शनिवार, 3 मई 2025

हिन्दी कहानी में दिव्यांग विमर्श

 


मनुष्य अपनी पंच ज्ञानेंद्रिय द्वारा इस दुनिया को पहचानता है और इनका संचालक है मस्तिष्क। प्रयोजन अनुसार मस्तिष्क बाकि अंग-प्रत्यंग को निर्देश देता है जिससे मनुष्य काम कर पाता है। यदि किसी कारणवश इन ज्ञानेंद्रियों में कोई  एक भी पूर्ण-रूप से विकसित नहीं हो पाता है या किसी दुर्घटना के कारण कोई ज्ञानेंद्रिय क्षतिग्रस्त हो जाए तब मनुष्य अपना काम करने में कठिनाई महसूस करता है। कभी-कभी सभी ज्ञानेंद्रियाँ सठीक होने के बावजूद कोई अंग-प्रत्यंग जैसे हाथ या पैर आदि में कोई त्रुटि हो या किसी दुर्घटना में  क्षतिग्रस्त हो जाए तब भी मनुष्य अपने काम करने में कठिनाई महसूस कर सकता है। ऐसे लोगों को ही हम दिव्यांग कहते हैं।इसी के साथ-साथ बुढ़ापा भी दिव्यांगता का पर्याय बनता जा रहा है जहाँ बढ़ती उम्र के साथ-साथ शरीर के अंग शिथिल ही नहीं काम करना भी बंद कर देते हैं। जैसे मोतियाँ बिंद, दाँतों के गिर जाने से तोतलाना, हाँथ-पैरों में गठिया को रोग से ठीक से काम न कर पाना या फिर कमर का अकड़ जाना, हाथ-पैरों का निरंतर काँपते रहना, कानों से सुनाई न देना इत्यादि।

हालांकि दिव्यांग शब्द हाल ही में व्यवहार होने लगा है। पहले ऐसे लोगों को फिज़िकली हैंडिकैप या विक्लांग ही कहा जाता था। इस शब्द का भी अपना एक इतिहास है। कहा जाता है कि 15-16वी शताब्दी में जब युद्ध में शारीरिक रूप से क्षतिग्रस्त सैनिक तथा अन्य लोग अपने जीवन जीने के लिए रास्तों में हाथ(अर्थात् हैंड) में टोपी(कैप) लेकर भीख मांगते थे। क्योंकि उस वक्त ऐसे लोगों को अन्य साधारण लोगों जैसे काम पर नहीं लिया जा सकता था क्योंकि वे सामान्य काम-काज करने में भी सक्षम नहीं थे या फिर उन्हें दूसरे लोग काम नहीं देते थे। इसलिए मजबूरी में इन्हें भीख ही मांगकर अपना गुज़ारा करना पड़ता था। जब ब्रिटेन के राजा हेनरी ने ये देखा तो समाज में ऐसे लोगों की दशा को समझते हुए उन्होंने इस प्रकार के भीक्षाटन को मान्यता प्रदान किया। तब से लोगों ने इन्हें हैंडिकैप नाम दिया और तब से ऐसे लोगों इसी नाम से ही पुकारा जाने लगा।

            एक बात जरूर है अगर किसी मनुष्य के अंग में विकलता या क्षति हो जाए तो उसका दूसरा अंग अधिक शक्तिशाली या अनुभूति संपन्न हो जाता है। जैसे अंधे व्यक्ति की आँखे न होने पर भी उसकी शरीर की त्वचा या हाथ की त्वचा अनुभूति प्रबल होती है जिससे कि वह बिना देखे ही समझ जाता है कि उसे किसने छुवा है। वही कोई बिना हाथ वाला व्यक्ति अपने पैरों से ही लिख सकता है अथवा अपना दूसरा काम कर सकता है। अतीत में जहाँ ऐसे शारीरिक या मानसिक अक्षमता वाले व्यक्तियों के लिए केवल करुणा ही प्राप्त होता था। ज्यादातर लोग ऐसे व्यक्तियों को बोझ के रूप में ही मानते थे। उन्हें किसी काम के उपयोगी न मानकर उन्हें काम नहीं देते थे। ऐसे में इन जैसे लोगों के लिए जीवन जीना कठीन था। परन्तु धीरे-धीरे समाज में लोगों की चिंता-धारा बदलने लगी और लोगों को इनमें भी काम काज करने की क्षमता दिखने लगी और ये भी देखा जाने लगा कि इनमें भी कुशलता का विकास सम्भव है और ये भी साधारण जीवन जी सकते हैं। वही 1980 के दशक में अमेरिका की डैमोक्रेटिक नेशनल कमीटी ने हैंडिकैप की जगह ‘डिफरेन्टली एबल्ड’ शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकार संघटन ने वर्ष 1992 की 3 दिसम्बर को ऐसे लोगों की कार्यक्षमता को जानते हुए पहली बार इंटरनेशनल डे ऑफ डिसएबिलिटि दिवस मनाने की घोषणा की जिसे आज प्रत्येक वर्ष लोग मनाते हैं। इसके अतिरिक्त इंटरनेशनल डे ऑफ ऑटिस्म 2 अप्रैल को मनाया जाने लगा, इंटर नेशनल डे ऑफ डीफ एण्ड डम्ब 23 सितम्बर को मनाया जाने लगा। उसी प्रकार इंटर नेशनल डे ऑफ ब्लाइंड जो कि अक्तूबर के दूसरे बृहस्पतिवार(second Thursday) को मनाया जाने लगा। इन दिनों के मनाये जाने का एक ही उद्देश्य था कि दिव्यांग व्यक्ति की कार्यक्षमता को पहचानना तथा विश्व को भी पहचान करवाना। दिसम्बर 2015 में हमारे भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपनी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इनके लिए दिव्यांग शब्द का व्यवहार किया।

 सबसे बड़ी बात है कि कोई भी मनुष्य करुणा पात्र बनकर जीना नहीं चाहता है। वह स्वाभिमान के साथ ही जीना चाहता है। फिर दिव्यांग व्यक्ति क्यों पीछे रहे। उसमें भी स्वाभिमान है और वह उसी के साथ जीना चाहता है। परन्तु अपनी अक्षमता के कारण वह दूसरों की सहायता लेने के लिए बाध्य है। जब मानव अधिकार संघठन ने देखा कि यदि ऐसे लोगों को सही प्रकार की सहायता, सही परिस्थिति एवं मौके दिए जाए तो यें भी स्वाभाविक जीवन जी सकते हैं। प्राचीन काल की बात करें तो हमारे भारतीय समाज का इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है। जैसे सूरदास जो की अन्धे थे परन्तु उन्होंने महान सूरसाहित्य की रचना की और भक्ति साहित्य में अपना नाम अमर कर दिया। उसी महर्षि च्यवन, महर्षि अष्टावक्र, दीर्घतमा, शुक्राचार्य आदि का योगदान आज भी हमारे भारतीय समाज के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। तो वही आज सुधाचन्द्रन जी का नाम लिया जा सकता है जिनके पैर न होने के बावजूद भी वह देश की जानी-मानी शास्त्रीय नृत्य-संगीत में अपने योगदान के लिए जानी जाती है। सबसे बड़ा उदाहरण तो हम स्टीफेन हॉकींस का दे सकते हैं जिन्होंने शारीरिक रूप से पूर्णतः अपंग होने के बावजूद भी विज्ञान की दुनिया को अपने कई महत्वपूर्ण आविष्कार दिए हैं तथा उसे समृद्ध बनाया है। इसी प्रकार दिव्यांग व्यक्तियों की क्षमता को पहचानते हुए वर्ष 1960 में इटली के रोम में  18 से 25 सितम्बर को ओलिम्पिक्स गेम्स की समाप्ति के बाद दिव्यांग व्यक्तियों के लिए खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसमें 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था तथा सभी किसी-न-किसी प्रकार से शारीरिक रूप से अपाहिज थे।1 धीरे-धीरे ये खेल इतना प्रसिद्ध हो चला की अब इसका आयोजन पैरालिम्पिक्स नाम से किया जाने लगा है जिसमें प्रायः आज विश्व के सभी देश हिस्सा लेते हैं और वहाँ के दिव्यांग खिलाड़ी इसमें भाग लेते हैं। वर्तमान में भारत के भाविनाबेन पटेल जिन्होंने टेबल टेनिस में रजत पदक जीता है जो कि पोलियोग्रस्त हैं तो वही योगेश कथूनिया जिन्होंने भी डिस्कस थ्रो में रजत पदक जीता है वे लकवाग्रस्त हैं। ऐसे हमारे देश के कई उमदा खिलाड़ी है जिन्होंने दिव्यांग होने के बावजूद भी दुनिया में अपनी कुशला से अपना कीर्तिमान स्थापित किया है।

   भारतीय समाज में दिव्यांग लोगों की कैसी स्थिति है यह समझने के लिए हमें हमारे भारतीय समाज और उसमें बसे भारतीय परिवारों में झांकना पड़ेगा। आज जहाँ 2023 तक आते-आते  दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में बहुत बड़े बदलाव आए हैं। वे अब समाज की मुख्य धारा से जुड़कर भारत के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। परन्तु आज से लगभाग दो दशक पहले क्या दिव्यांग लोगों की स्थिति उतनी ही सशक्त थी ये एक प्रश्न है। क्योंकि दिव्यांग लोगों के प्रति हमारे समाज में लोगों की धारणा वास्तव में कितनी भ्रामक है यह इस बात से ही पता चलता है कि आज भी कई दिव्यांग लोग सड़कों पर भिक्षाटन करते नज़र आते हैं। एक समय इतना भी भयानक सा चला था जब अच्छे-अच्छे घरों के मासूम बच्चों को भिखारियों के गैंग अगवा कर ले जाते थे और उन्हें अपंग बनाकर भिक्षा करवा कर अपने इस आपराधिक धंधे को चलाया करते थे। क्योंकि भारतीय मानसिकता हमेशा ऐसे लोगों पर दया करना जानती थी मगर सच्ची संवेदना स्वरूप दिव्यांग को सशक्त बनाकर उसे अपने जीवन में सही मार्ग पर चलने में सहायक नहीं बन सकी थी। वही परिवार में दिव्यांग सदस्य अपनी सदस्यता के आधार पर ही परिवार में सम्मान और देखभाल के पात्र बनते हैं। बुजुर्ग है तो उन्हें देखभाल और सम्मान तब तक मिलता है जब तक बदले में वे कुछ देते रहे। वही बच्चों में यदि दिव्यांग लड़की है तो उसे ताने मिलते हैं, माता-पिता उसके विवाह के लिए चिंतित रहते हैं। लड़का है तो उसके विवाह एवं जीवन संगीनी के चरित्र पर संदेह की स्थिति रहती है, जीवन साथी दिव्यांग है तो वह कभी-कभी स्वयं कुण्ठा ग्रस्त नज़र आता है। हाँ कभी-कभी ऐसे परिवार भी मिलते हैं जहाँ दिव्यांग सदस्य से परिवार के लोग बेशर्त ही प्यार करते हैं और देखभाल करते हैं। कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण मिला-जुला है।

2011 की जनगणना के सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 121 करोड़ की आबादी में से 2.68 करोड़ व्यक्ति दिव्यांग है जो कुल जनसंख्या का 2.21 प्रतिशत है। दिव्यांग जनसंख्या में 56 प्रतिशत अर्थात् 1.5 करोड़ पुरष हैं और 44 प्रतिशत अर्थात् 1.18 करोड़ महिलाएँ हैं। 2  बच्चों की दिव्यांगता की रिपोर्ट इससे दयनीय है। ये दिव्यांगता कई कारणों से है। जिनमें मुख्य रूप से सड़क दुर्घटना, पोलियों, जन्म के समय की बीमारी इत्यादि शामिल है। परन्तु अब इस ग्राफ़ में शायद पिछले कुछ समय से कमी आयी है। क्योंकि आज़ादी के बाद से ही भारत सरकार ने दिव्यांग व्यक्तियों को भी समाज की मुख्य धारा में जोड़े रखने के लिए कई कार्यक्रम चलाए है। दिव्यांग व्यक्तियों को कृत्रिम अंग प्रदान करके, नेत्र दान योगदान, पल्स-पोलियो टीकाकरण, जन्म से पहले गर्भस्त शिशु की बीमारी का पता लगाने, दिव्यांग व्यक्तियों को शिक्षा, स्वास्थ तथा नौकरी में आरक्षण एवं विशेष सुविधा आदि की व्यवस्था की गयी है। इसके अलावा भी कई अन्य सरकारी योजनाएँ भी उनके लिए समय-समय पर केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा गैर सरकारी संस्थानों द्वारा किया जा रहा है। इसका लाभ दिव्यांग लोगों को मिल रहा है एवं वे अब अन्य साधारण लोगों की भांति अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।आज का दिव्यांग व्यक्ति केवल शरीर से अपंग है परन्तु मानसिक रूप से सशक्त होने के कारण वह समाज में अपने महत्वपूर्ण योगदान देने से पीछे नहीं है।

 परन्तु दिव्यांगों के प्रति समाज की सोच में दयनीयता का भाव कैसे आया। इसका कारण था पराधीन समाज। हमारा भारतवर्ष जब अरबों और ब्रिटिशों का कई वर्षों तक गुलाम रहा तो उस समय साधारण शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्तियों का जीवन भी दयनीय स्थिति में चला गया था। ऐसे में दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में भी किस प्रकार के सुख की कल्पना की जा सकती थी क्योंकि किसी एक परिवार में दिव्यांग सदस्य होने से परिवार के अन्य लोगों के मन में उनके भविष्य को लेकर एक दुश्चिन्ता सताती रहती थी। इस बात को हम साहित्य के माध्यम से ही समझ सकते हैं। साथ ही यह भी समझ पाएंगे कि पराधीन भारत से लेकर आज़ाद भारत और विकसित भारत में दिव्यांग व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति में किस प्रकार परिवर्तन आया है।

हिन्दी कहानी में दिव्यांग पात्रों की अवधारणा प्रेमचन्द काल से ही चली आ रही है। प्रेमचन्द जी की कई कहानियों में दिव्यांग पात्रों की सामाजिक एवं पारिवारिक भूमिका देखने को मिलती है। वही उनके उनके समकालीन अन्य रचनाकारों की रचनाओं में भी दिव्यांग पात्र नज़र आते हैं जिनका कथानक में किसी-न-किसी प्रकार की भूमिका रही है। मुख्य भूमिका से लेकर गौण पात्र तक की भूमिका में नज़र आते रहे हैं। कभी-कभी प्रेरणा स्रोत के रूप में भी। इन्हीं के द्वारा समाज की कई कठोर सत्य को उजागर करने की कोशिश की जाती रही है। साथ-ही-साथ पाठकों के मन में ऐसे पात्रों के लिए न केवल संवेदना बल्कि सम्मान की भावना भी जगाने की कोशिश की गयी है। कुछ आधुनिक साहित्यकारों की रचनाओं में दिव्यांग पात्रों के नकारात्मक पक्ष को भी उजागर किया गया है। उपरोक्त सिद्धान्तों पर आधारित कई हिन्दी कहानियाँ है जिनमें हम दिव्यांग पात्रों के हर पहलू नज़र आते हैं जैसे प्रेमचन्द रचित पत्नी से पति, पंच-परमेश्वर, रांगेय राघव द्वारा रचित पंच परमेश्वर, अज्ञेय कृत खितीन बाबू, मालती जोशी कृत प्रतिदान, उमाकान्त खुबालकर द्वारा रचित एक था सुब्रतो। इन सभी कहानियों के द्वारा समाज में दिव्यांग व्यक्तियों की वास्तविक स्थिति को समझने में आसानी होगी। किस प्रकार हृदयहीन, विचारहीन समाज दिव्यांग व्यक्तियों के साथ अन्याय करता है उसका प्रमाण ये कहानियाँ है। वही यदि समाज में दिव्यांग व्यक्ति को किसी भी शारीरिक तथा मानसिक रूप से सशक्त व्यक्ति द्वारा थोड़ा सा भी अपनापन मिल जाए तो वह कैसे अपना प्रेम उनपर लुटाता है ये भी दर्शाया गया है।

प्रेमचन्द कृत कहानी पति से पत्नी पराधीन भारत, स्वतंत्रता संग्राम तथा कांग्रेस के आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर लिखित है। इस कहानी का मूल सारांश कुछ इस प्रकार है कि कहानी के मुख्य पात्र मिस्टर दीनानाथ सेठ को विलायती चीज़ों तथा विलायती जीवन शैली बहुत पसंद थी। वही उनकी पत्नी गोदवरी बिलकुल विपरीत थी। उन्हें स्वदेशी जीवन और स्वदेशी वस्तुओं से बहुत प्रेम था। जिस कारण वे अक्सर ही दुखी रहा करती थी क्योंकि सेठ जी घर में किसी भी स्वदेशी वस्तु को देखते तो क्रोधित हो जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने वाले मैदान में होली के दिन विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हो रहा था। उनकी होली जलाई जा रही थी। तब दोनों पति-पत्नी में स्वदेशी और विदेशी पर मतभेद हो जाता है और सेठ जी अपनी पत्नी को कमरे में अकेला छोड़ चले जाते हैं। उसी समय उनके घर के सामने से एक अंधा भिखारी कुछ गीत गाते हुए गुज़रता है। गोदावरी उसे भिक्षा देने के लिए बक्सा खोलती है और बड़ी मुश्किल से उसे एक घिसा हुआ एक पैसे का सिक्का मिलता है। वह उस सिक्के को भिक्षा के रूप में देते हुए संकोच करती है। पर अंत में वही सिक्का देकर भिखारी को एक पैसे का चबैना खाने के लिए कह देती है। अगले दिन जब मिस्टर सेठ उसे मनाने हेतु गोदावरी को फ्लावर शो में ले जाना चाहते हैं तो वह उन्हें मना कर देती है और कांग्रेस के जलसे में शामिल हो जाती है। वहाँ सभी आन्दोलन के लिए चन्दा देते हैं। तभी वहाँ वही अन्धा भिखारी भी आता है और आकर वही घिसा हुए सिक्का दान में दे देता है। आन्दोलन के आयोजक उसे भिखारी की संपूर्ण कमाई के रूप में दिखाकर लोगों से उसका मूल्य मांगते हैं और निलामी करते हैं। इस प्रसंग से गोदावरी लज्जित भी होती है और अपनी भूल सुधारने के लिए वही सिक्का सबसे अधिक भाव चुकाकर खरीद लेती है। पूरे शहर में इसकी चर्चा होती है जिसके फलस्वरूप मिस्टर सेठ को अपने अंग्रेज साहब से अपमानित होना पड़ता है और उनकी नौकरी भी चली जाती है। घर आने पर मिस्टर सेठ गोदावरी से इस बात पर झगड़ा भी करते है परन्तु वह हार मान जाते हैं। अंत में गोदावरी उन्हें कांग्रेस में शामिल होने के लिए कहती है। इस कहानी में प्रेमचन्द ने दिव्यांग व्यक्ति के प्रति हृदयहीन समाज के रूप को कुछ इस प्रकार दिखाया है जब भिखारी गोदावरी से भोजन मांगता है ---

अंधा – माता जी कुछ खाने को दीजिए। आज दिन भर से कुछ नहीं खाया।

गोदावरी – दिन भर मांगता है, तब भी तुझे खाने के नहीं मिलता?

अंधा – क्या करूं माता, कोई खाने को नहीं देता।3

इस प्रसंग में देखा जा सकता है कि पराधीन भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के साथा समाज किस प्रकार का अन्याय कर रहा था। माना कि उस समय भारत पराधीन होने के कारण कुछ व्यक्तियों को छोड़ आम मध्यम-वर्गीय भारतीय तथा निम्न मध्यम वर्गीय लोग आर्थिक रूप से इतने सशक्त नहीं थे। परन्तु एक भिखारी को एक समय का भोजन तो खाने के लिए दे ही सकते थे। केवल इतना ही नहीं वहाँ कहानी की पात्र गोदावरी भी चाहती तो अपने ही घर से उस भिखारी को खाने के लिए कुछ भी दे सकती थी। यही कारण है कि हमारे भारतवर्ष में आज भी कई लोग भूखमरी से इसीलिए मरते हैं। फिर दिव्यांग भिक्षुकों की दशा का दयनीय होना तो तय है ही। इसी प्रकार प्रेमचन्द जी ने अपनी एक और कहानी पंच-परमेश्वर में बूढ़ी मौसी जो कि अब बुढ़ापे के कारण उनका शरीर शिथिल पड़ने लगा था, कमर पूरी तरह से झुक गयी थी, उनपर अपने ही भांजे जुम्मन शेख द्वारा किए गए अत्याचारों को दर्शाया है। कहानी बड़ी सीधी सरल है। जुम्मन शेख और अलगु चौधरी दोनों बड़े पक्के मित्र होते हैं। दोनों की मित्रता इतनी गहरी होती है कि वे एक-दूसरे के खिलाफ कुछ भी बुरा नहीं सुन पाते हैं। जुम्मन शेख जब अपनी बूढ़ी मौसी को ठग कर उनकी सारी सम्पत्ति अपने नाम करवा लेता है तो वह पूरे गाँव से न्याय मांगती है। लेकिन जब उसे जब कोई मदद नहीं मिलती तो वह अलगू चौधरी के पास जाती है। वह उसे धर्म और न्याय का वास्ता देकर मदद करनी की गुहार करती है। निश्चित दिन पर पंचायत बैठती है तो जुम्मन खुद को बचाने के लिए पंचों में अलगू चौधरी का नाम सुझाता है। मगर जब अलगू चौधरी पंचों में शामिल होता है तो वह उचित न्याय करते हुए मौसी के पक्ष में फैसला सुनाता है। इससे जुम्मन शेख अलगू से नाराज़ हो जाता है। वही जब अलगू चौधरी का बैल समझू साहू के अत्यधिक अत्याचार से मर जाता है एवं समझू साहू अलगू चौधरी को बैल के पैसे देने से इंकार कर देता है तब दुबारा पंचायत बुलाई जाती है। तब जुम्मन शेख को भी मौका मिलता है अलगू चौधरी से बदला लेने का। मगर जब वह भी पंचों में शामिल होकर फैसला सुनाने वाला होता है तो उसकी भी अंतर-आत्मा उसे न्याय करने की ही प्रेरणा देती है। इधर अलगू चौधरी मन-ही-मन डरता है कि कही जुम्मन उससे बदला न ले लेकिन फैसला उसी है पक्ष में होता है। अंत में दोनों में सुलह हो जाती है। इस प्रकार कहानी का अंत हो जाता है। लेकिन प्रेमचन्द जी ने इस कहानी में वृद्ध एवं शारीरिक रूप से दुर्बल हो चुके सदस्य के साथ घर के लोगों का कठोर एवं हृदयहीन व्यवहार को बड़ी स्पष्टता से उजागर किया है। यथा – जुम्मन शेख़ की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी। उसके पास कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी; परन्तु उसके निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लम्बे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का ख़ूब आदर-सत्कार किया गया। उन्हें ख़ूब स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गए। हलवे-पुलाव की वर्षा-सी की गई; पर रजिस्ट्री की मोहर ने इन ख़ातिरदारियों पर भी मानो मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज़, तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मन शेख़ भी निठुर हो गए। अब बेचारी खालाजान को प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं।4 ऐसे व्यवहार वास्तव में किसी भी विवेकशील व्यक्ति के लिए लज्जा की बात होगी। परन्तु स्वार्थी कठोर संसार अब लज्जा की परिभाषा को केवल अपने स्वार्थ के लिए समय-समय पर बदलता रहता है। इसी कहानी में बुढ़ी मौसी के कष्टों को भी प्रेमचन्द ने दर्शाया है। जब जुम्मन और उसकी पत्नी के अत्याचारों से तंग आकर वह पंचायत करने की धमकी देती है और मदद के लिए गाँव-गाँव जाती है। इसके बाद कई दिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिए आस-पास के गांवों में दौड़ती रहीं. कमर झुक कर कमान हो गई थी. एक-एक पग चलना दूभर था; मगर बात आ पड़ी थी. उसका निर्णय करना ज़रूरी था।बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसके सामने बुढ़िया ने दुःख के आंसू न बहाए हां। किसी ने तो यों ही ऊपरी मन से हूं-हां करके टाल दिया, और किसी ने इस अन्याय पर ज़माने को गालियां दीं!।5  इस प्रसंग से पता चलता है कि लोग किस प्रकार दिखावा करना जानते हैं परन्तु वास्तव में किसी में सच्चा साहस ही नहीं होता कि एक असहाय की सहायता करे। यही हमारे समाज का वास्तविक हाल है और आज भी ऐसा ही चल रहा है। लोगों की उदासीनता के कारण ही समाज में दिन-ब-दिन ऐसी घटनाएँ घटित होती है जहाँ वृद्धों को अंत में विवश होकर सड़क किनारे या वृद्धाश्रम में आश्रय लेना पड़ता है। दिव्यांग व्यक्तियों के साथ भी यही होता है।

पराधीन भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन के कष्टों को जहाँ प्रेमचन्द की उपरोक्त दोनों कहानियाँ अभिव्यक्ति प्रदान करती है वही रांगेय राघव द्वारा रचित कहानी पंच परमेश्वर जो कि प्रेमचन्द की कहानी से बिलकुल अलग और यथार्थ के धरातल पर लिखित है। इसमें न केवल दिव्यांग पात्र के मन की कुण्ठा को दर्शाया गया है बल्कि उसके खल चरित्र को भी दर्शाया गया है। हाँ ये कहानी एक ऐसे दिव्यांग चरित्र के बारे में है जो कि कहानी के क्लाईमेक्स तक आते-आते खल पात्र में बदल जाता है। कहानी दो सौतेले भाई कन्हाई और चंदा के बारे में हैं। दोनों एक ही पिता के बेटे हैं। कन्हाई की माँ को उसके पिता है छोड़ दिया था एवं अपनी भाभी से विवाह कर घर बसा लिया था। कन्हाई एक आँख से अंधा है। जब चंदा की माँ की मृत्यु हो जाती है तो दोनों भाई मिलकर उसका दाह संस्कार करते हैं। फिर कन्हाई के मन में चंदा के लिए दया जगती है। वह बहुत जतन करके चंदा का विवाह करता है। चंदा गरीब है इसलिए वह दूसरे गाँव में मिट्टी खोदने और दूसरे काम करके पैसा कमाता है। कन्हाई को पास पैसा है तथा अपनी सब्जी की दुकान भी है। साथ ही अपना गधा भी है जिसको वह किराय पर देकर पैसे कमाता है। एक दिन चंदा की पत्नी कन्हाई के घर के आंगन में नहा रही थी तभी कन्हाई वहाँ आकर उसे उस अवस्था में देख लेता है। उसके मन में चंदा की पत्नी फूलो का यौवन समा गया। जब वह फूलो को अपने घर जाते समय उसे दो ककड़ी खाने के लिए देता है तो फूलो उसे लेकर घर चली जाती है। चंदा उससे पूछने पर फूलो झूठ बोल देती है कि उसने कन्हाई की दुकान से खरीदे हैं। चंदा इस बात पर कन्हाई की आलोचना करता है। जिससे कन्हाई के मन में चंदा के प्रति द्वेष की भावना भर जाती है क्योंकि उसने चंदा की सहायता की उसका घर उसी ने ही बसा कर दिया था। वह फूलो के स्वभाव से भी दंग रह जाता है क्योंकि फूलो न तो कन्हाई को जेठ जैसा सम्मान देती थी न ही अपने पति का ध्यान रखती थी। वह केवल अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचती थी। कन्हाई के मन में चंदा के प्रति ईर्ष्या का भाव जग चुका था और वह चंदा से बदला लेना चाहता था। वह फूलो को बहला फुसला कर अपने घर बिठा लेता है। जब चंदा शाम को मिट्टी लादने के काम से वापस घर आता है तो उसे फूलो कही दिखायी नहीं देती। वह सोचता है कि वह अपने माईके गयी हुई होगी लेकिन फूलो उसे वहा भी नहीं मिलती। वह दो दिन तक फूलो की खोज-खबर करता है। मगर जब उसे पड़ोसी से पता चलता है कि फूलो कन्हाई के घर है तो वह उसे लेने जाता है मगर फूलो उसके साथ वापस जाने के मना कर देती है। चंदा इस बात है बहुत नाराज होता है। चंदा और कन्हाई में फूलो को लेकर लड़ाई भी हो जाती है  और वह कन्हाई को पंचायत की धमकी देता है। मगर कन्हाई पंच चौधरी को नशे की रिश्वत देकर अपने अधिकार में फैसला करा लेता है। चंदा की गरीबी, वादा खिलाफी आदि बातों से वह पंचों को अपनी तरफ करवा लेता है और चंदा पर ही फूलो पर किए तथाकथित अत्याचार के बदले जुर्माना करवा लेता है।

इस कहानी में रांगेय जी ने कन्हाई की कुण्ठा और ईर्ष्या को साफ दर्शाने की कोशिश की है। यथा –"अपमान से कन्हाई का पुरुषत्व क्षण-भर को विषधर सांप की तरह बदला लेने की स्पर्धा से भर गया. क्यों है वह आज ऐसा कि बिरादरी में लोग उसके पास पैसा रहने पर भी उसकी इज़्ज़त नहीं करते? सब उसे देखकर हंसते हैं. और यह चन्दा! जो कुल दस-बारह आने लाता है, उसी में गिरस्ती चलाता है, उसको न्यौता भी है, बुलावा भी है, उसके गीत भी हैं...XXXXXक्योंकि वह बिजार नहीं है. उसके घर है, उसकी बात है, एक गिरस्त की बात, जिसमें दुनियादारी की समझ है. उसका कोई था ही नहीं जो उसका ब्याह कराता. जैसे वह तो आदमी ही न था. तभी भी सब अपने-अपने में लगे थे, आज भी वही.6 वही आगे कन्हाई हारकर लेट गया. किंतु वह क्यों अकेला रहे? चंदा को ऐसे सुख से रहने का ऐसा क्या हक है? जन्म हुआ तब से उसे कभी सुख-चैन न मिला. वह दूसरों के लिए कर-करके मरता गया और लोग-बाग अपना-अपना घर भरते गए. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि भैया कन्हाई, तेरे भी कुछ सुख-दुख हैं? कोई नहीं. सब अपने-अपने मतलब के.7 यहाँ  कहानी में व्यक्त इन बातों स्पष्ट हो जाता है कि कैसे समाज में लोग एक-दूसरे का व्यवहार करते हैं। कैसे समाज तय करता है कि किस व्यक्ति के लिए क्या करना है जिससे लाभ हो। लाभ मिल जाने के बाद उस व्यक्ति को छोड़ दो, उसके सुख-दुख या आवश्यकताओं से जैसे समाज का कोई लेना देना ही नहीं है। कन्हाई के पास पैसा है। तो लोगों ने उसका भरपूर फैयदा उठाया। यहाँ तक कि चंदा ने भी उसका फायदा उठाया। जिस चंदा की उसने इतनी बड़ी विपत्ति में साथ दिया। उसका घर बसा कर दिया। मगर वही चंदा फूलो के झूठ पर विश्वास करके अपने बड़े भाई की आलोचना एवं उसके एक आँख खराब होने को लेकर ताना देता है। कन्हाई की यही कुण्ठा उसे अपने छोटे भाई की पत्नी के साथ, जिसे वह अपनी बहन, बेटी या बहू के रूप में देखना चाहिए था उसके साथ घर बसाने एवं चंदा से बदला लेने को विवश कर देता है। कहानी के अंत में आकर उसका खल चरित्र दिखने लगता है जब वह पंचायत के सामने चंदा द्वारा फूलो के पिता को किया वादा कि वह फूलो को जेवर देगा, मगर पूरा न हो सका। वह चंदा द्वारा फूलो पर किए गए अत्याचार एवं उसकी गरीबी, फूलो को भरपेट भोजन न दे पाने की असमर्थता आदि की बात कहके उलटे चंदा पर ही जुर्माना करवा देता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सभी दिव्यांग व्यक्ति लाचार या समाज की दया पर नहीं जीते। जिनके पास सामर्थ्य है वह अपने लिए कुछ भी कर सकता है। वही रांगेय जी ने यह दर्शाने की कोशिश की है कि समय के साथ व्यक्ति चरित्र में परिवर्तन आना स्वाभाविक है फिर चाहे वह कैसा भी हो। इतिहास भी गवाह है कि कैसे अंधे धृतराष्ट्र एवं अपंग शकुनी की स्वार्थपरता एवं कुशाग्र बुद्धि क्रमशः महाभारत के युद्ध का कारण बनती है। फिर तो ये साधारण ग्रामीण कन्हाई है।

अब आते है अज्ञेय कृत खितीन बाबू कहानी पर। ये कहानी एक ऐसे दिव्यांग व्यक्ति की कहानी है जिसके जीवन में बार-बार दुर्घनाग्रस्त होना एवं अपना एक-एक अंग खोते जाने पर भी जिंदादिली से जीना और हंसते-मुस्कुराते हुए दूसरों को प्रेरणा देती है। अज्ञेय जी ने यह कहानी सच्ची घटना पर लिखी है। जब उनकी पहली भेंट खितीन बाबू से उनके एक मित्र के वहाँ हुई तब खितीन बाबू की एक आँख नहीं थी और एक हाथ नहीं था। उसके बाद कई महीनों बाद वे खितीन बाबू से मिले। तो पता चला कि उनका एक पैर भी कटवाना पड़ा है। रेलगाड़ी से हुई दुर्घटना के कारण उनका एक पैर कट गया। अज्ञेय जी जब उनसे मिलते हैं तो खितीन बाबू हंसते हुए उनसे मिलते हैं। तब वे अज्ञेय जी को बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपनी टांसिल तथा एपेंडिक्स भी कटवा लिए थे। इसके बाद फिर कई दिनों बाद वे दुबारा मिलते हैं तो खितीन बाबू की दूसरी बाँह भी कटी हुई थी। वे रिक्शे से गिर गये थे और कोहनी टूट गयी थी। घाव दूषित हो जाने के कारण दूसरा हाथ भी गंवाना पड़ा। वे काफी दिनों तक हस्पताल में पड़े रहे। किसी प्रकार वे बच गए थे। परन्तु खितीन बाबू में जोश की कोई कमी नहीं थी। बल्कि वे अपने मित्र की पत्नी से खाना बनवा रहे थे जिसका सारा तरीका वे बताए जा रहे थे। क्योंकि वे पाकविद्या के आचार्य थे। अज्ञेय जी को वह वहाँ भोजन-विलासी और शय्या-विलासी की कहानी भी सुनाते हैं। इसके बाद दुबारा मिलने पर खितीन बाबू की दूसरी टाँग भी कटी हुई थी। मगर खितीन बाबू अज्ञेय जी से मिलते ही बोल पड़ते हैं कि बचे रहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। फिर पाँचवी बार भी उनके साथ एक सड़क दुर्घटना में शरीर घायल हो जाता है। जो मोटर-ठेला उनसे टकराता है वह उनकी बाँह के ठूठ के ऊपर से चला जाता है। इस कारण उनका कन्धा भी शरीर से निकालना पड़ता है। मगर खितीन बाबू ये जान पाते हैं कि इसके बिना भी जिया जा सकता है। अपने शरीर के एक-एक अंग के इस प्रकार दुर्घटनाग्रस्त होकर चले जाने पर भी उनकी आत्मा की चमक उनके शरीर से गायब नहीं होती थी। परन्तु अंतिम बार की दुर्घटना में वे ज्यादा दिन तक नहीं बच सके। शरीर में विष फैल जाने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है। परन्तु वे हर बार दुर्घटनाओं से जिंदा बच आने के कारण अतीव उत्साह में रहते थे। यही कारण है कि अज्ञेय जी ने उनकी इस सच्ची घटना को कहानी का रूप देकर दर्शकों के सामने यह आदर्श रखने की चेष्टा की कि व्यक्ति का शरीर भले ही कष्ट पा जाता है। परन्तु जब तक आत्मा कष्ट नहीं पाती है व्यक्ति जीवन में सुखी रह सकता है तथा और को भी सुख से जीने की प्रेरणा दे सकता है। इस कहानी में अज्ञेय जी ने खितीन बाबू के जीवन्त व्यक्तित्व को कुछ इस प्रकार से दर्शाया है –"मैं अवाक् उन्हें देखता रहा। पर उनकी हँसी, सच्ची हँसी थी, और उनकी आँखों में जीवन का जो आनन्द चमक रहा था, उसमें कहीं अधूरेपन की पंगुता की झाई नहीं थी। उन्होंने शरीर के अवयवों के बारे में अपनी एक अद्भुत थ्योरी भी मुझे बताई थी; यह ठीक याद नहीं कि वह इसी दूसरी भेंट में या और किसी बार, लेकिन थ्योरी मुझे याद है, और उनका पूरा जीवन उसका प्रमाण रहा।8 वह थ्योरी यही थी कि अपने शरीर की पंगुता को अपने व्यक्तित्व में हावी नहीं होने देना। जो मिला है उसी में अपने आप को पूरी तरह से जीना। खितीन बाबू का पूरा जीवन इसी थ्योरी को प्रमाणित करता है। तो वही आगे वे खितीन बाबू के बारे में लिखते हैं कि –"उन्हें देखते हुए मुझे बचपन में आत्मा के सम्बन्ध में की गयी अपनी बहसें याद आ गयी। आत्मा है, तो शरीर में व्याप्त है, या किसी एक अंग में रहती है? अगर सारे शरीर में, तो, कोई अंग कट जाने पर क्या होता है? अपनी थ्योरी याद आ गयी, जिसमें इस पहेली को हल कर दिया गया था, कि जब कोई अंग कटता है, तो उसमें से आत्मा सिमट कर बाकी शरीर में आ जाती है, पंगु नहीं होती। यह थ्योरी कहाँ तक मान्य है, इस बहस में तो वैज्ञानिक पड़ें, पर उनको देखते हुए उनके बारे में जरूर इसकी सच्चाई मानो ज्वलन्त होकर सामने आ जाती थी, उनकी आत्मा न केवल पंगु नहीं थी, वरन् शरीर के अवयव जितने कम होते जाते थे, उसमें आत्मा की कान्ति मानो बढ़ती जाती थी मानो व्यर्थ से सिमट-सिमटरकर आत्मा बचे हुए शरीर में और घनी पुंजित होती जाती-सारे शरीर में भी नहीं, एक अकेली आँख में - प्रेतात्माओं से भरे हुए विशाल शून्य में निष्कम्प दिपते हुए एक आकाश-दीप के समान...9 यहाँ शरीर और आत्मा के सम्बन्ध को बताते हुए अज्ञेय जी ने खितीन बाबू के चरित्र के जरिए ये प्रमाणित किया है कि शरीर भले ही पंगु हो सकता है मगर आत्मा नहीं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आज तक हमारे भारत में ही ऐसे कई दिव्यांग व्यक्ति है जिन्होंने अपने शरीर की पंगुता को अपने जीवन में हावी होने नहीं दिया। यहाँ तक की उन्होंने अपनी इस कमी के बावजूद भी विश्व में देश का नाम ऊँचा किया है। जैसे 2021 की पैराओलिम्पिक चैम्पियन में अवनी लेखरा का नाम लिया जा सकता है जिनके दोनों पैर तथा शरीर का निचला हिस्सा एक दुर्घटना में पैरालाइस्ड हो जाता है।

इसी प्रकार हम एक और कहानी ले सकते हैं मालती जोशी की प्रतिदान ये कहानी हमें यथार्थ के धरातल पर ले जाकर समाज की ऐसी कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जो कि हम पाठको को आत्म मंथन करने पर विवश कर देती है। साथ ही यह भी दर्शाती है कि वर्तमान समय में टी.वी पर सिनेमा या अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों में दिखाए जाने वाले दिव्यांग पात्रों के मुकाबले साधारण सच्चे दिव्यांग पात्रों के जीवन और रहन-सहन में कितना अंतर है। कहाँ कोरी-कल्पना और कहाँ जीता-जागता इंसान। कहानी की पात्र संध्या जिसका विवाह श्रीधर से होने वाला है। श्रीधर संध्या को अपने अपाहिज भाई के बारे में बताता है। 15 साल की आयु में एक बस दुर्घटना में उसके दोनों पैर बेकार हो गए थे। दोनों भाई के पिता नहीं थे। विधवा माँ ने ही सारे कष्ट सहन करके उन दोनों को बड़ा किया था। संध्या के मन में अपनी सास और देवर के लिए श्रद्धा जगती है। श्रीधर और संध्या का विवाह उनके ताऊजी के घर होता है। लोकाचार के बाद जब संध्या पहली बार अपने ससुराल जाती है तो वहाँ उसका जोर-शोर से स्वागत होता है। उसे पता चलता है कि उसका देवर उद्धव इस विवाह से बहुत प्रसंन्न था एवं घर की सफेदी, बंदनवार, रतजगा आदि सब उसी ने करवाए थे। जब वे लोग घर पहुंचते हैं तो दोनों भाइयों का मिलन होता है फिर संध्या उद्धव से पहली बार मिलती है। उद्धव तो बड़े प्रेम से उसका हाथ पकड़ता है मगर जैसे ही संध्या उद्धव को देखती है तो वह उसे पूरी आंतरिकता के साथ स्वीकार नहीं कर पाती है। उसके मन की बात को उद्धव न जाने कैसे समझ जाता है और संध्या का हाथ छोड़ देता है। फिर संध्या को कई दिनों तक ग्लानी महसूस होती है लेकिन वह किसी से कुछ कह नहीं पाती है। फिर वे दोनों अपने घर वापस चले जाते हैं। दुबारा संध्या और श्रीधर अपनी पहली बेटी पम्मी के जन्म होने पर उसे माँ जी को मिलवाने आते हैं। पम्मी को पाकर संध्या की सास बहुत खुश हो जाती है और वह उसे बहुत दुलार करती है। संध्या भी अपनी सास और देवर को खुश करने की कोशिश करती है। एक दिन जब संध्या स्नान करने जाती है तो उसे सुनाई देता है कि उद्धव पम्मी को गोद में लेने के लिए अपनी माँ से कह रहा है। संध्या को यह बहुत बुरा लगता है कि उसकी अनुपस्थिति में उद्धव उसकी बच्ची को प्यार करना चाहता है जैसे कि वह चोरी कर रहा हो। फिर वह किसी तरह कपड़े पहनकर आती है और उद्धव की गोद से अपना बच्चा छीन लेती है। तभी वहाँ संध्या की सास भी आ जाती है। अपने बेटे के इस अपमान को वह समझ जाती है मगर वह संध्या से कुछ नहीं कहती। उसके बाद संध्या और श्रीधर दुबारा वहाँ से चले जाते हैं। वह संध्या की घर की अंतिम यात्रा थी। संध्या को इस बार अपनी गलती का एहसास होता है, वह उनकी गलतफहमियाँ भी दूर करना चाहती थी मगर उसे स्वयं पर विश्वास ही नहीं रह गया था। संध्या उद्धव को देखना चाहती थी मगर संकोच के कारण नहीं जा पाती थी, श्रीधर का ही केवल घर आना-जाना होता है। यहाँ तक कि उद्धव की मृत्यु के समय में भी संध्या उसे देखने नहीं जा सकी। अंत में श्रीधर अपनी माँ को अपने शहर वाले घर लेकर आता है। संध्या को दूसरा बच्चा होने वाला था। एक शाम उसे तेज़ दर्द महसूस होता है और वह श्रीधर के साथ निर्सिंग होम चली जाती है। संध्या को खयाल आता है कि जाने से पहले वह सास को बताकर नहीं आयी है जिससे उसे ग्लानी महसूस होती है। परन्तु उसकी सास पम्मी को लेकर निर्सिंग होम पहुँच जाती है। संध्या की तकलीफ को देखकर माँ जी बहुत परेशान हो जाती है और उसका हाथ थामें रहती है। संध्या को उस वक्त अपनी माँ तथा सास दोनों के जीवन की तकलीफे जन्म देने तथा अपनी ही एक संतान को खो देने की सारी बातें याद आने लगती है। अंत में संध्या को एक बेटा पैदा होता है। संध्या अपनी सास को कहती है कि ये उसका बेटा नहीं बल्कि उद्धव का पुनर्जन्म हुआ है। इस प्रकार कहानी के अंत में प्रतिदान शब्द सार्थक होता है।

इस कहानी में मालती जोशी जी ने ये दर्शाने की चेष्टा की है कि कैसे परिवार के लोगों में जब मन में किसी प्रकार का संदेह, संकोच या घृणा का भाव उत्पन्न हो जाता है तो परिवार के लोगों को ही इससे क्षति पहुँचती है। वही अतिरिक्त काल्पनिकता भी हमारे लिए क्षतिकारक हो सकता है क्योंकि इससे हम वास्तविकता के साथ सही मायने में नहीं जुड़ पाते हैं। संध्या ने केवल सिनेमा और उपन्यास में ही दिव्यांग पात्रों को देखा और समझा था। परन्तु दोनों में वास्तविकता का लेश मात्र भी नहीं होता है। सिनेमा मनोरंजन के लिए बनाई जाती है तो उसमें दिव्यांग पात्र हो या शारीरिक रूप से सशक्त पात्र हो दोनों को ही सजा-संवारकर दिखाना लाजमी है क्योंकि वह बाज़ार में इसी के बलबूते बिकता है। वहाँ लोग सिनेमा के पात्रों के चरित्र को कम उसके बाहरी साज-सज्जा को अधिक अपनाते हैं। वही उपन्यास के दिव्यांग पात्रों को साहित्यकार सजाते। साहित्यकार की संवेदनशील, काल्पनिक और आंतरिक आँखे होती है जो दिव्यांग पात्र के बाहर के शरीर को नहीं बल्कि अंतर की आत्मा को देखते हुए दिव्यांग पात्रों की रचना करता है। अतः ऐसे में सिनेमा और उपन्यास से आम पाठकों का मन भ्रमित सा ही रहता है। एक तरफ वह सिनेमा से बाहरी आवरण को अपनाता है तथा दूसरे से वह जिस आंतरिकता को अपना रहा है वह भी बाहरी ही होता है। परन्तु वास्तविक रूप में दिव्यांग पात्र ऐसे नहीं दिखते। इसी चीज को मालती जोशी ने अपनी कहानी में बहुत स्पष्ट रूप से दर्शाया है –  मेरी कल्पना का उद्धव यह नहीं था। मेरी कल्पना का उद्ध सिनेमा और उपन्यासों का मरीज था – लाख कष्टों के बावजूद जिसके चेहरे की कांति अक्षय रहती है, वेदना और यंत्रणा जिसे और आकर्षक बना देती हैं।...मेरे सामने जो उद्धव था, वह यथार्थ का उद्धव था। किशोरावस्था में ही अपंग हो जाने के कारण वह बुझ-सा गया था। अपनी विवशता की पीड़ा और कर्मण्यता का अहसास, अभावों में पले उसके कंकालप्राय चेहरे को और भी कठोर बना गया था। हृदय से न सही, पर उसे अपनी समस्त आंतरिकता के साथ मैं ग्रहण न कर सकी। अपनी कल्पना का यह विद्रुप मुझसे सहा नहीं गाय।10 वही जब उद्धव अपनी माँ से अनुरोध करता है कि वह पम्मी को गोद में लेकर प्यार करना चाहता है तो संध्या के मन के विचार कुछ इस प्रकार दर्शाया गया है— इस बार उसके स्वर में बला की आजिजी थी। शायद तभी तो माँजी से नहीं रहा गया होगा। उसका असीम दैन्य मुझे खल गया। मुझसे छिपाकर मेरी बच्ची को देखने का प्रस्ताव ऐसा ही कुस्तित लगा, जैसे मेरी अनुपस्थिति में किसी ने मेरे जेवरों का बक्स खोल लिया हो। उसके कंकालप्राय खुरदरे हाथों द्वारा पम्मी के शरीर के सहलाए जाने की कल्पना से मैं सिहर उठी। क्या पता उसने अपने घिनौने मुख से उसे चूम भी लिया हो।...पता नहीं कौन-सी बात मेरे मन में पड़ गई कि किसी तरह बेतरतीबी से साड़ी पहन मैंने दरवाजा खोल दिया और झटपट उसकी गोद से पम्मी को उठा लिया।11  इन्हीं बातों से स्पष्ट हो जाता है कि निम्न मध्यम परिवारों में दिव्यांग व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है तथा किस प्रकार का कष्ट भी उन्हें होता है। उद्धव के साथ किये गये इस प्रकार के व्यवहार न केवल असहनीय वरन लज्जा जनक है। हाँ सब व्यक्तियों में इतनी आत्मीयता नहीं हो सकती कि वे दिव्यांग व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार करे परन्तु सामने से ही उसका अपमान कर देना वास्तव में हमारे ही व्यक्तित्व की कमी को दर्शाता है।

अब आते है उमाकान्त खुबालकर द्वारा रचित कहानी एक था सुब्रतो ये एक शरारती स्कूली बच्ची की कहानी है। सुब्रतो बहुत ही शरारती बच्चा था। उसकी शरारतों के कारण न केवल स्कूल के बच्चे परेशान रहते बल्कि, टीचर, प्रिंसिपल, चपरासी तक परेशान हो जाते। उसके माता-पिता भी उसकी शरारतों से डरते थे। क्लास के सहपाठी के बैग में मरी हुई छिपकली रखना, गली के कुत्तों को पीटना, मोहल्ले की लड़कियों को भूत बनकर डराना उसका नित्य कर्म था। परन्तु वह पढ़ाई में विशेष कर गणित और विज्ञान में बहुत तेज़ था। यही कारण था कि उससे कोई कुछ नहीं कह सकता था। एक दिन घर की बिजली चली गयी थी। उसके माता-पिता बाहर पड़ोसी से बात कर रहे थे। उधर बरामदे का स्विच बोर्ड खुला हुआ था। मौका पाकर सुब्रतो ने टार्च की दो सेल खोलकर स्विच बोर्ड की दो नंगी तारों से लगा देता है। इस वजह से सुब्रतो को करंट लग जाता है और उसके दोनों हाथ स्विच बोर्ड से लग जाते हैं। बड़ी मुश्किल से उसे छुड़ाया जाता है। वह हस्पताल में भर्ती होता है। वहाँ डॉक्टर उसके माता-पिता को सूचित करते हैं कि यदि उसके दोनों हाथ काटे नहीं गए तो उसकी जान बचाना मुश्किल होगा। सुब्रतो के दोनों हाथ ऑपरेशन करके काट दिए जाते हैं। इस घटना से सुब्रतो बहुत आहत होता है। वही उसके स्कूल के सभी मित्र एवं शिक्षकगण उससे मिलने आते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। जल्द ही सुब्रतो अपने इस दुख पर कामयाबी पा लेता है। वह अपने पैरों की उंगलियों से लिखने की कोशिश करता है और कामयाब हो जाता है। लोग सुब्रतो की इस कामयाबी से चकित हो जाते हैं और उसे देखने आते हैं। काफी लम्बे समय बाद सुब्रतो दुबारा स्कूल जाना शुरु करता है। परन्तु स्कूल में सुब्रतो के जाते ही उसकी शांत, बुझी-बुझी प्रकृति देखकर रोने लग जाते हैं। परन्तु सुब्रतो जल्द ही इस परिस्थिति को अपनी एक और शरारत से काबू कर लेता है और सबको दुबारा हंसने पर मजबूर कर देता है। उसके टीचर उसे आकर उसे प्यार से सराहते हैं। वही उसके स्कूल प्रिंसिपल भी आकर उसे देखकर हंस रहे होते हैं। सभी बच्चे प्रिंसिपल से सुब्रतो को बेस्ट ब्वॉय ऑफ द स्कूल का खिताब दिए जाने की मांग करते हैं। प्रिंसिपल सबकी बात मान लेते हैं। सुब्रतो को तब ऐसा लगता है कि जैसे उसके हजारों हाथ हैं। वह निर्णय लेता है कि जीवन में वह कुछ बनकर रहेगा। कहानी के अंत में सुब्रतो जब घर जा रहा होता है तो गली के कुत्ते उस पर भौंकते हैं मगर सुब्रतो के पैरों की हरकत देखते ही वे शांत हो जाते हैं।

इस प्रकार ये छोटी सी कहानी हमें कई संदेश दे जाती है। एक तो यह कि जीवन में कब क्या होगा किसी को पता नहीं। कौनसी दुर्घटना हमारे जीवन को तहस-नहस कर सकती है, बदल सकती है इसका अंदाज़ा कभी नहीं किया जा सकता। दूसरा अपनी परिस्थिति को स्वीकार कर लेने से उसमें जीने की भी क्षमता विकसित हो जाती है। सुब्रतो के साथ जो भयानक दुर्घटना घटी उससे वह किसी प्रकार बच गया। परन्तु वह केवल एक छोटा सा बालक है। उसके आगे का बहुत बड़ा जीवन पड़ा हुआ है। परन्तु सुब्रतो अपनी इतनी बड़ी क्षति होने पर भी उससे हार नहीं मानता है और अपने पैरों से लिखने की कोशिश करते-करते कामयाबी पा लेता हैं। कहानीकार उमाकान्त खुबालकर जी ने सुब्रतो की इस कामयाबी को बहुत ही सीधे-साधे परन्तु सीधे दिल में उतरने लायक ढंग से पेश किया है – ऑपरेशन के बाद जब उसे होश आया और उसे अपने दोनों हाथ कटने की बात मालूम हुई, तो वह फूट-फूटकर रोया। उसे देखने के लिए पूरा स्कूल ही उमड़ पड़ा। अस्पताल का कमरा गुलदस्तों, शुभकामनाओं से भर गया। अखबारों ने सुब्रतो के बारे में खूब छापा। कुछ ही महीनों में सुब्रतो तंदरुस्त हो गया। उसके हाथ कट गए थे, अब वह घर में बैठकर पैरों की अंगुलियों से लिखने की कोशिश करने लगा। आखिरकार एक दिन उसे सफलता मिल गई। पैर की अंगुलियों से लिखने का करिश्मा देखने के लिए घर पर रोजाना भीड़ लगने लगी। उसे फिर से स्कूल भेजा गया।12

            निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि इन सभी कहानीकारों ने अपने-अपने समय, काल एवं परिस्थिति के अंतर्गत अपने समाज के आस-पास दिव्यांग व्यक्तियों को देखा, उन्हें जाना, समझा, पहचाना तथा अपनी कहानी में पात्र के रूप में रखा। किसी के लिए ये पात्र नायक रूप में रहे जैसे खितीन बाबू, कन्हाई, सुब्रतो। तो किसी के लिए ये मुख्य पात्र के साथ सहायक पात्र के रूप में रहे जैसे अंधा भिखारी, बूढ़ी खाला, उद्धव। किसी को इनकी दयनीयता दिखी तो किसी में खल चरित्र। परन्तु ये अवश्य कहा जा सकता है कि सभी पात्र जीवन्त है क्योंकि वास्तविक समाज से इनका पूरा लेना-देना है। वास्तविक समाज में दिव्यांग व्यक्ति बहुत मिलते हैं। हम दिव्यांग व्यक्ति को देखकर कदाचित उनके जीवन के कष्टों की कल्पना करके कुछ देर के लिए खेद प्रकट कर लेते हैं परन्तु बहुताया उन्हें हम अनदेखा या उपेक्षा करके चले जाते हैं। परन्तु इन्हीं लोगों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो जीवन की कई सीख तथा प्रेरणा समाज को दे जाते हैं। वही कुछ दिव्यांग अपनी परिस्थिति एवं अपनी कुण्ठा से ग्रसित होकर समाज के सामने अपना खराब पक्ष भी रखते हैं। परन्तु इनमें से किसी को भी अनदेखा करना हमारे समाज के लिए सही नहीं है। क्योंकि समाज तभी विकसित हो सकता है जब हम सभी को विकसित होने का अवसर दे, उन्हें समझे, उनकी दुविधाओं को दूर करें, उनकी मनःस्थिति को समझे और उन्हें अपने जीवन में आगे आने में मदद करें। अन्यथा यही लोग आगे चलकर समाज के लिए बोझ या फिर मुसीबत बन सकते हैं। क्योंकि  उपेक्षा से अक्सर आक्रोश जन्म ले सकता है।

 

 

संदर्भ

1.    https://www.paris2024.org/en/the-history-of-the-paralympic-games/#:

 

2.    http://www.ccdisabilities.nic.in

3.    https://bejodjoda.com/literature/stories/kahani-patni-se-pati-by-munshi-premchand/

4.    https://www.femina.in/hindi/sahitya/kahani/story-panch-parmeshwar-by-munshi-premchand-4693.html

5.    वही.

6.    https://www.femina.in/hindi/sahitya/kahani/panch-parmeshwar-by-rangey-raghav-5017-4.html

7.    वहीं

8.    https://www.hindikahani.hindi-kavita.com/KhitinBabuAgyeya.php

9.    वहीं

10. कथा संचय(कहानी संकलन) –संपादक डॉ आशा डी. शिरोलीकर, हिन्दी विभाग, माऊंट कार्मल कॉलेज द्वारा प्रकाशित, पृ,सं –58

11.  वही. पृ.,सं.—60

12.  एक था सुब्रतो(बाल एवं किशोर कहानियाँ) – लेखक- उमाकांत खुबालकर, राजेश प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ.,सं. -- 16

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

शंबूक लघु प्रश्नोत्तरी

 १  शंबूक खंड काव्य के रचनाकार कौन है?

जगदीश गुप्त

२ विष–दंश से गोरी देह क्या पड़ने लगी?

स्याह 

३ विपथ होकर पुष्पक यान किस दिशा की ओर चल पड़ा?

उत्तर दिशा

४ किसका दरबार ज्योति मंडित दिव्य राजद्वार के पीछे है?

राम का दरबार

५ संवेदना का मर्म कौन समझ सकता है?

लोकनायक 

६ शंबूक वध से पहले कितने मनस्वी व्यक्तियों के बीच संवाद हुआ?

दो

७ वन में राम का स्वागत के लिए कौन करते हैं?

वनदेवता 

८ किसके भय से सगे–संबंधियों ने शंबूक को त्याग दिया था?

मुनियों के शाप के भय से

९ जहां व्यक्ति का सम्मान हो, वह समाज कैसा है?

सुसंस्कृत 

१० मानव कर्म के आयाम क्या है?

पाप–पुण्य

११ राम को कितने वर्ष का वनवास मिला था?

१४

१२ क्षुब्ध ब्राह्मण क्यों शाप दे रहा था?

क्योंकि उसके पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई थी।

१३  शंबूक के अनुसार विप्र बालक की मृत्यु का कारण क्या था?

सर्प द्वारा काटे जाने पर उसकी मृत्यु हो गई थी।

१४ शंबूक खंड काव्य के प्रधान पात्र कौन–कौन हैं?

राम, नारद, वशिष्ठ, वनदेवता, शंबूक, विप्र, आदि


रविवार, 23 मार्च 2025

B.com 2nd Sem SEP कृष्ण की चेतावनी

 

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‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश-------------------हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण में ही त्रिदेव तथा समस्त संसार की शक्तियों को दिखाया गया है।

व्याख्या – श्री कृष्ण दुर्योधन को कह रहे हैं कि देखो मेरे भीतर करोड़ों ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश हैं। करोड़ों विजेता, करोड़ो जलपति तथा धन के ईश्वर कुबेर मेरे ही भीतर समाए हुए हैं। करोड़ों रुद्र तथा काल अर्थात् मृत्यु एवं दण्डधारी लोकपाल आदि सब कुछ मेरे ही भीतर समाए हुए है। अर्थात् कवि यह दर्शाना चाहते हैं कि इस संसार की संरचना करोड़ों वर्षों से हो रही है। इस संसार की रचना स्वयं श्रीकृष्ण के द्वारा ही हुई है। अतः उनके ही भीतर संसार के समस्त तत्व समाए हुए हैं। सृष्टि के संचालन के लिए करोड़ों वर्षों से ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की आवश्यकता थी जो कि स्वयं श्री कृष्ण से ही उपजे हैं। इसी प्रकार सभी मनुष्य, देवता, कुबेर तथा रुद्र एवं मृत्यु सबकुछ ही श्रीकृष्ण की ही संरचना है। श्री कृष्ण दुर्योधन को ललकारते हुए कह रहे हैं कि – हे दुर्योधन यदि तुझमें शक्ति है तो अपनी जंजीर बढ़ा और इन समस्त करोड़ों ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा लोकपालों को बांध सकते हो तो बांध कर दिखाओ। हाँ दुर्योधन इन सभी को बाँध कर दिखाओ।

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‘भूलोक, अतल, पाताल देख---------------------पहचान, इसमें कहाँ तू है।

प्रसंग—प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण दुर्योधन को महाभारत का वास्तविक दृश्य दिखाते हैं।

व्याख्या – श्रीकृष्ण अपने विराट रूप में दुर्योधन को दिखाते हुए कह रहैं हैं कि यह सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं में समाहित है। भूलोक अर्थात् पृथ्वी, अतल अर्थात् पाताल का एक भाग और पाताल भी सभी उनकी सत्ता के अधीन है। वे ही इनके स्वामि है। कृष्ण आगे कहते हैं कि यहाँ समय की मनुष्य तो केवल वर्तमान को देख सकता है परन्तु वे चाहे तो उसे अतीत(बीता हुआ समय) और भविष्य यानि आने वाला कल दोनों ही दिखा सकते हैं। इस जगत का सृजन उन्हीं से हुआ है। वे दुर्योधन को पहले ही महाभारत के युद्ध का दृश्य दिखा रहे हैं, जिसमें विनाश का तांडव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। युद्ध के बाद की भयानक दृश्य का वर्णन करते हुए वह दुर्योधक को दिखाते हैं कि देख धरती मरे हुए लोगों के शवों से ढक गयी है। उसमें अपने-आप को पहचानो, देखों तुम्हारे कारण कितना बड़ा विनाश होने जा रहा है। देख तू भी इनमें कहा है, शायद मृतकों में नहीं है। यहाँ वे दुर्योधन को चेतावनी दे रहे हैं कि उसका भी अंत होगा।

 

 

 

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‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख-------------------------फिर लौट मुझी में आते हैं।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नियंत्रक हैं।

व्याख्या – श्रीकृष्ण दुर्योधन से कहते हैं कि – हे दुर्योधन! देख यह आकाश मेरे केशराशि की तरह विस्तृत है। मेरे ही पैरों के नीचे पूरा पाताल लोक है।  मेरी मुट्ठी में तीनों काल अर्थात् अतीत, वर्तमान, भविष्य तीनों ही समाए हुए हैं। मेरा विकराल अत्यंत भयानक रूप देख। यह रूप ही है जो न केवल सृजन अर्थात् जन्म देता है बल्कि संहार भी करता है। यहाँ श्रीकृष्ण का योगेश्वर रूप स्पष्ट होता है जिसमें इस संसार के सभी जीव-जन्तु उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में ही विलीन हो जाते हैं।

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‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन-----------------छा जाता चारों ओर मरण।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण अपने महाविनाशकारी रूप का वर्णन करते हैं जिसमें वे स्पष्ट कर रहे हैं कि वे  केवल सृजनकर्ता ही नहीं बल्कि संहारकर्ता भी है।

व्याख्या—श्रीकृष्ण दुर्योधन से कहते हैं कि जब मैं अपना मुँह खोलता हूँ तो अग्नि की प्रचंड लपटें निकलती हैं। मेरी ही श्वास(सांस) से वायु का जन्म होता है, जिससे प्राणी सांस ले पाते हैं। जहाँ भी मेरी दृष्टि पड़ती है वही सृष्टि निर्मित हो जाती है। अर्थात् उनकी कृपा से ही सृजन होता है। लेकिन जब मैं अपनी आँखें मूँद लेता हूँ तो सम्पूर्ण सृष्टि ही नष्ट हो जाती है। मैं ही सृष्टि का जन्मदाता हूँ और मैं ही संहार करने वाला हूँ।

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‘बाँधने मुझे तो आया है-------------वह मुझे बाँध कब सकता है?

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में वे दुर्योधन से उसकी शक्ति का परिचय मांग रहे हैं तथा उसे बता रहे हैं कि आज तक कोई भी शून्य या सूने वस्तु को साध नहीं सका है।

व्याख्या – श्रीकृष्ण कहते हैं कि—हे दुर्योधन तू जो मुझे बाँधने आया है क्या तेरे पास इतनी बड़ी जंजीर है जिससे की तू मेरे इस विराट स्वरूप को बाँध सके? यदि मुझे तू बाँधना ही चाहता है तो पहले यह अनन्त गगन को बाँधकर दिखा। अर्थात् श्रीकृष्ण का स्वरूप अनन्त गगन की तरह है। वही वे आगे कहते हैं कि इस संसार में आज तक सूने या फिर शून्य को कोई बाँध नहीं सका है। शून्य जब किसी अंक के आगे लग जाता है तो उसका मूल्य घट जाता है परन्तु जब पीछे लगता है तो उसका मूल्य बढ़ जाता है। परन्तु जब वह अकेला रहता है तब उसे न कोई बाँट सकता है न ले सकता है न ही किसी को दे सकता है। शून्य से जब कोई टकराता है तो वह भी स्वयं शून्य में परिवर्तित हो जाता है। मैं स्वयं शून्य हूँ और मुझी से ही सृष्टि का आरंभ हुआ है। अतः मुझे आज तक कब कोई बाँध सका है?

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‘हित-वचन नहीं तूने माना----------------जीवन-जय या कि मरण होगा।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण दुर्योधन को अपना अन्तिम संकल्प की युद्ध होगा और विनाशकारी युद्ध हो जिसमें करो या मरो की स्थिति होगी के बारे में बताते हैं।

व्याख्या – श्रीकृष्ण कहते हैं कि – हे दुर्योधन मैंने तुम्हें समझाने का प्रयास किया। मैंने तुम्हारे हित कई बात कही परन्तु तुम्हें हित वचन अच्छे नहीं लगे। इसलिए तुमने मेरे हित वचनों को नहीं माना। मित्रता का मूल्य तुमने नहीं पहचाना। तो लो अब मैं जाता हूँ। परन्तु जाते-जाते अपनी अन्तिम चेतावनी सुना जाता हूँ। अब कोई याचना नही की जाएगी, अर्थात् कोई भी तुमसे आकर मित्रता करने की बार-बार भीख नहीं माँगेगा। अब सीधे युद्ध होगा। या तो इस युद्ध में कौरव की जीत हो या फिर पाण्डवों की। या तो वे मरेंगे या फिर तुम परन्तु युद्ध होगा ही।

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‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर--------------------फिर कभी नहीं जैसा होगा।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण भयंकर युद्ध की स्थिति के बारे में दुर्योधन को पहले से ही सावधान कर रहे हैं।

व्याख्या – हे दुर्योधन! देखना अब इतना भयंकर युद्ध होगा ऐसा लगेगा कि तारे आपस में टकरा रहे हैं। इस धरती पर आग की तरह एक-एक अस्त्र बरसेंगे। शेषनाग रूपी मृत्यु का फण खुलेगा जिसमें सभी समा जाएंगे। दुर्योधन ऐसा युद्ध होगा जिसमें इतना विनाश होगा कि भविष्य में फिर कभी दुबारा इतना विनाशकारी युद्ध नहीं होगा।

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‘भाई पर भाई टूटेंगे--------------------हिंसा का पर, दायी होगा।’

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीकृष्ण न्याय के लिए कौरव-पाण्डव जो कि वास्तव में एक-दुसरे के भाई थे उनमें युद्ध होने एवं स्वजनों के भाग्य फूटने का दुख की स्थिति के बारे में बता रहे हैं।

व्याख्या – हे दुर्योधन तुम्हारे कारण इस महाभारत के युद्ध में भाई-भाई आपस में एक-दूसरे से लड़ पड़ेंगे। एक-दूसरे को मारने के लिए जहर से भरे बाण उनपर छोड़ेंगे। जो लोग मरेंगे उनके अपने घर वालों पर दुख का पहाड़ तो टूटेगा ही साथ ही स्त्रियों का सौभाग्य फूट जाएगा। लोगों के मरने पर मरे हुए लोगों का भक्षण करने के लिए बाघ और सियारी आएंगे। उन्हें सुख मिलेगा। अर्थात् एक तरफ मनुष्य दुखी होगा तो दूसरी तरफ नरभक्षी पशु सुखी होंगे। अंत में एक दिन तू भी हार कर मृत्यु को गले लगाएगा और भूमि पर तू भी गिरेगा। हे दुर्योधन इतनी बड़ी हिंसा का तू ही दायी होगा।

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थी सभा सन्न, सब लोग डरे-------निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में हस्तिनापुर की राजसभा का दृश्य वर्णित है जिसमें श्रीकृष्ण की चेतावनी से पूरी सभी सन्न रह जाती है तथा सभी को आभास हो जाता है कि श्रीकृष्ण कोई राजदूत नहीं बल्कि स्वयं ईश्वर का अवतार है।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप सबके सामने प्रकट किया और अपनी शक्ति दिखाई तो दरबार में बैठे सभी लोग भयभीत हो जाते हैं। कुछ लोग तो उनके विराट रूप को देखकर लोग या तो बिल्कुल चुप हो जाते या फिर बेहोश ही हो जाते थे। केवल पूरी सभा में दो ही ऐसे व्यक्ति थे जो न तो भयभीत थे न ही हतप्रभ। वे थे धृतराष्ट्र और विदुर। दोनों की मनःस्थिति यहाँ पर अलग थी। धृतराष्ट्र जो कि जन्मान्ध थे वे अपनी आँखों से कुछ नहीं देख पा रहे थे लेकिन उनकी आत्मा कृष्ण की दिव्य शक्ति को अनुभव कर पा रही थी। वही विदुर जो हमेशा धर्म और सत्य के मार्ग पर थे, श्रीकृष्ण के इस दिव्य रूप को देखकर अपार आनंद और संतोष प्राप्त कर रहे थे। जहां सभी लोग भयभीत थे वही धृतराष्ट्र और विदुर ही हाथ जोड़े खड़े थे। दोनों ही श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप से प्रसन्न थे एवं बिना किसी डर के दोनों ने उनके विराट स्वरूप पर स्वीकार कर लिया था। वे धृतराष्ट्र जो कि पुत्र प्रेम में अंधे होने के बावजूद भी उन्होंने सच्चाई को समझ लिया था अतः वे उनकी जय-जय कर रहे थे। वही विदुर जो कि श्रीकृष्ण के भक्त थे अतः उनके लिए यह ईश्वरीय सत्य अत्यंत सुखकारी था। इसलिए वे भी जय-जय कर रहे थे।

शनिवार, 22 मार्च 2025

B.com 2nd Sem SEP कृष्ण की चेतावनी व्याख्या

 

कृष्ण की चेतावनी

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दुर्योधन वह भी दे ना सका------पहले विवेक मर जाता है।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में दुर्योधन की ईर्ष्या एवं विवेकहीन कृत्य की वर्णना की जा रही है।

व्याख्या – जब कृष्ण ने दुर्योधन से आधे राज्य के बदले केवल पाँच गाँव माँगे तो दुर्योधन क्रोधित हो जाता है और वह कृष्ण से कहता है कि वह पाण्डवों को सुई की नोक के बराबर की भूमि भी नहीं देगा। कवि आगे कहते हैं कि दुर्योधन यह भी न दे सका पाण्डवों को। यदि वह देता तो समाज उसे आशीर्वाद देता परन्तु उसके मना करने पर समाज को भी बुरा लगा। उलटे दुर्योधन ने मूर्खता दिखाते हुए वह कृष्ण को ही बन्दी बनाने लगा। जो कि असाध्य है क्योंकि कृष्ण  स्वयं भगवान है, उन्हें बांधना असंभव है। असाध्य को जब दुर्योधन साधने चला तो कवि कहते हैं कि मनुष्य का नाश जब सिर पर चढ़ता है तो पहले विवेक नाश हो जाता है।

 

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हरि ने भीषण हुंकार किया --------हाँ, हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में कृष्ण के क्रोध एवं उनकी शक्ति का वर्णन करते हैं।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि जैसे ही दुर्योधन कृष्ण को बन्दी बनाने के लिए उनकी तरफ बढ़ता है तो कृष्ण भीषण हुंकार करते हैं तथा अपना स्वरूप विस्तार करते हुए विश्वरूप धारण करते हैं। उनके विस्तृत रूप देखकर सारे दिग्गज अर्थात् दिग्विजयी योद्धा भी डर के मारे डग-मग होकर डोलने लगते हैं। भगवान कृष्ण तब क्रोधित होकर दुर्योधन को बोलते हैं – हे दुर्योधन अपनी जंजीर लेकर आओ और आगे बढ़ो और साध मुझे। हाँ दुर्योधन मुझे बाँध। भगवान कृष्ण यहाँ दुर्योधन को चुनौति देते हैं।

 

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यह देख गगन मुझमें लय है--------संहार झूलता है मुझमें।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कृष्ण के विराट स्वरूप के बारे में बता हैं।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि जब दुर्योधन को कृष्ण चेतावनी देते हैं तथा उसे अपने को बाँधने के लिए ललकारते है तब वे कहते हैं – यह देख दुर्योधन यह सम्पूर्ण गगन(आकाश) मुझमें समाया हुआ है।  यह देख दुर्योधन यह पवन भी मुझमें मिला हुआ है। सारे झंकार अर्थात् संसार में जितना नाद (आवाज़) ताल, लय, शब्द सबकुछ मुझमें विलीन है अर्थात् समाया हुआ है। कवि कहते हैं कि समस्त ध्वनियाँ, कंपन और संसार की समस्त चहल-पहल उनके भीतर समायी हुई है। यह उनकी आत्मा की व्यापकता और अखंडता को दर्शाता है। कृष्ण दुर्योधन से यह भी कहते हैं कि उनमें ही अमरत्व एवं विनाश(संहार) दोनों समाया हुआ है। अर्थात् सृष्टि के सृजन तथा विनाश दोनों ही वे स्वयं है।

 

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उदाचल मेरा दीप्त भाल------------सब हैं मेरे मुख के अन्दर

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का चित्रण करते हुए बताते हैं कि कृष्ण दुर्योधन को अपने दिव्य, अनंत और व्यापक रूप को दर्शा रहे हैं, जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपने भीतर समाहित किए हुए है।

व्याख्या – यहाँ उदयाचल(पूर्व दिशा की ओर सूर्य का उदित होना) को श्रीकृष्ण के चमकते हुए मस्तक(भाल) की उपमा दी गई है जो तेज और ज्ञान का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि भगवान का मुख मण्डल सूर्य की तरह प्रकाशवान और दिव्य है। कवि कहते हैं कि कृष्ण का वक्षस्थल(छाती) संपूर्ण पृथ्वी के समान विशाल बताया गया है। जिससे यह संकेत मिलता है कि वे समस्त ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए हैं।  आगे कि पंक्ति में कृष्ण की भुजाओं की अपार को दर्शाया गया है। उनकी भुजाएँ इतनी विशाल है कि वे पूरी सृष्टि को अपने घेरे में ले सकते हैं।

 

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दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख---शत कोटी

प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने श्रीकृष्ण के विश्वरूप को दर्शाया है जो कि दुर्योधन को चुनौति दे रहा है।

व्याख्या – कृष्ण दुर्योधन को ललकारते हुए कह रहे है कि यदि तेरी आँखें है, यदि उन आँखों में शक्ति है तो देख दुर्योधन। यह देख सारा ब्रह्माण्ड मुझमें समाया हुआ है। संसार के समस्त चर-अचर अर्थात् चलने वाले और एक ही स्थान पर रह जाने वाले अचल जीव-जन्तु, पूरा संसार, नष्ट होने वाले जीव हो अथवा अविनाशी जीव जो कभी नष्ट नहीं होते ऐसे सभी जीव मेरे ही अंदर है। मनुष्य हो चाहे देवता हो चाहे सुर या असुर, राक्षस सब मेरे ही भीतर है। इस पूरे ब्रह्माण्ड में करोड़ो सूर्य और चन्द्रमा, करोड़ो समुद्र, नदियाँ, झरने सबकुछ मेरे ही भीतर समाया हुआ है।

मंगलवार, 11 मार्च 2025

शंबूक व्याख्या

 व्याख्या: जगदीश गुप्त द्वारा लिखित 'शंबूक' की इन पंक्तियों में समाज में व्याप्त विषमता, अन्याय और शोक का सजीव चित्रण किया गया है। 

"लगी पड़ने स्याह गोरी देह, हो रहा विष दंश का संदेह" इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि ब्राह्मण पुत्र की देह स्याह अर्थात् नीला पड़ने लगा है। ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी सर्प से उसे कांटा है। विष के प्रभाव से उसका शरीर नीला पड़ गया है।

"कौन जाने कहां कैसा नाग, बुझा मेरा वंश दीपक आज" न जाने ये नाग कैसा है कहा से आया है एवं इसके काटने से आज मेरे पुत्र की मृत्यु हो गई है। इसके वजह से मेरे वंश का दीपक बुझ गया है। अर्थात् ब्राह्मण का पुत्र उसके वंश के दीपक के समान था जो कि आगे उसका वंश बढ़ाता परन्तु सांप के काटने से उसकी मृत्यु हो गई है। 

"राम यह कैसा ’तुम्हारा राज’" यहाँ कवि ने रामराज्य की आदर्श छवि पर प्रश्न उठाया है। जिस रामराज्य को न्याय और समानता का प्रतीक माना जाता था, वहीं पर एक ब्राह्मण के बेटे की इस प्रकार से मृत्यु होना सही नहीं है। 

"शोक से ब्राह्मण हुआ निःशब्द, घट गये ज्यों आयु के सब अब्द" यहाँ ब्राह्मण वर्ग का मौन रहना और उसकी आयु का घटना यह दर्शाता है कि समाज के संरक्षक और मार्गदर्शक वर्ग भी इस अन्याय के कारण हतप्रभ और लज्जित हैं। नैतिक मूल्यों का पतन हो चुका है।

"प्रजा पर यदि गिरे कोई गाज, ’दोष राजा का’, उठी आवाज" 

कवि कह रहे है कि ब्राह्मण उलाहना देते हुए राम को लक्ष्य करके कह रहा है कि जब प्रजा पर कोई विपत्ति या मुसीबत आती है तो इसमें राजा का ही दोष होता है। क्योंकि राजा पर ही प्रजा की सुरक्षा और पालन पोषण का भार होता है। यहां पर कवि ने सामाजिक जागरूकता को दर्शाया है। प्रजा यह समझने लगी है कि शासक की नीतियों और निर्णयों का प्रभाव समाज पर पड़ता है। रामराज्य में हुए अन्याय का दोष अब राम पर ही मढ़ा जा रहा है।

"जगे पुरजन, लगा होने भोर, मच गया चारों तरफ यह शोर"  ब्राह्मण की करुण पुकार एवं उलाहना सुनकर सारे नगरवासी जागने लगते हैं तथा चारों ओर ये बातें फैल जाती है।यहाँ जनचेतना के जागरण का संकेत है। अन्याय के प्रति लोगों में असंतोष और आक्रोश पनप रहा है। रामराज्य की आदर्श छवि खंडित हो रही है।

"राम–राज नहीं रहा अकलंक, इस कमल में भी सना है पंक" रामराज्य, जिसे निष्कलंक और आदर्श माना जाता था, अब उसमें भी दोष उत्पन्न हो गए हैं। 'कमल में पंक' का अर्थ है कि रामराज्य की निर्मलता और शुद्धता अब कलुषित हो गई है।

शंबूक विस्तृत व्याख्या BA 4th sem

 व्याख्या:

जगदीश गुप्त द्वारा लिखित शंबूक काव्य की इन पंक्तियों में रामराज्य की भव्यता, राजमहल की दिव्यता, और शासन की संरचना को चित्रित किया गया है।

आगे ज्योति मंडित, दीर्घ उन्नत, दिव्य राजद्वार – इन पंक्तियों में राजमहल के द्वार की विशालता और दिव्यता का वर्णन किया गया है। "ज्योति मंडित" से तात्पर्य है कि यह द्वार प्रकाशमय और अलौकिक तेज से युक्त है। "दीर्घ उन्नत" से द्वार की ऊँचाई और भव्यता का संकेत मिलता है।

पीछे शक्ति शाली, लोक रक्षक, राम का दरबार – इस पंक्ति में यह बताया गया है कि इस दिव्य राजद्वार के पीछे वह दरबार है जहाँ राजा राम न्याय करते हैं। यह केवल एक साधारण दरबार नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहाँ शक्ति (सत्ता) और लोक रक्षा (जनता की सुरक्षा) का संतुलन बना हुआ है। राम का शासन धर्म और न्याय पर आधारित है।

ऊपर तोरणों, आच्छादनों, कलशों, ध्वजों की भांति – यहाँ महल की शिल्पकला और उसकी अद्वितीय बनावट का वर्णन किया गया है। "तोरण" यानी महल के प्रवेश द्वार पर बने सजावटी द्वार, "आच्छादन" यानी छतों पर की गई विशेष सजावट, "कलश" यानी शिखर पर रखे गए पवित्र कलश, और "ध्वज" यानी झंडे, जो महल की दिव्यता को और बढ़ाते हैं।

जितने रूप, उतने रंग, जितने रंग, उतनी भांति – यह वाक्य महल की विविधता और उसकी सौंदर्यपूर्ण भव्यता को दर्शाता है। यहाँ पर यह संकेत दिया गया है कि महल का हर कोना अलग-अलग रंगों, रूपों और शैलियों से सजा हुआ है, जो उसे अत्यंत आकर्षक और राजसी बनाता है।

समग्र रूप से, इन पंक्तियों में राम के दरबार की अद्वितीय भव्यता और न्यायपरायणता का चित्रण किया गया है, जो एक आदर्श शासन व्यवस्था का प्रतीक है।



व्याख्या:

इन पंक्तियों में अयोध्या की भव्यता, सामाजिक व्यवस्था, और ब्राह्मण के पुत्र  की मृत्यु से उपजे शोक व आक्रोश का चित्रण किया गया है।

पहला खंड: अयोध्या का वैभव और व्यवस्था

"सहज प्रहरी, दंडधारी हर प्रहर, हर दिशा उल्लास की उठती लहर" यहाँ अयोध्या की सुरक्षा व्यवस्था और अनुशासन का वर्णन किया गया है। "सहज प्रहरी" से तात्पर्य उन सैनिकों से है जो स्वाभाविक रूप से नगर की रक्षा में तैनात हैं। "दंडधारी" शब्द प्रशासनिक शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है, जो अयोध्या में हर समय सक्रिय है। "हर दिशा उल्लास की उठती लहर" इस बात को इंगित करता है कि यह नगर समृद्ध, सुव्यवस्थित और उत्सवपूर्ण वातावरण से भरा हुआ है।

"यह अयोध्या का हृदय प्रत्यक्ष है, कौन इससे अधिक है समकक्ष है" इस पंक्ति में अयोध्या की श्रेष्ठता का चित्रण किया गया है। इसे आदर्श राज्य और न्याय का केंद्र माना गया है। प्रश्न के रूप में पूछे गए इन वाक्यों में गर्व और आत्मविश्वास झलकता है कि इस नगर की बराबरी करने वाला कोई अन्य राज्य या नगर नहीं है।

दूसरा खंड: एक विषादपूर्ण घटना

"चीर कर शाहनाइयों का नाद, बेधता किसका असीम विषाद" यहाँ विपर्यय (विरोधाभास) का चित्रण किया गया है। एक ओर तो अयोध्या में उल्लास और आनंद का वातावरण है, दूसरी ओर किसी के "असीम विषाद" (अत्यधिक दुःख) को वह खुशी भेद रही है। "शाहनाइयों का नाद" यानी उत्सवों और राजकीय वैभव की ध्वनि को किसी करुण क्रंदन ने चीर दिया है। यह संकेत करता है कि अयोध्या में कोई ऐसा अन्याय हुआ है जो इसके हर्षोल्लास पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

"शब्द कर्कश बोलता है कौन, अमृत में विष घोलता है कौन" यहाँ कवि प्रश्न करता है कि इस आदर्श राज्य में, जहाँ सब कुछ शांति और न्याय से संचालित होता है, यह कठोर और कटु शब्द कौन बोल रहा है? "अमृत में विष घोलता है कौन" – यह संकेत है कि रामराज्य की पवित्रता और न्यायप्रियता को किसी घटना ने कलंकित कर दिया है।

तीसरा खंड: ब्राह्मण का शोक

"शिखा खोले, क्षुब्द ब्राह्मण एक, दे रहा अभिशाप, बाँहें फेंक" यहाँ एक ब्राह्मण का चित्रण किया गया है जो अत्यधिक क्रोधित और क्षुब्ध है। "शिखा खोले" का तात्पर्य यह है कि वह शोकग्रस्त और व्याकुल है, क्योंकि शास्त्रों में किसी ब्राह्मण के खुले शिखा (चोटी) को अपशकुन और अनर्थ का संकेत माना जाता है। वह किसी को (संभवत: समाज या व्यवस्था को) अभिशाप दे रहा है, जिससे उसके आक्रोश और वेदना का पता चलता है।

"भूमि पर उसका तरुण प्रतिरूप, भग्न, निश्चल, यज्ञ का ज्यों यूप" यहाँ बताया गया है कि ब्राह्मण का युवा पुत्र मृत पड़ा है। "तरुण प्रतिरूप" यानी उसका जवान पुत्र, जो अब निष्प्राण है। "भग्न, निश्चल" से उसके शव की दशा का वर्णन है—वह टूटा हुआ और निष्क्रिय पड़ा है, जैसे यज्ञ में उपयोग किया गया "यूप" (बलि के लिए स्थापित लकड़ी का खंभा) बलि के बाद बेकार पड़ा रहता है।

भावार्थ:

जहाँ एक ओर अयोध्या में उल्लास और शांति का माहौल है, वहीं दूसरी  ओर ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु से उत्पन्न दुख के कारण स्थिति बहुत दुखद हो गई है जिससे ब्राह्मण को क्रोध होता है।ब्राह्मण के क्रोध और उसके मृत पुत्र के चित्रण के माध्यम से यह बताया गया है कि समाज को शिक्षा तथा ज्ञान देने वाले को ही यदि सुरक्षा नहीं मिलती है तो फिर इतने उल्लास और हर्ष मनाने की क्या आवश्यकता है।


व्याख्या:

प्रथम खंड: अतीत, वर्तमान और भविष्य की जटिलता

"विगत के आस्तित्व से अनजान, स्वप्न में होता भविष्यत ज्ञान" यहाँ यह बताया गया है कि मनुष्य अक्सर अपने अतीत को भुला देता है, लेकिन भविष्य को लेकर आशंकित और जिज्ञासु रहता है। यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि समाज अपने इतिहास में हुए अन्यायों से सीख नहीं लेता, बल्कि भविष्य को लेकर स्वप्नों में खोया रहता है।

"रात्रि के पिछले पहर, निस्तब्ध व्यक्ति से ज्यों बोलता प्रारब्ध" रात्रि का अंतिम पहर एक विशेष प्रतीक है, जो परिवर्तन और चेतना का संकेत देता है। जब सब कुछ शांति में डूबा होता है, तब "प्रारब्ध" (भाग्य) व्यक्ति से संवाद करता है। इसका अर्थ यह है कि जब समाज मौन हो जाता है, तब उसके भीतर छिपी नियति या उसके कर्मों का प्रभाव प्रकट होने लगता है।

द्वितीय खंड: ब्राह्मण की करुण पुकार और उसकी गूंज

"उस तरह उसका करुण चीत्कार, पैठ जाता चेतना के पार" यहाँ ब्राह्मण की पुकार को दर्शाया गया है, जो केवल एक सामान्य मृत्यु नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक अन्याय की घोषणा है। उसका करुण क्रंदन केवल सतही तौर पर नहीं सुना जाता, बल्कि वह चेतना के उस स्तर तक पहुँच जाता है जो व्यक्ति और समाज दोनों को झकझोर सकता है।

तृतीय खंड: रामराज्य का मौन और उसकी विडंबना

"शांत फिर भी राम का दरबार, मौन फिर भी भव्य राजद्वार" यह पंक्तियाँ गहरी विडंबना प्रकट करती हैं। ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु के बावजूद, राम का दरबार शांत है, कोई प्रतिरोध नहीं, कोई हलचल नहीं। यह मौन उस सामाजिक तंत्र को दर्शाता है जो अन्याय को देखकर भी प्रतिक्रिया नहीं देता। "भव्य राजद्वार" का "मौन" रहना यह संकेत करता है कि सत्ता और शासक वर्ग इस घटना से प्रभावित नहीं हुआ, वह अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने में ही व्यस्त रहा।

भावार्थ:

इन पंक्तियों में कवि ने नियति, अन्याय और सामाजिक व्यवस्था की निष्क्रियता को रेखांकित किया है। ब्राह्मण पु की मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक चेतना पर एक आघात थी। उसका चीत्कार एक प्रश्न की तरह इतिहास में दर्ज हो गया, लेकिन राम का दरबार और अयोध्या की सत्ता उस पर मौन बनी रही। यह मौन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और राजनीतिक चुप्पी को दर्शाता है, जो अन्याय को अनदेखा कर देती है।



व्याख्या:

इन पंक्तियों में ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु  के बाद उत्पन्न हुई विक्षोभ, वेदना और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाया गया है। कवि ने अन्याय के परिणामों को अत्यंत प्रभावशाली रूपकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

प्रथम खंड: यातना और उसका व्यापक प्रभाव

"यातना उसकी दरारें खोल, ला रही थी सृष्टि में भूडोल" ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु  की यातना केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह संपूर्ण समाज और सृष्टि के लिए एक झटका थी। "दरारें खोल" से तात्पर्य यह है कि यह घटना समाज के भीतर गहरी टूटन और असंतुलन उत्पन्न कर रही थी। "भूडोल" (भूकंप) शब्द इस बात को दर्शाता है कि इस अन्यायपूर्ण हत्या से एक ऐसा हलचल पैदा हो रहा था जो पूरे सामाजिक ताने-बाने को हिला सकता था। यह संकेत करता है कि जब भी समाज में अन्याय होता है, तो वह केवल एक घटना नहीं होती, बल्कि उसकी लहरें दूर तक फैलती हैं और सत्ता की नींव तक को हिला सकती हैं।

द्वितीय खंड: प्रकृति और न्याय की चुनौती

"भूमि पर अघटित घटेगा क्या? सूर्य निज पथ से हटेगा क्या?" यहाँ कवि प्रश्न करता है कि क्या यह घटना इतनी असाधारण और अन्यायपूर्ण थी कि यह प्रकृति के नियमों को भी बदल सकती है? "अघटित घटेगा क्या?"—अर्थात् क्या ऐसा कुछ होगा जो पहले कभी नहीं हुआ? यह प्रश्न सत्ता और समाज के लिए एक चुनौती है कि क्या वे इस अन्याय को स्वीकार करके भी स्वयं को न्यायप्रिय कहेंगे?

"सूर्य निज पथ से हटेगा क्या?"—यह अत्यंत महत्वपूर्ण पंक्ति है। सूर्य के अपने पथ से हटने का अर्थ है कि सृष्टि का संतुलन ही बिगड़ जाए। यहाँ सूर्य को सत्य और न्याय का प्रतीक माना गया है। कवि संकेत करता है कि क्या यह अन्याय इतना बड़ा है कि यह सृष्टि के मूल नियमों को भी हिला देगा?

भावार्थ:

इन पंक्तियों में ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु को एक ऐतिहासिक, सामाजिक और प्राकृतिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह अन्याय केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के न्याय और संतुलन पर प्रहार था। कवि ने भूकंप और सूर्य जैसे व्यापक रूपकों का उपयोग करके यह दिखाया है कि जब सत्ता अन्यायपूर्ण निर्णय लेती है, तो उसके प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि संपूर्ण समाज और उसकी संरचना को प्रभावित करते हैं।

शनिवार, 1 मार्च 2025

BBA 2nd sem SEP समानांतर लकीरें कविता व्याख्या

 

कविता: समानांतर लकीरें (प्रयागनारायण त्रिपाठी)

इस कविता में प्रेम, दूरी, सामाजिक बंधन, भय, और संशय जैसे तत्वों का गहरा चित्रण है। कवि ने प्रेम में आने वाली बाधाओं को "समानांतर लकीरों" के रूप में प्रस्तुत किया है, जो कभी मिलती नहीं हैं। यहाँ प्रत्येक पंक्ति की व्याख्या इस प्रकार है:


1. मैं अभी तक भी न छू पाया तुम्हें

  • यह प्रेमी की वेदना को दर्शाता है। वह अपने प्रिय से निकटता चाहते हुए भी उसे छू नहीं पाता, यानी उनके बीच कोई अदृश्य बाधा है।

**2. क्योंकि ढह पाईं नहीं

अब तक**

  • यह उन सामाजिक, मानसिक, और आत्मिक बाधाओं को इंगित करता है जो प्रेमी और प्रेमिका के बीच हैं।

**3-4. हमारे बीच की कुछ भीतियाँ—

यद्यपि बहुत झीनी**

  • "भीतियाँ" यानी दीवारें, जो उनके प्रेम में अवरोध बनी हुई हैं। ये बहुत पतली (झीनी) हैं, परंतु फिर भी टूट नहीं पाई हैं।

5. पवन-सी क्षीण।

  • यह दर्शाता है कि ये बाधाएँ बहुत हल्की और नाजुक हैं, जैसे हवा की एक हल्की परत, लेकिन फिर भी बनी हुई हैं।

6. अपरिचय की एक थी :

  • पहले अपरिचय (एक-दूसरे को न जानने) की दीवार थी, जो अब समाप्त हो गई है।

**7. वह ढह चुकी है—

कर चुकी है दृष्टि को छू दृष्टि**

  • अब वे एक-दूसरे को जान चुके हैं, एक-दूसरे की आँखों से आँखें मिला चुके हैं, यानी अब वे अजनबी नहीं रहे।

**8. परिचय ख़ूब :

पर अभी हैं और भी :**

  • प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे से भली-भाँति परिचित हो चुके हैं, लेकिन अब भी कुछ और बाधाएँ शेष हैं।

**9-10. जैसे कि कायरता—

(कि आत्मा की अटल जो माँग,**

  • प्रेमिका (या प्रेमी) की कायरता एक बड़ी बाधा है। वह अपने हृदय की सच्ची भावना को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।

**11-12. तुम बस खोजती रहती

उसी से भागने की राह)—**

  • प्रेमिका अपने भीतर के प्रेम को पहचानते हुए भी उससे बचने या भागने का रास्ता खोज रही है।

**13-14. और संशय

(यह कि पीपर-पात-सा**

  • संदेह (संशय) भी एक बाधा है। यह संशय शायद प्रेमी के मन की अस्थिरता को लेकर है।

**15-16. चल है पुरुष-मन)

और भय।**

  • पुरुष का मन पीपल के पत्ते की तरह चंचल होता है, यही संशय प्रेमिका के मन में भय पैदा करता है।

**17-18. (जग क्या कहेगा?

—क्षुद्र जग!)**

  • प्रेमिका समाज के डर से प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाती। कवि इसे "क्षुद्र जग" कहकर इसकी संकीर्ण सोच की आलोचना करता है।

**19-20. और शायद पाप

(क्योंकि केवल**

  • प्रेमिका इस प्रेम को शायद 'पाप' मानती है, क्योंकि समाज ने प्रेम को नैतिक और धार्मिक नियमों के दायरे में बाँध रखा है।

**21-22. ग्रंथि-बंधन-दंभ ही है

पुण्य की ध्रुव माप!**

  • समाज ने पुण्य और पाप के जो मापदंड बनाए हैं, वे केवल ग्रंथियों (मानसिक उलझनों), बंधनों और दंभ (अहंकार) पर आधारित हैं।

23. जय हो! धन्य)।

  • यह एक व्यंग्यपूर्ण कथन है। कवि कहता है कि यदि यही पुण्य है, तो "जय हो"।

**24-25. तो यही हो,

ओ सती!**

  • प्रेमिका को "सती" कहकर कवि व्यंग्य करता है कि यदि वह प्रेम को स्वीकार करने के बजाय त्याग और संयम को अपनाने में ही पुण्य मानती है, तो यही सही।

**26-27. तो नहीं छू पाए तुमको,

ओ अछूती पुण्य!**

  • कवि कहता है कि अगर तुम इतनी पवित्र (अछूती) हो कि प्रेम को स्वीकार नहीं कर सकतीं, तो मैं तुम्हें कभी छू नहीं पाऊँगा।

**28-29. मेरे स्पर्श का अंगार;

तो सदा चलती रहो तुम**

  • प्रेमी का प्रेम तीव्र और जलता हुआ है, लेकिन यदि प्रेमिका इस प्रेम को नहीं स्वीकार सकती, तो वह अपनी राह पर चलती रहे।

**30-31. तो सदा चलते रहें ये स्वप्न

तो सदा चलता रहूँ मैं :**

  • प्रेम एक असंभव स्वप्न बनकर चलता रहेगा, और प्रेमी इसी अधूरे प्रेम के साथ जीवन में आगे बढ़ता रहेगा।

**32-34. ये समानांतर लकीरें तीन

(शायद चार)।**

  • "समानांतर लकीरें" प्रेमी और प्रेमिका के रिश्ते का प्रतीक हैं। वे एक-दूसरे के बहुत करीब होते हुए भी कभी मिल नहीं पाते।

कविता का सार

यह कविता प्रेम की उन बाधाओं को दर्शाती है जो समाज, भय, संशय, और आत्म-संकोच से उत्पन्न होती हैं। प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे के करीब होते हुए भी समानांतर रेखाओं की तरह कभी मिल नहीं पाते। समाज की संकीर्ण सोच और व्यक्ति के मन में बसे संदेह प्रेम को अधूरा छोड़ देते हैं।