शनिवार, 4 जुलाई 2020

मान अपमान



आखिर कौन हो तुम?
क्या हो तुम?
तुम जो कोई भी हो मुझे फ़र्क नहीं पढ़ता
तुम्हें कोई अधिकार नहीं
तुम्हारी कोई औकात नहीं
ऐसे शब्दों से आहत होता है मन मेरा।
जो मान अपने लिए मन में लेकर रहती हूँ,
टूट कर बिखर जाता है अपनी की वाणी से
जो मान अपनों के लिए मन में लेकर रहती हूँ.
टूट कर बिखर जाता है अपनों के ही शब्दों से।
घर वाले कहते हैं बाहर वालों को त्याग दो
अपमान जो मेरा करते हैं
बाहर वाले कहते हैं घर वालों को त्याग दो
अपमान जो मेरा करते हैं।
अपमान फिर भी दोनों मेरा करते हैं
मगर चुप चाप दुख सहे जा रही हूँ मैं,
छुपाकर अपने आँसूओं को मुस्कुरा रही हूँ मैं,
मुझसे तो सभी अच्छे हैं सोच कर
खुद को रोज़ बदलते-बदलते,
खुद को ही खोते जा रही हूँ मैं।
ना दोष देना मुझे यदि एक दिन मैं चली जांऊ इस तरहा
ना कहना कि मैं कि मैं हार मान कर चली गयी किस तरहा
बस याद करना अपने उन बातों को
दुबारा ना दोहराना कभी उन लम्हों को
बस जीने की आस थोड़ी सी बची है ज़िन्दगी
मान अपमान में शायद अभी भी फ़सी है ज़िन्दगी।

रविवार, 14 जून 2020

जीवन और मृत्यु

जीवन सदा रंगों से भरा
जीता-जागता वरदान है
जीवन सदा सपनों से भरा
बीते कल की सीख है
जीवन सदा उम्मीदों से भरा
सफल संघर्ष की सीख है।

हाँ कभी-कभी इसमें
दुख के आँसू बहते हैं,
तो कभी-कभी खुशियों
के सच्चे पल भी रुलाते हैं।
जीवन तो सदा भावों से भरा,
ईश्वर के मन की सुन्दर रचना है।

चुनौतियाँ, मुश्किलें और संघर्ष
सिखाती है हमें बहुत कुछ।
इनसे गुज़रके ही मिलता है
बहुत कुछ
ये न होती तो होते हम पत्थर
ये है तभी बनते हैं हम मूरत।

जीवन तो है अखण्ड
निर्माण का घर
बनती बिगड़ती बातों में भी
कुछ नया आता है उभरकर
फिर क्यों हार मानकर
रे चला तु पथिक यूं संघर्ष
छोड़कर?

मृत्यु तो आती है सभी को,
उसे अपनी गति से आने दे।
निश्चिन्त जीवन को राह में,
तु अपनी गति से चलने दे।
भले तु थके जीवन में
भले तु रुक ले जीवन में
पुनः पुनः प्रयास तो कर
जीवन सदा कर्म से भरा
फल की सुन्दर डाली है।
आज नहीं तो कल सही
मिलेगी तुझे सच्ची खुशी
आशा का दीपक तु जलाए जा
जीवन तो है सदा उजालों से भरा
सुख-दुख के सितारों का आसमां है।

मंगलवार, 19 मई 2020

इक्कीसवी सदी का भारत


देश मेरा बैठा है आज बारूद के ढेर पर,
पर राजनेता है कुर्सी के चर्चे पर।
देश मेरा है आज आतंक के निशाने पर,
पर राजनेता आपस में एक-दूसरे के निशाने पर।
भाषावाद,जातिवाद,क्षेत्रीयवाद यही सब रह गया है,
देश कब गया अंधेरे के गर्त में किसे खबर है
विकास के नाम पर तो वोट माँगे जाते है?

विशेष विशेष के कुछ और ही नाते आते हैं?
मगर गरीब की आबरु है आज भी ताक पर।
कोई दो अरब का आशियाना बनाए,
कही आशियाने ही जला दिए जाए।
कही है नौकरी और पढ़ाई पर रिजर्वेशन,
कही है पक्षपात और डिसक्रिमिनेशन।
देश मेरा आज किस ओर जा रहा है
किसे पता है,
किसे पता, क्या होगा आगे?
क्या यही है इक्कीसवी सदी का उभरता भारत।


शुक्रवार, 8 मई 2020

रस परिचय – रस किसे कहते हैं? रस कैसे उत्पन्न होता है?


रस – भारतीय जीवन में रस एक सर्वव्यापक वस्तु है और सर्वव्यापक होने के कारण इसका सर्वत्र प्रयोग होता है। रस का इन सभी जगहों में अलग-अलग प्रयोग अर्थ आदि है। अर्थ निर्भर करता है लेने वाले पर। अर्थात् कोई किसी प्रसंग में अर्थ किस प्रकार लेता है उसी पर अर्थ निर्भर करता है। रस शब्द सबके लिए अलग-अलग अर्थ लेकर आता है। जैसे कि –

(क) प्राकृत्तिक वस्तु के रूप में रस का अर्थ है काठ का रस, फूल का रस, पत्ते का रस, फल का रस इत्यादि।

(ख) आयुर्वेद में रस का अर्थ है रसायन अथवा औषधि। उसे रस रसायन के नाम से कहा जाता है। आयुर्वेद में ही शरीर का मूल तत्व(वीर्य) को जो कि जीवन-मृत्यु का मूल है उसे भी रस कहा गया है।

(ग)  स्वाद के अर्थ में रस जैसे मधु रस, तीक्त रस, झाल रस इत्यादि।

(घ)  मधु के अर्थ में रस को लिया जाता है।

(ङ)  आध्यात्म के क्षेत्र में भी रस को भक्ति रूप में लिया जाता है। उसे मुक्ति भी कहते हैं।

(च) आनन्द के अर्थ में भी रस को लिया जाता है। इसे काव्यानन्द कहते है। जैसे संगीत सुनने से, नृत्य देखने पर, मूर्ति देखने पर भी आनन्द को प्राप्ति होती है। काव्य और सभी प्रकार के कलाओं को देखने से हमें आनन्द की प्राप्ति होती है।

उपरोक्त सभी रस का प्राथमिक परिचय है। उपरोक्त सभी बातों से स्पष्ट है कि रस हमारे संपूर्ण जीवन के प्रत्येक क्षण में, प्रत्येक तत्व में, प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है। रस के बिना हमारा जीवन अधूरा है।

            साहित्य में रस का अर्थ है जब हम कोई साहित्यिक विधा पढ़ते है, सुनते है तो हमारे मन में उस विधा में वर्णित कथा या विचार पढ़कर जो अनुभूति होती है तथा उस अनुभूति से जो भाव जन्म लेता है जो कि हमारे चेहरे तथा शरीर में दिखायी देता है या जो हमारी अवस्था होती तो रस की उत्पत्ति होती है। जैसे कि हम कोई वीर रस से भरी कविता पढ़ते हैं तो हमारे शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न होती है, हमारी आँखों में गर्व दिखायी देता है। उसी प्रकार यदि हम कोई ट्रेजेडी वाला साहित्य पढ़ते हैं तो हम रोते हैं। इस स्थिति को हम काव्यानन्द कहा जाता है। उसी आनन्द को हम रस कहते हैं।

रस की उत्पत्ति कैसे होती है?  कोई कार्य या कोई परिणाम अपने-आप नहीं हो जाता है, जिसके पीछे कोई घटना या वस्तु होती है जिसे कारण कहा जाता है। घटना या वस्तु के बिना कार्य या परिणाम नहीं होगा। रस के उत्पादान कारण इस प्रकार –

            विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पतिः  -- (आचार्य भरतमुनि)

आचार्य भरतमुनि के अनुसार रस की उत्पत्ति विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस का आदि कारण है भाव। एक प्राणी किसी घटना, वस्तु, व्यक्ति, विचार आदि में से किसी एक के संपर्क में आने पर उसके चित्त(मन, heart) में एक प्रतिक्रिया होगी। इसका एक परिणाम होगा और यही परिणाम भाव कहलाएगी। यह परिणाम अनुकूल(favourable) भी हो सकता है या प्रतिकूल(adverse) भी हो सकता है। अनुकूल हुआ तो सुख होगा अर्थात् सुखात्मक भाव या प्रतिकूल हुआ तो दुख अर्थात् दुखात्मक भाव। किसी क्रिया का हमारी चेतना पर जो परिणाम होता है वही भाव है। क्योंकि चेतना का जगत काफी सूक्ष्म होता है इसीलिए भाव का स्वरूप भी काफी सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म (प्रत्यक्ष रूप से दिखायी नहीं देगा बल्कि उसकी अनुभूति होती है।) भाव की अवस्था में मनुष्य संसार में नहीं रहता। वह ममत्व और परत्व के बन्धन से मुक्त हो जाता है।



भाव को दो भागों में बाँटा गया है।

अस्थायी भाव
स्थायी भाव
अल्प अवधी अर्थात् थोड़े समय के लिए जिसका अस्तित्व होता है।
कुछ भाव ऐसे है जो कुछ दीर्घ काल तक शुष्क रूप से हमारे भीतर बने रहते हैं, इनको मिटाया नहीं जा सकता उनको स्थायी भाव कहते हैं। ये सदा शाश्वत बने रहने वाला भाव।



रस सिद्धान्त में रस नौ प्रकार के बताए गए हैं। परन्तु भक्तिकाल में भक्तिपरक रचनाओं में दो नयी प्रकार का भावों को भक्तिकाव्य में लक्ष्य किया गया तथा उसे रस के अंतर्गत जोड़ा गया। ये नए भाव थे (भक्ति एवं वात्सल्य)।

रस के प्रकार एवं उनके स्थायी भाव

स्थायी भाव                                                        निष्पन्न होने वाले रस

रति                                                                   श्रृंगार रस

हास                                                                  हास्य रस

शोक                                                                 करूण रस

क्रोध                                                                  रौद्र रस

उत्साह                                                               वीर रस

भय                                                                   भयानक रस

जुगुप्सा                                                              वीभत्स रस

विस्मय                                                              अद्भुत रस

निर्वेद                                                                शान्त रस

पुत्र विषयक रति                                                 वात्सल्य रस



विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव किसे कहते हैं?

विभाव – वि का अर्थ है विशेष अर्थात् विभाव का अर्थ है विशेष प्रकार का भाव। वास्तव में हेतु, कारण, प्रयोजन भाव को उत्पन्न करने वाले हेतु, कारण या प्रयोजन को विभाव कहते हैं।

            हमारी चेतना में स्थायी भाव, शाश्वत सनातन रूप में विद्यमान है जो अपने-आप नहीं जगते। इनको जगाने का काम कोई बाहरी क्रिया करती है। इसी प्रयोजन को विभाव कहा जाता है। क्योंकि इसके कारण भाव जैसी सूक्ष्म वस्तु का जागरण होता है इसलिए इसे विशेष भाव कहा जाता है। हमारी आत्मा में स्थायी भाव सदैव उपस्थित रहते हैं। परन्तु हम इन भावों को सदैव महूसस नहीं कर पाते हैं। ऐसे में जब कोई कारण या हेतु इन्हें प्रकट करता है तभी हमें ये स्थायी भाव महूसस होते हैं। जैसे कि किसी व्यक्ति द्वारा कही गयी कोई अटपटी बात या चुटकुले सुनकर हम सबको हंसी आती है। इसमें उस व्यक्ति द्वारा जो चुटकुला सुनाया गया है वही चुटकुला विभाव के रूप में काम करता है तथा हमारे मन में स्थित हास नामक स्थायी भाव को जगा देता है जिसे हम महसूस कर पाते हैं।

विभाव के दो मूल भेद है। एक है आलम्बन विभाव और दूसरा है उद्दीपन विभाव। भाव को जगने कोई आधार चाहिए, आधार न हो तो भाव नहीं जगेगा। जिस आधार पर भाव जगता है उस आधार को आलम्बन विभाव कहते हैं। भाव के जगने अर्थात रति नामक स्थायी भाव को रस के रूप में निष्पन्नः होने के लिए नायक और नायिका नामक आलम्बन विभाव चाहिए। जैसे रामायण में पुष्प-वाटिका प्रसंग में राम ने जानकी को देखा तो उनके हृदय में रति भाव जगा। इसलिए जानकी आलम्बन विभाव है और राम में रति भाव जगा इसलिए राम और राम का हृदय आश्रय है। जहाँ जाकर रस को आधार मिलता है, स्थायी भाव जागता है उसे आलम्बन विभाव कहते है। आल्मबन यहाँ देवी सीता है तथा उनके द्वारा की गयी चेष्टाएँ उद्दीपन विभाव कहलाएगी।

अनुभावआश्रय की चेष्टाएँ अनुभाव के अन्तर्गत आती है जबकि आलम्बन की चेष्टाएँ उद्दीपन के अन्तर्गत मानी जाती हैं। अनुभाव की परिभाषा देते हुए कहा गया है – अनुभावों भाव बोधकः अर्थात् भाव का बोध कराने वाले कारण अनुभाव कहलाते है। आश्रय की वे बाह्य चेष्टाएँ जिनसे यह पता चलता है कि उसके हृदय में कौन-सा भाव उत्पन्न हुआ है वह अनुभाव कहलाते हैं।

जैसे की राम जब देवी सीता को पुष्प-वाटिका में देखते हैं तो राम के मन में प्रेम उत्पन्न होता है। राम तब देवी सीता को एकटक देखते रहते हैं तथा मुस्कुराते हैं। उनका मुस्कुराना, एकटक देखना अनुभाव है। वही देवी सीता राम के इस प्रकार एकटक देखने पर वह भी उन्हें देखती रहती है तथा बाद में लज्जा वश अपनी पलके झुका लेती है। यहाँ देवी सीता आल्मबन है तथा उनका लजाना इत्यादि चेष्टाएँ उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत आते हैं।

संचारी भाव – संचरणशील (अस्थिर) मनोविकारों या चित्तवृत्तियों को संचारी भाव कहते हैं। ये भाव रस के उपयोगी होकर जलतरंग की भाँति उसमें संचरण करते हैं। इससे ये संचारी भाव कहे जाते हैं। इनका दूसरा नाम व्यभिचारी है। विविध प्रकार से अभिमुख और अनुकूल होकर चलने के कारण इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। ये स्थायी भाव के साथी है। रस के समान ही संचारी भाव भी व्यंजित या ध्वनित होते हैं। इनकी तैंतीस संख्या मानी गयी है।

ये तैंतीस भाव इस प्रकार है –1) निर्वेद 2) ग्लानि 3) शंका 4) असूया 5) मद 6) श्रम 7) आलस्य 8) दैन्य या दीनता 9) चिन्ता 10) मोह 11) स्मृति 12) धृति 13) व्रीड़ा 14) चपलता 15) हर्ष 16) आवेग 17) जड़ता 18) गर्व 19) विषाद 20) औत्सुक्य 21) निद्रा 22) अपस्मार 23) स्वप्न 24) विबोध 25) अमर्ष 26) अवहित्था 27) उग्रता 28) मति 29) व्याधि 30) उन्माद 31) त्रास 32) वितर्क 33) मरण

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

मोइदा-ओइ-दे


कभी-कभी लगता है कि ज़िन्दगी यू ही बिना किसी झंझट के गुज़र जाती तो कितना अच्छा होता। पुरानी यादें जो बार-बार नज़रों के सामने आती है वह यह एहसास दिला जाती है कि आज जो ज़िन्दगी है या जो हुआ करती थी उसमें से कौन सी सबसे ज्यादा अच्छी है? क्योंकि आज सबकुछ होते हुए भी लोगों के पास कुछ नहीं है। घड़ियाँ है पर वक्त नहीं है, अनाज बहुत है पर भूख नहीं है, लोग बहुत है पर रिश्तें कही खो से गये हैं। बीते वक्त से चुनकर कुछ एक ऐसी ही घटनाएँ मुझे याद आती हैं। मैं बारवी कक्षा की छात्रा थी। पिताजी के साथ हम सभी अलोंग अरुणाचल प्रदेश के असम-रायफल्स केम्पस में रहा करते थे। रोज का टाईम-टेबल था पिताजी नहा-धोकर तैयार होकर असम-रायफल्स स्कूल पढ़ाने चले जाते। पिंकी (मेरी छोटी बहन) भी तैयार होकर पिताजी के साथ स्कूल चली जाती। मैं और भाई आलोक भी तैयार होकर आलोंग हाइयर सेकेन्डरी स्कूल चले जाते। माँ घर के कामों से फुर्सत पाकर सिलाई के काम में बैठती थी। उनको सिलाई बहुत अच्छी तरह आती है। क्रोशिये पर जब उनकी ऊंगलियाँ चलती तो इतने सुन्दर-सुन्दर मेज़-पोश बनते, हमारे लिए सुन्दर-सुन्दर स्वेटर बनाती थी जो देखने लायक होते थे। फ्रॉक तो ऐसे बनती थी जैसे कि रेडीमेड खरीदी हो। हम दोपहर को स्कूल से घर लौटते थे तो माँ के साथ ही भोजन करते थे। शाम का वक्त खेलने का होता या फिर पढ़ने के लिए बैठ जाते। घर की दिनचर्या हमारी बिलकुल साधारण सी थी। शाम को पिताजी के पास उनके कई स्टूडेन्ट पढ़ने आते। हफ्ते में तीन दिन वे दूसरी जगह पढ़ाने भी जाते थे। उनके आने के बाद हम सब अपने-अपने डाउट लेकर बैठ जाते थे। ज्यादातर गणित और विज्ञान के विषयों से सम्बन्धित होते थे। मेरी गणित तथा विज्ञान में कोई विशेष रुची नहीं थी। कल्पना की दुनिया में उन दिनों उड़ान भरा करती थी। अपने क्वाटर के आस-पास के दृश्यों के देख-देख कर न जाने क्या-क्या सोचती रहती थी। क्वाटर के आस-पास के नज़ारे भी तो इतने सुन्दर थे कि क्या कहने!! हमारे क्वाटर का मुख्य दरवाजा उत्तर दिशा की ओर खुलता था। बाहर एक बहुत छोटा सा आँगन था। जैसे कि सरकारी और विशेष कर आर्मी बटालियन में रहने वालों के घर होते हैं। वैसे हम जहाँ थे वहाँ गिनती के सिर्फ छः क्वाटर थे। सभी जाने पहचाने। आँगन के दाहिने तरफ खुली बड़ी सी जगह और उसके बाद नर्स अंकल का क्वाटर पड़ता था। उनके क्वाटर की तरफ देखने पर दूर पहाड़ी और घने जंगल दिखते थे। ये पूर्व दिशा की ओर था। रोज वहाँ से सूर्योदय का नज़ारा दिखता था। पश्चिम की दिशा की ओर भी उससे भी ऊँचा पहाड़ था। उस पहाड़ में स्थानीय लोगों के घरों तथा तरह-तरह के पेड़ पौधे, केले के पेड़, फूलों की क्यारियाँ तथा गमले और भी न जाने क्या-क्या। उनमें सूरज की रोशनी पड़ती थी तो सबकुछ कितने रंगीन हो जाते थे। आँगन के बाये तरफ एक सफेद जबाकुसुम का पौधा था। सावन के महिने तथा अन्य बारीश के दिनों में उसमें बहुत सारे सफेद जबाकुसुम फूल खिलते थे। साथ ही रेन ग्रास लिली के फूल भी खिलते थे।

            हम केम्पस के जिस हिस्से में रहते थे उस ओर से असम-रायफल्स के केम्पस से शहर की ओर जाने का रास्ता पड़ता था। मेन गेट के बाहर कई दुकाने थी । शहर से अक्सर एक बूढ़ी औरत लकड़ियाँ टेकते हुए भीख माँगने आया करती थी। थी तो वह वही की स्थानीय। हिन्दी भाषियों तथा अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोगों के कारण थोड़ी बहुत हिन्दी वह भी सीख गयी थी और प्रतिदिन ‘मैदा’(रोटी बनाने के लिए) की भीख माँगती थी। पर मुँह में दांत न होने की वजह से स्पष्ट बोल नहीं पाती थी और इशारों से समझाती थी कि उसे खाने के लिए रोटी चाहिए। वह खुद अपने हाथों से रोटी बनाकर खाएगी। हम उसे भीख देते थे। भीक्षा मांगने पर भीख देना भारतीय परिवारों में बहुत महत्व रखता है। खासकर परोपकार की भावना और पुण्य कमाने की लालसा सबसे अधिक है। पर जो भी हो उस बूढ़ी औरत से हफ्ते में दो बार मिलना हो ही जाता था। उसे देखकर यह कभी पता नहीं चलता था कि वह किसी बड़े घर की औरत रही होगी। पोशाक अरुणाचली और चेहरे पर ज़िन्दगी के थपेड़े और तिरस्कार साफ पता चलते थे। पर स्वाभिमान की भावना भी उतनी ही प्रबल दिखती थी। दो एक घर से उसे जितनी भीख मिलती थी उसके लिए काफी होता था तो वह वापस लौट जाती थी। मेहनती भी बहुत थी। पर बूढ़ी होने के कारण उसे कोई काम पर नहीं रख सकता था।           

             ऐसे ही एक दिन की बात है। पाहाड़ों पर अक्सर बादल ऐसे घूमते नज़र आते हैं जैसे कि वे बादल नहीं बल्कि कोई इन्सान हो। धीरे-धीरे बादलों के झुण्ड को चीरते हुए लकड़ी टेकते हुए बूड़ी अम्मा आ रही थी। उन दिनों खूब बारीश हो रही थी। इसलिए ठण्ड भी बहुत ज्यादा थी। बूड़ी अम्मा के शरीर पर कपड़े तो थे लेकिन वे शायद ठण्ड से बचने के लिए उतने काफी नहीं थे। वह हमारी लाइन में भीख मांगने आयी थी। एक तो ठण्ड उस पर से भूख। कैसी अवस्था होती है यह तो सिर्फ वही समझ सकती थी। वह आकर अपनी अरुणाचली तथा हिन्दी भाषा के मिश्रण में कहने लगी ---“मोइदा-ओइ-दे।” । हम सब भी उन्हें मोइदा-ओइ-दे बूढ़ी ही बुलाते थे। उसकी आवाज़ में भूख की पीढ़ा तथा आर्द्रता थी। हमारे क्वाटर के बायी तरफ जो कि मेन रोड से सटा था उसमें रहने वाली ऑन्टी ने उन्हें खाने के लिए कुछ दिया। फिर शायद उनसे कुछ कहने को हुई लेकिन बूढ़ी अम्मा कुछ न सुनते हुए दुबारा हम सभी के क्वाटर्स के सामने आकर भीख माँग रहीं थीं। जब वह हमारे घर के सामने आयी तो हमने भी अन्नदान दिया। लेकिन मन में न जाने किसी प्रकार का कोई संतोष नहीं हुआ। क्योंकि उन्हें जब भी मैं देखती तो लगता था कि उनके बारे में सबकुछ जान लू। उनका किचमिचाया हुआ चेहरा, दाँत को नाम पर केवल दो ही बचे है, सर पर एक कपड़ा पगड़ी के जैसे बांधे रहती थी। पाहाड़ी स्त्रियों के सिर पर कपड़ा माल ढोने तथा पाहाड़ी ठण्डक से बचने के लिए होता है। परन्तु यही कपड़ा उनकी पोशाक को और भी सुन्दर और विशेष बना देता है। हमारी मोइदा-ओइ-दे की पोशाक भी ऐसी ही थी। बस एक ही फ़र्क था कि कई पुराने मैले-कुचले कपड़े एक साथ पहने रखे थे उन्होंने। पहाड़ी रास्तों पर लगातार चलने की थकावट सबकुछ जैसे उन्हें अंदर से बहुत दुर्बल और दुखी कर रहा था। पर एक चीज़ थी, जब भी कोई उन्हें भीख देता तो वह उसे खुशी से आशीर्वाद जरूर देती। ये सब देखकर कभी-कभी सोचती कि विधाता की यह कैसी लीला है, जिस उम्र में उन्हें घर में आराम से रहना था, वह भिक्षा माँगकर अपना जीवन बिता रही हैं। भारत में वैसे भी भिक्षुको की कमी नहीं है। परन्तु वृद्धावस्था में किसी को भीख माँगते देख कुछ ज्यादा ही अजीब लगता है।

            एक दिन मैंने हमारे पास के क्वाटर के एक अंकल से यू ही इन बूढ़ी अम्मा के बारे में पूछ लिया था। तो पता चला कि आलोंग टाउन के ये कभी सबसे अमीर परिवार से हुआ करती थी। इनके चार-चार बेटे हैं, बड़ा घर है, गाड़ियाँ है। फिर एक दिन इनके पति ने किसी दूसरी महिला से शादी कर ली और इन्हें घर से निकाल दिया था। तब से ये भीख माँगकर अपना जीवन गुज़ार रही है। बस इतना ही पता है उनके बारे में। लेकिन जो भी हो उनको देखे बिना चैन नहीं आता था। हर हफ्ते न सही पर हर महीने का यही क्रम था। पर कभी-कभी सोचती थी कि एक बार कभी मौका मिले तो उन्हें पेट भर कर भोजन करता जरूर देखू। विधाता ने हमें यह मौका भी दिया। हमारी दादी माँ गुज़र चुकी थी। हर साल पिताजी घर पर उनकी बरसी मनाते थे और पूजा करते थे। सिलेठी परिवारों में एक रिवाज यह है कि दादी या नानी का यदि देहान्त हो तो उनके पोते या नाती द्वारा उनके श्राद्ध के समय पर एक छाता देना पड़ता है ताकि दिवंगत को स्वर्ग जाने में कोई कठिनाई न हो। उस दिन घर में जब पूजा हो रही थी तो यही बूड़ी अम्मा संयोग से भीख माँगने आयी। माँ ने उस दिन शुद्ध निरामिश भोजन बनाया था। पूजा लगभग समाप्त होने को आयी थी। हमने बूड़ी अम्मा को रोक लिया। वह भीख माँगने कही और जाना चाहती थी लेकिन हमने उन्हें किसी तरहा अपने घर पर रोक लिया। फिर पूजा समाप्त होते ही उन्हें केले के पत्ते पर भोजन परोसते हैं। उन्होंने इतना सारा भोजन कई शायद दिनों बाद देखा था। शायद इसीलिए वह इतना भोजन नहीं कर पा रही थी। उन्होंने जितना भोजन करना था सो किया लेकिन बाकी का उन्होंने अपनी थैली में भर लेना चाहा था। बेचारी क्या करती? कपड़े की मैली सी थैली में क्या-क्या भरती। फिर हमने किसी तरहा उन्हें कुछ डब्बों में भरकर भोजन बांध दिया। उसके बाद मुझे अचानक खयाल आया कि मेरा एक पुराना सलवार-सूट है जो मैं अब नहीं पहनती। मैंने उन्हें ले जाकर दिया तो उन्होंने उसे तुरंत पहन लिया। अपने बाकी मैले कपड़ों के ऊपर उस पुराने कुर्ते को पहन भी वह बहुत खुश हुई। आलोक ने उन्हें छाता भी दिया। उन्होंने ये सारी चिजे खुशी-खुशी ले ली। उसके बाद वह कई बार हमारे यहाँ भीख माँगने आती रही। शायद उन्हें ये लगता रहा होगा कि हम उन्हें खाने के लिए कुछ-न-कुछ देंगे। पर रोज-रोज हमारे लिए भी यह सम्भव नहीं हो पाता था। क्योंकि हम सभी घर से बाहर रहते थे और माँ घर के काम में व्यस्त या फिर क्वाटर के पीछे बने बागान में सब्जियों के पौधों में पानी डाल रही होती थी। इसलिए जब सम्भव होता उन्हें खाने के लिए हर रोज कोई-न-कोई  कुछ-न-कुछ ज़रूर दे देता था।  पर बहुत दिनों तक ये सिलसिला भी नहीं चला। दादी माँ की बरसी वाले दिन के बाद कुछ दिनों तक वे दिखी पर उसके बाद फिर वे हमें नहीं दिखी। विधाता जाने क्या हुआ? हमारी मोइदा-ओइ-दे बूढ़ी से दुबारा मुलाकात नहीं हुई। पर दादी माँ की बरसी के दिन जो अच्छे से मिले थे उतना आज तक याद है। 

            ये समृति कथा 1999-2000 के समय की है। अतः प्रकृति के नियम के अनुसार शायद वह अब इस लोक में नहीं है। प्रार्थना करती हूँ कि जहाँ भी वह रहे ईश्वर उनको शान्ति दे।

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

पिता को समर्पित


मैं पिता हूँ

संतान की मंगल कामना में

रात-दिन न, थकने वाला,

न रुकने वाला,

निशब्द, निर्विकार,

चलने वाला प्राणी हूँ।



एक हँसी संतान की जो

मन को तृप्ति से भर दे

एक परिचय जो संतान से मिले

उसी की आशा में जीवन बिता दे

हाँ मैं वही पिता हूँ।



मेरी घड़ी चल जाती है

बरसों तक

मेरे कपड़े नए हो जाते है

हर महिने

मेरे जूते चल जाते हैं

हर महिने

हाँ मैं वही पिता हूँ।



बिटियाँ के रसोई के खिलौने से

पेट भर जाता है मेरा

बेटे की टॉय साईकिल से

दुनियाँ घूम लेता हूँ।

मेरे नाम कई है

बाबा, अप्पा, देवता

पप्पा, बाबू, डेडी, डूड

हाँ मैं वही पिता हूँ।



बेटे की इच्छाओं का

मैं आकाश हूँ

बिटियाँ के सुख का

मैं प्रकाश हूँ

हाँ मैं वही पिता हूँ।



जब माँ न हो पास

तो मैं ममता हूँ

जब दादी न हो पास

तो मैं रस भरी कथा हूँ

जब दादा न हो पास

तो मैं कंधे की सवारी हूँ

हाँ मैं वही पिता हूँ।



जग में माँ का स्थान

कोई न ले पाएगा।

लेकिन यह भी सच है कि

पिता न कोई यू ही बन जाएगा।

मैं निरन्तर तपने वाला

एक तपस्वी हूँ

हाँ मैं पिता हूँ।


शनिवार, 4 अप्रैल 2020

माहामारी नहीं नयी शुरूआत


सुन रे मानव

ये वक्त की पुकार है

ये धरती लगा रही

तुझे कब से गुहार है



तू सोचता होगा

ऐसा आज क्या हो गया?

क्यों घर पर तू कैद है,

क्या गुनाह तुझसे हो गया?



तो सुन क्या कहती है

ये धरती...

एक सुन्दर सा खज़ाना दिया था

धरती ने तुझे

एक हरा-भरा जमाना दिया था

धरती ने तुझे

खुद की तरक्की के लिए जो चाहे तू ले ले

धरती से सब दिया, सारे तकलीफ झेले



मगर तू स्वार्थ में अंधा हो

इन्सान की जगह असुर बना

हदे सारी पार कर दी

धरती के लिए नासूर बना





एक वक्त आया ऐसा कि

स्वार्थ में तू बना इतना अंधा

धरती का विनाश ही

बन गया था तेरा धंधा।



ये धरती जो तेरी माँ है,

आखिर कब तक सहती रहती

तू क्या सोचे

वह कभी कुछ तुझे न कहती?



आज बारी आयी है उसकी

जो तू भूल गया था कि

इसमें मनुष्य के अलावा भी रहते हैं

प्राणी और कई

याद दिलाने आयी है उनकी।



पर तू घबरा मत

ये न सोच कि खत्म हो जाएगा

अब तेरा सबकुछ

बल्कि खत्म होगा सिर्फ

तेरा स्वार्थ

तेरा लालच

तेरी ईर्ष्या

तेरा क्रोध



मत भूल कि इसी धरती में

एक बीज को भी टूटना पड़ता है

मिट्टी में मिलना पड़ता है

तभी नया रूप वह धारण कर पाता है



यही धरती आज समझाने आयी है

महामारी नहीं ये नयी शुरूआत है

घर पर बैठ कर अब सोचना जरा गौर से

धरती भी गुज़री है तेरी चाहतो के दौर से



अब कुछ पल ठहर जा

सब होगा ठीक इस बार

अंधेरा मिटेगा

आएगी नयी सुबहा बहार



पर वादा कर

तू न भूलेगा इस सीख को

लेकर चलेगा साथ

धरती के हर प्राणी को



काट मत पेड़ो को

पर काट अपने स्वार्थ को

गंदा न कर नदी को

साफ रख अपने मन को

बंजर ज़मी दिखे तो

लालच न करना

हो सके तो मानवता का मंदिर

उसमें बनाना।