्ठिर जिसे पूरा संसार धर्मराज के नाम से अभिहित करता है क्या उनका द्रौपदी को इस प्रकार से अपनी माँ के सामने सम्बोधित करना उचित था। यह तो सबसे बड़े दुख की बात है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही स्वयं द्रौपदी के रूप लावण्य के देख कर उसे उचित सम्मान न देते हुए केवल वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर रहा है जो कि एक अन्याय है। जिस नारी के साथ यह अन्याय हुआ वह और कोई नहीं द्रौपदी थी जो यज्ञ से उत्पन्न हुई थी एक अत्यन्त तेजस्विनी नारी थी। जिसकी सुन्दरता की कोई परिभाषा नहीं थी। जो इतनी विदुषी, भक्तिमती, शक्तिपूर्ण, शीलवती नारी थी। जिसके साथ सबसे प्रथम अन्याय पाण्डवों ने किया था। यह अन्याय पाण्डवों द्वारा अनजाने में हुआ या विधी का यह विधान था इस पर कोई भी विचार नहीं किया जा सकता। परन्तु इसमें आहत द्रौपदी ही हुई ।फिर भी इतिहास के इस विशेष सत्य को जाने बगेर या जानकर भी अनजाने बनकर आज भी समाज द्रौपदी के प्रति विचार-शून्य बातें करता है। उसे तरह-तरह से अपमानित किया जाता है। उसके पाँच-पाण्डवों के साथ हुए विवाह को हास्यास्पद तरीके से देखा-दिखाया जाता है और उन सबके जीवन पर व्यंग्य किया जाता है। प्रतिभा राय जी ने इन्हीं बातों का ध्यान रखकर द्रौपदी उपन्यास की रचना की है।
प्रतिभा राय जी की स्त्री चेतना कितनी प्रबल और स्वस्थ है यह इस बात से पता चलता है कि उन्होंने स्वयं को द्रौपदी की भांति भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया और स्वयं को पूरी तरह से द्रौपदी के स्थान पर ला खड़ा किया। उन्होंने द्रौपदी को अपने में आत्मसात कर द्रौपदी के सम्पूर्ण जीवन के घटना चक्र तथा उसकी मानसिक पीड़ा, दुख-सुख आदि का वर्णन किया।
उपन्यास के प्रारम्भ में ही प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के मन की व्यथा को प्रस्तुत किया। पाण्डवों के महाप्रस्थान के समय जब सभी हिमालय के रास्ते स्वर्ग जा रहे थे तब अचानक द्रौपदी का पाव फिसल जाता है और वह गिर जाती है। तब भीम उसकी सहायता के लिए आगे आता है पर युधिष्ठिर उसे द्रौपदी की सहायता करने से मना कर देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि --- कितना झूठ है यह पति-पत्नी का सम्बन्ध!स्नेह, प्रेम,त्याग और उत्सर्ग! अपने कर्म अगर आदमी स्वयं भोगता है, तो पिर युधिष्ठिर के धर्म की रक्षा के लिए पाँच पतियों के चरणों में अर्पित होकर सारी दुनिया का उपहास, व्यंग-विद्रुप और निंदा-अपवाद ढोती क्यों फिरी?4 (पृ.सं.8) यह प्रश्न द्रौपदी का नहीं बल्कि आज तक पति के कारण दुख भोगती आयी उस प्रत्येक नारी का है जिसमें पति ने कुछ कर्म किया पर लांछन पत्नी पर लगा। द्रौपदी पाँच पाण्डवों की पत्नी थी। पाँचों में युधिष्ठिर सबसे बड़े थे, अपने जुआ खेलने की आदत में तो वह अपना राज्य गंवा बैठे, परन्तु क्या अधिकार था युधिष्ठिर को द्रौपदी को जुए में दाव पर लगाने का। पत्नी कोई राज्य या सम्पत्ति तो नहीं जिसे जैसे चाहे कोई इस्तेमाल करे। परन्तु यही बात यह पुरूष समाज नहीं समझ सका, न ही युधिष्ठिर और कर बैठता है अपनी पत्नी का अपमान। द्रौपदी को कौरव सभा में अपमानित किया दोनों ने ही। वास्तव में देखा जाए तो युधिष्ठिर ने कभी भी द्रौपदी को स्त्री के रूप में नहीं देखा, देखा तो सिर्फ वस्तु के रूप में। विवाह के प्रथम रात्री में वह द्रौपदी से कहते हैं पुरूष की प्रकृति से तुम परिचित नहीं। अपने प्रिय पदार्थ पर किसी अन्य का अधिकार वह सह नहीं सकता। तुम तो वैसे ही पाँचों की प्रियतमा हो। हम में से कोई तुम्हें पल भर भी अपने निकट से अंतर करना नहीं चाहेगा। किसी को ज़रा-सी भी उपेक्षा सहन नहीं होगी। तब अवस्था क्या होगी? ( पृ.सं. 52)5 । यह बात युधिष्ठिर ने द्रौपदी से तब कही जब द्रौपदी ने सबके कहने पर पँच-पति वरण कर युधिष्ठिर से विवाह किया और उससे कहा कि वह उनकी बात मानेगी और सब कुछ ठीक होगा क्योंकि बाकि सभी भाई जो उसके पति होंगे वह सब युधिष्ठिर के आज्ञा का पालन करेंगे। यब युधिष्ठिर अपने भाईयों का स्वभाव जानते थे और द्रौपदी की दुविधा को भी समझते थे तो उन्होंने ऐसा किया ही क्यों, क्यों उन्होंने द्रौपदी को इस प्रकार के अस्वभाविक रिश्ते में जकड़ा। फिर भी युधिष्ठिर की तुच्छ सोच को देखो वह तब भी द्रौपदी को पदार्थ या वस्तु ही बता रहे है। जबकि द्रौपदी एक मनुष्य है जीवित हाड़-मांस की जिसमें चेतना है, भावना है। वह कोई वस्तु कैसे हो सकती है। प्रतिभा राय जी ने न केवल द्रौपदी के इस दुख को ही उजागर किया है बल्कि द्रौपदी को संसार की पंच सती नारी में स्थान देने पर द्रौपदी के मन से निकले दुख और व्यंग्य को भी उजागर किया है। यह इसलिए क्योंकि भले ही वह पंच सतियों में से एक है पर फिर भी संसार उसका उपहास करता न की आदर। इसी कारण वह यह कहते हुए दुखी हो जाती है कि—कहते है मेरा नाम पंच सती में गिना जाएगा। उसे देख कलियुग के नर-नारी विद्रुप कर हँसेंगे। कहेंगे पंचपति वरण कर द्रौपदी अगर सती हो सकी, तो फिर एक पतिव्रतपालन की क्या आवश्यकता? बहुपति वरण कर वे कलियुग में सती क्यों नहीं होंगी? यौन विकारग्रस्त कलियुग के उच्छृंखल नर-नारियों के बीच द्रौपदी होगी व्यंग्य-परिहास का उपादान। पांच पतियों की पत्नी द्रौपदी को सतीत्व के लिए तिल-तिल जलना पड़ा होगा, इसे ये लोग भला कैसे समझेंगे? तब तो हस्तिनापुर की नायिका द्रौपदी एक निंदित आत्मा, कलंक भरी कहानी की नायिका बन जायेगी।6 (पृ.सं. 8) यह बात सच भी हुई। कलयुग में आज द्रौपदी उपहास की पात्र बन गयी है।
पर प्रतिभा राय जी ने इस उपन्यास में एक प्रसंग में यह भी दिखाया कि जब द्रौपदी विवाह के पश्चात् प्रथम बार अपने गार्हस्थ जीवन का प्रारम्भ करती है तब उस कृष्ण-युधिष्ठिर की बात से ज्ञात होता है कि बहुपति वरण करना स्त्री के लिए लज्जा जनक बात है तो उसके अंदर से यज्ञ-अनल में संभूत याज्ञसेनी विद्रोह कर उठती है और सोचने लगती है कि देवलोक के विधान अनुसार एक पुरूष अनेक स्त्रियाँ ग्रहण कर सकता है पर स्त्री एक से अधिक पति वरण करने पर पापिनी कहलाएगी। साथी ही सबसे आश्यर्च की बात है कि यही बात जब उसके द्वारा तथा उसे परिवार द्वारा कही जा रही थी तब सभी ने इस बात को नहीं माना। जो युधिष्ठिर आज द्रौपदी के पाँच पति वरण करने को लेकर उसे पापिनी समझ रहा है तब स्वयं द्रौपदी के इस विवाह से इन्कार करने पर देवलोक एवं गन्धर्व लोक के उदाहरण देकर यह विवाह कर रहा था। तब उसने यह क्यों नहीं सोचा कि वह तो स्वयं ही एक स्त्री को एक पाप करने के लिए विवश कर रहा है। स्वयं एक धर्मात्मा होते हुए भी एक स्त्री से अधर्म करवा रहा है। द्रौपदी यह बात समझ गयी थी कि इस पुरूष प्रधान समाज के द्वारा बनाया गया नियम है तभी वह स्त्री-पुरूष में पाप-पूण्य का भेद इस प्रकार से करते है। जब चाहे अपनी सुविधा के अनुसार एवं अपने सुख के लिए पाप और पुण्य का निश्चित विधान बना डाला और स्त्रियों को तुच्छ वस्तु के समान मान कर उसका जैसे चाहे प्रयोग करते रहे। इस पुरूष प्रधान समाज ने स्त्री को कभी मनुष्य का दर्जा नहीं दिया। इस प्रसंग पर प्रतिभा राय जी के विचार द्रौपदी के जरिए इस प्रकार आते है—वास्तव में पंचपति वरण समग्र नारी जाति के लिए एक आहवान था। एक साथ अनेक पुरूष वरण कर भी किसी नारी के चरित्र की शुद्धता अमलिन रह सकती है, मानो यह प्रमाण करने का स्वर्ण अवसर है।7 (पृ.सं. 66) सत्य ही है कि द्रौपदी का चरित्र शुद्ध था। फिर यह कोई साधारण बात नहीं थी किसी स्त्री के लिए कि वह एक साथ बहुपति वरण कर वैवाहिक जीवन को निभा सके। द्रौपदी के चरित्र की शुद्धता इस बात से भी सिद्ध होती है कि कभी भी पंच-पाण्डवों में से किसी ने भी स्वयं द्रौपदी पर किसी भी प्रकार से संदेह नहीं किया न ही उसके किसी बात की अवहेलना की हो। सभी ने द्रौपदी को प्रेम ही किया है। वास्तव में एक स्त्री जब एक पुरूष के साथ रहती है तो स्वाभाविक रूप से उसके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध जोड़ती है। फिर वह चाहे पिता हो, भाई हो या पति। सबके साथ उसकी भावनाएं जुड़ी होती है तथा वह अपने हर रूप में पुरूष को संस्कारित ही करती है। पंच-पाण्डवों के बीच रहकर द्रौपदी ने पंच-पाण्डवों के लिए केन्द्रीय शक्ती के रूप में रही तभी पाण्डव महाभारत का युद्ध जीत पाए थे। केवल ईश्वर के साथ होने से ही नहीं बल्कि ये द्रौपदी का सतीत्व ही था कि पाँचों भाई सौ कौरवों पर विजय प्राप्त कर सके।
प्रस्तुत उपन्यास में प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी के जरिए ही अपनी स्त्री चेतना को व्यक्त नहीं किया है बल्कि उन्होंने स्त्रियों के बारे में भी लिखा जिन्हें परिस्थिति के आगे इतना विवश होना पड़ा कि अंत में एक स्त्री को अपने प्राण तक त्यागने पड़े और फिर अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह शिखंडी के रूप में दुबारा जन्मी। धीवर कन्या मत्स्यगंधा तथा काशिराज की तीन कन्याओं अम्बा, अम्बिका तथा अम्बालिका की कथा को उजागर करते हुए यह स्पष्ट दर्शाया कि किस प्रकार महापुरूष के भी स्वार्थ तथा काम पिपासा के कारण उन स्त्रियों को लोकनिंदा तथा परिहास सहना पड़ा। राजकुमारी अम्बा को भीष्म के कारण प्राण त्यागने पड़े थे क्योंकि उन्होंने उसे अपने भाई विचित्रविर्य के लिए अपहृत किया था परन्तु बाद में उसके निवेदन पर छोड़ दिया था। तत्पश्चात् जब राजा शाल्व ने उसे अस्वीकार किया तो वह भीष्म के पास शरण मांगने गयी थी तो भीष्म ने भी अपनी प्रतिज्ञा के चलते उसे ठुकरा दिया था। जिस कारण उसे अपने प्राण त्यागने पड़े। इसी प्रकार मत्स्यगंधा के साथ मुनि पराशर ने बलात् उसे नौका में ग्रहण किया पर बाद में उसे सत्यवती में रूपांतरित कर दिया जो आगे जाकर कुरूवंश के राजा शांतनु की पत्नी बनी। परन्तु यह बात तब तक लोक में फैल चुकी थी जिस कारण वह जीवन भर लोक निन्दा सहती रही। इस बात को पाठक वर्ग के सामने लाने के पीछे प्रतिभा राय जी का उद्देश्य यह है कि आखिर पूरा संसार पुरूष के द्वारा स्त्री पर किए गए अत्याचारों या कुकर्मों के लिए स्त्री को क्यों कोसता है या उसे सहानुभूति की आढ़ में ताने क्यों देता है। क्या नारी कोमल है शक्तीहिन है इसलिए?
प्रतिभा राय जी नारी की शक्तीशालिनी एव धर्यशालिनी रूप के बारे में अपने विचार अपने उपन्यास के एक दुसरे प्रमुख पात्र ऋषि व्यास के द्वारा उपन्यास में प्रस्तुत करते हुए कहती है – नारी तो सर्वसहा धरित्री है। उनकी जैसी सहनशीलता पुरूष में कहाँ? अतः नारी के प्रति दोष-रोष सहज है। पुरूष के प्रति ऐसा दोष-रोष करने से पृथ्वी भर पर हिंसा री हिंसा चलती रहेगी। शायद तभी पुरूष की निंदा करने का साहस कोई नहीं करता।8 (पृ.सं. 67) पाप-पुण्य का विचार द्रौपदी के मन में हमेशा से उठता रहा है। वह जब भी अपने वंश की अन्य स्त्रियों राज माता सत्यवती, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, कुंती तथा माद्री के बारे में सोचती है तो उनके जीवन में घटित घटनाओं से वह आहत होती है। सबके जीवन में अस्वभाविक घटनाएं पुरूषों के द्वारा घटित हुई है। मुनि पराशर ने मत्स्यगंधा के रूप पर मोहित होकर उसका नौका में बलात्कार किया फिर अपनी तपस्या के बल से उसे सत्यवती में परिवर्तित भी कर दिया। इसके बाद वह कुरूवंश में राजा शांतनु की पत्नी बनी। जो भी हो उनके साथ अन्याय हुआ जिसके दायी मुनि पराशर है पर उनको इस बात के लिए कोई दोषी नहीं ठहराता। शायद इसलिए कि वो अपने तपोबल से प्रतिवाद करने वाले को श्राप दे देते या कुछ कर देते। इसलिए निन्दा का पात्र चुना समाज ने सत्यवती को। अम्बा के साथ हुए अन्याय को सभी जानते है जिसमें प्रथम दोष भीष्म का है, दूसरा राजा शाल्व का जो कि उस पर बिना सोचे-समझे अविश्वास कर बैठते है। उसे अस्वीकार करते है। अम्बिका और अम्बालिका को भी अपने पति के बाद पर पुरूष से सम्बन्ध बनाना पड़ता है क्योंकि उनके वंश को उत्तरअधिकारी चाहिए नहीं तो सही गति न होगी। समाज नियोग को स्वीकृति देता है कहकर सत्यवती और अन्यों ने समझाया उन्हें। फिर भी देखों समाज की ही कारस्तानी, सबको ही अपने जीवन में उपहास निन्दा का पात्र बनना पड़ा। कुंती एवं माद्री तक न बची। फिर भी समाज इसी को आधार बनाकर पाप-पुण्य का विचार स्त्री के पक्ष में कुछ और पुरूष के पक्ष में कुछ देता है। तब द्रौपदी सोचती है कि पाप-पुण्य का विचार नारी-पुरूष के लिए समान होता तो सामाजिक अत्याचार में नारी जाति उत्पीड़ित नहीं होती।9(पृ.सं.69) देखा जाए तो सच ही है यह। प्राचीन काल की अनेक गाथाओं में हम देखते है कि किसी ऋषि की तपस्या भंग करने पर अप्सरा को बानरी बनने तक का श्राप मिला है वही किसी मुनि ने एक पवित्र कुमारी का शील हरण किया तो उन्हें किसी प्रकार का श्राप विधाता ने नहीं दिया। पति की बात न मानने पर या उसे न पहचानने पर उसे पत्थर बनने का श्राप दिया परन्तु पति ने ही जब उसे समाज के झुटे आक्षेपों को सुनकर अपनी पत्नी पर विश्वास न करके उसे वनवास दिया तो उस पति को किसी ने दण्ड नहीं दिया। सब वास्तव में पुरूष के जानवरों वाली प्रवृत्ति के कारण ही है। जिसमें पुरूष कभी अपनी गलती नहीं मानता और न ही कभी यह समाज मानता है।
इस बात से स्पष्ट सिद्ध होता है कि वास्तव में पुरूषों में इतनी सहनशीलता नहीं है। जबकि नारी में है तभी तो वह समाज के इतने कठोर नियमों का पालन कर सकती है। इससे ज्ञात होता है कि नारी पुरूष के मुकाबले अधिक महान एवं शशक्त है। परन्तु यह भी कोई बात नहीं हुई कि नारी में सहनशीलता है तो समाज उसकी सहनशीलता की बार-बार परीक्षा लेता रहे और उसकी सहनशीलता का परिहास करे। नारी के सहनशीलता की एक सीमा है। यदि यह सीमा पार हो गयी तो नारी अपना कोमल रूप छोड़कर प्रचण्ड रूप धर सकती है। क्या समाज इस बात को समझ नहीं पाता। आज भी नारी ही पर अत्याचार हो रहे है। आधुनिकिकरण के चलते समाज में जो बदलाव आए है उसके चलते नारी की स्थिति में परिवर्तन अवश्य आए है परन्तु फिर भी कही-न-कही किसी-न-किसी रूप में नारी के साथ अन्याय होता ही रहता है जो हम देखते भी है तो अनदेखा कर लेते है।
प्रतिभा राय जी ने द्रौपदी एवं अम्बा, मत्स्यगंधा आदि नारियों का प्रसंग उठाकर तथा उनके जीवन में हुए अस्वाभाविक घटना, उनके कष्ट, उनके साथ हुए अन्याय को तथा इन समस्थ प्रसंगों के साथ उठाए गए प्रश्नों को समाज के सामने इसलिए रखा है ताकि समाज एक बार तो आँखें खोलकर देखे कि उसने नारी के प्रति क्या-क्या अन्याय किया है और किस-किस रूप में किया है। परम्परा, संस्कृति के नाम पर बनाए गए नियमों में नारी का जीवन ही आहुति के रूप में चढ़ाया जा रहा है यह समाज एक बार देखे और समझे। आधुनिकिकरण ने भी नारी को ही विवश किया है अपने स्वरूप एवं स्वभाव को बदलने के लिए। फिर द्रौपदी के जीवन में जो कुछ भी हुआ उसके लिए द्रौपदी ही दोषी क्यों? पाँच-पति वरण करना कोई सम्मान का कार्य नहीं परन्तु अपनी माता समान सांस के आदेश का पालन करने के लिए अपना जीवन द्रौपदी ने स्वाहा कर दिया। फिर भी द्रौपदी को ही दोषी माना जाता है। परन्तु एक बार समाज यह भी तो सोचकर देखे कि जो कुछ द्रौपदी ने किया क्या वह उचित नहीं था? नहीं था तो समाज ने उसे विवश क्यों किया? विवश किया समाज ने फिर स्वयं अपनी भूल न मानते हुए उसे ही दोषी माना। प्रतिभा राय जी इन सब प्रश्नों का उत्तर समाज से चाहती है। फिर द्रौपदी पर जो यह आरोप लगाया जाता है कि पाँच पति होने के बाद भी द्रौपदी कृष्ण के प्रति अनुरक्त थी तो इस बात को प्रतिभा राय जी ने कृष्ण-द्रौपदी के बीच के सखा भाव तथा देहातीत प्रेम को दर्शाते हुए यह सिद्ध किया है कि द्रौपदी कृष्ण की परम् भक्त थी। दोनों के बीच ईश्वरीय प्रेम था जिसे समाज किसी अन्य दृ्ष्टि से देख रहा था। एक नारी का अपने जीवन में हुए इस प्रकार के घटनाक्रम के कारण जो उस पर बीती है क्या उसमें उचित नहीं कि वह ईश्वर की शरण ले तथा ईश्वर से प्रेम करने पर क्या पाप किया उसने।
इस प्रकार प्रतिभा राय जी के इस उपन्यास में हम पाते है कि नारी के प्रति जो समाज ने अन्याय किया है उससे वह कितनी आहत हुई है। अपनी संस्कृति, परम्परा तथा महाभारत की कथा के हर मूल बातों को और प्रसंगों को बिना जाने हम आज भी द्रौपदी का अपमान करने लगते है। जो कि न केवल उसका अपमान है बल्कि नारी जाति का अपमान करते है। क्योंकि आज तक द्रौपदी के जैसे ही कई घटनाएं हुई होंगी समाज में, कई अम्बाओं ने अपने प्राण त्यागे होंगे, कई मत्स्यगंधा को बलात् अपनाया गया होगा फिर भी उन्हीं को ही हम दोष देते रहते है। प्रतिभा राय जी का यह उपन्यास नारी चेतना को दर्शाने वाला एक सशक्त उपन्यास है। जिसमें समस्त नारी जाति को आहवान किया जा रहा है कि वह अपने प्रति हो रहे तरह-तरह प्रकार के अत्याचारों के प्रति अपनी आवाज उठाए और इस पुरूष प्रधान समाज को अपने उपर कोई भी आरोप लगाने का मौका न दे। यदि ऐसा हो भी तो आरोप के विरूद्ध, आरोप लगाने वाले के विरूद्ध संघर्ष करे।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)